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मुहब्बत या खुदगर्जी

Posted On: 14 Feb, 2018 Junction Forum में

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red roseकहानी इसी समाज से उठायी जाती हैं बस नाम और शहर बदले जाते हैं ऐसी ही एक कहानी नहीं मैं कड़वी सच्चाई से रूबरू हुई थी मेरे पति की क्लिनिक और हमारा घर एक ही बिल्डिंग में है| एक महिला यदि उसके साथ दो बच्चे बड़ी लडकी और छोटा लड़का नहीं होते मैं उसे लड़की लिखती आई | लम्बी छरहरी गजब की खूबसूरती र्चेहरे की रंगत सफेद लेकिन लालिमा लिए हुए लेकिन बड़ी –बड़ी उदास आँखे  और ही कहानी कह रही थी वह अस्वस्थ बेटी के इलाज के लिए आई थी बच्ची भी बला की खूबसूरत थी | मेरे पति ने मुझे बुलाया मैं माँ बेटी को देखती रह गयी जब वह चली गयीं मै ईश्वरीय रचना पर हैरान थी दो तीन दिन बाद वही महिला अकेली आई अब वह मुझसे मिलने आई थी कुछ देर बैठने के बाद उसने कुछ इधर उधर की बातें करने के बाद पूछा आप पहले विदेश में रहते थे ? हाँ ईरान में तुम्हारी खूबसूरती ईरान की याद दिलाती है उसने लम्बी सांस लेकर कहा आपने कहावत नहीं सुनी रूप की रोवे करम की खावे परन्तु मैने अपने करम खुद ही बिगाड़े हैं वह चुप हो गयी कुछ देर बाद वह चली गयी |

शाम को फिर वह फिर आई अबकी बार अपनी आप बीती बताना चाहती थी लेकिन उसने कहा मैं ऐसे ही आई हूँ मैने हँस कर कहा बिना उद्देश्य के पत्ता भी नहीं हिलता |उसने लम्बी सांस लेकर कहा आंटी मैने अपने माता पिता और परिवार की मर्जी के खिलाफ विवाह किया था मैने कहा ठीक है अब तो तुम्हारे  दो बच्चे हैं समय के साथ बात आई गयी हो जाती है अबकी बार उसकी आँखों में आंसू आ गये आंटी मेरी मुस्लिम परिवार में शादी हुई है मैने घर से भाग कर निकाह किया था लेकिन पहले मजहब बदला मुझे हैरानी हुई तुम्हें लड़का कहां टकरा गया उसने बताया इंटर की परीक्षा देने के बाद मैं छुट्टियों में अपनी बुआ के घर बेंगलौर गयी पहली बार मैं घर से बाहर रहने गयी थी मेरी बुआ और फूफा जी के कोई सन्तान नहीं है उनकी इच्छा थी मैं उनके पास रह कर ग्रेजुएशन करूं लेकिन इसके लिए मेरे पिता और माँ तैयार नहीं थे ख़ैर नसीर मेरा शौहर पढ़ रहा था उसका बी काम का आखिरी साल था देखने में हेंडसम बिलकुल किताबी राजकुमार शायराना अंदाज में बात करता था | उनके परिवार से मेरी बुआ परिवार की कोई जान पहचान नहीं थी बस शाम को मैं पास पड़ोस की लड़कियों के साथ बेडमिन्टन खेलती या गप्पें मारती वह अपने मकान की छत से मुझे देखता रहता मुझे अजीब नहीं लगा अक्सर लोग मुझे हैरान होकर देखते थे फिर बेंगलोर में मेरा सफेद रंग ज्यादा ही आकर्षित करता था मुझे अपने पर गुमान भी बहुत था | एक दिन मुझे बाजार में अपनी बहन के साथ मिला बहन बहुत हंसमुख मिलनसार पर्दा नहीं करती थी | मेरी उससे दोस्ती हो गयी मैं उसके घर वह मेरे घर आने लगी समझ लीजिये हमारे सम्बन्धों के बढने का जरिया वही थी मैं घंटो उनके घर में अम्मी नसीर की बहन और नसीर से बातें करती नसीर बड़े-बड़े सपने देखता था उसके साथ मैं भी देखने लगी उसकी बहन का शौहर दुबई में नौकरी करता था लेकिन अपनी पत्नी को ले जाने से हिचकिचा रहा था न जाने क्यों वह शेखों से डरता था | उसके अनुसार शेखों के बंगलों में उनकी कई बीबियाँ रहती हैं यदि शेख की किसी लड़की पर नजर पड़ गयी बस कितनी भी मेहर मांगों हो देकर निकाह करना चाहते हैं |

ख़ैर नसीर दुबई की चकचौंध भरी जिन्दगी की बातें करता पर अभी तक दुबई नहीं गया था लेकिन उसका सपना था वह वहीं पहली नौकरी करेगा वह बताता था वहाँ के सोना बाजार है इतना खरा सोना सजा रहता है सडकों का रंग भी चमक से पीलिया जाता है|  में भी उसके साथ ख़्वाबों में दुबई के शानदार हवाई अड्डे , ऊँची – ऊँची इमारतों और बाजारों में सैर करने लगी |अब नसीर ने अपने प्यार का इजहार करते हुए मेरे सामने शादी का प्रस्ताव रक्खा | मुझे ऐसा लग रहा था नसीर से अच्छा लड़का दुनिया में कोई भी नहीं है मेरे बाऊजी कितनी भी कोशिश करे मेरे लिए ऐसा वर ढूँढ़ नहीं सकते | नसीर की अम्मी की शर्त थी होगा निकाह् ही एक दिन मेरे फूफा जी ने मुझे नसीर की बाईक के पीछे बैठे देख लिया हालाकिं मैने दुपट्टे से मुहँ ढका था |घर में कोहराम मच गया मुझे तुरंत दिल्ली के लिए प्लेन से रवाना कर दिया |आंटी उस उम्र में कुछ नहीं सूझता मैं बहुत धनी परिवार की बेटी हूँ मेरे पिता नामी बिजनेस मैन थे मेरी दो बहने बहुत अच्छे घरों में ब्याही हैं लेकिन मेरी अक्ल पर ऐसा पर्दा पड़ा मुझे दुनिया में सबसे दुश्मन अपने माता पिता नजर आ रहे थे क्यों मेरे प्यार की दुनिया उजाड़ रहे हें? नसीर के खत लगातार मेरी सहेली के पते पर आते रहते खत क्या उनमें शेरो शायरी मुहब्बत के फसाने अलग रहने की तड़फ थी | एक दिन नसीर दिल्ली आया यहाँ उसके चांदनी चौक में कई रिश्तेदार हैं वह सीधा हमारे घर आ गया उसने मेरे पिता के सामने अपने प्यार के इजहार में कसीदे पढ़ें और शादी का प्रस्ताव रक्खा मेरे पिता हैरान हो गये लेकिन उनमें दुनियादारी की समझ थी उन्होंने नसीर को बिना झगड़े विदा कर दिया |

मुझे ऊँच- नीच समझाया |वह पार्टीशन से पहले रावल पिंडी में रहते थे जैसे ही पाकिस्तान की हवा चली पड़ोसियों की आँखे बदल गयी वह अपना सब कुछ छोड़ कर बुआ और माता पिता के साथ दिल्ली आ गये पिता रास्ते में दंगाईयों के हाथों मारे गये |दिल्ली में भी जमना आसान नहीं था बड़ी मेहनत की मेरी उनकी कहानी में कोई रूचि नहीं थी | मै चुप चाप घर छोड़ कर नसीर के पास चली आई अभी मैं 18 वर्ष की नहीं हुई थी नसीर के साथ दिल्ली की सकरी गलियों में उनके रिश्तेदारों के घर समय काटा | पिता प्रभावशाली थे मुझे घर-घर ढूँढा गया विरोध प्रदर्शन हुए मौलानाओं से प्रभावशाली लोगों ने सम्पर्क किये परन्तु मैं बुर्के में एक घर से दूसरे घर नसीर के साथ छुपती रही | 18 वर्ष एक दिन ऊपर होते ही मेरा नसीर से निकाह हो गया| मेरे पिता सह नहीं सके रात को उनके सीने में भयानक दर्द हुआ और सदा के लिए सो गये| निकाह के बाद मैं बेंगलोर आ चुकी थी बुआ ने मुझसे मिलने की कोशिश की लेकिन मैने  उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जैसे वह मेरी दुनिया उजाड़ने आई हैं |दिन हंसी ख़ुशी से बीत रहे थे वैसे  परिवार में पर्दा नहीं था लेकिन मैं बहू थी अत :बुर्का लाजिमी हो गया एक मौलाना मुझे अरबी पढाने आते थे अब मैं पांचो वक्त की नमाज पाबंदी से पढ़ती रोजे रखती |

मैं एक बेटी की माँ बन गयी दो वर्ष बाद बेटा हुआ बेटे के जन्म के बाद मेरी दुनिया ही बदल गयी अम्मी की बहन  का खत आया उनकी बेटी 18 बरस की हो गयी है वह नसीर से उसका निकाह करवाना चाहती थीं वह जब भी फोन करती पूछती तुम्हारी हिन्दुआनी बहू का क्या हाल है अम्मी माथा ठोकते झींकती कहतीं न जाने कहाँ से उठा लाया है क्या करूं अभी मेरे लड़के का जादू चढ़ा है ?मुझे हर समय धक्के पड़ने लगे जब तब कहा जाता बस तीन बार तलाक कह कर छुटकारा पा ले सारी जिन्दगी गले से लटकाए रहेगा | नसीर मुझे बच्चों सहित को बहला फुसला कर दिल्ली लाया और मेरी माँ के दरवाजे पर छोड़ गया उसके अनुसार जल्दी ही नौकरी मिलते दुबई ले जाएगा | माँ तो माँ होती है उसने मेरे सिर पर हाथ फेरा  लेकिन मेरे भाई की आँखों में खून उतर आया भाभी फुंकारने लगी किस मुहं से आई हो पहले लाज शर्म नहीं आई तुम्हारी करनी बाऊ जी को खा गयी अब किसकी बली चाहिए |वह बच्चों को अपने बच्चों के पास खड़ा नहीं होने देती थीं | मेरे बच्चे भी मुझसे सवाल करते अम्मी आप नमाज नहीं पढ़ती मामा मस्जिद नहीं जाते एक दिन मेरी बेटी मेरी भांजी को दुआ मांगना सिखा रही थी भाभी आपे से बाहर हो गयी| मेरी माँ ने बड़ी लाचारी से कहा बेटी मैं परबस हूँ नसीर को लिखो वह तुम्हें ले जाये या तुम खुद बेंगलोर चली जाओ | मेरे मायके में मेरी दोनों बहनों, जीजाओं और कुछ रिश्तेदारों की पंचायत जुटी मेरे छोटे जीजा मुझे अजीब नजरों से देख एहे थे में नजर पहचानती थी|

अंत में मैने नसीर को फोन किया तुम मेरे और बच्चों के बारे में सोचों नसीर तो नहीं आये हाँ उसका हिन्दू दोस्त अपनी पत्नी सहित आया उसने आपके एरिया में किराये का मकान लिया था उन्होंने कहा नसीर दुबई की तैयारी में लगा है उसने मुझे कुछ रूपये भेजें हैं आप हमारे साथ रहो नसीर जल्दी ही आपसे मिलने आयेगा हम यहाँ रहने आ गये देखो आगे क्या होता है हाँ मेरे शौहर के फोन आते रहते हैं एक दिन वह बहुत उदास हमारे घर आई उसने कहा नसीर कल आया था मुझे उसने कुछ सामान लेने बाजार भेज दिया पीछे से बच्चों ने बताया अब्बू आपकी अटैची से कागज निकाल रहे अब चले गये उन्होंने कहा था अम्मी से कहना खुदा हाफिज |अटैची खोल कर देखा निकाह नामा और हमारे खत साथ ले गया मैं समझ रही हूँ उसने मुझे छोड़ दिया लेकिन तलाक नहीं दिया शायद डाक से भेज देगा मैने उसे समझाया उससे अब आशा करना बेकार है वह खुदा हाफिज कर गया | वह तुम्हें तलाक नहीं देगा वह जानता है बच्चों को किसी भी तरह पालोगों वह आये या न आये बच्चे उसी के कहलायेंगे |वह रोने लगीं जब वह रो –रो कर शांत हो गयी मैने उसे समझाया तुमने जिस हिम्मत से प्यार निभाया मजहब बदला था अब उसी हिम्मत से कमर कस लो अब बच्चे पालने हैं जीना है उसके चेहरे की दीनता कम हो गयी | एक हफ्ते बाद आई उसने मुझे बताया मेरी दोनों बहनों ने मेरे लिए दिल्ली की हल्की बस्ती में किराए का कमरा ले लिया वह मेरा खर्चा उठाएंगी उस एरिया में कई फैक्ट्रियां हैं मुझे कोई न कोई काम मिल जायगा वहाँ पास ही सरकारी स्कूल है | आपने मुझे सही सलाह दी है नसीर का इंतजार करने रोने बिलखने से अच्छा है बच्चों के लिए कमर कस लूँ में जा रही हूँ वह चली गयी लेकिन मुझे उदास कर गयी मुझे दुःख था में उसकी कोई मदद नहीं कर सकी |

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