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रक्षा तैयारियां और मोदी सरकार

Posted On: 20 Dec, 2017 Social Issues में

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सत्ता सँभालने के बाद से ही लगातार जिस तरह से संसद से लेकर सड़क तक भाजपा, खुद पीएम मोदी और उनकी सरकार के मंत्री जिस तरह से अपनी पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार पर आक्रामक रहा करते हैं और उस पर यह आरोप लगाया करते हैं कि उसने देश की रक्षा से समझौता किया और सेनाओं के लिए १० वर्षों तक पर्याप्त धन की व्यवस्था भी नहीं की उसकी पोल खुद उनके सांसद मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी की अध्यक्षता में गठित रक्षा मामलों की संसदीय समिति ने खोल कर रख दी है. समिति ने जिस स्तर पर सरकार की आलोचना की है उससे यही लगता है कि रक्षा क्षेत्र में मोदी सरकार की कथनी और करनी में बहुत बड़ा अंतर है और हालत यहाँ तक पहुंच गयी है कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में रक्षा बजट केवल २.७४ लाख करोड़ रुपयों का रखा गया है जो कि प्रस्तावित जीडीपी का १.५६ % और १९६२ के चीन युद्ध के बाद से न्यूनतम है. समिति ने सेना के आधुनिकीकरण के लिए जरूरत भर का फंड उपलब्ध नहीं कराने और रक्षा खरीदारी को फास्ट ट्रैक नहीं करने के लिए सरकार की कड़ी आलोचना की है। इस वित्तीय वर्ष में आर्मी, नेवी और वायुसेना को आधुनिकीकरण की उनकी मांग की तुलना में क्रमशः महज ६०, ६७ और ५४ फीसदी फंड उपलब्ध कराया गया है। समिति ने इस बात की आशंका और चिंता भी जताई है कि फंड की अनुपलब्धता का प्रतिकूल असर सेना के ऑपरेशंस पर पड़ सकता है।
समिति ने मोदी सरकार को सेना के सुस्त आधुनिकीकरण के लिए फटकार लगाई और कहा है कि चीन और पाकिस्तान की तरफ से देश की सुरक्षा के लिए खड़े किए जा रहे मौजूदा खतरों के दौरान भी सेना के आधुनिकीकरण में सुस्ती बरती जा रही है। भारतीय सेना कई मोर्चों पर कार्रवाई के लिए संसाधनों की कमी से जूझ रही है इनमें सबमरीन, फाइटर जेट, हॉवित्जर्स और हेलिकॉप्टर्स की कमी के साथ नई जेनरेशन की असॉल्ट राइफल, मशीन गन, बुलेट फ्रूफ जैकेट्स और हेल्मेट्स जैसे बेसिक संसाधनों की कमी भी शामिल हैं। ये वो आंकड़े हैं जो हमारी सेनाओं और उनके लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों की वास्तविक तस्वीर को सामने लेकर स्थिति की गंभीरता को बता रहे हैं फिर भी सरकार की तरफ से केवल पूर्व की सरकार पर हमले किये जाने और उसकी आलोचना तक खुद को सीमित किया जाना आखिर किस तरह से देशहित में अच्छा कहा जा सकता है ? यह सही है कि देश में रक्षा सौदों में दलाली के चलते कोई भी सरकार कुछ भी खरीद करे उस पर आरोप बहुत आसानी से लगाए जा सकते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि हथियारों को बनाने वाले देश और निर्माण करने वाली लगभग हर कम्पनी ने पूरी दुनिया में अपने एजेंट नियुक्त कर रखे हैं जिनके माध्यम से देश और कम्पनी किसी भी सौदे में उनकी सहभागिता होने या न हो पाने की दशा में भी कमीशन का भुगतान किया करती हैं जो कि पूरे विश्व में एक सामान्य प्रक्रिया है पर भारत में इसे जिस तरह से घूस कहा जाता है वह कमीशन की श्रेणी में नहीं आ सकता है इसलिए सरकार को भी सौदों में तत्परता के लिए अपनी शर्तों में इन एजेंट्स के लिए एक सीमा तक आधिकारिक रूप से कमीशन दिए जाने को वैध कर देना चाहिए जिससे आने वाले समय में रक्षा खरीद को पटरी पर लाया जा सके और भ्रष्टाचार के कथित आरोपों से बचने के लिए सरकारें देश की सुरक्षा आवश्यकताओं को मानकों के अनुरूप रख पाने में सफल हो सकें.
जिस तरह से पूरा देश जानता है कि देश में रक्षा खरीद की प्रक्रिया बेहद पेचीदी है जिसके चलते कोई भी सरकार केवल अपने को बचाने के प्रयास में ही लगी दिखाई देती है कि कहीं उस पर देश की सुरक्षा के मामले में समझौता करने और कमीशन लेने का आरोप न लग जाये. बोफोर्स कांड के बाद से जिस तरह से वह देश में एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा बन गया था उसे देखते हुए भी वर्तमान खरीद प्रक्रिया में बेचने वाले देशों की सरकारों या कंपनियों के एजेंट्स की भूमिका को स्पष्ट करने की आवश्यकता भी सामने आ चुकी है क्योंकि अब नीतियों में व्याप्त कमियों को सुधारने की आवश्यकता अधिक है जबकि हम एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने में ही व्यस्त हैं ? हम सभी जानते हैं कि पाकिस्तान में सेना ही सर्वोपरि है और उसके निर्णय के सामने खड़े होने का साहस कोई भी नहीं कर सकता है जिसके चलते वहां रक्षा सौदे करना आसान है और चीन अब रक्षा क्षेत्र में खुद एक उत्पादक देश के रूप में स्थापित हो रहा है जिससे उसको रक्षा खरीद के लिए दूसरे देशों पर उतना निर्भर नहीं रहना पड़ता है पर भारत की स्थिति को देखते हुए क्या संसद में ही सर्वसम्मति से एक नयी रक्षा खरीद नीति को लागू करने की आवश्यकता नहीं है जिससे आने वाले कुछ वर्षों में देश की रक्षा आवश्यकताओं को मानकों के अनुरूप किया जा सके ?
देश ने बहुत काम करने वाले और सादगी से भरे दो रक्षा मंत्री ए के अंटोनी और मनोहर पणिकर भी देखे पर ईमानदारी से काम करने के बाद भी वे देश की रक्षा आवश्यकतों को पूरा करने में असफल ही रहे जिसके लिए उन्हें दोषी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि देश की रक्षा खरीद की प्रक्रिया की पेचीदियों पर काबू पाए बिना इसे सुधारा नहीं जा सकता है. खरीद में अब एक सीमा तक कमीशन को कानूनी रूप से सही घोषित किया जाना चाहिए और उसे हर हालत में कम्पनी द्वारा ही दिया जाना चाहिए साथ ही मंत्रालय को इस बारे में गुणवत्ता की जाँच कर उसकी न्यूनतम अंतर्राष्ट्रीय कीमत पर खरीदने की अनुमति होनी चाहिए जिससे सरकार का दखल उसमें कम किया जा सके और ऐसी किसी भी खरीद को संसदीय समिति के सामने भी निश्चित समय सीमा में रखने और उसकी संस्तुतियों के आधार पर सीधे संसद से अनुमोदन कराने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए. इस तरह की पारदर्शी व्यवस्था बनाये जाने से जहाँ खरीद को आसान बनाया जा सकता है वहीं हमारी सेनाओं की आवश्यकताओं को भी हर समय पूरा रखने की एक सीमा को जल्दी ही पाया जा सकता है. मोदी सरकार को भी इक्का दुक्का मामलों को देश के सामने रखकर अपनी रक्षा तैयारियों के बारे में प्रदर्शन करने के स्थान पर पूरी सेना की समग्र तैयारियों के बारे में गभीरता से सोचना शुरू करना चाहिए जिससे सेना को सही तरह से आधुनिक किया जा सके.



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