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आम बजट मध्यम वर्ग की उम्मीदों पर खरा क्यों नहीं उतरा?

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कुछ रोज पहले देश के एक प्रतिष्ठित अखबार द्वारा अपने इंटरनेट संस्करण के पाठकों से यह सवाल पूछा गया था कि ‘इस बार का आम बजट क्या आपकी उम्मीदों पर खरा उतरा है?’ इस सवाल के जबाब में 62.49 प्रतिशत पाठकों ने आम बजट के प्रति अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए नहीं में जबाब दिया था. समूचे देशभर का जो मिडिल तबका है, अधिकतर की ऐसी ही राय है. देश का मध्यम वर्ग वित्तमंत्री अरुण जेटली द्वारा प्रस्तुत 2018-19 के आम बजट से खुश नहीं है. शेयर बाजार में हुई भारी भरकम गिरावट भी यही दर्शाती है कि शेयर में निवेश करने वाले मध्यमवर्गीय लोग लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन पर टेक्स से बेहद नाराज हैं.


पिछले कुछ रोज में बहुत से लोगों से मेरी बातचीत हुई. संक्षेप में कहूं तो उस बातचीत का निष्कर्ष यही था कि देश की आम जनता अभी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसक है और आज भी उन्हें देश का सबसे अच्छा लीडर मानती है, लेकिन मोदी सरकार के वित्तमंत्री अरुण जेटली से तो इतनी नाराज है कि पूछिए मत. सोशल मीडिया पर भी वित्तमंत्री अरुण जेटली नाराज मध्यम वर्ग के कड़वे शब्दों की मार अब तक काफी झेल चुके हैं. कोई उन्हें नकारा वित्तमंत्री साबित कर रहा है तो कोई उनके पिछले लोकसभा चुनाव हारने पर ताना मारते हुए आम जनता का दुखदर्द न समझने वाला एक अमीर मंत्री कह रहा है.


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कर्ज में दबा हुआ, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और उनके शादी-विवाह के खर्चों से परेशान देश का मध्यम वर्ग आज 25,000 से लेकर 50,000 रुपये मासिक के घरेलू बजट से जूझ रहा है, इसलिए पांच लाख रुपये सालाना तक की आय वाले मध्यम वर्ग खासकर वेतन भोगी लोगों को उम्मीद थी कि वित्तमंत्री अरुण जेटली लगभग आठ हजार रुपये सालाना चुकाए जा रहे इनकम टैक्स से काफी हद तक तक राहत दे देंगे, लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया. लगभग 224 रुपये की मामूली छूट उनके लिए ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हुई.


अपना जीवन स्तर अपने स्वयं के प्रयासों और संघर्षों से सुधारने में जुटा देश का मध्यम वर्ग आज कर्ज के बोझ तले तो दबा ही है, वो इनकम टैक्स की भी बहुत बड़ी दोहरी मार झेल रहा है. आम बजट में गरीबों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना और किसानों के लिए उनकी लागत का डेढ़ गुना मूल्य देने का प्रावधान किया गया है. 1 फरवरी को वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में अपना 5वां आम बजट पेश करते हुए गरीबों और किसानों के लिए लिए सौगातों की झड़ी लगा दी. गरीबों और किसानों की बेहतरी के लिए मोदी सरकार द्वारा जो कुछ भी किया जा रहा है, देश का मध्यम वर्ग उससे खुश है, दुखी नहीं है, लेकिन देश के लिए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष टैक्स के रूप में भारी भरकम त्याग करने वाले मध्यम वर्ग की भी कुछ अपेक्षाएं थीं, जो पूरी नहीं हुईं.


देश का मध्यम वर्ग टैक्स स्लैब में बदलाव, पेट्रोल-डीजल के दामों में कमी और अपने लिए भी कम से कम 5 से 10 लाख रुपये तक का हेल्थकवर पाने की उम्मीद मन में संजोये हुए थी. आजकल महंगाई की मार के साथ-साथ देश का मिडिल क्लास महंगे दवा इलाज से भी बहुत परेशान है. वित्तमंत्री ने देश के मध्यम वर्ग को इस मामले में निराश ही किया है. मोदी सरकार ने आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए गरीबों और किसानों को खुश करने के लिए इस साल का आम बजट पेश किया है, लेकिन इस बात को वो भूल रही है कि भाजपा को स्पष्ट बहुमत से केंद्र की सत्ता दिलाने में गरीबों और किसानों के साथ-साथ मध्यम वर्ग का भी बहुत बड़ा योगदान था.


हाल ही में हुए उपचुनावों में राजस्थान में भाजपा की जो करारी शिकस्त हुई है, उसका सबसे बड़ा कारण मध्यम वर्ग का भाजपा से हो रहा मोहभंग है. देश का मध्यम वर्ग नाराज होकर यदि भाजपा को वोट न दे या फिर उसे वोट देने के लिए अपने घर से ही न निकले तो 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का फिर से केंद्र की सत्ता में लौटना मुश्किल हो जाएगा. इस बात में कोई दो राय नहीं कि आम बजट ने मध्यम वर्ग के जले पर नमक छिड़कने का काम किया है. भाजपा के लिए यह चिंता की बात होनी चाहिए कि आम लोगों की यह धारणा अब बदल रही है कि भाजपा की कार्यशैली दूसरी पार्टियों (खासकर कांग्रेस) से कुछ अलग है.


हाल ही में हुए गुजरात के चुनावों में भाजपा प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता के चलते किसी तरह से पुनः सत्ता प्राप्त कर ली है. लेकिन उस चुनाव ने स्पष्ट रूप से मध्यम वर्ग की नाराजगी जाहिर कर दी थी. पूरे देश के मध्यम वर्ग की नाराजगी की एक बड़ी वजह मोदी सरकार द्वारा जल्दबाजी में आधीअधूरी तैयारी के साथ लागू की गई जीएसटी और आयकर विभाग द्वारा निरंतर जारी छापेमारी है. इससे व्यापारियों के साथ साथ आम जनता भी परेशान हुई है. मोदी सरकार ने डिजिटल लेनदेन पर जोर दिया तो देश में क्रिप्टोकरंसी में निवेश करने का चलन भी बढ़ा. कुछ अतिरिक्त कमाई के चक्कर में गुजरात सहित लगभग पूरे देश के पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग का रुझान उस तरफ बढ़ा.


आज स्थति यह कि रूस (36%) के बाद भारत दूसरा ऐसा देश बन गया है, जहाँ पर क्रिप्टोकरंसी (खासकर बिटकॉइन और फार्गोकॉइन) में भारतीय लोगों के निवेश का हिस्सा 26 से 30% तक पहुँच गया है. आयकर विभाग टैक्स वसूली के लिए ऐसे निवेशकों को बकायदे नोटिस भी भेज रहा है. भविष्य में ये निवेश और बढ़ेगा. दुनिया के अन्य कई देशों की तरह भारत सरकार को भी बकायदे इसका नियमन करना चाहिए. इससे ऐसे निवेश का जोखिम लेने वाले डरे सहमे मध्यम वर्ग को तो लाभ होगा हो, साथ ही केंद्र सरकार को भी काफी टेक्स मिलेगा.



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