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संतुष्ट रहें, प्रसन्न रहें

Posted On: 27 Jun, 2017 मेट्रो लाइफ में

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नमस्कार दोस्तों, मेरा नाम है स्वराज, मैं हूँ एक आम आदमी, सॉरी वो पोलिटिकल हो जाएगा, एक आम सॉफ्टवेर इंजिनियर, वैसे जिस तरह से देश में इंजिनीयर्स की संख्या बढ़ती जेया रही है, कूछ सालों में आम आदमी और इंजिनियर पर्यायवाची बन जाएँगे.

आजकल कई जगहों पर ऐसे लेख दिख रहे होंगे आपको भी जिनमे लिखा है की डिप्रेशन में आए हुए लोगों की तादाद बढ़ती जा रही है. ये खबर सुनके कितने सारे लोग जो डिप्रेशन में नही थे, वो भी डिप्रेशन में आ गये. होता क्या है, ऐसी खबरों में हम उनकी जुड़ी बातें देखकर खुद के हैं. फिर ये साबित करने में लग जाते हैं की ये खबर तो हमारे ही लिए है. सिर्फ़ सहानुभूति की भूख मिटाने के लिए.
खैर ये खबर काला बंदर वाली खबरों जैसी नही लगती. क्यूंकी हम अपने आस पास ही कई दुखी आत्माओं को और उनके साथ होती दुर्घटनाओं को देख रहे हैं.

मैं कोई एक्सपर्ट नही हूँ, ना कोई बाबा, बस अपना अनुभव आज आपके साथ बाँटना चाहता हूँ. दर्द और दारू दोनो बाँटने से कम होते हैं.
मुझे नही पता डिप्रेशन असल में क्या होता है, लेकिन मैने खुद को और कई लोगों को चिड़चिड़ा होते देखा है. इसके लक्षण हैं, बात बात पर गाली देना, दारू पीकर अपने संघर्ष की कहानी सुनाना, कस्टमर केयर वाले को अँग्रेज़ी में ज़ोर ज़ोर डांटना, वग़ैरह.
होता क्या है, की हम नाराज़ अपने आप से रहते हैं और गुस्सा सारा दूसरों पर निकल देते हैं. और वो दूसरा जो पहले से खुद पर गुस्सा है, हमारे उपर अपना गुस्सा निकल कर हमारी ज़िंदगी से चला जाता है. पहले दारू पीने से दुख कम होते थे, आजकल दोस्त कम हो जाते हैं. और करो बेटा दारू पी के दंगा.

इसकी शुरूवात होती है हमारी आशाओं से. जो देश की आबादी की तरह बढ़ती ही जा रही है. कुछ साल पहले जिनके यहाँ टीवी नही था, वो 32 इंच का टीवी देख कर दुखी होते हैं क्यूंकी पड़ोसी या किसी जान पहचान वाले के पास 40 इंच का है. 40 इंच आ जाए तो ये सोच कर दुखी होते हैं की किसी और के पास 55 इंच का है. ये इंच इंच की चाहत इतनी खींचती जा रही है की हम सबकुछ होते हुए भी दुखी हैं.

हम ज़िंदगी नही जी रहे हम लड़ रहे हैं, अपने आप से. हुमारे पूर्वजों ने अँग्रेज़ों से आज़ादी की लड़ाई लड़ी, अब खुद से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं हम. उन्होने आज़ादी की लड़ाई इसलिए नही लड़ी थी की हमें लड़ाई की आज़ादी मिल सके.
हमारे पहले वाली पीढ़ी, हमसे ज़्यादा खुश थी क्यूंकी उनके पास था संतोष. अब उसकी जगह आ गयी है “हाइ एक्सपेक्टेशन” और इसलिए है डिप्रेशन. पहले का दोहा था,
“साई इतना दीजिए, जामे कुटूम समाय, मैं भी भूखा ना रहूं, साधु ना भूखा जाए.”
आअजकल का दोहा है,
“भाई इतना लीजिए, जिससे मन भर जाए, मन को ऐसा कीजिए, की कभी भी ना भर पाए”
स्मार्ट फोन और स्मार्ट टीवी की दुनिया से समय निकल कर आइए तोड़ा वक़्त परिवार और दोस्तों के साथ बितायें. और जब कोई बात कर रहा हो आपसे, तो एक सेकेंड को भी ध्यान या नज़र फोन पर ना जाए. हम जिस खुशी को शॉपिंग माल में खरीदने जाते हैं, वो घर पर फ्री में मिलती है दोस्तों. बच्चों के साथ खेलकर, घर के लोगों के साथ इधर उधर की बातें करके, या टेबल बजा कर गाना गाके.
तो मेरे विचार से संतोष डिप्रेशन को कम कर सकता है.
तो, दोस्तों संतोषी रहिए और लोगों को संतुष्ट करिए, अपनी मीठी बातों से.



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