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आओ शंकर जी की आरती गाएं

Posted On: 17 Mar, 2017 Others में

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इस साल शिव रात्रि का व्रत २४ फरवरी को पड़ रहा था ! मेरा जन्म स्थान उत्तराखंड प्रदेश के जिला पौड़ीगढ़वाल, तहसील कोटद्वार, पट्टी अजमेर वल्ला में पड़ता है ! अगर हम हरिद्वार लछमन झूला से यात्रा शुरू करें तो कांडी रोड हमारे इलाके को स्पर्श करती है, लेकिन हमारे इलाके के गावों को अभी तक सरकार ने सडकों से नहीं जोड़ा है न दूसरी सुविधाएं मुहिया करवाई है ! इसीलिए इलाके के बहुत सारे गावों से जवान लोग अपने बच्चों का भविष्य बनाने के लिए पलायन कर गए हैं ! एक दो घरों में केवल बृद्ध ही शेष हैं बाकी बहुत सारे घरों के दरवाजों में ताले पड़े हैं ! कल तक जिन खेतों में खेती होती थी, अनाज से घर भरे रहते थे, आज वे घने जंगल में तब्दील होगये हैं ! बंदरों ने वैसे ही जीना हराम किया हुआ और जंगली हिंसक जानवर भालू बाघ ख़तरा बन कर दिन दहाड़े मवेशियों और बच्चे बुजुर्गों को अपना निवाला बना रहे हैं ! हमारे पूर्व में मेरा मामाकोट ढौरी डबरालस्यूं पट्टी में पड़ता है और उसके साथ डाबर पंडतों का गाँव तथा तिमली गाँव, यह मेरा ससुराल है ! ये गाँव मेरे गाँव से बड़े हैं और इनकी जनसंख्या भी ज्यादा होने के कारण सरकार ने इन गाँवों में बिजली, पानी,सड़कें, स्कूल बाजार, नर्सिंग होम की समस्याएं सुलझा दी हैं, कारण वही वोट बैंक की राजनीति ! हाँ यहां की सबसे बड़ी समस्या जो आज बड़ी विकराल बन गयी है वह है दिन दहाड़े गुलदार (बाघ ) का आतंक ! मैं अपनी पत्नी के साथ २२ फरवरी को महाराणा प्रताप बस अड्डे से उत्तराखंड रोडवेज से कोटद्वार गया ! वहां कोटद्वार में शोभा (मेरी पत्नी की भतीजी) के घर मेरी पत्नी के बड़े भाई भी आए हुए थे ! २४ फरवरी को हम चारों शोभा की कार से सुबह सबेरे शिव मंदिर के दर्शनों के लिए निकले ! कोटद्वार से दुगड्डा, फतेहपुरी होते हुए गूमखाल, भैरबगड्डी, द्वारीखाल, चेलुसेन, बटकोली का घना जंगल, (यहां हम संन १९५०-५१ तक अपने जूनियर हायस्कूल के अध्यापकों के कीचन के लिए लकड़ियां ले जाते थे ! यहां चीड़ के अलावा काफी ऊंचाई नापने वाले पेड़ हैं, जिससे जमीन तक सूरज की रोशनी नहीं पहुँच पाती है, कारण बड़ी मात्रा में जोंक हैं, जो अक्सर पैदल यात्रियों के पावों पर लग जाती हैं ! यहां बुरांश नाम का एक काफी बड़ा सुर्ख लाल रंग का फूल भी बड़ी मात्रा में अपनी सुंदरता से पूरे जंगल की शोभा में चार चाँद लगा रहा है ! यहां के लोगों के द्वारा अब तो इस फूल से जूस भी निकाला गया है जो आज बाजार में उपलब्ध है), कांडाखनिखाल, देवीखेत होते हुए, हम लोग मामाकोट ढाऊँरी पहुंचे (यहां पर गाँव वालों ने एक आकर्षक, भब्य और सुन्दर नंदादेवी मंदिर का निर्माण कर दिया है ) ! फिर हम वासुदेव (शिव) नव निर्मित मंदिर में पहुंचे और शिवरात्री के शुभ अवसर पर शंकर जी के दर्शन किये ! सड़कें गावों तक पहुँच गयी हैं, यहां तक हमारी यात्रा कार से सम्पूर्ण हुई ! देवीखेत विशेष चहल पहल नहीं नजर आई ! सं १९४६ ई० तक देवीखेत में केवल प्राइमरी स्कूल तक थी ! उस समय तक इलाके में केवल दो मिडिल स्कूलें (७ वीं तक ) थी, पौखाल और मटियाली ! मेरे मामाजी स्वर्गीय श्री गोकुलसिंह, स्वतंत्र सैनानी, १९७१-७७ तक सांसद स्वर्गीय श्री प्रतापसिंह जी के छोटे भाई और उस जमाने के प्रसिद्द स्वतंत्र सैनानी थे और आम जनता के उत्थान में कर्म शील जानी पहिचानी हस्ती मानी जाती थी ! उनके अथक प्रयास से यहां १९४६ में मीडिल स्कूल की आधार शिला रखी गयी थी, आजादी के बाद इसका नाम जूनियर हाई स्कूल रखा गया और इसका विस्तार
७ वीं की जगह आठवीं तक किया गया था ! १९४९ में इसका पहला बैच बोर्ड परीक्षा के लिए लगभग १५ किलोमीटर पैदल पैदल दुगड्डा गया था, हमारा बैच दो साल बाद लगभग २०-२५ किलो मीटर की पैदल यात्रा करके जहरीखाल बोर्ड परिक्षा में सामिल हुआ था ! आज यह स्कूल १२ वीं क्लास तक के बच्चों को शिक्षित करके देवीखेत के नाम को भारत के नक़्शे पर स्थान दे चुका है ! यहां ग्रामीण बैंक की शाखा के साथ एसबीआई बैंक की शाखा भी खुल गयी है ! दुकानें आस पास गाँवों की आवश्यकताएं कुछ हद तक पूरी कर देती हैं ! इलाके के हर घर में लकड़ियों की जगह गैस इस्तेमाल किया जा रहा है, सफाई और प्रदुषण के मामले में उत्तराखंड के ऊपर कुदरत की मेहर रही है, पर्वतों की ऊंचाइयों और घाटियों में चलने वाली, शरीर को स्नेह से स्पर्श करती हुई हवाएं और चश्मों का शुद्ध जल और अविरल गति से नदियों में बहने वाला पानी आज भी अपनी स्वच्छता को अपने में समेटे हुए है ! बाथ रूम के नाम पर कहीं भी स्वच्छता के दर्शन नहीं हुए ! देवीखेत में सड़क के किनारे एक नाम मात्र का ढांचा खड़ा किया हुआ है और नाम बाथ रूम कानाम दिया हुआ है, लेकिन इसमें गन्दगी का अम्बार लगा हुआ था ! प्रधान मंत्री द्वारा चलाया गया अभियान, घर घरों में बाथ रूम की व्यवस्था के बारे में यहां की आम जनता अभी तक जागरूक नहीं हो पायी है ! यात्रा की समाप्ति पर हम कोटद्वार वापिस आये, यहां मोटाढांग तल्ला में मेरा चचेरा भाई दयालसिंह के घर पर ‘कुल देवता’ के पूजन का आयोजन था, हम इसमें भी सामिल हुए और पहली मार्च को बस द्वारा दिल्ली वापिस आगये ! भोले शंकर भगवान् की जय

शंकर भगवान् की आरती
शंकर की कृपा से सब काम हो रहा है,
करने वाले शंकर मेरा नाम हो रहा है ! शंकर की……….

जब भी डमरू बजता, ताडंव हैं वे करते,
भक्तों को देते खुशियां, दर्जन ईर्षा से मरते,
पापियों का दल बल कुकमों से जल रहा है,
शंकर की कृपा से सब काम हो रहा है ! २ ! करने……………..

पास कुछ नहीं हैं पर नाम भोले भंडारी,
जो भी दर पे आया जाता नहीं है खाली,
सच्चा ही भक्त उनका मस्ती में गा रहा है,
शंकर की कृपा से सब काम हो रहा है ! ३ ! करने…………

नंदी की सवारी और भूतों का संग है,
शमशान की भष्मी लिपटी अंग अंग है,
चूहे की पीठ पर गणपति लड्डू खा रहा है,
शंकर की कृपा से सब काम हो रहा है,
करने वाले शंकर नाम मेरा हो रहा है ! ४ !

जपता हूँ नाम तेरा, तन मन प्रशन्न हो मेरा,
शिवालय में डेरा चाहे सांझ हो सबेरा,
शिवरात्रि का दिन है, कीर्तन हो रहा है,
शंकर की कृपा से सब काम हो रहा है ! ५ !

(२)
पशुपति नाथ तुम, दुखियों के साथ तुम,
घट घट में वास है, नजर क्यों न आते ?

हे शंकर सदाचारी, लुटाते सम्पदा सारी,
भक्तों में बाँटते हो, बनके भोले भंडारी,
रहते हर सांश में कभी दूर कभी पास में,
नजर क्यों न आते ?
पशु पति ………..

बना भुजंगों की माला, शिव ने गले में डाला,
भांग धतूरे से हे शिव, पड़ गया पाला,
कहते हैं, ‘तुम जल थल में,
तुम हर डाल के हर पातन में’,
नजर क्यों न आते

तन में भष्मी लगाए, बाघम्बर सर्पों के गहने,
भूत प्रेत संग हैं शिव के, शंकर के क्या कहने,
कहाँ से आते कहाँ जाते हो,
नजर क्यों न आते ?
पशुपति नाथ तुम,………….हरेन्द्र

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