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"विदाई भाषण"

Posted On: 13 Jan, 2017 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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13/1/17
अंकल सैम…
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“विदाई भाषण”
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मेरे सामने भावुक ओबामा का चित्र है. वे रूमाल से आँख की कोरों को सोखने का प्रयास करते दिख रहे हैं. अब यह फॉरेंसिक साइंस का विषय है कि उनके रूमाल में खो गए आंसू कितने सच्चे हैं ? सिर्फ़ स्पर्श से मुश्किल है कि उनके इस रूमाल की नमी कितनी मानवीय है और कितनी बनावटी ?
‘क्रेमलिन’ ( रूसी सरकार का किला ) चाहे तो इस रूमाल को अपने कब्ज़े में लेकर दूध-का-दूध…पानी-का-पानी कर सकती है. ट्रंप के बहाने आख़िर जाते-जाते ओबामा अपने प्रशंसक अमेरिकियों को उनसे बचे रहने की सलाह जो दे गए हैं. हैकर टीम के साथ पुतिन सूचित
हों !
विदाई स्वाभाविक है. यह एक पारी की समाप्ति की सूचना तो नई भूमिका का प्रस्थान बिंदु भी है. राष्ट्रपति के रूप में ओबामा आठ साल तक उस अमरीका का हिस्सा रहे जो आज भी अपनी ‘चौधरी’ भूमिका के लिए कुख्यात है. जो आज भी अपने हथियारी फ़ायदे के लिए ‘आतंक’ के बीज रोपने में सिद्ध हस्त है.
सर्वाधिक भस्मासुर पैदा करने का श्रेय उसे ही जाता है. तभी तो हम ओबामा की उस ‘मुस्लिम’ पीड़ा के छद्म की बात छेड़ना चाहते हैं जो विदाई भाषण के केंद्र में था.
आठ साल लम्बी मैराथन पारी खेलने के बाद ओबामा ने अपने लिए नया रोल चुन रखा होगा. अमरीका का पूँजीवाद कभी ‘रिटायर’ नहीं होता. उन्हें शुभकामनाएं. लेकिन हम चाहेंगे कि वे इन विषयों पर भी काम करें कि आख़िर वह कौन सी ‘बीमारी’ है जो आज भी उनके महान लोकतंत्र को ‘अछूत’ बनाए हुए है ? येस बी डिड, येस बी कैन…के नारे ने उन्हें जिताया था. अमेरिकी फ़र्स्ट के नारे ने ट्रंप को जिताया. दोनों ही नारों के केंद्र में उनका स्वयंभू अमेरिका है. फिर उनके लोकतंत्र को कैसा ख़तरा ? इसका भी ज़िक्र ओबामा ने अपने 55 मिनट के शिकागो भाषण में किया था.
रिपब्लिकन होना ग़ुनाह तो नहीं. ओबामा चाहें तो इस मुहावरे पर भी काम कर सकते हैं कि सत्ता किसी भी पार्टी को मिले अमेरिका की फॉरेन पॉलिसी नहीं बदलती ! फिर ट्रंप का अपने दामाद को ‘पेंटागन’ का सलाहकार बनाना ग़लत कैसे ?
यह ठीक है कि बौद्धिक ओबामा के सम्मुख खांटी सैक्सी व्यापारी ट्रंप कहीं भी नहीं ठहरते. लेकिन ट्रंप को कोसने से बेहतर है उन्हें रिपब्लिकनों की क्षमता पर भरोसा करना आना चाहिए. आप हिलेरी को न जिता पाने की खीज रूसी अधिकारियों को निकालकर नहीं दे सकते. शायद ओबामा को न पता हो कि किस तरह उन्होंने ट्रंप की जीत पर असहजता ज़ाहिर कर अपनी ‘नोबेल’ छवि को नुक़सान पहुँचाया है. विदा में बहाए गए आँसू मुझे नहीं लगता क्षतिपूर्ति में सहायक होंगे !
छद्म अमेरिका का निकनेम है. संरक्षण के नाम पर आप किसी भी देश की संस्कृति का पेटेण्ट कर सकते हैं. लादेन को घुसकर मार सकते हैं. साथ ही ‘ॐ’ की तरह संप्रभुता की रक्षा के मंत्र भी उच्चारित करते रह सकते हैं.



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