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तुम्हारी कहानी : ९

Posted On: 30 Sep, 2016 Celebrity Writer,Hindi Sahitya,(1) में

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9 Chapter Jagran Junction

तुम्हारी कहानी : ९


[प्रकरण ८ के अन्तमे आपने पढ़ा : "नहीं, मैं महसूस कर रही हूँ कि मैं आपकी नज़रोंमें आपकी दोस्तीके काबिल नहीं." उसने सिसकते हुए कहा. उसकी आंखोंसे सावन भादों बह रहे थे.
कल रात जो कुछभी हुआ था उससे मुझे यही लगा था कि ये एक ऐसी औरत है जिसके अंदर अब भी बचपन ज़िंदा है. मैं उसे वाकई पसंद करने लगा था. मैंने उसकी ओर अपना हाथ बढ़ाया और कहा,
"मंदाकिनीजी, क्या आप मुझसे दोस्ती करेंगी?"
मैंने जैसा सोचा था वैसाही उसने किया. अपनी नज़र दूसरी ओर घुमा ली और फिर कहा,
"आकाशजी, मंदाकिनीजी दोस्तिजीमे तकल्लुफ्जी पसन्दजी नहीजी करतीजी."
"मंदाकिनी, मुझसे दोस्ती करोगी?" मैंने मुस्कुराते हुए उसे फिरसे पूछा.
उसने वापस अपना खूबसूरत चहेरा मेरी ओर घुमाया और मेरी आँखें उसकी आंखोंसे मिली. उसके होठों पर हल्कीसी मुस्कान थी पर आँखों में संवेदनाओं का सागर उमड़ रहा था. उसी क्षण मुझे अहेसास हुआ कि उसके साथ दोस्ती को दोस्तीके दायरे तक सिमित रखना बहोत मुश्किल होगा. वो संवेदनाका ऐसा उफान अपनेआपमे संजोये हुए बैठी थी जिसे बहने के लिए रास्ता और वजह चाहिए थे. वो रास्ता, वो वजह उसे मुझमे दिख रहे थे. अगर इसे मैं सम्हाल नहीं पाता तो एक साथ बहोत सारी ज़िन्दगियाँ तबाह हो सकती थी. लेकिन अब मैं खुद दोस्ती के लिए हाथ बढ़ा चुका था. उसने धीरे से अपना हाथ उठाया और मेरा हाथ थाम लीया.] आगे पढ़िए …

“मन्दाकिनी, मुझसे दोस्ती करोगी?” मैंने मुस्कुराकर अपना सवाल दोहराया. हालांकि वो मेरा हाथ थाम चुकी थी. पर मैं उसके मुंहसे सुनना चाहता था. अचानक उसकी आंखोंमें शरारत झलक उठी. उसने हलके से मुस्कुराकर मुझे कहा,

“जब आपने फूलदानसे मेरी तस्विरको तोडा तभीसे मैंने आपको मेरा दोस्त समझ लिया था. अरनॉबको मैंने रातको ही कहे दिया था कि मुझे एक अच्छा दोस्त मिल गया है. उन्हेंभी हमारी दोस्ती पसंद आयी. दिल्ली पहूंचतेही उन्होंने मुझे फ़ोन करके बोला कि मैं आपको हमारे यहाँ रहनेके लिए इन्वाइट करूँ. जब सुबह दस बजे मैं आपको जगाने आयी तो आप बच्चोंकी तरह सो रहे थे. सो मैंने सोचा कि मैं आपका सब सामान यहाँ ले आऊं.” उसने कहा.

उसकी बात सुनकर मुझे ख़ुशी भी हो रही थी और गभराहट भी. मेरे व्यवसायमें मेरी बहोत सारी महिलाओंसे मित्रता थी. उन सबके बारेमे मेरी पत्नी अणिमा जानती थी और कुछ के साथ तो उसकी भी बहोत अच्छी दोस्ती हो गयी थी. इसलिए आम तौर पर किसी भी महिलासे मित्रता करते हुए मुझे कोई परेशानी नहीं होती थी. मगर न जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहाथा कि मंदाकिनीसे मेरी दोस्ती मेरे जीवनमें कुछ उथलपुथल अवश्य लेकर आएगी.

“क्या सोचमे पड़ गए आप?” उसने पूछा.

“आप दस बजे आई थी? आई मीन कमरेके अंदर आई थीं?” मैंने जवाबमे प्रश्न पूछा.

“हाँ.सर्किट हाउस जो जाना था आपका सामान लाने. पहले मैंने दरवाज़े पर नॉक किया. फिर जब आपने नहीं खोला तो मैंने हलकेसे धक्का दिया और दरवाज़ा खुल गया.” उसने मुस्कुराकर कहा, “मैं नीचे लंचके लिए आपका इंतज़ार कर रही हूँ. और हाँ, वहां ड्रेसिंग टेबलके पास स्लिपर्स है जिन्हें आप घरमे पहन सकते हो.” कहकर वो चली गई.

उसके जाने के बाद मैं खिडकीके पास जाकर खड़ा रहा. यह बंगला शहरसे थोड़ा दूर बना हुआ था इसलिए आस पास भी काफी दूर तक हरियाली थी. विशाल कंपाऊंडमे लॉन थी और काफी पेड़ पौधे और बेलें नज़र आ रही थी. दोपहरके वक्तभी कुछ पंछी विविध पेड़ों पर चहक रहे थे. हर तरफ जैसे उसका अंदरूनी व्यक्तित्व बिखरा पड़ा था. बहोत ही कमालकी औरत थी वो. मेरी हर सुविधाका उसने ख़याल रखा था.

लंचके दौरान हमारे बीचमे काफी बातचीत हुई. बड़े सलीक़ेसे उसने बात बातमें मेरी पसंद नापसंद जान ली. उसने ऑफ व्हाइट कलरकी साड़ी पहन राखी थी जिसमे वो बहोत ही सुन्दर लग रही थी. बात बातमे मुझे ज्ञात हुआ कि उसने मेरी खातिरदारीके लिए आज अपने ऑफिससे छुट्टी ली थी. उसने दूसरे दिने उसके ऑफिसमे आनेका मुझे न्योता दिया जो मैंने सहर्ष स्वीकार लिया. ज़िल्लेके वन विभाग का मुख्य कार्यालय राज नगरमे था. वास्तवमे यह राज्य के तीन ज़िल्लेमे व्याप्त जंगलका मुख्यालय था. ये सारा वन विस्तार एक तरहसे उसके आधीन था.चूँकि मुझे यहाँ शूटिंग करनी थी और लोकेशन भी देखने थे इस लिए इसी विभागसे भविष्यमे शूटिंगका परमिशन और लोकेशन देखनेके लिए मार्ग दर्शन मिलने वाला था. मन्दाकिनीसे दोस्ती हो जानेके बाद मेरा काम बहोत सरल हो गया था पर कुछ औपचारिकताओंके लिए भविष्यमे मुझे अपने प्रोडक्शन मेनेजर को इस ऑफिसमे भेजनेकी आवश्यकता पड़ने वाली थी. इसके आलावा मुझे उसका व्यवसाय भी काफी दिलचस्प लगा. एक अच्छे फॉरेस्ट ऑफिसरको कितनी सारी चीजों का ज्ञान होता है वो उसके साथकी बातचीतमें समझ आ रहा था. हमारी प्यारी पृथ्वीको तंदुरस्त रखनेके लिए सन्निष्ठ वनकर्मी अति आवश्यक है. ये हमारा दुर्भाग्य है कि व्यवसायकी इस शाखाकी ओर हमारे समाजमे इतनी समझ और जागरुकता नहीं है. हमारे देशके प्रशासनिक बुनियादी ढाँचेमें आईएफएस ( IFS ) महकमा भी आईएएस ( IAS ) और आईपीएस ( IPS ) जितनाही दिलचस्प और सन्माननीय है उसका ज्ञान आम जनता तक अभी तक नहीं पहोंच पाया. हमारे देश और विश्वकी सार्वत्रिक सुखाकारी हमारे जंगल और वन्य सृष्टिके संरक्षण पर निर्भर करते है जिसका ज़िम्मा इन वन कर्मियोंके कन्धों पर है. मन्दाकिनीसे बात करते करते मेरे अंदरका लेखक इन सब बातोंके बारेमे गंभीरतासे सोचने लगा था. मेरे साथ वो हंसती खिलखिलाती बातें कर रही थी जिसे देख के कोई ये नहीं कहे सकता था कि ये औरत कितना बड़ा ज़िम्मेदारी वाला काम कर रही है. उसके साथ बातों ही बातों में शाम हो गयी. जैसे जैसे मैं उसके साथ बात करते जाता था उसके अंदर रही एक बहोत ही सशक्त नारी मेरे सामने उजागर हो रही थी. वो बहोत ही अच्छी तरह से फायर आर्म्स का इस्तेमाल कर सकती थी .

मैंने उससे पूछा,”इस प्रकारके हथियार चलाना सीखनेकी क्या आवश्यकता है? इस लिए कि आपको हमेशा जंगलमे घूमना पड़ता है और हिंसक पशुओंका भय रहता है? अपने बचावके लिए?”

अचानक वो गंभीर हो गयी. उसने मेरी ओर देखा. एक क्षण में वो अल्हड़पन उसकी आंखोंमेंसे गायब हो गया. उसकी आंखोंमें एक तेज चमका. वो बोली, “अपने बचावके लिए, आपने सही सोचा. लेकिन किसी पशुके भय से नहीं पर इंसानके भय से.जानवर कुदरतके नियमोंका पालन करता है और अपनी मूल प्रकृतिके अनुसार चलता है पर इंसान कुदरतके नियमोंका उल्लंघन करता है और उसकी प्रकृति, उसकी फ़ितरत, उसकी जरुरत और लालचके अनुसार बदलती रहती है.” उसके बाद वो खामोश हो गई.

मैं समझ गया कि वो अपने कार्यक्षेत्रमें इंसानोंके द्वारा किये जाने वाले गैरकानूनी कामोंकी ओर इशारा कर रही थी. यह भी एक बहोत ही रोचक विषय था. इस विषय पर मैं उसके साथ अधिक बात करना चाहता था पर अचानक वातावरण बहोत ही गंभीर हो गया. ऐसा लगता था जैसे उसका कोई घाव रिसने लगा हो. चाय बनानेके बहाने वो मेरे सामनेसे उठके किचनमें चली गई. थोड़ी देर बाद वो वापस आई और बोली,

“आकाश आओ हम थोड़ा बाहर कंपाउंडमें टहलते है. धम्मा दादा बैकयॉर्डमे चाय लेकर आएंगे.”

बंगलेके पीछे के हिस्सेमे हम दोनों टहलने लगे. वो हँसने कोशिश कर रही थी पर उसकी आँखोंमें दर्द रह रह कर झलक रहा था. शामका अँधेरा छाने लगा था. बंगलेके पीछे एक हिस्सेमे पेड़ों के बिच अँधेरा था. चलते चलते हम वहां पहोंचे तो उसने मेरा हाथ थाम लिया और मेरी ओर मुड़ी. अंधेरेमेभी मैं उसकी आंखोंमें नमी देख सकता था. उसके होंठ हलकेसे थर थराये. वो धीमे से बोली,

“आकाश, न जाने क्यों मैं तुम पर बहोत भरोसा करने लगी हूँ. मैं कभी तुम्हारे लिए समस्या खड़ी नहीं करुँगी पर एक दोस्त के रूपमें मुझे तुम्हारा साथ चाहिए.”

“तुम मुझपर भरोसा कर सकती हो मन्नो.” अनायास मैने उसे मन्नो कहकर पुकारा. उसकी आँखें चमक उठी और होठों पर मुस्कराहट आ गई.

“तो चलो हम चाय पीते है.” उसने कहा. मैंने देखा की धम्मा दादा बैकयार्डमें बने शेडक़े नीचे टेबल पर चाय का ट्रे रख रहे थे. हम उस तरफ चल पड़े. चलते चलते मैं सोच रहा था की कोई न कोई ऐसी बात है जो मन्दाकिनीको परेशान कर रही है. लेकिन ऐसा क्या हो सकता है? मै ये भी समझ रहा था कि ये बात घरेलु नहीं है. लेकिन जैसाकि मैं जानता था वो खुद बहोत ही शक्तिशाली पद पर आसीन अधिकारी थी और उसका पति भी जिल्लेका सबसे शक्तिशाली अधिकारी था. हालांकि मन्दाकिनी अब वापस पहलेकी तरह शरारत पर उत्तर आई थी. उसके साथ मैं हँसते हुए जाकर चायके टेबलके पास पहुंचा लेकिन मेरा मन काफी कुछ सोच रहा था. अक्सर अखबारोंमें और टेलीविज़न पर जंगलमें होनेवाले गुनाहोंके बारे में पढ़ा और देखा था. क्या कोई ऐसी बात थी जो उसे परेशान कर रही थी? सोचते सोचते मैं उसके साथ चाय पीने लगा.



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