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क्या कड़ी सज़ा रेप रोकने के लिये पर्याप्त है?

Posted On: 16 Jul, 2017 Others,social issues में

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पता नहीं हमारे देश में अपराध के पीछे के कारणों और अपराध को घटित होने से रोकने के उपायों से ज़्यादा सज़ा पर ही ज़ोर क्यों दिया जाता है? रेप एक ऐसा अपराध है, जो प्री-प्लांड या सुनियोजित नहीं होता, बल्कि अचानक या अकस्मात किया जाता है। कोई माने या ना माने, लेकिन रेप के पीछे फ़िल्मों, टीवी चैनल्स, इन्टरनेट, मोबाइल, अश्लील साहित्य और सार्वजनिक स्थलों पर बढ़ती अश्लीलता बहुत बड़े कारण हैं। इन पर गम्भीरतापूर्वक विचार और चर्चा करने की बजाए फांसी, आजीवन कारावास, बालिग-नाबालिग, मनोरोगी इत्यादि पर ही चर्चा की जाती है।

rape

दरअसल, दुनिया में इन्सानों के वेश में हैवान-शैतान भी मौजूद हैं और ऐसे लोग जब भी फिल्मों, टीवी चैनल्स, इन्टरनेट, मोबाइल, अश्लील साहित्य या सार्वजनिक स्थलों पर अश्लीलता देखते हैं, तो उनके अन्दर हैवानियत हावी हो जाती है। फिर वे मौक़े की तलाश में लग जाते हैं, जिसका शिकार ज़्यादातर असहाय, कमज़ोर, लाचार लड़की-महिला या बच्ची तक हो जाती है, जिनका पहनावे से कोई लेना-देना नहीं होता। इसके अलावा अनेक महत्वपूर्ण बातों को हम छोटी-मोटी बातें समझकर नज़रअंदाज कर देते हैं जैसे…
१. स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों या अन्य शैक्षणिक संस्थानों, हॉस्टल्स, सरकारी एवं ग़ैर सरकारी संस्थाओं इत्यादि में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर हो।
२. स्कूल बस-वैन इत्यादि में कंडक्टर-क्लीनर अनिवार्य रूप महिलाएं हों।
३. स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों या अन्य शैक्षणिक संस्थानों, हॉस्टल्स, सरकारी एवं ग़ैर सरकारी संस्थाओं इत्यादि में अनुशासनात्मक समिति का गठन अनिवार्य रूप से हो और उसमें महिलाओं की भागीदारी बराबरी की हो।
४. प्रत्येक पुलिस थाने में महिलाओं से सम्बन्धित अपराधों के लिए अलग विभाग-समिति अनिवार्य रूप से गठित की जानी चाहिये, जिसमें महिला-पुरुष अधिकारियों-कर्मचारियों की बराबरी की भागीदारी हो।
५. प्रत्येक छोटे-बड़े शहर में Remote-Isolated Areas की List तैयार करके पुलिस गश्त बढ़ाई जानी चाहिये।
६. रिहायशी इलाकों से शराब की दुकानें व बार इत्यादि हटाए जाने चाहिये।
७. शराब-बार इत्यादि के खुले रहने की सीमा अधिकतम रात्रि १० बजे तक की जानी चाहिये।
८. देश भर में नशे के कारोबार पर सख़्ती से लगाम लगानी चाहिये, क्योंकि ज़्यादातर अपराध नशे की अवस्था में ही किये जाते हैं।
९. फ़िल्मों, टीवी चैनल्स, इन्टरनेट, मोबाइल, अश्लील साहित्य, सार्वजनिक स्थलों पर अश्लीलता को रोकने के लिए सख़्त क़दम उठाए जाने चाहिये।
१०. महिला सम्बन्धी किसी भी प्रकार के अपराध में चार्जशीट प्रस्तुत करने की अवधि अधिकतम १५ दिन की जानी चाहिये।
११. महिला सम्बन्धी किसी भी प्रकार के प्रकरण की सुनवाई Fast Track Court के तहत अधिकतम ६ माह में होनी चाहिये।
१२. रेप एक अमानवीय एवं बर्बरतापूर्ण अपराध है, इसलिये अपराधी के प्रति किसी भी प्रकार की मानवीयता अथवा सहानुभूति न बरतते हुए आजीवन नपुंसकता की सजा का प्रावधान किये जाने के लिए संसद में क़ानून बनाया जाना चाहिये।

रेप जैसे वीभत्स अपराध की सज़ा केवल फांसी या आजीवन कारावास नहीं हो सकती। रेपिस्ट के लिये सबसे उपयुक्त सज़ा आजीवन नपुंसकता है। निर्भया प्रकरण के बाद सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस दीपक वर्मा को रेप सम्बन्धी क़ानून/धाराओं में संशोधन एवं सज़ा के प्रावधानों पर जनता से राय लेकर उसकी समीक्षा करने और अपना पक्ष रखने को कहा गया। देश भर से आक्रोशित लोगों ने अपनी राय/सिफ़ारिशें भेजीं, जिनमें रेपिस्ट को सार्वजनिक रूप से बीच चौराहे पर फांसी देने, सार्वजनिक रूप से बीच चौराहे पर ज़िन्दा जला देने, नपुंसक बना देने, जनता के हवाले कर देने, फांसी देने, आजीवन कारावास देने जैसी राय-सिफ़ारिशें भी सम्मिलित थीं। जस्टिस वर्मा ने मानवीयता का हवाला देते हुए उन सभी राय-सिफ़ारिशों को नकार दिया और वर्तमान न्यायालयीन प्रक्रिया पर व उसके न्याय पर अपनी सहमति और विश्वास व्यक्त किया। कुछ दोषियों की फांसी की सज़ा भले ही आज बरक़रार रखी गई हो, लेकिन निर्भया प्रकरण का सबसे वहशी दरिन्दा मात्र कुछ दिनों की बेमानी छूट के चलते साफ़ बचकर निकल गया। इस बात का अफ़सोस देश की जनता के साथ निर्भया की आत्मा को भी ज़रूर होगा।

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