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घूँघट की जेल "CONTEST "

Posted On: 29 Mar, 2017 Contest में

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गाँव में रहे बिना गाँव के बारे में जाना नहीं जा सकता.मैं तो बचपन में गेहूं धान और सरसों के खेतों में जी भर के खेली हूँ.मटर,चना,गन्ने का रस,गुड़,झूले.गाँव का बस यही चित्र मेरी आँखों में है क्योंकि मैके में हमारे खेत शहर से थोड़े ही दूर थे.हम खेल कूद कर वापस अपने घर चले आते.वहां की ज़िन्दगी कैसी है ये पता नहीं था.ससुराल भी ऐसा मिला कि कितने खेत हैं, ये हिसाब किसी को मुंह ज़बानी याद ही नहीं.मेरे ससुरजी शुरू से नौकरी पर बाहर ही रहे.तीज त्योहार पर मेहमान की तरह जाते थे.हाँ गाँव पर पट्टीदारों में आपसी स्नेह व प्रेम व्यवहार में कभी कमी नहीं आयी.इसीलिए जब मेरे बेटे के मुंडन के समय गाँव पर रहने वाले,ससुरजी के चचेरे भतीजे ने सारा कार्यक्रम गाँव से ही करने का प्रस्ताव रखा तो हम सभी बड़े प्रेम से तैयार हो गए.मैं भी,गाँव की खुली हवा और खेतो से आने वाली ताज़ी सुगंध सोच कर ही सम्मोहित सी होने लगी.
पूर्वी यूपी के देवरिया ज़िले का गाँव.मुख्य सड़क से उत्तर कर कच्ची सड़क पर आते ही मेरी सास ने मुझे नाक तक घूँघट खींचने को कहा.एम्बेसडर कार की पिछली सीट पर ज़िगज़ैग हो कर पाँच लोग बैठे थे.मेरी गोद में ढाई साल का एक बेहद नटखट बच्चा.हालाँकि अक्टूबर था लेकिन बेटे को न जाने माहौल क्यों गरम लगा वो चीत्कार करने लगा.दूर से ही लोगों को पता चल गया कि हम आ गए हैं.उस अखंडित परिवार की मैं सबसे नयी बहू थी सो मुझे आंगन के पार सबसे पीछे वाले कमरे में ले जाया गया.भूख लगी थी लेकिन जिसकी नाक तक घूँघट हो वो खाना कैसे मांगे.बच्चा तो गाड़ी से उतरते ही किस किस की गोद से हो कर कहाँ गया मुझे बताने वाला कोई न था.बस गांव की औरतें थोड़ी थोड़ी देर में आ कर कमरे में झांक कर चली जाती.धीरे धीरे रात गहराने लगी.मैं बच्चे के लिए बेहद परेशान थी कि किसी ने आकर बताया”वो खा पी कर बाबा के साथ सो रहा है”.मैं हतप्रभ रह गयी.गाने की एक एक लाइनों पर एक एक कौर खाने वाला बच्चा आज क्या खा पीकर सो गया?अगली सुबह मैं ने डरते डरते ओसारे में झाँका ही था कि पीछे से मेरी सास ने डपटा.मैं ने कहा”बच्चे को नहला धुला तो दूँ”
“लगन की हल्दी चढ़ी है,कल मुंडन के बाद ही नहायेगा”बात ख़तम हो गयी.
अगले दिन सुबह मेरा बेटा मेरे सामने आया तो मैं पहचान न सकी.लंबे लंबे हल्दी तेल में सने खुले बाल,कुहनियां छिली,पीछे से पैंट फटी हुई.पता चला गाड़ी चढाने वाले स्लोप पर दिन भर फिसलता रहता था.मेरा गला रुंध गया.वो तो बुक्का फाड़ कर रोने लगा.”अम्मा आप कहाँ थी इतने दिन से”
खैर मुंडन हुआ शाम को दावत थी.अपना गांव तो आमंत्रित था ही,आस पास के गांवों से भी नाते-रिश्तेदारों को निमंत्रण भेजा गया था.अपने ही तालाब की मछली थी,खाने वालों ने ऐसे खाया मानो पेट में मत्स्य पालन केंद्र खोलना हो.सबसे बड़ी जेठानी के शाकाहारी भैया ने खाना खाने से इंकार कर दिया.”हम मछली की जुठारी पंगत में खाना खाने के लिए नहीं आये हैं.”
मामा को देख कर तो पूरा गांव ही भांजा हो जाता है.ऐसे ही किसी भांजे ने मज़ा लेते हुए कहा”ऐ हो मामा,बहन के घर खाना मिल रहा है बड़ी बात है नहीं तो जूता से स्वागत होता.
“मामा जी को बात लग गयी.बोले”यहाँ कौन नंगे पैर है”.तू तू मैं मैं हाथा-पायी में बदल गयी.औरतों के बीच कोई आ कर बता गया मामा के गांव के लोग कट्टा लाने गए हैं.रोना-पीटना मच गया.मैं घूँघट काढ़े अपने बच्चों को खोजते बाहर निकल आयी.न जाने कौन दहाड़ा”बहुरिया,अंदर जाओ”आफत कैसे टली पता नहीं लेकिन अब गांव जाने के नाम से रोमांच नहीं भय होता है.

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