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बदलना पड़ता है राजनीति की खिचड़ी का स्‍वाद

Posted On: 15 Nov, 2017 हास्य व्यंग में

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हिंदुस्तान के आपातकाल के बाद जय प्रकाश नारायण द्वारा बनी शानदार खिचड़ी अधिक समय तक अपने स्वाद को कायम नहीं रख सकी। किन्तु इस खिचड़ी में शामिल भारतीय जनसंघ को खिचड़ी का स्वाद इतना भाया की उसने अपना नाम ही बदल कर भारतीय जनता पार्टी यानि भाजपा रख लिया। एक ही तरह के हिन्दू शुद्ध दाल-भात, रोटी-सब्जी पकाते पकाते वो ऊब चुकी थी। ऊबना पड़ा भी था क्योंकि जनता उसे नकारती जा रही थी। इस जनसंघ खिचड़ी के स्वाद को जीवित रखते-रखते बलराज मधोक निस्तेज हो गए।


election


अतः विचारों का मंथन करके सादा भाजपाई खिचड़ी पकाई जाती रही, जो राजीव गांधी जी के बाद पकाई जाती रही। नरसिंहराव से लेकर अटल बिहारी बाजपेयी और फिर मन मोहन सिंह जी की खिचड़ी।


जनता दाल में घुसकर खिचड़ी का फार्मूला पाकर, खिचड़ी पकाने में पारंगत हो चुके लालकृष्ण अडवाणी जी आखिर अटल बिहारी वाजपेयी जी को सिंहासन तक पहुंचा चुके थे। किन्तु फिर उसी खिचड़ी को खाते-खाते बेस्वाद लगती खिचड़ी कांग्रेस शासन में मनमोहन सिंह की खिचड़ी के आगे नहीं टिक पाई।


दस वर्षों तक भाजपा का कोई फार्मूला खिचड़ी में नहीं चल पाया। आखिर ‘चाणक्य’ रचित खिचड़ी फार्मूला नरेंद्र मोदी जी को पदासीन कर गया। यह फार्मूला इतना सफल रहा कि कांग्रेस के राहुल गांधी का विदेशी फार्मूला भी फेल होता चला गया।


अंत में थक हारकर राहुल गांधी को भी भाजपा का चाणक्य फार्मूला ही अपनाना पड़ रहा है, किन्तु कौन जाने भाजपा के खिचड़ी के स्वाद में रम चुके वोटर, राहुल गाँधी द्वारा नक़ल की गयी पकाई खिचड़ी की तरफ ललचायेंगे।


कांग्रेस भी एक ही प्रकार के व्यंजनों से थक हार चुकी है। उसका ध्यान भी इस खिचड़ी उद्योग पर जा रहा है। वो भी सोच रही है कि उसने यदि खिचड़ी नहीं पकाई तो लोग उसे भूल जायेंगे। अतः उसने भी धर्म निरपेक्ष खाना खिचड़ी पकाना एक तरफ करके हिन्दू कार्ड वाली खिचड़ी पकाना आरम्भ कर दिया है। राहुल गाँधी द्वारा मंदिरों में जाना, आराधना करना इसी खिचड़ी का प्रयास है।


चाणक्य, महाभारत, गीता का अध्धयन कर खिचड़ी के सर्वप्रिय प्रकार के तरीके खोजे जा रहे हैं। कैसे एक साधारण ब्राह्मण चाणक्य ने राज पाठ स्थापित किया, कैसे सम्राट तक का सफर तय किया। कैसे भगवान श्रीकृष्ण ने पांडवों की साधारण सेना होने पर भी कौरवों को परास्त कर महाभारत युद्ध जीता। कैसे मोदी जी ने चाय बेचते-बेचते अमित शाह के साथ साम्राज्य स्थापित कर लिया।


राहुल गाँधी जी का स्वाद्ध्यायी ज्ञान दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। लगता है वे इस जीत की खिचड़ी को पकाये बिना शांत बैठने वाले नहीं हैं। भारतीय जनसंघ द्वारा सिद्धांतों की खिचड़ी त्यागकर बिना सिद्धांतों की विभिन्न प्रकार के छौंको वाली खिचड़ी बनाकर लोकप्रियता हासिल करना भी कांग्रेस के राहुल गाँधी जी को ललचा रहा है। अब वे भी सिद्धांतों की राजनीति वाली खिचड़ी में रमे रहने का विचार त्यागते जा रहे हैं।


जब से होश संभाला है राहुल गाँधी ने लगातार अनेकों बार विभिन्न राज्यों में खिचड़ियाँ बनाई, किन्तु शनि की साढ़ेसाती रहने के कारण किसी राज्य के लोगों ने पसंद नहीं की। जबकि वही सब कुछ मसाला डाला जो राहुल जी के पूर्वजों ने डाला था। यहाँ तक कि भाजपा के फार्मूले की नक़ल कर डाले मसालों से बनी खिचड़ी भी जनता ने नापसंद कर दी।


पंडितों का कहना है कि अब शनि की साढ़ेसाती ख़त्म हो चुकी है, अतः कांग्रेस के चिराग से भाजपा फार्मूला से बनी खिचड़ी अवश्य ही गुजरात और हिमाचल में पसंद की जाएगी। मगर राहुल गाँधी जी नहीं समझ सके हैं कि गुरु, गुरु ही होता है। नए अविष्कार करके पुराने पड़ चुके खिचड़ी मसालों को व‍िपक्षी पार्टियों को लुटा देता है।


अब हिन्दू-मुसलमानों, दलितों-ब्राह्मणों को सड़क पर लड़ा देना पुराने मसाले हो चुके हैं, जिनसे बनी खिचड़ी बेस्वाद पड़ चुकी है। अतः नयी टेक्नोलॉजी से खोजी मसालेदार खिचड़ी ही जीत दिला सकती है।


कांग्रेस द्वारा पाटीदार, दलित, हार्दिक पटेल, कल्पेश, मंदिरों में भगवत सत्संग जैसे कड़क मसालों से काट कर, थकी भाजपा की खिचड़ी को बेस्वाद कर देने का दम भरने वाले राहुल जी के चेहरे की चमक देखने योग्य थी कि अब गुजरात में राहुल खिचड़ी अवश्य ही भाजपा खिचड़ी को मात देगी।


अब श्री श्री रविशंकर जी द्वारा लगा छौंका राम मंदिर विवाद एक बार फिर गुजरात विजय दिला देगा। ऐसी संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं। हिन्दुओं में यह माना जाता है कि ब्रह्मास्‍त्र का वार कभी असफल नहीं होता। क्या कांग्रेस के पास है इस ब्रह्मास्‍त्र का काट?


समय ही बताएगा कांग्रेस कहाँ से निकालेगा इसका काट करने वाला अस्‍त्र, जिससे उसकी पकाई खिचड़ी जन प्रिय होकर विजय दिला सके। ऐसा भी कहा जाता है कि ब्रह्मास्‍त्र भी भक्ति की शक्ति से प्रभावित होकर अपनी दिशा बदल सकता है।


अतः यदि कांग्रेस भी राम भक्ति में लीन होकर मंदिर-मंदिर जाकर आराधना करे और राम मंदिर को बनाने की स्वयं ही घोषणा कर दे। हिन्दुओं को राम के असली भक्त राहुल और उनकी पार्टी ही नजर आने लगेगी। बस राम नामी ब्रह्मास्‍त्र की दिशा उल्टी हो जाएगी और राहुल गाँधी जी को शनि की साढ़े साती उतरते-उतरते गुजरात विजय तो दे ही जाएगी।



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