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आतंकियों को विनाशक गोली की जगह संतों की कल्याणकारी बोली समझनी चाहिए

Posted On: 10 Jul, 2017 Religious,Social Issues में

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काशी के घमहापुर (कंदवा) क्षेत्र में स्थित प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम में गुरुपूर्णिमा पर्व अपनी 26 वर्ष पुरानी परम्परा ‘जात-पात पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई’ के अनुसार मनाया गया। काशी में सभी जाति और धर्म के लोग आश्रम के मानवतावादी विचारों और सेवा कार्यों से प्रभावित रहे हैं। लोगों को हर तरह के नशा, मन के विकारों और तमाम तरह की सामाजिक बुराइयों को छोड़ने के लिए प्रेरित करना व संत-मार्ग के अनुसार आत्मानुभूति-ईश्वरानुभूति प्राप्त करने का सरल और सहज ईश्वर-पथ दिखाना प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम का मूल उद्देश्‍य रहा है। बिना किसी जाति-धर्म के, भेदभाव के एक पंगत में बैठकर सभी सतसंगियों के प्रसाद ग्रहण करने के कारण ही आश्रम के बारे में ये मशहूर है कि वहां पर शेर और बकरी सब एक ही घाट पर पानी पीते हैं।

Varanasi

आज भी काशी के कई आश्रमों में प्रवेश करने पर पहला सवाल यही होता है कि ‘आप ब्राह्मण हैं या नहीं?’ जबाब के अनुरूप ही आगंतुक से व्यवहार किया जाता है। प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ आश्रम वो आश्रम है, जहां पर आने वाले से उसकी जाति नहीं पूछी जाती है। हमारी नजर में दुनिया के सारे इंसान एक ही परमात्मा के अंश-पुत्र हैं। इंसान को भगवान ने सिर्फ इंसान बना के भेजा है और कुछ भी नहीं।

जातपात को बढ़ावा देने में धर्मगुरुओं के साथ-साथ उनके आगे-पीछे घूमने वाली मीडिया भी उतनी ही दोषी है। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर रविवार 9 जुलाई 2017 को कार्यक्रम का शुभारम्भ प्रातः 11 बजे भजन गायन से हुआ। त्रिलोकनाथ पांडे, सूरज भक्त, सनातन मौर्य, शिवशंकर सिंह, रमेश मौर्य और मुंबई से आये कथा वाचक व भजन गायक पंडित नरसिंह शास्त्री ने सतसंगियों को भाव-विभार कर देने वाले भजन सुनाए।

आश्रम में गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर एकत्रित श्रद्धालु सतसंगी भाई-बहनों को सम्बोधित करते हुए आश्रम के आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक सद्गुरु राजेंद्र ऋषिजी ने पूरे विश्व को शान्ति और भाईचार का सन्देश देते हुए कहा कि पूरे विश्व को सुन्दर, शांत और सुखी बनाओं। क्योंकि इस संसार में पता नहीं कहां आपको जन्म लेना पड़े। जन्म और मृत्यु पर किसी इंसान का नहीं, बल्कि ईश्वर का नियंत्रण है।

किसी भी मुल्क या समुदाय से नफरत मत करो, क्योंकि ईश्वर अगले जन्म में आपको उनके बीच भेज सकता है, जन्म दे सकता है। अहंकार से ग्रस्त और हथियार उठाने वाले हिंसक प्रवृति के हर मनुष्य को यह बात याद रखनी चाहिए कि हमारा जीवन परमात्मा रूपी अदृश्य शक्ति के हाथों नियंत्रित है, इसलिए हमारी मनमानी, हिंसक प्रवृत्ति और तानाशाही सदैव नहीं चलेगी।

सद्गुरु जी ने संत कबीर साहब के एक भजन की विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि शरीर और संसार ये दोनों प्रकृति हैं। दोनों के ही भीतर और बाहर पुरुष यानी परमात्मा समाहित है, इसलिए शरीर और संसार दुनिया का सबसे बड़ा सिद्धपीठ है। प्रकृति पुरुष सिद्धपीठ एक सृष्टि व्यापी सच्चाई है, जिसे दुनिया का कोई भी इंसान झुठला नहीं सकता। लोग अज्ञानतावश परमात्मा को यहां-वहां भटकते हुए ढूंढ रहे हैं। जीव ब्रह्म का अंश है और ब्रह्म यानि परमात्मा का अंश होते हुए भी उसे इसका ज्ञान नहीं है, क्योंकि जीव मायाधीन होकर अपने ब्रह्म स्वरूप को भुला बैठा है। यही दुनिया के सारे मनुष्यों की सबसे बड़ी आध्यात्मिक समस्या है। अज्ञानता और अहंकार के कारण ही आतंकवाद का कीड़ा बहुतों के दिमाग में रेंग रहा है। आतंकवादियों को विनाशकारी गोली की जगह संतों की कल्याणकारी बोली समझनी चाहिए।

हिन्दू कहे मोहि राम पियारा, तुर्क कहे रहमाना।
आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना॥

संत कबीर साहब के इस दोहे की चर्चा करते हुए सद्गुरु जी ने कहा, हिन्दू अपने को राम का भक्त कहते हैं और मुसलामानों को रहमान से प्यार है। राम और रहमान के नाम पर दोनों आपस में लड़कर न जाने कितने बेगुनाहों का क़त्ल करते हैं। यहां तक कि खुद भी मौत के आगोश में चले जाते हैं। राम और रहमान के नाम पर वो दंगेफसाद और कई तरह के हिंसक अपराध करने वाले एक छोटी सी बात नहीं समझ पाते हैं कि राम और रहमान दोनों अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही हैं। चाहे उसे राम कहो या रहमान, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। परमात्मा मनुष्य के भीतर है और वो उसे बाहर ढूंढ रहा है। परमात्मा को आज भी मनुष्य मंदिर-मस्जिद में ढूंढ रहा है और मंदिर-मस्जिद के लिए आपस में लड़-झगड़ भी रहा है। दरअसल यह लड़ाई राम और रहमान के लिए नहीं, बल्कि अपने अहंकार की तुष्टि के लिए है। पूरा संसार राम-रहमान का घर है। उसे मंदिर-मस्जिद रूपी घर की जरूरत नहीं है।

उन्होंने कहा, अधिकांशतः धार्मिक स्थल आज मनुष्य को न तो सांसारिक सन्मार्ग दिखा रहे हैं और न ही आध्यात्मिक दृष्टि से तृप्त कर रहे हैं, बल्कि धर्म के नाम पर लोगों को सिर्फ भड़काने, लूटने, आपस में लड़ाने-भिड़ाने और ईश्वर-पथ से भटकाने का ही कार्य कर रहे हैं। जब तक मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध नहीं होगा, तब तक वो धर्मों, तीर्थों और कर्मकांडों के भंवरजाल में फंसकर छटपटाता रहेगा। धर्मगुरु शिष्य बनाकर उसे जीवन भर मूर्ख बनाते रहेंगे। लूटते रहेंगे और अपनी तुच्छ स्वार्थ सिद्धि करते रहेंगे। लोगों को अब जागरूक होना चाहिए और संत-संगति करनी चाहिए। किसी संत किसी सद्गुरु की मदद से जिस दिन किसी व्यक्ति का परिचय अपने स्वरूप की सहजता से हो जाता है, उसे सहज स्वरूप परमात्मा का बोध भी प्राप्त हो जाता है।



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