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एक सांझ,,,,,, 'प्रिये' की यादों मे ठिठकी हुई

Posted On: 18 Mar, 2017 16942 में

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लघुकथा
************
ऑफिस की घड़ी मे शाम के 5 बजे की टिकटिक के साथ आज आवेग जी का मन अपनी प्रिये की याद से टिकटिका उठा। कुछ पल के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेजों पर दस्तख़त करते उनके हाथ रुक गए ,,,,,,,,,,,,,,,,,और गालों पर जा टिके,,,,,ऑफिस की खिड़की के बाहर निगाहें शाम के सिंदूरी आसमान मे,,, अपनी प्रिये के मुस्कुराते मुखमंडल की छवि की कल्पना कर ख़यालों मे डूब गई। वे मन ही मन प्रिये से संवाद करने लगे,,,,,मेरी प्रिये,,,,,,,!!!!!

सांझ आहिस्ते-आहिस्ते उतर रही है,,,,,,। सूरज मद्धम होते जा रहा है,,,,,,। दिन करवट ले रहा है। यह सांझ सबको किसी न किसी बहाने बाहर निकाल लाती है, ,,,,,,,,,प्रकृति के स्नेहिल परिवेश में सहभागिता के लिए। ऐसे में प्रिये तुम बहुत याद आती हो,,,,,,। मैं प्रतीक्षारत रहूँ और तुम आ जाओ। ,,सूरज की तरह मेरी आँखों की चमक तथा चांदनीं सी दमकती तुम – बस,,,, यहीं सांझ ठिठक जायेगी यह देखने के लिए कि सूरज सी तपिश भरी आतुर निगाहों तथा चांदनीं सी झिलमिलाती प्रिये के मिलान पर क्या होगा। सांझ ठिठकी सी ढलती जाएगी,,,, हवा शीतलता में वृद्धि करते हुए मौसम को संतुलित रखने का प्रयास करेगी,,,,, बत्तियां आँखें खोल निहारना आरम्भ कर देंगी,,, दूर गगन में चाँद भी छुप-छुप कर निहारता रहेगा। जानती हो प्रिये,,,,! सांझ को तुम्हारा मुझसे मिलना कितना परिवर्तन ला देता है। यह तपिश भरी निगाहें न जाने कब शीतल हो बर्फ सी स्थिर हो जाती हैं, अपलक तुम मे समाहित होते हुए,,,,परिवेश सुगंधमयी और रंगमयी होने लगता है। तुम्हारी पालकें,,, रह-रह कर बंद होने लगती हैं। ना,ना,,,ना प्रिये!! अब और वर्णन नहीं करूंगा। ओ प्रिये,,!,
ओ मेरी मनभावन,,,,! ओ मेरी सोन चिरैया,,,! सुनो न, दिल पुकार रहा है, ,,,ठिठकी सांझ तुम्हारे दरस की कामना लिए है। अब और न सताओ मेरी गौरैया। चली आओ न मेरी प्रिये।
****
कल्पनाओं के ख़याली संदेशवाहकों ने जैसे पंख लगा उनका संदेश उनकी प्रिये तक जा पहुँचाया,,,,,,,,। प्रियतम के अह्लादित प्रेमसुरभित संदेश को पाकर ‘प्रिये’ लजाई ,,सकुचाई,,,,। संदेश वाहकों के हाथ,, अति प्रफुल्लित हो उसने अपना पैगाम सिंदूरी आसमान पर लिख भेजा,,,,

“आज पहली दफा सांझ को इतना मखमली महसूस किया,,नीड़ को लौटते पंक्षियो की चहचहाहट,,,
तुम्हारे संदेश को मुझ तक पहुँचाती सी लगी,,,,
अस्त होते सूरज की लालिमा मे तुम्हारे मिलन की ललक प्रस्फुटित होती प्रतीत होने लगी,,,, ।
शाम स्थिर सी हो गई,,पर एक हलचल सी अपने अंतर मे छुपाए,,,। जैसे की मेरा मन भी तुमसे मिलने को अधीर हुआ जाए,,,,।अनेको भावों की हल्की हवा,,इस बेचैनी को सुकून देने का प्रयास करती सी प्रतीत होने लगी।
तुम्हारे प्रेमाकुल सम्बोधन ने संध्या बेला को नवविवाहिता सा बना दिया है,,,।
जो अपने प्रियतम के घर आने की प्रतीक्षा मे श्रृंगार कर घर की ढोयोड़ी पर घूँघट डाल पथ निहार रही है,,।

एक असीम सुख की परिकल्पना से जनित अनुभूति से आवेग जी की आंखें अधखुली और चेहरे पर मुस्कान,,,, लिए कुछ देर उसी रससागर मे डूबी बेसुध पड़ी रही। एक गहरी निःश्वास के साथ उन्होने खुद को समेटा और वापस दस्तावेज़ों को निबटाने मे जुट गए।
उनकी सोन चिरैया,,,उनकी गौरैया उनकी प्रिये,,, फिर उनके ख़यालों मे आएगी,,,,,, शायद फिर किसी ,मखमली ,,,महकते एहसासों के साथ कोई नई अभिव्यक्ति लिखवा जाएगी,,,,,,,

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