JagranJunction Blogs

Aapki Awaaz, Aapka Blog. Your Voice, Your Blog.

60,000 Posts

63640 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1 postid : 1345790

अब की सावन में

Posted On: 11 Aug, 2017 कविता में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

आज मनुष्य ने धरती को नोच-नोच कर लुह्लुहान कर दिया है. सड़े-गले घावों से उठने वाली दुर्गंधी में साँस लेना भी दुष्कर हो गया है. पहले तो यमुना में जहर उगलने वाला एक कालिय नाग था. परन्तु आज सभी नदी नालों में हजारो कालिय नाग विष उगल रहे है. समस्त जल विषाक्त हो गया है. प्रतिदिन धरती पर जीवन नष्ट हो रहा है. क्या यह प्रलय का आग़ाज तो नहीं है.

वडनावल: समुद्र से उठाने वाली प्रलयंकारी अग्नि
संवर्तक मेघ: जलप्रलय के समय बरसने वाला मेघ.

अब की सावन में
वडनावल उठे समुद्र से
सौ सालों तक बरसे
मेघ संवर्तक प्रलयंकारी.

जीर्ण शीर्ण काया को तज
जलप्लावित प्रलय समुद्र में
फिर अमृत स्नान करे धरती.

नववधु सी कोमल काया
हरित वस्त्र का कर शृंगार
गालों में लाली लिए
धरती फिर मुस्काए.

नव सृजन के अंकुर फूटे
कवी गण गाये
वेदों की नयी ऋचाएं.

अब की सावन में
वडनावल उठे समुद्र से
सौ सालों तक बरसे
मेघ संवर्तक प्रलयंकारी.



Tags:

Rate this Article:

0 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 50 votes, average: 0.00 out of 5 (0 votes, average: 0.00 out of 5, rated)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran