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युद्ध की अनिवार्यता उसी पल समाप्त हो गयी थी, जब संवाद का जन्म हुआ

Posted On: 21 Jul, 2017 Others,social issues में

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मनुष्य को अपने जीवन की विपरीत परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाना पड़ता है। इस परिश्रम में उसका सामना प्रकृति तथा मनुष्य दोनों से होता है। इस उद्देश्य के लिए शुरू में उसके पास प्रकृति तथा प्रतिद्न्‍द्वी मनुष्य दोनों को नष्ट करना ही एक मात्र विकल्प होता था।

war

प्रकृति का प्रतिरोध प्रत्यक्ष नहीं था, परन्तु सामना करने वाले मनुष्य के पास प्रतिक्रिया थी। इसी कारण से परिश्रम का विशिष्ट अर्थों में नया नाम संघर्ष हो गया। भाषा मनुष्य में प्रकट होते ही मनुष्य भी भाषा में प्रकट होने लगा। इस सिलसिले में प्रतिद्वंद्वी के प्राण लेने के पूर्व बातचीत एक विकल्प के रूप में सामने आया, जिसे संवाद नाम दिया गया |

संघर्ष के निमित्त भी शिकार, स्त्री तथा सरहद से होते हुए सभ्यता और संस्कृति तक पहुंचे। संघर्ष के रूप भी संग्राम से युद्ध और संवाद में बदले। युद्ध के परिणाम एक त्रासदी बनकर पीढ़ी दर पीढ़ी तक टिकते हैं। हताहत सैनिक युद्ध के अच्छे बुरे से मुक्त हो जाते हैं, मगर नतीजे परिवार तथा समाज को भोगने पड़ते हैं।

युद्ध तथा शान्ति एक-दूसरे के लिए अनिवार्य भी नहीं होते। युद्ध की अनिवार्यता उसी पल समाप्त हो गयी थी, जब संवाद का जन्म हुआ। अधिक नहीं, पिछले सत्तर वर्षों में ही कई मुल्कों के आपसी वैमनस्य केवल संवाद से ही ख़त्म हुए हैं। हमें युद्ध के अवसरों की बजाय संवाद की सम्भावनाओं को तलाशना होगा। हमारे जितने अधिक मित्र होंगें, हमारा संवाद उतना अधिक प्रभावी होगा।

विंस्टन चर्चिल ने कहा है- युद्ध मुख्य रूप से त्रुटियों की एक तालिका है। War is mainly a catalogue of blunders.

मैं कहता हूं- संवाद ही समाधान की चित्रपंजी है। Dialogue only is album of solution.

युद्ध और सैनिक कार्रवाई में बहुत अंतर

सीमांकित मुल्क जब तक वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता है, तब तक सेना भी इस व्यवस्था की जरूरत है और सैन्य कार्रवाई भी। असरदार संवाद तथा कारगर सैन्य कार्रवाई के लिए नियोजित तथा प्रभावी सामरिक तैयारी, वैश्विक मैत्रीपूर्ण राजनयिक (कूटनीतिक) सम्बन्ध आवश्यक होते हैं। समय के साथ सैनिक कार्रवाई और युद्ध के अर्थ में कुछ नया शामिल हो गया है तथा कुछ बाहर हो गया है। पूरी शक्ति लगाकर अपनी सामाजिक सुरक्षा के लिए विशाल सैनिक संख्या तथा अपरिमित साधनों से प्राण गंवाने की प्रबल सम्भावनाओं के साथ की गयी कार्रवाई भी सैनिक कार्रवाई है। बशर्ते प्रतिद्वंद्वी देश की सामाजिक सुरक्षा नष्ट करना हमारा ध्येय कभी न हो। सैनिक कार्रवाई में अनुशासन तथा नियंत्रण कभी बेलगाम नहीं होता। सैनिक कार्रवाई में स्त्री, बच्चे, वृद्ध और निशक्तजन, शस्त्रधारियों की बर्बर पाशविक उत्तेजना का शिकार नहीं बनते।

स्त्री, बच्चे, वृद्ध और निशक्‍तजन भी विस्फोटों में बेसहारा-बेघर हो सकते हैं। मगर यह परिणाम युद्ध में आस्था रखने वालों की सैन्य कार्रवाई का नहीं, बल्कि संवाद की उपेक्षा करने वाले उन हुक्मरानों का है, जो शान्ति और अमन के पैरोकारों को कायर और बुजदिल आंकते हैं। सच्चाई यह है कि उनके सामने भी बारूद की आग के बाद अंतिम आश्रय संवाद ही बचा होता है। स्वतंत्र बांग्‍लादेश का अभ्युदय हमारी सैनिक कार्रवाई का बेजोड़ उदाहरण है।

इसी के विपरीत अमेरिका की सैनिक कार्रवाई इराक के सन्दर्भ में युद्ध के दायरे में आती है। सीरिया, अफगानिस्तान के कलह/संघर्ष दरअसल युद्ध है। इस बात पर गौर करें कि युद्ध कभी भी अंतिम हल नहीं होता। युद्ध विचाराधीन मुद्दे की ऐसी कोई गारंटी नहीं कि वह मसला या विवाद दोबारा सर नहीं उठाएगा। युद्ध, इसमें सम्मिलित पक्षों को कमजोर कर उन्हें थकाता है। थके लोग अपने मुद्दों के लिए संघर्ष के काबिल नहीं होते। अत: यथास्थिति के लिए अपनी लाचारी से भरकर सहमत होते हैं, अगले अवसर के इंतज़ार में।

समाधान यथास्थिति नहीं स्पष्ट स्थिति चाहता है

स्पष्ट स्थिति रेखांकित करने का एकमात्र जरिया संवाद होता है। किसी भी प्रकार के दबाव, रुझान, जिद, स्वार्थ तथा महत्वाकांक्षा से मुक्त तथ्यों का पारदर्शी प्रस्तुतीकरण। संवाद मनुष्य और मानवता के विकास का वह नतीजा है, जो युद्ध के पहले भी उपस्थित है और युद्ध के बाद भी। युद्ध के पहले युद्ध कभी नहीं होता, युद्ध के बाद युद्ध होना ही युद्ध का अभागापन है।

नाभीकीय विखंडन (न्यूक्लीयर एक्सप्लोजन) जिस युद्ध में शामिल हो जाए, वह दृश्य कल्पनातीत होगा। जघन्यतम, नृशंस और घिनौना। सामूहिक आत्महत्या, सामूहिक नरसंहार। युद्ध से हम बचे हुए लोगों को क्या सौपेंगें? अभिशप्त डीएनए तथा रोगी अनुवांशिकता? नहीं, नहीं। चाहे साक्षात ईश्वर आकर कहें कि युद्ध अनिवार्य है तो इस समय मैं और मेरे जैसे लोग, यदि हैं तो एक साथ हम कहेंगे- मालिक हम इस धरती से मिटने का श्रेय एक-दूसरे को मारकर खुद नहीं लेना चाहते। तू तो सर्व शक्तिमान विधाता है, सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा काफी है, भेज दे जिससे हम नहीं लड़ सकें, बस मनुष्य ख़त्म। तेरी इज्जत बच जायेगी कि तू ही पैदा करता है और तू ही मिटाता है।

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