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जीवन का मतलब

Posted On: 25 Dec, 2016 कविता में

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कभी तो रुको,

सोचो खड़े होकर,

कहाँ ले आये हो खुद को,

कितनी दूर आ गए हो तुम|

कभी तो मुड़ो,

और देखो उन खुशियों को,

जिसे छोड़ आये हो तुम,

पीछे किसी रास्ते में|

कभी तो सोचो,

कि क्या तुम वही हो,

जो कभी बनना चाहते थे,

या क्या पाया इस दुनिया में तुमने|

कभी तो जानो,

कि दौलत जिसे तुम अपना कहते हो,

तुम्हें बस आराम दे सकती है,

चैन कभी नही|

कभी तो समझो,

खुशियां दुसरो के प्यार से मिलती है,

और प्यार,

हमेसा दिल से होता है|

कभी तो बनाओ,

अपनी जिंदगी को जिंदगी की तरह,

जहा हो दुसरो की खुशिया पहले,

और अपना स्वार्थ अंत में|

कभी तो बनो,

प्यार का वो समंदर,

कि कोई भी खत्म न कर सके,

इंसानियत के पानी को तुम्हारे दिल से|

कभी तो रुको ,

कभी तो सोचो,

कभी तो समझो,

कि ये जीवन बस तुम्हारा है,

और तुमसे बेहतर इसे कोई नही जी सकता|

और अंत में प्रज्वलित करो,

इंसानियत की वो मसाल,

जो बदल दे इस दुनिया में ,

जीवन की परिभाषा|

-विजय कुमार खेमका



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