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श्रीमद् भगवत गीता का सार (गीता जयन्ती दिसम्बर १०) पर विशेष

Posted On: 9 Dec, 2016 Others में

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जय श्री राम  गीता भगवन कृष्णा का अर्जुन को दिया हुआ युद्द के मैदान में दिया उपदेश है इसलिए इसे दिव्य वाणी कहते है!ये सब शास्त्रों का निचोड़ है और जीवन का शास्त्र है और इसमें कर्मा,ज्ञान भक्ति की बहुत सुन्दर व्याख्या है!आज कल हरियाणा में 5 दिन का गीता महोत्सव कुरुक्षेत्र में मनाया गया जिसमे देश विदेश से बहुत से लोग आये है.!१८००० स्कूली बच्चो द्वारा एक साथ गीता के स्लोको का गायन बहुत मनमोहक था.विश्व के कई देशो में इसको पाठ्यक्रम में शामिल कर इस पर शोध भी होती है!इसे गंगा से भी ज्यादा पवित्र माना जाता है क्योंकि गंगा में जाकर नहाने पर नहाने वाले को ही मोक्ष मिलती जबकि गीता पढने सुनने वाले को कही पर पढने सुनाने से मोक्ष मिल जाती है!

१. सांसारिक मोह के कारण की मनुष्य “मै क्या करू और क्या नहीं करू “-इस दुविधा में फंस कर कर्तव्यचुत हो जाता है !अत:मोह या सुखासक्ति के वशीभूत नहीं होना चाइये2.शरीर नाशवान है और उसे जाननेवाला शरीरी अविनाशी है -इस विवेक को महत्व देना और अपने कर्तव्य का पालन करना- इन दोनों में से किसी भी एक उपाय को लाम में लाने से चिंता-शोक मिट जाते है !

3.निष्कामभाव पूर्वक केवल दुसरो के हित के लिए अपने कर्तव्य का तत्परता से पालन करने मात्र से कल्याण हो जाता है!

4.कर्मबंधन से छूटने के दो उपाय है -कर्मो के तत्त्व को जानकार नि:स्वार्थ भाव से कर्म करना और तत्त्वज्ञान का अनुभव करना!

5.मनुष्य को अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितियो के आने पर सुखी दुखी नहीं होना चाइये,क्योंकि इनसे सुखी दुखी होने वाला मनुष्य संसार से ऊंचा उठकर परम आनंद का अनुभव नहीं कर सकता! 6.किसी भी साधन से अन्त:करण में समता आनी चाइये !समता आये बिना सर्वथा निर्विकल्प नहीं हो सकता!

7.सबकुछ भगवान् ही है -ऐसा स्वीकार कर लेना सर्वश्रेष्ठ साधन है!

8.अन्तकालीन चिंतन के अनुसार ही जीव की गति होती है !अत:मनुष्य को हरदम भगवान् का स्मरण करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाइये,जिससे अन्तकाल में भगवान की स्मृति बनी रहे.!

9.सभी मनुष्य भगवत्प्राप्ति के अधिकारी है चाहे वे किसी भी वर्ण,आश्रम,सम्प्रदाय .देश,वेश आदि के क्यों न हो !

१०.संसार में जहां भी विलक्षणता,विशेषता,सुन्दरता महत्ता,विद्वता ,बलवता आदि दिखे उसको भगवान् का ही मानकर भगवान् का ही चिंतन करना चाइये.

११.इस जगत को भगवान् का ही स्वरुप मानकर प्रत्येक मनुष्य भगवान् के विराट रूप का दर्शन कर सकता है!

१२.जो भक्त शरीर -इन्द्रियां -मन-बुद्धि सहित अपने आपको भगवान् के अर्पण कर देता है व भगवान् को प्रिय होता है!

१३.संसार में एक परमात्मतत्व की जानेयोग्य है !उसको जानने पर अमरता की प्राप्ति हो जाती है!

१४.संसार-बंधन से छूटने के लिए सत्व,रज,और तम -इन तीन गुणों से अतीत होना जरूरी है !अनन्यभक्ति से मनुष्य इन तीनो गुणों से अतीत हो जाता है!

१५.इस संसार का मूल आधार और अत्यंत क्ष्रेष्ठ परमपुरुष एक परमात्मा ही है-ऐसा मानकर अनन्यभाव से उनका भजन करना चाइये!

16.दुर्गुण-दुराचारो से ही मनुष्य चौरासी लाख योनियो एवं नार्को में जाता है और दुःख पाटा है!अत:जन्म-मरण के चक्र से छूटने के लिए दुर्गुण-दुराचारो का त्याग करना आवश्यक है !

१७.मनुष्य श्रद्धा पूर्वक जो भी शुभ कार्य करे उसको भगवान् का स्मरण करके नाम का उच्चारण करके ही आरम्भ करना चाइये!

18.सब ग्रंथो का सार वेद है ,वेदों का सार उपनिषद है ,उपनिषदों का सार गीता है और गीता का सार भगवान् की शरणागति है !जो अनन्यभाव से भगवान् की शरण हो जाता है उसे भगवान् संपूर्ण पापो से मुक्त के देते है !

आभार- कल्याण दिसम्बर २०१६

रमेश अग्रवाल -कानपुर



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