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कांग्रेस की भारतविरोधी गन्दी राजनीति

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मित्रों, हम पहले भी कह चुके हैं कि कांग्रेस भारत के लिए खतरनाक थी और अब पहले से भी ज्यादा खतरनाक हो गयी है. हम पहले भी कह चुके हैं कि कांग्रेस जो दिखाती है सिर्फ वही उसका चेहरा नहीं है बल्कि एक के भीतर एक उसके कई सारे घूंघट हैं. हमेशा उसकी निगाहें जाहिर तौर पर कहीं और होती हैं और निशाना कहीं और होता है.
मित्रों, भारत में कई सौ राजनैतिक दल हैं. इन दलों को हम दो श्रेणियों में बाँट सकते हैं. पहली श्रेणी में वे हैं जिनकी प्राथमिकता में देश भले ही पहले स्थान पर नहीं हो लेकिन है जरूर और दूसरी श्रेणी में वैसे दल आते हैं जिनकी प्राथमिकता में सिर्फ सत्ता और देश को लूटना है देश कहीं है ही नहीं. दुर्भाग्यवश इस समय पहली श्रेणी में भाजपा आती है तो वहीँ दूसरी श्रेणी में वो कांग्रेस आती है जिसका इतिहास १३२ साल पुराना है.
मित्रों, आज की कांग्रेस न तो गाँधीजी वाली कांग्रेस है और न ही तिलक या पटेल वाली बल्कि आज की कांग्रेस राहुल-सोनिया वाली कांग्रेस है. यह हमारा दुर्भाग्य है कि इंदिरा के समय से ही कांग्रेस पारिवारिक संपत्ति बनकर रह गई है. पिछले २० सालों का इतिहास गवाह है कि जब भी कांग्रेस सत्ता में होती है तब तो देश को दोनों हाथों से लूटती है और जब विपक्ष में होती है तो वापस फिर से सत्ता पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार होती है फिर चाहे उससे देश को कितना भी बड़ा नुकसान ही क्यों न हो जाए. १९९९ में कांग्रेस ने कथित ताबूत घोटाले को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ा लेकिन चुनाव के बाद मुद्दे को ही भूल गयी क्योंकि सारे आरोप फर्जी और मनगढ़ंत थे.
मित्रों, २०१९ के लिए कांग्रेस ने जो रणनीति बनाई है वो देश को १९९९ से भी ज्यादा महँगी पड़नेवाली है. कांग्रेस ने हिन्दुओं को जहाँ तक हो सके आपस में लड़ाने-भिड़ाने की कुत्सित योजना बनाई है और उसके इस काम में सारे छद्मधर्मनिरपेक्ष और साम्यवादी शक्तियां उसकी मदद कर रही हैं. कांग्रेस ने पटेलों के नाम पर पहले गुजरात को जलाया और अब महाराष्ट्र को जला रही है आगे पता नहीं कौन-कौन सा जिला जलेगा क्योंकि कांग्रेस को पता है कि हिन्दू अगर संगठित रहे तो भारत मजबूत होगा और महाशक्ति बन जाएगा. कांग्रेस को पता है कि मुसलमान हर स्थिति में झक मारकर उसको ही वोट देंगे और चीन-पाकिस्तान के साथ-साथ कांग्रेस को भी पता है कि मोदी की ताक़त का राज मशरूम नहीं है बल्कि हिन्दुओं की चट्टानी एकता है.
मित्रों, कांग्रेस को तो यह भी पता था कि भीमा कोरेगांव में भारत की हार और अंग्रेजों की जीत का जश्न मनाने का क्या असर होगा. आखिर इस महोत्सव को मनाने की जरुरत ही क्या थी? इतिहास गवाह है कि सिखों के खिलाफ अंग्रेजों ने पूर्वी भारत के सैनिकों को लडवाया और बाद में १८५७ के विद्रोह के समय पूर्वी भारत के सैनिकों को दबाने के लिए सिखों का प्रयोग किया. अंग्रेजों की तो नीति ही यही थी कि फूट डालो और शासन करो तो क्या सिखों और पूर्वी भारतियों को एक-दूसरे के खिलाफ जीत का जश्न मनाना चाहिए?
मित्रों, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिग्नेश मेवानी और उमर खालिद शुरू से ही कांग्रेस को लाभ पहुँचाने की दिशा में काम करते रहे हैं, भले ही ये कांग्रेस के कागजी सदस्य नहीं हैं. इतने सालों में तो कोई बड़ा कांग्रेस नेता इस मौके पर भीमा कोरेगांव नहीं गया फिर इस साल इन दोनों को क्या आवश्यकता थी दलितों के कथित विजयोत्सव में शामिल होकर तनाव को बढाने की?
मित्रों, कांग्रेस और उसके समान विचारधारा वाली पार्टियों के एजेंडे को समझिए. उनके निशाने पर न तो राजपूत हैं, न ही जाट, न ही गुज्जर या ब्राह्मण या यादव या पटेल या सिख या जैन या बनिया बल्कि उनके निशाने पर सिर्फ और सिर्फ भारत है. कांग्रेस पहले भी सत्ता के लिए भारत के टुकड़े कर चुकी है और आज भी भारतीय समाज को विभाजित कर रही है. कही भी पहले विभाजन की रेखा ह्रदय और मन में खींची जाती है बाद में जमीन पर. इसलिए भारत के सारे देशप्रेमियों को सचेत रहने की जरुरत है. इतना ही नहीं भारत के सबसे बड़े शत्रु चीन के प्रति कांग्रेस की प्रीति भी संदेह पैदा कर रही है. वैसे भी जैसे अभी पाकिस्तान के नेता विदेश भाग रहे हैं ये भारतीय अंग्रेज भी अपने पूरे कुनबे और चमचों के साथ जब देश बर्बाद हो चुका होगा क्वात्रोची की तरह इटली या माल्या की तरह लन्दन निकल लेंगे लेकिन हमें और हमारे वंशजों को तो इसी मिट्टी की खाक में मिलना है और यहीं पर रहना है इसलिए सचेत रहिए कि कहीं कांग्रेस आपके प्रदेश में भी जातीय विभाजन का गन्दा खेल तो नहीं खेल रही. जनेऊ-मंदिर धोखा है, दरअसल रावण साधू के वेश में घात लगाए घूम रहा है.



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