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भगवान शिव से अधूरी रह गई थी विवाह की इच्छा, नाम पड़ा ‘कन्याकुमारी’

Posted On: 3 May, 2017 Religious में

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भारत की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है ‘कन्याकुमारी’ लेकिन क्या आप जानते हैं इस जगह का नाम कन्याकुमारी क्यों पड़ा? पौराणिक कथा के अनुसार कन्याकुमारी एक ऐसी कन्या थी, जिनका जन्म एक राक्षस को मारने के लिए हुआ था लेकिन उन्हें शिव से प्रेम हो गया. अंत में समस्त सृष्टि की रक्षा के लिए उनका विवाह शिव से नहीं हो पाएगा और वो आजीवन कुंवारी रह गई.


kanya kumari story



बानासुरन के वध के लिए ‘कुमारी’ नाम कन्या ने लिया था जन्म

‘शिवपुराण’ में लिखी एक पौराणिक कथा के अनुसार बानासुरन नामक एक असुर था, जिसने देवताओं को अपने कुकर्मों से पीड़ित कर रखा था. सभी देवता इस असुर से मुक्ति चाहते थे लेकिन दूसरी ओर भगवान शिव ने असुर को कठोर तपस्या के बाद यह वरदान दिया था कि उसकी मृत्यु केवल एक ‘कुंवारी कन्या’ के हाथों ही होगी अन्यथा वह अमर हो जाएगा.


शक्ति का अंश थी ‘कुमारी’

उस काल में भारत पर शासन कर रहे राजा भरत के यहां एक पुत्री ने जन्म लिया था. राजा के 8 पुत्र और एक पुत्री थी. कहते हैं कि यह पुत्री कोई और नहीं बल्कि आदि शक्ति का ही अंश थी, जिसका नाम कुमारी रखा गया. आगे चलकर राजा ने अपने साम्राज्य को नौ बराबर हिस्सों में अपनी संतानों में विभाजित कर दिया, जिसमें से दक्षिणी छोर का हिस्सा पुत्री कुमारी को मिला. कुमारी ने वर्षों तक इस क्षेत्र की लगन से रक्षा की और इसकी उन्नति के लिए हर संभव प्रयास भी किया.


shiva


शिव से करना चाहती थी विवाह

पौराणिक कथाओं के अनुसार माना जाता है कि कुमारी भगवान शिव से प्रेम करती थी. उसने शिवजी से विवाह करने हेतु कठोर तपस्या की और उसके तप से प्रसन्न होकर शिवजी ने उनका विवाह प्रस्ताव स्वीकार किया और उनके यहां बारात लाने का आश्वासन भी दिया. अब कुमारी विवाह की तैयारियों में लग गई. विवाह हेतु उसने श्रृंगार भी किया. लेकिन दूसरी ओर नारद मुनि यह जान चुके थे कि कुमारी कोई साधारण कन्या नहीं बल्कि असुर बानासुरन का वध करने वाली ही देवी है, नारद ने ये रहस्य सभी देवताओं और शिव को बता दिया. अंत में सृष्टि के कल्याण के लिए इस बात का निर्णय लिया गया कि भगवान शिव की बारात को रास्ते से ही वापस कैलाश भेज दिया जाए.


इस तरह कैलाश वापस लौट गए शिव

कुमारी से विवाह करने के लिए शिवजी आधी रात में ही कैलाश से भारत के दक्षिणी छोर के लिए रवाना हो गए, ताकि वे सुबह तक वहां विवाह के मुहूर्त तक पहुंच जाएं, किंतु देवताओं ने आधी रात में ही मुर्गे की आवाज में बांग लगा दी और मुहूर्त के लिए देरी हो जाने का एहसास होने पर शिवजी कैलाश की ओर वापस लौट गए.


shiv



इस तरह हुआ बानासुरन का वध

इस बीच बानासुरन को जब कुमारी की सुंदरता के बारे में पता चला तो उसने कुमारी के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा. कुमारी ने कहा कि यदि वह उसे युद्ध में हरा देगा तो वह उससे विवाह कर लेगी. दोनों के बीच युद्ध हुआ और बानासुरन को मृत्यु की प्राप्ति हुई.


इस तरह कुंवारी रह गई कन्या, नाम पड़ा कन्याकुमारी

देवताओं को असुर से मुक्ति मिली और उसके बाद अपने वर के इंतजार में बैठी कुमारी आजीवन कुंवारी ही रह गई और उन्होंने शिव से विवाह की इच्छा भी त्याग दी. इस कथा को आधार मानते हुए भारत के इस दक्षिणी छोर का नाम कन्याकुमारी पड़ा. …Next


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बानासुरन के वध के लिए ‘कुमारी’ नाम कन्या ने लिया था जन्म

एक पौराणिक कथा के अनुसार बानासुरन नामक एक असुर था, जिसने देवताओं को अपने कुकर्मों से पीड़ित कर रखा था. सभी देवता इस असुर से मुक्ति चाहते थे लेकिन दूसरी ओर भगवान शिव ने असुर को कठोर तपस्या के बाद यह वरदान दिया था कि उसकी मृत्यु केवल एक कुंवारी कन्याके हाथों ही होगी अन्यथा वह अमर हो जाएगा.

शक्ति का अंश थी ‘कुमारी’

उस काल में भारत पर शासन कर रहे राजा भरत के यहां एक पुत्री ने जन्म लिया था. राजा के 8 पुत्र और एक पुत्री थी. कहते हैं कि यह पुत्री कोई और नहीं बल्कि आदि शक्ति का ही अंश थी, जिसका नाम कुमारी रखा गया.

आगे चलकर राजा ने अपने साम्राज्य को नौ बराबर हिस्सों में अपनी संतानों में विभाजित कर दिया, जिसमें से दक्षिणी छोर का हिस्सा पुत्री कुमारी को मिला. कुमारी ने वर्षों तक इस क्षेत्र की लगन से रक्षा की और इसकी उन्नति के लिए हर संभव प्रयास भी किया.

शिव से करना चाहती थी विवाह

पौराणिक कथाओं के अनुसार माना जाता है कि कुमारी भगवान शिव से प्रेम करती थी. उसने शिवजी से विवाह करने हेतु कठोर तपस्या की और उसके तप से प्रसन्न होकर शिवजी ने उनका विवाह प्रस्ताव स्वीकार किया और उनके यहां बारात लाने का आश्वासन भी दिया.

अब कुमारी विवाह की तैयारियों में लग गई. विवाह हेतु उसने श्रृंगार भी किया. लेकिन दूसरी ओर नारद मुनि यह जान चुके थे कि कुमारी कोई साधारण कन्या नहीं बल्कि असुर बानासुरन का वध करने वाली ही देवी है, नारद ने ये रहस्य सभी देवताओं और शिव को बता दिया. अंत में सृष्टि के कल्याण के लिए इस बात का निर्णय लिया गया कि भगवान शिव की बारात को रास्ते से ही वापस कैलाश भेज दिया जाए.

इस तरह कैलाश वापस लौट गए शिव

कुमारी से विवाह करने के लिए शिवजी आधी रात में ही कैलाश से भारत के दक्षिणी छोर के लिए रवाना हो गए, ताकि वे सुबह तक वहां विवाह के मुहूर्त तक पहुंच जाएं, किंतु देवताओं ने आधी रात में ही मुर्गे की आवाज में बांग लगा दी और मुहूर्त के लिए देरी हो जाने का एहसास होने पर शिवजी कैलाश की ओर वापस लौट गए.

इस तरह हुआ बानासुरन का वध

इस बीच बानासुरन को जब कुमारी की सुंदरता के बारे में पता चला तो उसने कुमारी के समक्ष शादी का प्रस्ताव रखा. कुमारी ने कहा कि यदि वह उसे युद्ध में हरा देगा तो वह उससे विवाह कर लेगी. दोनों के बीच युद्ध हुआ और बानासुरन को मृत्यु की प्राप्ति हुई.

इस तरह कुंवारी रह गई कन्या, नाम पड़ा कन्याकुमारी

देवताओं को असुर से मुक्ति मिली और उसके बाद अपने वर के इंतजार में बैठी कुमारी आजीवन कुंवारी ही रह गई और उन्होंने शिव से विवाह की इच्छा भी त्याग दी. इस कथा को आधार मानते हुए भारत के इस दक्षिणी छोर का नाम कन्याकुमारी पड़ा. Next

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