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जय श्रीराम उद्घोष के निहितार्थ

Posted On: 26 Jul, 2017 Others,Politics में

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राष्ट्रपति पद के लिए हुआ यह पहला चुनाव था, जिसमें सत्ताधारी भाजपा ने अपने उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का उपयोग सियासी दलित कार्ड की तरह किया। विरोधी पर कीचड़ उछालने की भाजपा की सुविचारित, सुनियोजित रणनीति की वजह से कीचड़ के कुछ छीटे खुद उसके उम्मीदवार के दामन पर भी पड़े। सोशल मीडिया पर विधिवत रामनाथ कोविंद और मीरा कुमार की जन्मकुंडली से ‘आधी हकीकत, आधा फ़साना’ छाप पोस्ट्स की बाढ़ सी आ गई, जिसके जिक्र का कोई औचित्य नहीं।

रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी के बाद एक आशंका जनमानस में थी की भाजपा उनके माध्यम से अपने भगवा एजेंडे को देश पर थोपने का अपना खेल अब खुलकर खेल सकेगी। सांख्यिक दृष्टि से कोविंद की जीत सुनिश्चित थी, फिर भी भाजपा ने उनको अश्वमेघ के घोड़े की तरह पूरे देश में घुमाया, ताकि उसकी सियासी ताकत को देश महसूस करे।

बहरहाल, रामनाथ कोविंद जीते। उनके शपथ ग्रहण समारोह में जो कुछ हुआ वह संविधान की अवधारणा व लोकतंत्र का सत्तामद में माखौल उड़ाने जैसा था। संसद के सेन्ट्रल हॉल में जय श्रीराम का उद्घोष काफी कुछ कह गया। जय श्रीराम के नारे से किसी को परहेज नहीं, लेकिन स्थान व अवसर ऐसा था कि यह उद्घोष आपत्तिजनक है। राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण समारोह में तमाम राजनयिक मौजूद थे। हमारे संविधान ने धर्म निरपेक्षता को अंगीकृत किया है।

संसद में संविधान की आत्मा से खिलवाड़ करने वाले माननीय क्या संदेश देना चाहते हैं, कहने की जरूरत नहीं। बेहतर होता कि जय श्रीराम का नारा लगा था, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शेष धर्मों के प्रतिनिधि नारे लगवाये होते। नरेन्द्र मोदी से कोई उम्मीद पालना आत्म प्रवंचना होगी। हालांकि इस वाकये ने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति को एक कठिन परीक्षा में फंसा दिया है। जब तक जय श्रीराम के उद्घोष पर उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं आ जाती, यह कहना जल्दबाजी होगी कि  वे संविधान की आत्मा से खिलवाड़ के मूकदर्शक बने रहेंगे। फिलहाल तो वे चूक गए, मौन रहकर। उम्मीद की जानी चाहिये कि वे भाजपाई खोल से बाहर निकलेंगे।

खबरिया चैनलों पर भाजपा प्रवक्ताओं की फ़ौज इस वाकये का औचित्य सिद्ध करने के मोर्चे पर कुतर्कों के तीर-कमान लेकर डट चुकी है। इस कुतर्की फ़ौज के माध्यम से भाजपा राष्ट्रपति की उपस्थिति में जय श्रीराम के उद्घोष की सियासी मार्केटिंग करना चाहती है। इस सियासत को सही जबाब देने की नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ नवनिर्वाचित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की है। प्रार्थना कीजिए कि महामहिम राष्ट्रपति कुछ ऐसा संकेत जरूर देंगे कि भविष्य में ऐसा देखने को न मिले।

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