JagranJunction Blogs

Aapki Awaaz, Aapka Blog. Your Voice, Your Blog.

60,000 Posts

72116 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1 postid : 1296373

कैशलेस जमाना धीरे-धीरे आई बबुआ

  • SocialTwist Tell-a-Friend

कैशलेस जमाना धीरे-धीरे आई बबुआ
दौर-ए-नोटबंदी। नया शहर और नए लोग। गली-बाजार, नाई-हलवाई, पंसारी-पनवाड़ी सब अनजाने। जेब में नोट। लेकिन खर्च होने पर एटीएम की लाइन में दिन-दिनभर खड़े रहने का डर। फिर भी एटीएम कार्ड में पैसा है, पेटीएम में पैसा है का दंभ। सोचा क्यों न ऊपर से आधा काला, नीचे आधा सफेद नजर आ रहे बालों की डेंट-पेंट करा ली जाए। नदेसर में होटल ताज वाली सड़क पर तीन-चार हाई-फाई नजर आ रहे सैलूनों की ओर कदमताल कर डाली। घुसते ही तनिक झिझकते हुए मेरा सवाल होता-पेटीएम से पेमेंट लेते हो क्या?  जवाब मिलता-’अभी नहींÓ। फिर एक सवाल..और कार्ड स्वाइप। फिर वहीं जवाब-’अभी नहींÓ। करीब दो किलोमीटर की चक्कर लगाने के बाद सोचा फिर कभी देखेंगे। चलो लौटते हैं। बगल सड़क एक पान की दुकान पर अड़ीबाजी की अंदाज में जमे लोग। भीड़ है तो नाम होगा, नाम है तो पान भी अच्छा होगा। यही सोचकर मैं भी दुकान की ओर मुड़ गया। एक पान हमहूं क खिलाय द भइया..कह कर तमाशबीन बन गया। बड़ी गंभीर बहस हो रही थी। पनवाड़ी का सवाल था-’ई कैशलेस, पेटीएम का होत हौÓ…इसको परिभाषित करने में तीन-चार लोग अपना सारा ज्ञान उड़ेले पड़े थे। तब तक एक सेल्समैन ने पॉस निकाला-’अरे गुरू छोड़ा जायेदा एटीएम-पीटीएम। ई देखा पॉस मशीन। एहमा कार्ड डाला अउर पेमेंट डन।Ó बहस-मुबाहिशे का गवाह बने बनते-बनते दस मिनट बीत गए। पैदल चलने से थकन की झल्लाहट में तनिक जोर से बोला-’एक पान हमहूं क देबा।Ó इस बार आवाज पनवडि़ए के कानों तक जा पहुंची। पान दिया और मैं घुलाता हुआ आगे चल दिया। एटीएम, पेटीएम को कोसता हुआ। नकदी संकट को रोता हुआ। धीरे-धीरे सोचता हुआ-मोदी मालिक तो कैशलेस का फोकटियां मंतर दे दिये। सुना कितने लोगों ने…आजमाया कितनों ने। अंतत: नकदी खर्च न करने का संकल्प टूट ही गया। रिक्शा पकड़ कर आगे मलदहिया की ओर बढ़ गया गुनगुनाते हुए-एप से आई, स्वाइप से आई। एटीएम से आई, पेटीएम से आई। कैशलेस जमाना धीरे-धीरे आई बबुआ।
कैशलेस जमाना धीरे-धीरे आई बबुआ
दौर-ए-नोटबंदी। नया शहर और नए लोग। गली-बाजार, नाई-हलवाई, पंसारी-पनवाड़ी सब अनजाने। जेब में नोट। लेकिन खर्च होने पर एटीएम की लाइन में दिन-दिनभर खड़े रहने का डर। फिर भी एटीएम कार्ड में पैसा है, पेटीएम में पैसा है का दंभ। सोचा क्यों न ऊपर से आधा काला, नीचे आधा सफेद नजर आ रहे बालों की डेंट-पेंट करा ली जाए। नदेसर में होटल ताज वाली सड़क पर तीन-चार हाई-फाई नजर आ रहे सैलूनों की ओर कदमताल कर डाली। घुसते ही तनिक झिझकते हुए मेरा सवाल होता-पेटीएम से पेमेंट लेते हो क्या?  जवाब मिलता-’अभी नहींÓ। फिर एक सवाल..और कार्ड स्वाइप। फिर वहीं जवाब-’अभी नहींÓ। करीब दो किलोमीटर की चक्कर लगाने के बाद सोचा फिर कभी देखेंगे। चलो लौटते हैं। बगल सड़क एक पान की दुकान पर अड़ीबाजी की अंदाज में जमे लोग। भीड़ है तो नाम होगा, नाम है तो पान भी अच्छा होगा। यही सोचकर मैं भी दुकान की ओर मुड़ गया। एक पान हमहूं क खिलाय द भइया..कह कर तमाशबीन बन गया। बड़ी गंभीर बहस हो रही थी। पनवाड़ी का सवाल था-’ई कैशलेस, पेटीएम का होत हौÓ…इसको परिभाषित करने में तीन-चार लोग अपना सारा ज्ञान उड़ेले पड़े थे। तब तक एक सेल्समैन ने पॉस निकाला-’अरे गुरू छोड़ा जायेदा एटीएम-पीटीएम। ई देखा पॉस मशीन। एहमा कार्ड डाला अउर पेमेंट डन।Ó बहस-मुबाहिशे का गवाह बने बनते-बनते दस मिनट बीत गए। पैदल चलने से थकन की झल्लाहट में तनिक जोर से बोला-’एक पान हमहूं क देबा।Ó इस बार आवाज पनवडि़ए के कानों तक जा पहुंची। पान दिया और मैं घुलाता हुआ आगे चल दिया। एटीएम, पेटीएम को कोसता हुआ। नकदी संकट को रोता हुआ। धीरे-धीरे सोचता हुआ-मोदी मालिक तो कैशलेस का फोकटियां मंतर दे दिये। सुना कितने लोगों ने…आजमाया कितनों ने। अंतत: नकदी खर्च न करने का संकल्प टूट ही गया। रिक्शा पकड़ कर आगे मलदहिया की ओर बढ़ गया गुनगुनाते हुए-एप से आई, स्वाइप से आई। एटीएम से आई, पेटीएम से आई। कैशलेस जमाना धीरे-धीरे आई बबुआ।

cashlesslogo

दौर-ए-नोटबंदी। नया शहर और नए लोग। गली-बाजार, नाई-हलवाई, पंसारी-पनवाड़ी सब अनजाने। जेब में नोट। लेकिन खर्च होने पर एटीएम की लाइन में दिन-दिनभर खड़े रहने का डर। फिर भी एटीएम कार्ड में पैसा है, पेटीएम में पैसा है का दंभ। सोचा क्यों न ऊपर से आधा काला, नीचे आधा सफेद नजर आ रहे बालों की डेंट-पेंट करा ली जाए। नदेसर में होटल ताज वाली सड़क पर तीन-चार हाई-फाई नजर आ रहे सैलूनों की ओर कदमताल कर डाली। घुसते ही तनिक झिझकते हुए मेरा सवाल होता-पेटीएम से पेमेंट लेते हो क्या?  जवाब मिलता-’अभी नहींÓ। फिर एक सवाल..और कार्ड स्वाइप। फिर वहीं जवाब-’अभी नहींÓ। करीब दो किलोमीटर की चक्कर लगाने के बाद सोचा फिर कभी देखेंगे। चलो लौटते हैं। बगल सड़क एक पान की दुकान पर अड़ीबाजी की अंदाज में जमे लोग। भीड़ है तो नाम होगा, नाम है तो पान भी अच्छा होगा। यही सोचकर मैं भी दुकान की ओर मुड़ गया। एक पान हमहूं क खिलाय द भइया..कह कर तमाशबीन बन गया। बड़ी गंभीर बहस हो रही थी। पनवाड़ी का सवाल था-’ई कैशलेस, पेटीएम का होत हौÓ…इसको परिभाषित करने में तीन-चार लोग अपना सारा ज्ञान उड़ेले पड़े थे। तब तक एक सेल्समैन ने पॉस निकाला-’अरे गुरू छोड़ा जायेदा एटीएम-पीटीएम। ई देखा पॉस मशीन। एहमा कार्ड डाला अउर पेमेंट डन।Ó बहस-मुबाहिशे का गवाह बने बनते-बनते दस मिनट बीत गए। पैदल चलने से थकन की झल्लाहट में तनिक जोर से बोला-’एक पान हमहूं क देबा।Ó इस बार आवाज पनवडि़ए के कानों तक जा पहुंची। पान दिया और मैं घुलाता हुआ आगे चल दिया। एटीएम, पेटीएम को कोसता हुआ। नकदी संकट को रोता हुआ। धीरे-धीरे सोचता हुआ-मोदी मालिक तो कैशलेस का फोकटियां मंतर दे दिये। सुना कितने लोगों ने…आजमाया कितनों ने। अंतत: नकदी खर्च न करने का संकल्प टूट ही गया। रिक्शा पकड़ कर आगे मलदहिया की ओर बढ़ गया गुनगुनाते हुए-एप से आई, स्वाइप से आई। एटीएम से आई, पेटीएम से आई। कैशलेस जमाना धीरे-धीरे आई बबुआ।

———-दौर-ए-नोटबंदी। नया शहर और नए लोग। गली-बाजार, नाई-हलवाई, पंसारी-पनवाड़ी सब अनजाने। जेब में नोट। लेकिन खर्च होने पर एटीएम की लाइन में दिन-दिनभर खड़े रहने का डर। फिर भी एटीएम कार्ड में पैसा है, पेटीएम में पैसा है का दंभ। सोचा क्यों न ऊपर से आधा काला, नीचे आधा सफेद नजर आ रहे बालों की डेंट-पेंट करा ली जाए। नदेसर में होटल ताज वाली सड़क पर तीन-चार हाई-फाई नजर आ रहे सैलूनों की ओर कदमताल कर डाली। घुसते ही तनिक झिझकते हुए मेरा सवाल होता-पेटीएम से पेमेंट लेते हो क्या?  जवाब मिलता-’अभी नहींÓ। फिर एक सवाल..और कार्ड स्वाइप। फिर वहीं जवाब-’अभी नहींÓ। करीब दो किलोमीटर की चक्कर लगाने के बाद सोचा फिर कभी देखेंगे। चलो लौटते हैं। बगल सड़क एक पान की दुकान पर अड़ीबाजी की अंदाज में जमे लोग। भीड़ है तो नाम होगा, नाम है तो पान भी अच्छा होगा। यही सोचकर मैं भी दुकान की ओर मुड़ गया। एक पान हमहूं क खिलाय द भइया..कह कर तमाशबीन बन गया। बड़ी गंभीर बहस हो रही थी। पनवाड़ी का सवाल था-’ई कैशलेस, पेटीएम का होत हौÓ…इसको परिभाषित करने में तीन-चार लोग अपना सारा ज्ञान उड़ेले पड़े थे। तब तक एक सेल्समैन ने पॉस निकाला-’अरे गुरू छोड़ा जायेदा एटीएम-पीटीएम। ई देखा पॉस मशीन। एहमा कार्ड डाला अउर पेमेंट डन।Ó बहस-मुबाहिशे का गवाह बने बनते-बनते दस मिनट बीत गए। पैदल चलने से थकन की झल्लाहट में तनिक जोर से बोला-’एक पान हमहूं क देबा।Ó इस बार आवाज पनवडि़ए के कानों तक जा पहुंची। पान दिया और मैं घुलाता हुआ आगे चल दिया। एटीएम, पेटीएम को कोसता हुआ। नकदी संकट को रोता हुआ। धीरे-धीरे सोचता हुआ-मोदी मालिक तो कैशलेस का फोकटियां मंतर दे दिये। सुना कितने लोगों ने…आजमाया कितनों ने। अंतत: नकदी खर्च न करने का संकल्प टूट ही गया। रिक्शा पकड़ कर आगे मलदहिया की ओर बढ़ गया गुनगुनाते हुए-एप से आई, स्वाइप से आई। एटीएम से आई, पेटीएम से आई। कैशलेस जमाना धीरे-धीरे आई बबुआ।


Tags:             

Rate this Article:

0 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 5 (0 votes, average: 0.00 out of 5, rated)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran