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इतिहास की स्वर्णिम तिथि 10 मई 1857

Posted On: 8 May, 2017 Others में

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भारतवर्ष की ही नहीं विश्व की प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं में एक है  1857 की क्रान्ति.विश्व की घटनाओं में एक कहने का कारण ये है कि जिस देश के विरुद्ध इस संग्राम का श्रीगणेश हुआ ,यह देश था ग्रेट ब्रिटेन ,जिसके साम्राज्य का सूर्य कभी अस्त नहीं होता था, साम्राज्यवादी नीति का पोषक होने के कारण जिसका ध्वज विश्व के प्रत्येक कोने में लहराता था.कभी व्यापार के माध्यम से तो कभी देशों के विवाद सुलझाने के नाम पर गोरों ऩे पहले एक कदम रखा और धीरे धीरे वहां के स्वामी बन बैठे निरंकुश सत्ताधारी.
मुग़ल सम्राट जहाँगीर के काल में १६१२ में एक फैक्ट्री के माध्यम से भारत में सूरत में व्यापार की अनुमति लेने वाली अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कम्पनी हमारी अधिष्ठाता बन बैठी.लोक भाषा की कहावत है,”अंगुली पकड़ कर पाहेंचा पकड़ना.” इस संदर्भ में सटीक है.सूरत के बाद मद्रास , बम्बई और फिर कलकत्ता.व्यापार फलता फूलता रहा और धीरे देसी राजाओं की दुर्बलता,पारस्परिक फूट का लाभ उठाते हुए आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप और १७५७ में प्लासी की हार के बाद १७६४ में बक्सर के युद्ध ऩे अंग्रेजों के पैर मजबूती से जमा दिए.मुग़ल सम्राट शाह आलम के काल में कम्पनी के अधिकारों में वृद्धि होती गयी कम्पनी का अधिकार क्षेत्र बढ़ता रहा..देश का धन लूटा जाता रहा सोने की चिड़िया कहलाने वाला देश कंगाल बनता रहा और शासकों की विलासिता ,फूट,अकर्मण्यता का परिणाम दासता के रूप में सामने आया ब्रिटिशकम्पनी की साम्राज्यवादी नीति के कारण देश के सभी राज्य धीरे धीरे इनकी अधीनता स्वीकारते रहे.हमारी सेना के जांवाजों के दम पर ब्रिटिश साम्राज्य बढ़ता गया और बढ़ते गये,आमानुषिक अत्याचार.गोरी कौम को श्रेष्ठ मानेवाले अंग्रेज अब हमारे स्वामी थे और हम थे निरीह दास.जो अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर विरोध करने का साहस करता ,उसको कुचल दिया जाता.
भारत की हस्तकला,सूती,रेशमी वस्त्र ,मसाले तथा सूखे मेवे और अन्य वस्तुओं की विदेशों में बहुत मांग थी परन्तु हमारे अशिक्षित तथा भोले उत्पादकों से सस्ते दामों पर सामान खरीद कर कई गुनी कीमतों पर उस सामान को विक्रय कर विदेशी विशेष रूप से अंग्रेज धनी बनते रहे,और फिर अंग्रेजी सत्ता ऩे ऐसे क़ानून बना दिए कि अपने देश में यहाँ के बुने वस्त्र खरीदने पर प्रतिबन्ध लगाते हुए,बहुत भारी अर्थदंड लगाने की घोषणा कर दी.परिणाम वस्त्र बिकने बंद हो गये तथा शिल्पी बेरोजगार हो गये उनको .कृषि क्षेत्र में मजदूरी करने के लिए बाध्य होना पड़ा.परन्तु गोरों की रग रग में शोषण करने की प्रवृत्ति थी. अपनी नस्ल को श्रेष्ठ मानने वाले अंग्रेज सदा दूसरों को निरीह देखना चाहते थे,चाहे उसके लिए किसी भी सीमा का अतिक्रमण करना पड़े.उन्होंने मालगुजारी व कृषि के क्षेत्र में भी ऐसी दमनकारी नीति बनायीं कि कृषकों को भी पाई पाई का मोहताज बना दिया.मालगुजारी इतनी बढ़ा दी गयी कि इस मद में १७६४-६५ में जो राशि एकत्र हुई थी ,१७६५-६६ में वो दोगुने से भी अधिक हो गयी.
वास्तव में अधिकांश अंगेरजी गवर्नर जनरल की नीति हड़पने की थी,अर्थात देसी जागीरदारों द्वारा राजस्व नहीं चुकाया गया तो जागीर हड़प ली गयी,,इसी प्रकार रियासतों को भी कभी उतराधिकारी न होने के नाम पर,कभी उत्तराधिकारी अवयस्क होने के नाम पर तथा कभी शासक अयोग्य होने का बहाना बनाकर अपनी साम्राज्यवादी नीति का परिचय देते हुए ब्रिटिश साम्राज्य का अंग बना लिया.ऐसे में विवश जागीरदारों तथा रियासतों के स्वामियों में असंतोष बढ़ रहा था.१७५७ से १८५७ के मध्य कम्पनी की सेनाओं ऩे २० से अधिक युद्ध लड़े और मैसूर,महाराष्ट्र,कर्नाटक,तंजौर ,बुंदेलखंड रूहेलखंड ,हरियाणा पंजाब आदि राज्यों को अपने साम्राज्य का अंग बना लिया.
ईसाई धर्म का प्रचार प्रसार करते हुए अंग्रेज अधिकारियों ऩे घोषणा की ,कि ईसाई धर्म अपनाने पर उनकी छिनी हुई जागीर वापस कर दी जायेंगी.धर्मपरायण हिन्दुओं तथा मुस्लिमों के लिए यह सह्य नहीं था कि धर्म पर आघात हो.और ये प्रत्यक्ष रूप से धर्म के मामले में हस्तक्षेप किया जा रहा था उनको ईसाई बनाने का षड्यंत्र था.

कम्पनी की सेनाओं को कुछ युद्धों में पराजय का सामना करना पड़ा तो भारतीय सैनिकों में यह भावना उत्पन्न हुई कि अंग्रेज अपराजेय नहीं और उनको यह भी अनुभव हो रहा था कि अंग्रेज अपने हितों के लिए भारतीय सैनिकों को मृत्य के घाट उतरवा रहे हैं.

आर्थिक,राजनैतिक,सामजिक धार्मिक तथा सैन्य सभी क्षेत्रों में अंग्रेजों की दमन नीति के शिकार भारतीय जनता व नरेशों,कृषकों,जागीरदारों की भावनाओं में उफान आ ही रहा था कि कारतूसों वाली घटना के रूप में चिंगारी भड़क उठी.
विद्रोह का सन्देश स्थान स्थान पर पहुंचाने के लिए रोटी व कमल को प्रतीक के रूप में विविध रूप धरे हुए लोगों ऩे गुप्त रूप से दूर दूर तक पहुँचाया.गुप्त बैठकों में कार्यवाही तय हुई तथा ३१ मई १८५७ को विद्रोह की तिथि को तय किया गया.तैयारी ३१ मई की तारीख के हिसाब से चल रही थी.
सही कहा गया है “होई है वही जो राम रची राखा”कलकत्ता के दमदम में बैरकपुर छावनी में क्रांतिवीर मंगल पाण्डेय ऩे इस क्रान्ति का श्रीगणेश कर दिया. तथा कट्टर ब्राहमण होने का परिचय दिया अंग्रेज अधिकारी की अवेहलना करते हुए .मंगल पाण्डेय ऩे कारतूसों को मुंह से खोलने को मना कर दिया सेना ऩे उसका साथ दिया तथा बौखलाए गोरों ऩे उसपर शक्ति प्रदर्शन करना चाह तो उसने दो अंग्रेज अधिकारीयों पर आक्रमण कर दिया.मंगल पाण्डेय झुका नहीं और अंग्रेजों को उसका प्राणांत करना ही एक मात्र उपाय दिख रहा था,अतः उसको फांसी की सजा सुनायी गयी.कायर अंग्रेजों ऩे फांसी भी निर्धारित तिथी से पूर्व ही दे दी क्योंकि उनको विद्रोह भड़कने की चिंता सता रही थी.
६ मई १८५७ को ९० भारतीय सैनिकों को ये कारतूस मेरठ में प्रयोग करने के लिए दिए गये ,परन्तु जोशीले सैनिकों को मंगल पाण्डेय के बलिदान की लाज रखनी थी उनका स्वाभिमान जागृत हो गया था.अतः उन्होंने आदेश मानने से मना कर दिया,अंग्रेज दमनकारी नीति अपना रहे थे सैनिकों के धर्म का अपमान किया जा रहा था.,भारतीयों सैनिकों को कड़ी सजा देने की घोषणा की गयी . १० मई १८५७ की ऐतिहासिक तिथि को सैनिकों ऩे विद्रोह कर दिया. अंग्रेज अफसरों को मार दिया गया “मारो फिरंगियों को “के नारे के साथ विप्लव बढ़ता गया तथा विद्रोही दिल्ली पहुँच गये.मुग़ल सम्राट बहादुर शाह जफ़र को अपना नेता घोषित कर दिया क्रान्तिकारियों का जोश पूर्ण ज्वार पर था उनके स्वाधीनता संग्राम में उनका साथ देने के लिए आम नागरिक भी उनके साथ जुट गये.दिल्ली के किले पर क्रांतिवीरों का अधिकार हो गया,.अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए अंग्रेज इस किले को सितम्बर में ही मुक्त करा सके.
कानपुर में नेतृत्व के लिए नाना साहब कमर कसे हुए थे,अंग्रेज जनरल को पराजय का सामना करना पड़ा ,उनके परिवारों को बंदी बना लिया गया,उदारवादी नैतिकता के पोषक क्रान्ति नेता परिजनों को सुरक्षित निकालना चाहते थे परन्तु जनरल नील के द्वारा इलाहाबाद व बनारस में भारतीयों के नरसंहार का समाचार पाकर विद्रोही आक्रोशित हो गयेऔर नेताओं की इच्छा के विरुद्ध अपना आक्रोश उन परिजनों को मार कर ही निकाला. अंग्रेजों ऩे भारी सैन्य सहायता से कानपुर पर कब्ज़ा पुनः कर लिया और नाना साहब को वहां से नेपाल जाना पड़ा.तांत्या टोपे,वीरतापूर्वक अंग्रेजों से लोहा लेते रहे और अंग्रेज तथा भारतीय वीरों के मध्य इसी प्रकार जीत-हार चलती रही.
आन्दोलन का चरम दिखाई दिया अवध में.जनता,जागीरदार,सेना ,जाती धर्म का भेद भुला कर एकजुट हो कर लड़े और अंग्रेजों को जीवित नहीं निकलने दिया.अंग्रेज अधिकारी मारे गये निरंतर सेना के बल पर लड़ते हुए अंग्रेज लखनऊ को मार्च १७५८ में ही दोबारा अपने नियन्त्रण में ले सके.पूर्णतया त्रस्त व बौखलाए अंग्रेजों ऩे निरीही ग्रामीणों व अन्य देशवासियों को फांसी देकर अपना रोष उतारा.
झांसी और ग्वालियर में भी रानी लक्ष्मीबाई तथा तांत्या टोपे ऩे अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए ,यद्यपि देशद्रोहियों के कारण झांसी महारानी के हाथ से निकल गयी परन्तु वह स्वयं उनकी पकड़ में नहीं आयीं.
इसी प्रकार बिहार में कुंवर सिंह तथा फैजाबाद में मौलवी अहमदुल्लाह ऩे अंग्रेजों को खूब छकाया. इंदौर में भी आन्दोलन का रंग चरम पर था, देश के अन्य भागों में भी कहीं कम तो कहीं अधिक विद्रोह अग्नि धधकती रही और अपनी सैन्य शक्ति व छल बल के सहारे गोरे उसको दबाते रहे और अंततः यह संग्राम कुछ विशिष्ठ उपलब्धियों के साथ दब गया
इस महत्वपूर्ण क्रांति को अंग्रेज जहाँ अपनी श्रेष्ठता के दम्भ में मात्र सिपाही विद्रोह mutiny, मानते हैंपरन्तु अग्रांकित मानचित्र दर्शाता है कि देश के बड़े भाग में इस क्रान्ति का प्रत्यक्ष व परोक्ष प्रभाव था. हमारी दृष्टि में यह घटना, यह क्रान्ति, यह आन्दोलन बहुत महत्वपूर्ण है.यह सत्य है कि आन्दोलन अंग्रेजों को बाहर खदेड़ने में सफल न हो सका परन्तु अंग्रेज शासकों ऩे यह स्वीकार किया कि अब भारत को सदा के लिए अपना गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकता.
आन्दोलन ऩे भारतीय जनमानस के मस्तिष्क में एक आशा किरण जगा दी कि संगठित हो कर गोरों को देश से बाहर निकालना असम्भव कार्य नहीं.समय तो लगा परन्तु स्वाधीनता की भूख जगाने में सफल रही क्रान्ति और अंतत १९४७ में अंग्रेजों को भारत से बाहर भागना पड़ा.
उपरोक्त सफलता के साथ क्रान्ति ऩे हमें ये भी दिखा दिया कि भाइयों ऩे ही भाईयों को मरवाया और अंग्रेजों का साथ देने वाले हमारे भाई थे,जिनके सहयोग से अंग्रेज इतने लम्बे समय यहीं जमे रहे.अपने क्षुद्र स्वार्थों , कुछ विलासी,अकर्मण्य व निष्ठुर मुग़ल राजाओं से परेशान हो कर सिखों के एक वर्ग ऩे गोरखों और कुछ अन्य लोगों ऩे अंग्रेजों का साथ दिया.
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अपनी कुछ कमियों के बाद भी आन्दोलन एक मील का पत्थर था तत्कालीन परिस्तिथियों में इतना व्यापक नेटवर्क बनाना एक या दो दिन का काम नहीं हो सकता था.आन्दोलनं और अधिक सफल होता यदि अपनी पूर्व निर्धारित तिथि ३१ मई को ही प्रारम्भ होता.परन्तु केवल एक ही नेता न होना इस तर्क को भी प्रमाणित करता है कि विद्रोह की अग्नि स्थान स्थान पर प्रज्वलित हो चुकी थी.और यह देश के किसी छोटे भाग में घटित घटना नहीं थी. .
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