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तिहाड़ आइडल: सलाखों के पीछे छुपे कैदियों के ऐसे हुनर को देखकर आप रह जाएंगे दंग

Posted On: 6 Jan, 2016 social issues में

Pratima Jaiswal

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‘सुबह लिखती हूं शाम लिखती हूं, इस चारदीवारी में बैठी बस तेरा नाम लिखती हूं’

इन फासलों में जो गम की जुदाई है बस उसी को हर बार लिखती हूं’


‘तिनका-तिनका तिहाड़’ से ली गई इन पंक्तियों में सलाखों के पीछे रहने का एक छुपा दर्द कविता के रूप पिरोकर बयां किया गया है. क्या आपने कभी जेल के उस माहौल को महसूस किया है जहां आप एक दुनिया का हिस्सा होकर भी, एक ऐसी अकेली जगह पर हैं जहां की दीवारों से भी लोग बचकर चलना पसंद करते हैं और शायद यहां रहने वाले कैदियों के लिए दुनिया की सबसे प्यारी चीज है ‘आजादी’. जिसे हम जैसे बाहर की दुनिया में रहने वाले लोग नहीं समझ सकते. लेकिन जेल में अपने किए की सजा काट रहे इन कैदियों के बारे में, अधिकतर लोगों का ये मत हो सकता है कि ‘इनकी यही सजा है, ये लोग समाज में रहने लायक नहीं हैं. इनका चारदीवारी में रहना ही अच्छा है’.



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बिल्कुल, ऐसी राय को सरासर गलत भी नहीं कहा जा सकता लेकिन जरा एक बार फिर से सोचिए. सजा की अवधारणा क्या है ‘किसी भी इंसान को एक बार सुधरने का मौका देना’ (इसमें रेप जैसे जघन्य अपराध करने वाले लोग शामिल नहीं है ), वहीं जेल का अर्थ ‘सुधारगृह’ से लिया जाना चाहिए न कि बंदीगृह से. जहां जाने-अंजाने में अपराध कर चुके कैदियों के पास समाज की मुख्यधारा से जुड़ने का एक मौका और हो. लेकिन क्या आप जानते हैं एशिया की सबसे बड़ी जेल माने जाने वाली तिहाड़ में ऐसे कई काम किए जाते हैं जो तिहाड़ को बंदीगृह नहीं बल्कि सुधारगृह के रूप में दर्शाते हैं. कल्पना से परे सलाखों के पीछे छुपी तिहाड़ की कुछ ऐसी ही दिलचस्प बातों पर एक नजर डालते हैं.



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दीवार पर चित्रकारी से उतारी हुई अनकही कहानियां

अगर आप तिहाड़ जेल के पास से गुजेरेंगे तो आपकी नजर यहां की दीवारों पर उतारी गई सुदंर चित्रकारी और रंगीन शब्दों पर जरूर पड़ेगी. यहां दीवारों पर अंकित कुछ शब्द तो ऐसे हैं जो एक शब्द होने पर भी अपनी कहानी बयां कर देते हैं. जैसे तिहाड़ की एक कैदी सीमा रघुवंशी द्वारा अंकित एक कविता की पंक्ति ‘सुबह लिखती हूं शाम लिखती हूं’ राहगीरों को जरूर आकर्षित करती है. वहीं रंगीन शब्दों में लिखा ‘चारदीवारी’ शब्द में इन कैदियों का दर्द छलकता है.



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बदं कमरों में छुपा हुनर

तिहाड़ के कैदियों द्वारा नक्काशी और चित्रकारी से तैयार बनावटी सामान तैयार किए जाते हैं. जिसे अलग- अलग जगह मौजूद तिहाड़ हाट में बेचा जाता है. यही नहीं खाने-पीने के सामान जैसे बिस्कुट, नमकीन, बूंदी, मिठाई आदि को ‘टीजे’ ब्रांड के नाम से तिहाड़ हाट में बेचा जाता है. बताया जाता है ‘टीजे’ प्रॉडक्ट के लिए तिहाड़ का सालाना टर्नओवर 30-40 करोड़ रुपए है. जिसमें 10-11 घंटे काम करने के बदले कैदियों को 128 रुपए प्रतिदिन की मजदूरी दी जाती है.


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तिहाड़ फूड कोर्ट में चखिए कैदियों के हाथ का खाना

अगर आप खाने-पीने के शौकीन है तो एक बार तिहाड़ फूड कोर्ट का खाना भी जरूर चख कर आइए. घर जैसे खाने का लजीज अनुभव लेने के बाद आप एक बार इन कैदियों के बारे में जरूर सोचने पर मजबूर हो जाएंगे. हांलाकि यहां काम करने वाले कुछ कैदियों का कहना है कि अधिकतर लोग हमारे हाथों से बनाए गए खाने को तिरछी नजर से देखते हैं. साथ ही उनका मानना होता है कि हमारे हाथों न जाने कितने ही अपराध हुए होंगे लिहाजा अपराधियों के हाथों से बना खाना वो कैसे खा सकते हैं.


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कैदियों के हुनर को पहचान देता ‘तिहाड़ आइडल’

आपने टी.वी पर ‘इंडियन आइडल’ टैलेंट हंट का नाम तो जरूर सुना होगा लेकिन अगर कोई आपसे ‘तिहाड़ आइडल’ के बारे में बात करे तो आप उलझन में पड़ जाएंगे, लेकिन ये सच है सिंगिंग, डांसिंग, एक्टिंग आदि हुनर होने पर तिहाड़ कैदियों को तिहाड़ में आयोजित होने वाली प्रतियोगिता ‘तिहाड़ आइडल’ में परफॉर्म करने का मौका दिया जाता है. आने वाले समय में ‘तिहाड़ आइडल’ का तीसरा सीजन शुरू होने वाला है. 2012 से शुरू हुए इस रोमांचक टैलेंट हंट की शुरुआत में मशहूर गायक सोनू निगम ने अपनी मौजूदगी से सभी लोगों में जोश भर दिया था.


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तिहाड़ से अपनी म्यूजिक अकेडमी तक

तीन साल तिहाड़ में सजा काट चुके भागीरथ ने ‘तिहाड़ आइडल’ में भाग लेने के लिए म्यूजिक सीखा. 2012 ‘तिहाड़ आइडल’ के विजेता रहे भागीरथ बताते हैं ‘जेल से बाहर आने के बाद मेरे लिए जिदंगी को फिर से पटरी पर लाना आसान नहीं था. क्योंकि ये समाज जेल में सजा काट के आए किसी भी इंसान को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं करता. मेरे साथ भी बिल्कुल यही हुआ. यहां तक की मैंने कई टैलेंट हंट शो में ऑडिशन भी दिया लेकिन जैसे ही उन्हें मेरे बैकग्राउंड के बारे में पता चलता, मुझे रिजेक्ट कर दिया जाता. वहीं नौकरी मिलना तो दूर की बात थी. लेकिन मैंने हार नहीं मानी और अपने घर को गिरवी रखकर पश्चिम दिल्ली के नजफगढ़ में ‘R.D अकेडमी’ शुरू की. जिसमें म्यूजिक के प्रति रूचि रखने वाले बच्चों को म्यूजिक सिखाया जाता है. आज इस अकेडमी में 40 बच्चे हैं. मेरे इस काम में मेरे परिवारवालों ने खूब साथ दिया.’


तिहाड़ में कैदियों के जीवन में बदलाव करने के लिए चलाई जा रही इन दिलचस्प मुहिम से सलाखों के पीछे छुपी इन कहानियों को समाज द्वारा एक नए सिरे से पढ़ने की उम्मीद की जा सकती है. साथ ही इन कैदियों की जिदंगी को समझने के लिए इन दो पंक्तियों पर गौर किया जा सकता है

‘कौन है जिसने आज तक कोई गुनाह किया नहीं, फर्क इतना है कि कोई चारदीवारी में तो कोई सड़कों पर बेलगाम घूमता है’Next


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अब इस जेल में आप भी गुजार सकते हैं रातें…

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