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पार्टी या स्वार्थ देशहित पर भारी

Posted On: 18 Jun, 2017 Others में

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तो ये हैं धूर्त नेता जिनका ईमान धर्म है ही नहीं और यदि है तो इसकी सच्चाई सिवाय उनके या उनके समर्थकों के सब जानते हैं। आप कह सकते हैं कि भला अपनी सच्चाई कौन नहीं जानता है? मैं आपकी इस बात का समर्थन करूँगा परन्तु यह भी कहूँगा कि यदि व्यक्ति अंदर व बाहर से अलग दिखे अर्थात “मन में राम बगल ……” तो यही कहना होगा कि वह खुद को नहीं समझता है भले यह उसका दिखावा ही है। भाजपा हिंदू समर्थक होने का दिखावा करती है परन्तु उसकी कौन सी नीति ऐसा आभास देती है? परन्तु सभी कहते तो फिर भी यही हैं कि यह हिंदूवादी पार्टी है। अन्य पार्टियाँ खुद को तथाकथित धर्मनिरपेक्षता की पोषक कहती हैं परन्तु व्यवहार से तो वो अल्पसंख्यक की बात करती हैं परन्तु वहाँ भी असफल हैं क्योंकि पक्ष तो अल्पसंख्यक में उनका ही लेती हैं जो उस समूह के बहुसंख्यक हैं। तो ऐसे में क्या कहें इनको? कहने को कुछ कहिए परन्तु सच्चाई तो बदलने वाली है नहीं और सच्चाई यही है कि आज सभी देश के लिए घातक बन चुके हैं। सभी के अपने स्वार्थ देशहित से ऊपर आ चुके हैं। यही सर्वाधिक दुखद है।
यहाँ किसी के समर्थन या विरोध की बात नहीं है। बस बात है उस सच्चाई को समझने की जिसको जानते हुए भी हम नजरअंदाज करते हैं और देश के साथ, अगर कहूँ कि गद्दारी करते हैं, तो यह गलत नहीं होगा। यह बात जानने व मानने के बावजूद हम यदि अकर्मण्यता की स्थिति में हैं तो यह धोखा है देश के साथ। यह बात हम जितनी जल्द समझ ले उतना ही बेहतर होगा। परन्तु हमारे स्वार्थ ऐसा होने देंगे, मुझे शक है।
आज बंगाल या महाराष्ट्र या मध्य प्रदेश या केरल या तमिलनाडु कहीं की घटना लें हर जगह आप नेताओं के दोहरे मानदंड ही देखेंगे। हर नेता का रोल एक ही होता है, पक्ष में हैं तो सरकार की हर गलती पर पर्दा डालो और विपक्ष में हैं तो सरकार की हर नीति का विरोध करो। यह देश इसी राजनीतिक दोगलेपन का शिकार होकर बरबाद हो रहा है और अधिसंख्य आबादी का इससे कोई सरोकार नहीं है। नेता, अधिकारी, व्यापारी व आम जनता सभी को बस अपने हित नज़र आते हैं। आज देशहित के वादे तो महज बातें हैं और बातों का भला क्या मोल?
आज का सत्ता पक्ष कल तक आज के विपक्ष को, जो तब सत्ता पक्ष था, जिन कारणों से किसान विरोधी, शिक्षा विरोधी, देशहित विरोधी या जनविरोधी बताता था आज लगभग वही सारे काम खुद कर रहा है। तब के सत्ता पक्ष ने इनको नहीं सुना और वही आज ये कर रहे हैं। आज ये भी वादे पूरे नहीं कर रहे हैं पीछे उन्होंने यही किया था जो आज यह कह रहे हैं कि सरकार विपक्ष की सुनती नहीं है। यहाँ लोग एक दूसरे से ऐसी उम्मीद क्यों करते हैं जब उन्होंने पहले कभी खुद वही काम नहीं किया यही बात मैं आज तक समझ नहीं पाया। तब की सत्ता ने तानाशाही की तो आज की कर रही है तो बुरा क्यों? यह सवाल उनके लिए जो विपक्ष या सत्ता पक्ष बनते रहते हैं। परन्तु आम जन तो यही कहेगा कि एक ने गलत किया तो दूसरा उसे क्यों दोहरा रहा है?
अगर देश की राष्ट्र भाषा बहुसंख्यक लोगों द्वारा बोली व समझी जानेवाली हिंदी बनाने की बात होती है तो लोगों को लगता है कि यह जबरदस्ती है या थोपने वाली बात है, तो आज यही कहने और करने वाली ममता बंगाल में जहाँ नेपाली ज्यादा हैं वहाँ बांग्ला क्यों थोप रही हैं, यह सवाल तो उठेगा ही। पहले इन्हीं मुद्दों पर आप ने राजनीति की है तो आज भले ही आप का काम पवित्र हो पर विपक्ष अपनी जमीन की तलाश में आपका विरोध आज करेगा और जरूर करेगा क्योंकि राजनीति को इस गंदगी में ढकेलने वाले हैं तो आप ही लोग। आप लोगों ने कभी अपने हितों के आगे देशहित रखे होते तब तो आप लोग यह बात समझ भी पाते परन्तु देशहित तो आपके लिए कोई मायने ही नहीं रखते हैं। आज यूपी या बिहार में कोई कहे कि यहाँ मात्र हिंदी ही चलेगी यूपी में उर्दू को दूसरी भाषा का दर्जा नहीं दिया जाएगा तो यही ममता बनर्जी जिसका इस प्रांत से कोई सरोकार नहीं है मुस्लिम वोटों के लिए राजनीति करने दौड़ी आएगी। कांग्रेस सपा या बसपा को तो यह करना ही होगा क्योंकि इसी बँटवारे पर तो इनको सत्ता का सुख मिला है या मिलेगा। परन्तु जिनका यहाँ कोई जनाधार नहीं है वो भी यहाँ दौड़े आएँगे तो क्यों? बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना क्यों हो जाता है? समस्या की जड़ यहीं है। परन्तु मानता कौन है?
यूपी के चुनाव में भाजपा ने किसी मुस्लिम को टिकट नहीं दिया और मुस्लिम मामलों के लिए वक्फ का मंत्री बनाने की बात आई तो एक मुसलमान को आयात किया ताकि लोग यह न कह सके कि मुसलमान के साथ अन्याय हो रहा है या कोई दखल दी जा रही है। यह सही भी है क्योंकि मुस्लिम परंपरा या रीतिरिवाजों को कोई मुस्लिम ही ठीक से समझेगा। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि यही उचित हो सकता है परन्तु व्यावहारिक पक्ष तो यही है। अब देखिए जो खुद सांप्रदायिक हैं और देश तोड़ने पर आमादा है वो भाजपा को सांप्रदायिक बताते हैं। मैं आज तक नहीं समझ सका कि ये दोनों पक्ष हैं तो एक जैसे ही फिर सांप्रदायिक सिर्फ एक क्यों? सारी पार्टियों ने बहुसंख्यक समुदाय के खिलाफ अघोषित प्रतिबंध लगा रखा है और अल्पसंख्यक तो जैन या सिख या पारसी हैं परन्तु अल्पसंख्यक के नाम की सारी मलाई सिर्फ मुसलमानों को ये सारी ही कुकर्मी पार्टियाँ खिला दे रही हैं। फिर कौन है सांप्रदायिक? सांप्रदायिक ये सारे नीच और देशद्रोही नेता हैं।
जब महाकुम्भ का मेला होता है तो सपा जैसी सांप्रदायिक पार्टी मुहम्मद आजम जैसे हिंदू विरोधी को लूटने की छूट देकर वहाँ का प्रभार उस देशद्रोही को सौंप देती है जैसे मुगलों की सरकार हो न कि कोई लोकतांत्रिक सरकार। क्या अखिलेश या मुलायम को नहीं पता कि यह कुकर्मों जब पहली बार मंत्री बना था तब इसने एक पीडब्ल्यूडी इंजीनियर को बेइज्जत किया था। यह तो कुछ नहीं इसने भारत माँ को डायन कहा था जो देशद्रोह है। परन्तु हमारे नेता तो देशद्रोहियों को ही सम्मान देते हैं और हमारे जवानों तथा शहीदों का अपमान करते हैं। कौन है जो इन बातों पर नेताओं की आलोचना तक करे? आमजन इन्हीं बातों पर नेता की आलोचना तक कर दें तो जेल और डंडे यह है व्यवस्था इन देशद्रोही नेताओं की बनाई ताकि ये लूट मचाए रहें और कोई खिलाफ फिर भी न जा सके। ममता बनर्जी बंगाल के सर्वाधिक महत्व के हिंदू मंदिर का प्रभार एक मुसलमान को सौंप देती है और भाजपा को सांप्रदायिक कहती है। ये दोनों, अखिलेश व ममता, अति निकृष्ट लोग अगर इसी में सांप्रदायिक सौहार्द देखते हैं कि हिंदू धार्मिक स्थलों या रीति रिवाज को मुस्लिम संचालित करें तो इसका दूसरा उदाहरण क्या इन दोगले लोगों की नाजायजों के द्वारा पेश किया जाएगा। है हिम्मत तो ये चाण्डाल लोग किसी वक्फ बोर्ड का अध्यक्ष किसी हिंदू या सिख या पारसी या बौद्ध को तो छोड़िए खुद ही बनकर दिखा दें। नहीं पड़ेगी हिम्मत इन सत्ता के दलालों की क्योंकि पता है कि मुंडी कलम कर दी जाएगी। परन्तु यह बात भी कल सत्य होगी ही कि आज ये जिनको इस्तेमाल कर रहे हैं बीस पच्चीस साल बाद ये खुद चरण दास बन जाएँगे और जिनका ये फायदा उठा रहे हैं वो इनको गुलाम बनाएँगे।
किसान आंदोलन के पीछे निश्चित ही विपक्ष का हाथ है यह कह पाना कठिन है परन्तु भारतीय राजनीति का चाल चलन देखें तो यह गलत भी नहीं लगता है। कांग्रेस जब लगातार तीस साल राज करती रही तो इसने क्या किया? ये देश में न शिक्षा दे सके न कृषि को सुधार सके न ही नागरिकों को देशभक्त बना सकी। कश्मीर को विशेषाधिकार दिया और अब तक अरबों खरबों रूपयों की बरबादी के बाद आज क्या मिला है हमें? इस्लाम के नाम पर फिर से देश विभाजन की धमकी यही न? नेताओं या अधिकारियों या जजों को विशेषाधिकार दिया तो क्या मिला? देश की बढ़ती अराजकता शायद इसी का ही दुष्परिणाम है। जो सरकार देश को अपने तीस साल के लगातार चले शासनकाल में जनता को अनुशासन नहीं सीखा सकी और देश को उच्छृंखल बना दिया आज वही दूसरों पर देश तोड़ने का आरोप लगा रही है। कांग्रेस को तो बस सत्ता हथियाने की जल्दी थी। गांधी को अपना बाप मानने वाली कांग्रेस ने गांधी की कांग्रेस को भंग करने की बात क्यों नहीं मानी? पटेल की जगह नेहरू को प्रधानमंत्री गांधी ने किसके दबाव में बनवाया? १९४७ से २०१४ तक भ्रष्टाचार करती कांग्रेस अगर आज देश की हालत पर भाषण देती है तो कांग्रेसी ही उसको हजम कर सकते हैं दूसरे नहीं। इनको तो आज किसी की बुराई करने का कोई अधिकार है ही नहीं क्योंकि कश्मीर को समस्या इन्होने बनाया, शिक्षा को मैकाले से आगे इन्होंने नहीं बढ़ने दिया, कम्युनिस्टों से मिलकर देश के इतिहास को तोड़ने मरोड़ने वाले यही रहे हैं, शिवाजी या महाराणा प्रताप या भगतसिंह या चंद्रशेखर या अश्फाक आदि जैसे क्रांतिकारियों के नाम इतिहास के पन्नों से गायब इन्हीं ने करवाए, कृषकों को इन्होंने नहीं आगे बढ़ने दिया, नक्सलवाद-आतंकवाद इन्होंने बढ़ाया, राजनीति के अपराधीकरण की शुरुआत इन्होंने की ऐसा कौन सा गुनाह है जो इन्होंने नहीं किया। फिर भी जाने किस मुंह से ये देशभक्ति की बात करते हैं।
भाजपा को ये पार्टियाँ नसीहत देने के काबिल न थीं न हैं और कभी होंगी भी नहीं। परन्तु हमने कौन सा गुनाह किया है, बस यही न कि हम पहले केजरीवाल फिर मोदी पर विश्वास कर बैठे? परन्तु यह गुनाह तो नहीं। क्योंकि लोकतंत्र में किसी का तो समर्थन करना ही पड़ता है किसी को तो सरकार चलाने के लिए चुनना पड़ता है। मैंने भी यही किया और अगर लोकतंत्र में यह गुनाह है तो मैं गुनहगार हूँ। लेकिन मैं यह कहने का हकदार भी हूँ कि मोदी ईमानदारी से काम कर रहे होंगे परन्तु उनके सिपहसालार सही नहीं हैं तो इसके लिए जिम्मेदार तो मोदी खुद ही होंगे। मैं फिर कहूँगा कि किसी सपाई बसपाई कांग्रेसी कम्युनिस्ट या इनके पिछलग्गू को आलोचना का अधिकार नहीं है क्योंकि जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश को तोड़ने की बात करें या देश के दुश्मन का साथ दें उनको आलोचना का नहीं बस फांसी पर लटकने का अधिकार है। आज देश को मोदी सरकार भी सही शिक्षा, जनसंख्या, स्वास्थ्य और कृषि नीति नहीं दे सकी। नोटबंदी के परिणाम घोषित नहीं कर सकी। देश के जवानों की शहादत नहीं रोक सकी। सार्वजनिक उपक्रमों की क्षमता नहीं सुधार सकी। देश को अनुशासन का पाठ नहीं पढ़ा सकी। अपराधियों का मनोबल नहीं तोड़ सकी। राजनीतिक भ्रष्टाचार या अपराध नहीं रोक सकी। भ्रष्टाचारियों को जेल नहीं भेज सकी इन सभी बातों की आलोचना करने का अधिकार हमारा है और इनपर विरोध का अधिकार हमारा है। तीन साल बस हुआ बवाल। अब कुछ ऐसा करो कि हमारा मोह भंग न हो। वरना अगले चुनाव में पाँच दस प्रतिशत वोट भी खिसकने तो जिनको तुम अंदर नहीं कर सके वो तुम्हें अंदर करने में देर नहीं करेंगे।

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