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जिन्ना चले गए पर वो सोच यहीं रह गई

Posted On: 28 Jul, 2017 Others,social issues में

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मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि राष्ट्रगीत “वन्दे मातरम” सभी स्कूलों, कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों में हफ़्ते में एक दिन गाना होगा. इसके साथ ही सभी सरकारी और निजी कार्यालयों में महीने में एक दिन “वन्दे मातरम” गाना ही होगा. जस्टिस एमवी मुरलीधरन ने यह भी आदेश दिया है कि वन्दे मातरम को तमिल और इंग्लिश में अनुवाद करना चाहिए और उन लोगों के बीच बांटना चाहिए, जिन्हें संस्कृत या बंगाली में गाने में समस्या होती है. अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि शैक्षणिक संस्थान हफ़्ते में सोमवार या शुक्रवार को वंदे मातरम गाने के लिए चुन सकते हैं.

vandematram

कोर्ट ने यह भी कहा, “इस देश में सभी नागरिकों के लिए देशभक्ति जरूरी है. यह देश हमारी मातृभूमि है और देश के हर नागरिक को इसे याद रखना चाहिए. आजादी की दशकों लंबी लड़ाई में कई लोगों ने अपने और अपने परिवारों की जान गंवाई है. इस मुश्किल घड़ी में राष्ट्रगीत वंदे मातरम से विश्वास की भावना और लोगों में भरोसा जगाने में मदद मिली थी.”

लेकिन कोर्ट के इस फैसले से अचानक मुस्लिम धर्म गुरुओं का एक तबका फिर से उठ खड़ा हुआ है कि ये वन्दे मातरम तो मजहब के ख़िलाफ है. कुछ मौलाना कह रहे हैं कि इस्लाम अल्लाह को नमन करना सिखाता है, माँ-बाप या मुल्क को नहीं. क्या इन मौलानाओं का यह विरोध आज भी मध्ययुगीन समाज के अतार्किक होने का एक रूप है या फिर 1938 में मुहम्मद अली जिन्ना ने खुले तौर पर पार्टी के अधिवेशनों में वन्दे मातरम गाए जाने के ख़िलाफ बगावत करने वाली सोच को जिन्दा रखने का काम हो रहा है? इस एकछत्र धार्मिक नियंत्रणवाद ने इस्लाम के दिल में ख़तरनाक घाव कर दिया है. आज फिर एक मद्रास कोर्ट के फैसले के बाद इसकी कराह सुनी जा सकती है. इस्लाम के झंडे तले दुनिया को देखने की ख़्वाहिश रखने वाले लोग देश या देशप्रेम जैसी किसी विचाधारा  से ही मतलब नहीं रखते?

देश का बँटवारा हुआ. पाकिस्तान बन गया. जिन्ना चले गए, लेकिन वो सोच यहीं रह गयी. अगर चरख़ा, सत्याग्रह और अहिंसा आजादी की लड़ाई के हथियार थे, तो वन्दे मातरम भी था. फिर वन्दे मातरम के लिए आज तक अदालती लड़ाइयाँ क्यों चल रही हैं?  सवाल ये भी है कि इस्लाम ने क्या ये मुहम्मद अली जिन्ना के नींद से जागने के बाद सिखाया? क्योंकि 1905 में बंगाल विभाजन रोकने के लिए जो बंग भंग आंदोलन चला, उसमें किसी ने हिंदू-मुसलमान के आधार पर वन्दे मातरम का बहिष्कार नहीं किया. हिन्दू और मुसलमान एक साथ सुर में वन्देमातरम का जयघोष कर बलिदान की वेदी पर चढ़ गये, लेकिन बाद में जिन्ना आया और जिन्ना के साथ ये विचार कि वन्देमातरम गीत इस्लाम का हिस्सा नहीं है.

देश के ऊपर प्राण न्योछावर करने वाले वीर अब्दुल हमीद या शहीद अश्फाक उल्लाह ख़ां ने वन्दे मातरम के नारे लगाकर जो शहादतें दीं, क्या वो भी अब धर्म के पलड़े में रखकर तौली जाएँगी? हालांकि यह स्पष्ट कर दूँ ये सभी मुस्लिमों की आवाज नहीं है, लेकिन जिनकी है उनकी सोच पर आज भी मोहमद अली जिन्ना सवार है. जो लोग आज कह रहे हैं कि इस्लाम में एक सजदा है, वे सिर्फ उनके खुदा के लिए है. चलो इस एकेश्वरवाद का स्वागत है, किन्तु इस एकेश्वरवाद में राष्ट्र के राष्ट्रीय गीत, प्रतीकों और चिन्हों को मजहब के नाम पर क्यों हाशिये पर धकेला जा रहा है? आप अपने मजहब से जुड़े रहिये, लेकिन राष्ट्र की एकता के मूल्यों से मजहब को दूर रखिये. यहां तो मामूली आलोचनाओं पर भी लोग मजहब के नाम पर भीड़ इकट्ठी कर बाजार को आग के हवाले करने निकल आते हैं. श्रीलंका या इंडोनेशिया के मुसलमान अगर देश के सम्मान में लिखा गया गीत शान से गाते हैं, तो क्या वे भारतीयों से कम मुसलमान हो जाते हैं?

कांग्रेस पार्टी के सारे अधिवेशन वन्दे मातरम से शुरू होते रहे, तब तक जब तक कि मुस्लिम लीग का बीज नहीं पड़ गया. 1923 के अधिवेशन में मुहम्मद अली जौहर ने कांग्रेस के अधिवेशन की शुरुआत वन्दे मातरम से करने का विरोध किया और मंच से उतर के चले गए. दिलचस्प ये है कि इसी साल मौलाना अबुल कलाम आजाद कांग्रेस के अध्यक्ष थे. तभी से जिन्ना का समर्थन करने वालों ने वन्दे मातरम का विरोध करना शुरू कर दिया. जिन्ना पाकिस्तान चले गये, लेकिन वन्देमातरम का विरोध यहीं रह गया.

रही बात मजहब के आदर की तो वह कौन तय करेगा. कब और कहां से तय होगा. क्योंकि आप कहते हैं कि न हम भारत माता की जय बोलेंगे और न वन्देमातरम बोलेंगे. आज मैं इन सभी इस्लाम के कथित ठेकेदारों से पूछना चाहता हूँ कि वे हमें बताएं कि आखिर किस तरह से कुरान देशविरोधी नारेबाजी लगाने वालो को गलत नहीं मानती, लेकिन देशभक्ति के नारे लगाना गलत मानती है. वो जरा विस्तार से बताएं कि कुरान की किस आयत में ये सब लिखा है और यदि कुरान में ऐसा कुछ नहीं लिखा है, तो कृपया अपनी गन्दी राजनीति के लिए इस देश के मुसलमानों को गुमराह करना बंद कर दें. इस्लाम के इन सभी कथित ठेकेदारों की राजनीति की वजह से इस देश में मुसलमानों एवं अन्य धर्मों के लोगों के बीच एक गहरी खाई बनती जा रही है.  मैं एक बार फिर इस देश के सभी मुसलमानों से यही कहूँगा कि अपना सही आदर्श चुनें एवं समाज में जहर घोलने वाले इन लोगों से दूर रहें और इनका खुलकर विरोध करें.

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