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Naaz


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गाली या अपशब्द कर

Posted On: 10 Oct, 2015  
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असभ्यपन को छुपाने की कोशिश……!!

Posted On: 22 Oct, 2013  
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साथ खड़े होने की ज़रूरत !

Posted On: 21 Oct, 2013  
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आय कम रोज़गार कम, अनाज कम तो बच्चे भी कम!

Posted On: 14 Apr, 2013  
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काँधे पे अपने रख के अपना मज़ार गुज़रे।।

Posted On: 31 Mar, 2013  
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मायूस करने वाली कार्रवाई !

Posted On: 18 Feb, 2013  
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Posted On: 30 Jan, 2013  
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मुसलमान होने की समस्याएं !

Posted On: 30 Jan, 2013  
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अफ़सोस लोकतन्त्र में वोटों के खिसक जाने के डर से राजनेता कम बच्चे पैदा करने की बात को अपने चुनावी भाषण का हिस्सा नहीं बनाते क्योंकि वहाँ वोट अहम हो जाते हैं देश की भलाई का मुद्दा हल्का पड़ जाता है फिर अगर एक पार्टी इस मुद्दे को छूएगी तो दूसरी इसकी मुख़ालफ़त कर वोट हथियाने की फि़राक़ में रहेगी। इसके पीछे एक कारण शायद संजय गाँधी के जबरिया अभियान की आलोचना रही हो लेकिन कड़ुवी सच्चाई यह है कि नेताओं के अपने बच्चे ही दो से ज़्यादा हैं, ऐसे में वह आबादी को काबू रखने की बात जनता से किस मुँह से कहें! यह तो जनता को समझना चाहिए कि उसे आने वाली पीढ़ी को बेरोज़गारी, अनाज-पानी की कमी और चिडि़या जैसे रिहाइशी घर देने हैं या एक अच्छा जीवन ! आप जैसा कोई व्यक्तित्व ऐसा लिखता है तो लेखन की गरिमा और भी बढ़ जाती है ! बहुत सटीक और सार्थक लेखन !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Naaz Naaz

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के द्वारा: Naaz Naaz

के द्वारा: Naaz Naaz

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

बेबी नाज़ जी, बात भले ही आपकी बात से इत्तेफाक रखने या न रखने की न हो, किन्तु मैं आपकी बातों से पूरी तरह से इत्तेफाक रखता हूँ, आज पूरे समाज का नैतिक पतन होता चला जा रहा है, जिसपर लगाम लगाने वाला कोई ज़िम्मेदार वर्ग अपने कर्तव्यों को सही ढंग से नहीं निभा रहा है! आज के समय में कोई भी नेता कोई बयान देता है तो उस बयान को जानबूझकर विपक्षी दल के नेताओं द्वारा गलत ठहराया जाता है और राजनीति की रोटियाँ सेकने की कोशिश की जाती है! ठीक उसी तरह एक धर्म के ठेकेदार द्वारा जब कुछ कहा जाता है तो दुसरे धर्म के ठेकेदार द्वारा उसको गलत ठहराने और लोगों की भावनाओं को भड़काने का काम किया जाता है! आम जनता भी इन बातों पर गहन विचार करने के बजाये भड़क उठती है और दंगे शुरू हो जाते हैं! इन सब में नुक्सान तो इसी आम जनता का ही होता है! आज हमारे पास विरोध करने के लिए भ्रष्टाचार, महंगाई और नैतिक पतन जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, फिर हम फ़िज़ूल की छोटी मोती बातों को ज्यादा तूल न दें, तभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर पूरा ध्यान दे पायेंगे! इस लेख को लिखने के लिए आपको बधाई!

के द्वारा: Anil "Pandit Sameer Khan" Anil "Pandit Sameer Khan"

हार्दिक क्षमा प्रार्थी हूँ यदि मेरी किसी बात से किसी की भावना को ठेस लगे तो.............. जहाँ तक इस लेख में आपने शूर्पणखा की नाक काट ने पर सवाल किया है तो इसका जो उत्तर मेरी नजर में है वो ये की नारी को युगों युगों से सम्मान का प्रतीक माना गया है......... तो वो इस लिए नहीं की वो नारी है....... अपितु इस लिए की वो ही किसी वंश को सम्मान के उच्चतम शिखर तक न केवल स्वयं पहुचती है अपितु पहुचने वाली संतानों को जन्म भी देती है............. किसी विवाहित पुरुष के साथ पुरुष की इच्छा के विरुद्ध उसको विवाह के लिए विवश करने का प्रयास स्वत नारीत्व की गरिमा को समाप्त कर देता है.......... फिर ऐसा प्रयास करने वाली नारी नारी नहीं रह जाती.............. उसकी नाक काटना एक प्रतिक है की वो अब नारी नहीं रह गयी....... उसने नारी की गरिमा को समाप्त कर दिया है................ और जहाँ तक रावन का प्रश्न है.............. तो रावन इस दंड का हकदार था.......... यदि कोई बच्चा कोई अपराध करता है तो उसको क्षमा किया जा सकता है की वो अबोध है उसको ज्ञान नहीं.............. पर रावण ब्रह्म ज्ञानी था............. और उसके इस कृत्य का जो फल उसको मिला वो असाधारण था.......... अहिल्या को तारने वाले भगवान् श्री राम के हाथों मृत्यु को कोई दंड नहीं कहा जा सकता......................

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

बहन नाज़ जी, आपका बहुत आभार | आज जब आप जैसे युवा इस बात को समझ रहे है तो उम्मीद की एक किरण दिखाई देती है | ये बात ठीक है की , हमारे पास विकल्प है की हम ऐसा नापाक व् बेहूदा कूड़ा न देखे | पर क्या बात यही ख़तम हो गयी | क्या सभी लोगो में इतना विवेक है या क्या सभी बच्चे या युवा ये बात समझ सकते है | और क्या बात सिर्फ एक बिग्ग बॉस की है हर चैनल पर किसी न किसी रूप में हमारी हर मर्यादा को तोड़ने की तयारी कर ली है | अब तो टीवी/मीडिया वालो को भरोसा हो ही गया की ये भारत वासी तो सो रहे है , इसलिए एक के बाद एक और अधिक से अधिक मर्यादाओ को तोड़ने की होड़ लगी रहती है | उन्होंने पहले छोटी छोटी मर्यादाओ को तोड़कर हमारे मूक दर्शक होने का सफल परिक्षण कर लिया | फिर क्या था ,उनकी तो समझ आ गया कुछ भी करो | कोई रोकने वाला नहीं | पूरा मीडिया विदेशी हाथो में बिका हुआ है | काले अंग्रेजो की इस भ्रष्ट सरकार व् अंगेरजी कानून व् पूरी शिक्षा व्यवस्था को अब बदलना ही होगा ये मर्यादा पुरोश्तम श्री राम की धरती है , इसे हमें बचाना ही होगा| भाई मनीष सिंह के शब्दों में कहना उचित होगा मेरा दिल कहता है – हमे कुछ कदम उठाने ही होंगे. कुछ बदले से तेवर दिखाने ही होंगे, ऐ मेरे दोस्तों ज़रा नींद से जागो! कुछ कर्तब्य हमे निभाने ही होंगे………….. वर्ना………. ज़मीन बेच देंगे गगन बेच देंगे, नदी नाले पर्वत चमन बेच देंगे, अरे नौज़वानों अभी तुम न संभले, तो ये भ्रष्ट नेता वतन बेच देंगे अरुण अग्रवाल …

के द्वारा: ARUN AGGARWAL ARUN AGGARWAL

हमारे लिये तो वैसे भी इस प्रकार के कार्यक्रम न प्रशंसा करने लायक रहे हैं, और न ही आलोचना करने योग्य । थोड़ी देर भी नज़र टिकाकर देख पाएं तब न बता पाएं कि इसपर हमें क्या कहना है! अफ़सोस की बात ये है कि बच्चे मुंह चिढ़ाने वाली तर्ज़ पर इन कार्यक्रमों का आनन्द लेते हुए उसी में डूबते उतराते दिखाई दे रहे हैं, और हमारी कुढ़न को अब कोई तवज़्ज़ो भी नहीं देते । गाँवों के जिन घरों में डिश के माध्यम से मल्टी चैनल रिसेप्शन की व्यवस्था है, वहां भी अब इसी प्रकार के कार्यक्रम पसन्द किये जा रहे हैं । जितना बदलाव पिछले दो दशक में आया है, इतना तो कई सौ वर्षों में भी नहीं होता था । रामायण और महाभारत जैसे सीरियल, अभी बहुत दिन नहीं हुए हैं, शुरू होने से पहले ही सड़कें वीरान हो जाती थीं । आज कई चैनलों पर उनकी कड़ियां दोहराई जाती हैं, और किसी को पता भी नहीं चलता । भूमंडलीकरण ने हमारे खान-पान, मनोरंजन, सोचने समझने के अंदाज़ और यहां तक कि सेक्स चर्चा और कामकलाओं तक को पूरी तरह बदल दिया, और वह भी एक झटके से । यह भी निर्विवाद है कि इस बदलाव का सबसे बड़ा कारक यह टीवी ही है, जिसपर बिग बाँस दिखाया जा रहा है । साधुवाद ।

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