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तुम केवल वकील हो समझे ....

Posted On: 26 May, 2017 Celebrity Writer में

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”जातियां ही चुनावी घडी हो गयी ,

उलझनें इसलिए खड़ी हो गयी ,

प्रजातंत्र ने दिया है ये सिला

कुर्सियां इस देश से भी बड़ी हो गयी .”

केवल शेर नहीं है ये ,सच्चाई है जिसे हम अपने निजी जीवन में लगभग रोज ही अनुभव करते हैं.मेरठ बार एसोसिएशन के कल हुए चुनाव का समाचार देते हुए दैनिक जनवाणी लिखता है -”कि चुनाव में सभी बिरादरियों के प्रमुख नेता अपने अपने प्रत्याशियों के लिए वोट मांग रहे थे .” समाचार पढ़ते ही दिल-दिमाग घूमकर रह गए कि आखिर कब तक हम इन जातियों बिरादरियों में उलझे रहेंगे ? धर्म के नाम पर अंग्रेज हमारा बंटवारा कर गए पर हम नहीं सुधरे ,और आज भी ये स्थिति है कि हम कभी सुधरेंगे ये हम कभी कह ही नहीं सकते .

स्वयं अधिवक्ता होने के नाते जानती हूँ कि मुवक्किल भी अपनी जाति के ही वकील पर जाते हैं और अगर उन्हें अपनी जाति  का कोई वकील न मिले तो वे अपने गांव का वकील ढूंढते हैं ,जबकि ये सभी जानते हैं कि अधिकांशतया बुरा करने वाला भी अपनी जाति का ही होता है पर क्या किया जा सकता है ,अनपढ़ -गंवार लोगों की बात तो एक तरफ छोड़ी जा सकती है किन्तु वकील जो कहने को कम से कम बी.ए.एल.एल.बी.तो होते ही हैं और कहने को शिक्षा

”शिक्षा गुणों की संजीवनी ,शिक्षा गुणों की खान ”

पर यहां क्या जब आदमी वकील बनने के बाद भी वो ही कुऍं का मेंढक बना रहे ,अरे जब वोट देने जा रहे हो तो कम से कम ऐसे प्रत्याशी को चुनो जो तुम्हारी संस्था के लक्ष्यों को पूर्ण कर सके ,तुम्हारे अधिकारों को तुम्हें दिलवा सके .वर्तमान गवाह है बहुत सी बार एसोसिएशन ने इस जाति-बिरादरी की सीमा में फंसकर अपने न्यायालयीन कामकाजों को ताक पर रख दिया है और अब उनके लिए ऐसी स्थिति आ गयी है कि वे रोजमर्रा के कामकाज के लिए भी जूझते फिर रहे हैं .

ऐसे में वकील बिरादरी को अपनी बिरादरी तो तय कर ही लेनी चाहिए जिससे वे केवल वकील होने के कारण जुड़े हैं न कि जाट-गुर्जर-ब्रह्मिन-वैश्य होकर ,वैसे भी जब कहीं वकीलों को अपना अख्तियार दिखाने की बात आती है तब वे खुद को केवल वकील ही कहते हैं -जाट-गुर्जर-ब्राह्मण-वैश्य नहीं .और वकील कानून किताबों से पढ़ते हैं अपनी गलियों-कुंचियों से नहीं और वकीलों को समाज देश का खेवनहार बनना चाहिए न कि डुबोने वाला क्योंकि हमेशा से देश की राजनीति में वकीलों का अहम् योगदान रहा है ,ये देश वकीलों ने संभाला है और इसमें राजनीति के आकाश पर चमकने वाला लगभग दूसरा सूर्य वकील ही रहा है इसलिए अपनी गरिमा बनाये रखते हुए वकीलों को देश से जाति-बिरादरी का अँधेरा दूर करना ही होगा .जिसके लिए डॉ.शिखा कौशिक ‘नूतन ‘ कहती हैं-

”जो किताबें हम सभी को बाँट देती जात में ,

फाड़कर नाले में उनको अब बहा दें साथियों !

है अगर कुछ आग दिल में तो चलो ए साथियों ,

हम मिटा दें जुल्म को जड़ से मेरे ए साथियों !”

हम नहीं हिन्दू-मुसलमां ,हम सभी इंसान हैं ,

एक यही नारा फिजाओं में गूंजा दें साथियों .

है अगर कुछ आग दिल में तो चलो ए साथियों ,

हम मिटा दें जुल्म को जड़ से मेरे ए साथियों .”

शालिनी कौशिक

[कौशल]



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