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लालू राज– भयावह अतीत, जूझता वर्तमान और अंधकारमय भविष्य

Posted On: 17 Jul, 2017 Politics में

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Lalu

मैं एक बिहारी हूं…। कोई भी बिहारी इस बात को गर्व से कहे, शर्म से कहे या अफसोस जाहिर करते हुए, इस बात को वह आज तक नहीं समझ पाया। यकीन मानिये ऐसे असंख्य बिहारी हैं, जो इसी असमंजस में रहते हैं। ऐसी बात नहीं है कि हमें अपनी मातृभूमि पर गर्व नहीं है। आप सभी की तरह हमें भी है, लेकिन जब भी यह बात आती है कि क्या हम उस राज्य के निवासी हैं, जहां लालू प्रसाद यादव जैसे नेता का दो दशक से ज्यादा समय तक बोलबाला रहा, तो हर खुद्दार बिहारी शर्मसार होता है। क्योंकि लोगों की हंसती निगाहें ये पूछती हैं कि जब बिहार देश को सबसे ज्यादा IAS/IPS देता है, फिर ऐसे राज्य में एक घटिया व्यक्ति दो दशक तक कैसे सरकार चला सकता है। इतने पढ़े लिखे लोग अपने लिए महज 9वीं पास उपमुख्यमंत्री कैसे चुन सकते हैं।

चार दशक से ज्यादा यहां कांग्रेस ने राज किया और दो दशक से ज्यादा लालू परिवार ने। इस राज्य ने विकास के अलावा राजनीति के हर गंदे पहलुओं का अनुभव किया है और आज भी झेल रहा है। जयप्रकाश आंदोलन से निकले बाहुबली नेता लालू प्रसाद यादव ने अपनी गन्दी राजनीति और गुंडागर्दी की बदौलत बिहार को गरीबी, असाक्षरता, भुखमरी और बेरोजगारी जैसी समस्याओं में झोंककर हमेशा से बिहार को पिछड़े राज्यों की श्रेणी में सर्वोच्च स्थान पर रखा हुआ है।

लालू ने अपने राजनीतिक सफ़र में हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि बिहार के दलितों का विकास न होने पाए। गरीब हमेशा गरीब बने रहें और साक्षरता लोगों की पहुंच से दूर रहे। बिहार राज्य में सवर्ण को उखाड़ फेंकने के लिए लालू ने भूराबाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) साफ करो का नारा दे दिया था। ये वो दौर था, जब कश्मीर से पंडितों को मारकर भगा दिया गया था। बिहार के सवर्णों को इसके उदाहरण दिए जाते थे कि अगर उन्होंने लालू के खिलाफ कोई कदम उठाया, तो उनका भी वैसा ही हश्र होगा। 90 का दशक बिहार के ब्यूरोक्रेट्स, इंजीनियर्स और व्यवसायियों के लिए दहशत का दौर रहा। हफ़्ता वसूली, अपहरण और क़त्ल लालू के संरक्षण में ख़ूब फला फूला और इसका प्रभाव राबड़ी देवी शासन काल तक रहा।

हमारा बचपन लालू का जंगलराज देखते हुए बीता है। इसलिए आज जब कोई बाहरी सिर्फ मोदी विरोध में लालू का समर्थन करता है, तो जितनी नफरत हम अपनी वर्तमान जंगलराज वाली सरकार से करते हैं, उससे ज्यादा घिनौना उसका व्यक्तित्व लगता है। आप बिहार की दुर्दशा के प्रत्यक्षदर्शी नहीं रहे हैं, तो कम से कम अपने तथ्यों को दुरुस्त कर लीजिए। अपने मतभेद को अहं का काला चश्मा पहनाकर बस मोदी विरोध में लालू का समर्थन कर रहें हैं, तो किसी भी सम्मानित और खुद्दार बिहारी के लिए आप भी उतने ही गिरे हुए हैं, जितना कि लालू प्रसाद यादव।

90 के दशक से लेकर 21वीं सदी के कई साल तक बिहार के गांव में बिजली के तार तो थे, लेकिन बिजली हमने अपने विद्यालय जीवन में कभी नहीं देखी। हमने अपनी प्राथमिक शिक्षा लालू जी की मेहरबानी से उनके चुनाव चिन्ह लालटेन की रोशनी में पूरी की। उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी थी बिहार को पिछड़ा बनाए रखने में और मुख्य तौर पर वो सफल भी हुए हैं। यही कारण है कि आज भी बिहार के अधिकतर नौजवान सुबह-सुबह चौक-चौराहे पर इकट्ठा होकर ताश खेलते हैं और लालू जी का गुणगान करते हैं। सड़कों की दुर्दशा तो पूछिए ही मत। यहां जिले की 17 किलोमीटर की दूरी तय करने में 4 घंटे लग जाते हैं। राजधानी से 125 km के दायरे में रहने वाले लोग भी राजधानी हवाई अड्डे से शाम की फ्लाइट से कहीं जाने के लिए सुबह ही घर से निकलते हैं और अगर सुबह की फ्लाइट हो तो एक दिन पहले ही निकलना पड़ता है।

अपने बच्चों को भुखमरी और असाक्षरता में झोंककर लालू के अनपढ़ बेटों को चुनने का कारनामा सिर्फ बिहार में हो सकता है। चारा घोटाले का आरोप साबित होने के बावजूद अपनी अनपढ़ पत्नी राबड़ी देवी को बिहार की मुख्यमंत्री बनाकर जेल की हवा खा रहे लालू ने जेल से सरकार चलाकर यह साबित कर दिया कि बिहार में वो कहीं भी रहें और किसी भी हाल में रहें, सरकार उन्हीं की चलेगी। कमाल की बात यह है कि इतना अपार धन होने के बावजूद इनके पुत्र तेजस्वी यादव जो वर्तमान में उपमुख्यमंत्री हैं, कहते हैं कि वो पिछड़े और गरीब हैं, इसलिए उनको निशाना बनाया जा रहा है और CBI को जबरदस्ती उनके पीछे लगा दिया है सरकार ने। मतलब जिस तरह की फूहड़ बातों से लालू जनता को गुमराह करते आये हैं, उसी प्रकार के घटिया हथकंडे अब इनके बेटे अपना रहे हैं, जनता को गुमराह करने के लिए। लोगों को चाहिए कि वे लालू परिवार के हर सवाल पर चुप रहने या आश्चर्य करने की बजाय उनसे ये सवाल पूछें…

1. मीसा भारती अगर यह कह रही हैं कि उनके फार्म हाउस पर छापा क्यों पड़ा, तो लोग उल्टा सवाल करें कि मीसा भारती जैसों के पास फार्महाउस कैसे है? क्या डॉक्टरी से उनकी आय इतनी है, जिससे वे करोड़ों की जमीन और फार्म हाउस खरीद सकें?

2. तेजस्वी यादव अगर यह कह रहे हैं कि 10 साल पुराने मामले में पूछताछ क्यों हो रही है, उस समय तो उनको मूछ भी नहीं उगी थी, तो लोगों को सरकार से सवाल करना चाहिए कि यह तफ्तीश दस साल तक क्यों नहीं हुई? इन्हें अब तक जेल क्यों नहीं भेजा गया?

3. अगर तेज प्रताप और तेजस्वी ये कहते हैं कि उनके खिलाफ CBI का छापा बदले की भावना से प्रेरित है, तो उनसे यह सवाल करना चाहिए कि 12वीं और 9वीं पास इन भाइयों की इतनी आय कहां से हुई?

4. अगर लालू यह कह रहे हैं कि उनके खिलाफ चल रहे मामले विपक्ष की साजिश है, तो यह सवाल उठना चाहिए कि क्या विपक्ष की एकता का आधार और न्यायिक प्रक्रिया परस्पर विरोधी संकल्पनाएं हैं? विपक्षी राजनीति का कवच एक भ्रष्टाचारी को क्यों बचाये?

5. मीडिया के इस रिपोर्ट पर कि महागठबंधन बना रहेगा या नहीं? इस पर भी सवाल उठना चाहिए कि क्या अपराधी और आरोपियों को सत्ता में बने रहने का कोई हक भी है?

6. सवाल यह नहीं है कि घोटालों की जांच फांसीवाद है या नहीं? सवाल यह है कि चोरी और भ्रष्टाचार के कीचड़ में सने राजनेता क्या अपने ऊपर समाजवाद और धर्मनिपेक्षता का इत्र छिड़ककर पवित्र हो सकते हैं?

समस्या यह है कि ऐसे सवाल पूछने वाले को बिहार में या तो उठवा दिया जाता है या फिर पंगु और अपाहिज बनाकर ऐसी जगह फेंक दिया जाता है, जहां से वह सोचकर भी लालू परिवार पर अंगुली न उठा सके। आखिर लालू परिवार पिछड़ों और प्रतिमनुवाद के नाम पर लूट-खसोट का नंगा खेल कब तक खेलता रहेगा? इनसे निपटने का एक ही तरीका है और वो है लोगों का संगठित विरोध व सशक्त कानून, जो इस परिवार के घोटालों पर ऐसा शिकंजा कसे, जिससे कम से कम लालू परिवार 20 साल तक सक्रिय राजनीति से दूर रहे। इनकी अवैध संपत्ति को सरकार अपने कब्जे में तुरंत ले और बिहार के लिए विकास का एक नया रास्ता सुनिश्चित करे, जिसके लिए बिहार की जनता का दृढ निश्चय और सहयोग वांछनीय है।



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