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हम कब महसूस करेंगे कि राम व रहीम में कोई फर्क नहीं है?

Posted On: 31 Jul, 2017 Social Issues में

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sky

आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम
आजकल वो इस तरफ देखता है कम,
आजकल किसी को वो टोकता नहीं,
चाहे कुछ भी कीजिये रोकता नहीं,
हो रही है लूटमार फट रहें हैं बम,
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम
आज कल वो इस तरफ देखता है कम।

साल 1958 में हिंदी फिल्म ‘फिर सुबह होगी’ प्रदर्शित हुई थी, जिसके लिए साहिर लुधियानवी ने इस गीत को लिखा था और मुकेश ने गाया था. संसार के मालिक ईश्वर या कहिये खुदा को लेकर इस गीत में एक बहुत बड़ी सच्चाई बयान की गई है. इस गीत में एक सवाल उठाया गया था कि संसार में अच्छा काम कम और गलत काम ज्यादा हो रहा है, फिर भी ईश्वर क्यों चुपचाप देखता रहता है, वो हस्तक्षेप क्यों नहीं करता और गलत काम करने वालों को सजा क्यों नहीं देता है?

इसी विषय को लेकर साल 2014 में राजकुमार हिरानी ने एक फिल्म ‘पीके’ बनाई थी. उस फिल्म में टेपरिकॉर्डर के जरिये मुकेश का गाया उपरोक्त गीत भी प्रासंगिक रूप से परदे पर बजता हुआ दिखाया गया था. फिल्म ‘पीके’ में बहुत मनोरंजक, रोचक और निष्पक्ष ढंग से हमारी दुनिया में चल रही बुराइयों तथा अंधविश्वासों को दिखाया गया था. धर्म के नाम पर हो रहे अत्याचार और सदियों से जारी कुरीतियों पर इस फिल्म में कड़ा प्रहार किया गया था. दूसरे ग्रह से आये एलियन को यह समझ में ही नहीं आता है कि वह कौन सा धर्म अपनाए, जिससे उसे भगवान मिल जाएं. वो इंसान के शरीर पर ईश्वर की तरफ से लगाया हुआ वो ठप्पा ढूंढता है, जिससे पता चल जाए कि ये इंसान इस धर्म का है.

किसको भेजे वो यहाँ खाक छानने,
इस तमाम भीड़ का हाल जानने,
आदमी हैं अनगिनत देवता हैं कम,
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम.
आज कल वो इस तरफ देखता है कम
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम.
आज कल वो इस तरफ देखता है कम…

पहनावे और बाहरी वेशभूषा से ही लोग अंदाजा लगाते हैं कि ये किस धर्म का है? ईश्वर ने संसार को बनाया और संसार ने बहुत सारे ईश्वर, धर्म और नियम बना डाले. इसमे इंसान अब अपने ही बुने हुए जाले में फंसी मकड़ी की भांति फंस चुका है, जो जाले से बाहर निकलने को फड़फड़ा रहा है, लेकिन ईश्वर और धर्म के ठेकेदार उस पर इतने हावी हैं कि उसे धार्मिक तानेबाने से बाहर निकलने ही नहीं देते. हम इक्कीसवीं सदी में जाने पर आज मंगल ग्रह पर यान भेजने का भले ही दावा करें, लेकिन अंधविश्वासों, कुरीतियों और रीतिरिवाजों के घेरे में कैद हमारा रहन-सहन और सोच-विचार आज भी सदियों पुराना, भयभीत करने वाला और दकियानूसी है.

वास्तव में यदि दूसरे ग्रह का आदमी आकर हमारे संसार की हालत देखे, तो वो हमारी बदहाल हालत या कहिए बेवकूफी पर या तो हंसेगा या फिर पागल हो जाएगा. जिन्हे देवता कहा जाता है, आजकल की दुनिया में ऐसे समझदार और अच्छे इंसानों को ढूंढना एक बहुत मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव काम है. आज मैंने मीडिया के माध्यम से दो ऐसे समाचार पढ़े, जिस पर रूढ़िवादी और आक्रामक विचारधारा से बाहर निकलने के लिए तथा इस मुल्क की एकता को कायम रखने के लिहाज से चर्चा जरूर करनी चाहिए.

जो भी है वो ठीक है जिक्र क्यों करें,
हम ही सब जहान की फ़िक्र क्यों करें,
जब उसे ही गम नहीं तो क्यों हमें हो गम,
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम.
आज कल वो इस तरफ देखता है कम,
आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम.
आज कल वो इस तरफ देखता है कम…

‘हमारे समाज में जो कुछ भी घटित हो रहा है, वो ठीक है’, पहले तो हमें इस ख़राब और कमजोर मानसिकता से बाहर निकलना चाहिए. इस दुनिया में हमने जन्म लिया है, तो यहाँ की बुराइयों को दूर करना हमारा जरूरी फर्ज बनता है. पहला समाचार मैंने पढ़ा कि बिहार विधानसभा में 28 जुलाई को ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाने पर बिहार सरकार के अल्पसंख्यक मंत्री और जेडीयू के मुस्लिम विधायक खुर्शीद उर्फ फिरोज अहमद के खिलाफ इमारत-ए-शरिया के एक मुफ़्ती ने फतवा जारी कर उन्हें इस्लाम से खारिज और मुर्तद करार दे दिया. वो इस्लाम से बाहर कर दिए गए और उनका निकाहनामा भी खत्म हो गया. मजबूरन उन्हें मुफ़्ती से मांफी मांगनी पड़ी, शायद उन्हें अपनी बीवी से दोबारा निकाह करना पड़े. फिरोज अहमद ने इतना ही तो कहा था कि राम और रहीम में कोई फर्क नहीं है. सच बोलने की इतनी बड़ी सजा?

दूसरा समाचार मैंने पढ़ा कि एक पत्रकार एम. अतहरउद्दीन मुन्ने भारती को 28 जून 2017 को बिहार के मुज़फ़्फरपुर नेशनल हाईवे पर बजरंग दल के लोंगो के सामने ‘जय श्रीराम’ कहकर अपनी और अपने परिवार की जान बचानी पड़ी थी. पूरे देश में अब इस तरह के धार्मिक असहिष्णुता के मामले बढ़ रहे हैं, जो देश और समाज दोनों के लिए घातक हैं. देश के संविधान से बढ़कर अब धर्म हो गया है, यह सरकार और समाज दोनों के लिए ही चिंता की बहुत बड़ी बात है. इस पर शीघ्र से शीघ्र पूर्णतः अंकुश लगना चाहिए.



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