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अपनी मासूम दुनिया छोड़कर अपराध की ओर क्यों रूख कर रहे हैं बच्चे

Posted On: 9 Nov, 2016 Junction Forum में

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‘मेरे मन के एक छोटे-से कोने में एक मासूम-सा बच्चा रहता है, जो बड़ों की दुनिया देखकर बड़ा होने से डरता है.’

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माना जाता है कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं. आज के बच्चे जितने कुशल और शिक्षित बनेंगे, देश की भावी पीढी उतनी ही जिम्मेदार होगी. आधुनिक युग में आज समाज से लेकर सरकार सभी बच्चों के भविष्य के प्रति अपनी जिम्मेदारियां सुनिश्चित कर रहे हैं, लेकिन बात करें आज की, तो वक्त तेजी से बदल रहा है. बदलाव की इस बयार में अब बच्चों को समझना पहले से कहीं अधिक जटिल हो गया है. जिसका एक उदाहरण है बच्चों में बढ़ती अपराधिक प्रवृत्ति.


सोचिए, आपके पड़ोस में कोई 13-14 साल का एक मासूम-सा दिखने वाला लड़का रहता है. जिसे आप रोज उसके दोस्तों के साथ खेलते-कूदते हुए देखते हैं, लेकिन एक रोज वो आपको अखबार और न्यूज की सुर्खियों में दिखाई देता है, जिसने किसी बड़ी अपराधिक घटना को अंजाम दिया होता है.


आप किसी भी अखबार या न्यूज चैनल को देख लीजिए, आपको किसी किशोर से जुड़ी हुई कोई न कोई अपराधिक घटना जरूर मिल जाएगी. बेशक, भारतीय संविधान में हर अपराधी के लिए सजा का प्रावधान है, लेकिन सोचने वाली ये बात है कि इस क्रांतिकारी युग में बच्चे अपनी मासूम दुनिया को छोड़कर अपराध की ओर क्यों मुड़ रहे हैं?


अगर बात करें समाज की, तो कहीं न कहीं परिवारों का बिखराव और परिवारजनों की व्यस्तता का प्रभाव भी बच्चों के कोमल मन पर पड़ा है. वहीं डिजीटल दुनिया की नजदीकी ने अपनों को बच्चों से दूर कर दिया है, जिससे वो अपने मन के भावों को कहने से ज्यादा भूलने पर यकीन करने लगे हैं. मन की बातों को किसी से न कह पाने की स्थिति, आगे जाकर उनके लिए ही नहीं बल्कि समाज और देश के लिए खतरनाक साबित होती है.


आपको क्या लगता है बच्चे अपराध की ओर क्यों रूख कर रहे हैं? उन्हें ऐसी स्थिति से कैसे बचाया जा सकता है? एक अभिभावक या जिम्मेदार नागरिक होने के नाते इस दिशा में आपकी क्या जिम्मेदारियां हैं? आप अपने विचार ‘जागरण जंक्शन’ के साथ सांझा कर सकते हैं.


नोट : अपना ब्लॉग लिखते समय इतना अवश्य ध्यान रखें कि आपके शब्द और विचार अभद्र, अश्लील और अशोभनीय न हो तथा किसी की भावनाओं को चोट न पहुंचाते हो.



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