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बाबूजी का कॉपीराइट

Posted On: 16 Jul, 2017 Others,हास्य व्यंग में

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इधर, एक घटना घट गई, लेकिन यह घटना अपने पूरे सौंदर्य-बोध के साथ उभर पाती, इससे पहले ही दब गयी। दब इसलिए नहीं गयी कि यह घटना, घटना जैसी नहीं थी। दरअसल, बात यह थी कि इस बीच चीन ने कुछ ऐसी हरकतें कर दीं, जिससे हम लोग द्विपक्षीय सम्बन्धों में ऊष्णता और गतिशीलता लाने की गरज से पड़ोसी को गाली-फक्कड़ी करने में व्यस्त हो गए थे।

amitabh bacchan

हां, तो बात यहां उस दबी हुई घटना की ही करेंगे। बात यह थी कि कुमार विश्वास ने अपने एक नए प्रोग्राम ‘तर्पण’ जो कि स्वनामधन्य कवियों के प्रति एक श्रद्धांजलि के तौर पर था, में हरिवंशराय बच्चन जी की एक रचना पढ़ी थी। हालांकि पढ़ी उन्हीं के नाम से, लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों अमित जी ने बाबूजी की रचना को पढ़े जाने पर बड़ी गम्भीरता से संज्ञान ले लिया।

बच्चन साहब कुछ नाराज़ बताए गये। उन्होंने कुमारजी को नोटिस थमा दिया। कुमार विश्वास का ‘तर्पण’ शुरुआत में ही ‘तड़पन’ में तब्दील हो गया। पहले-पहल तो यही समझ में आया कि जरूर कुमार से रचना-पाठ में कोई व्याकरणिक गलती हो गयी होगी, पर बात यह नहीं थी। बताते हैं कि कुछ कॉपीराइट का मामला था। बात नाराजगी की थी भी। ठीक है, माना कि आप उनको श्रद्धांजलि दे रहे थे, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि आप नियम-कानून को ताक पर रख दें। श्रद्धांजलि की आड़ में आप कानून से खिलवाड़ करें, यह नहीं चलेगा।

ये AAP वाले भी नाहर जगह घुसने की फिराक में रहते हैं। भाई, जब आप मतलब भर की कविताएं लिख लेते हैं, तो काहे को बाबूजी की कविताओं के पीछे पड़े हैं और फिर अगर आपको बाबूजी जी की कविताएं सुनानी ही थीं, तो परमीशन लेने में क्या हर्ज था। जब आप हर जगह घूमते फिरते हैं, तो मुम्बई जाकर परमीशन लेने में क्या दिक्कत थी। मगर बाद में कुछ ऐसे-वैसे सूत्रों से पता चला कि बात सही होने पर भी असली बात यह नहीं थी। मामला कुछ और ही था।

दरअसल, यह सारी लड़ाई रचना के कॉपीराइट की आड़ में सम्बन्धों के कॉपीराइट की थी। बाबूजी की कविता गाकर कुमार यह साबित करना चाह रहे थे कि बच्चन साहब पूरे देश के हैं। उनकी रचनाओं को गुनगुनाने का अधिकार हर भारतवासी को है और फिर उनके मानस पुत्र होने के नाते उनको तो सहज ही यह अधिकार हासिल है। चूंकि, बाबूजी की रचनाओं में पूरा भारत बसता है, इसलिए भारतवासी उनके और वो भारतवासियों के हैं। मगर जैविक पुत्र होने के नाते अमिताभ जी को कुमार की यह हरकत अखर गयी। उनका मानना है कि बाबूजी पहले हमारे हैं, बाद में किसी और के। बाबूजी का सम्मान करना है तो शौक से करें, पर पहले हमसे परमीशन लें।

वैसे नोटिस मिलना उतनी बुरी बात नहीं जितना कि भाई लोग प्रचार कर रहे हैं। नोटिस किसी ऐरे-गैरे ने नहीं, बल्कि सदी के महानायक ने दिया है। सदी के महानायक की तरफ से नोटिस मिलना भी किसी प्रशस्ति पत्र से कम नहीं। इसके लिए कुमार विश्वास को बच्चन साहब का आभारी होना चाहिए और हां, अंत में जनहित में एक सूचना यह है कि जिस किसी को भी अमितजी से ऐसे प्रशस्ति पत्र पाने की दिली इच्छा हो, तो वह मधुशाला या उनकी किसी भी कविता का सार्वजनिक मंच से पाठ करे। उनकी मनोकामना जल्द ही पूरी होगी।



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