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bodhisatvakastooriya


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“जागो ग्राहक जागो

Posted On: 5 Apr, 2011  
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Others पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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शपथ तुम्हे १५ अगस्त की

Posted On: 12 Aug, 2017  
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कविता में

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‘चप्पा-चप्पा चरखा चले’

Posted On: 8 Aug, 2017  
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हास्य व्यंग में

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आँसुओं की माला

Posted On: 13 May, 2017  
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कविता में

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आँसुओं की माला

Posted On: 13 May, 2017  
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कविता में

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तलाक

Posted On: 27 Apr, 2017  
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कविता में

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भारत की नारी

Posted On: 22 May, 2016  
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कविता में

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विश्वास

Posted On: 13 May, 2016  
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कविता में

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श्रद्धांजलि

Posted On: 14 Apr, 2016  
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में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: krishnabhardwaj krishnabhardwaj

के द्वारा: Lahar Lahar

abodhbaalak और  bodhisatvakastooriya आप दोनो अपने आपको कोसना बन्द करो । हम लोग प्रजा है । प्रजा को तो पेहले से ही जन्गली मान लिया है , राज्य कर्ताओ ने और धर्म गुरूओने । प्रजा का भ्रष्ट होना स्वाभाविक है । हमको सीधा करने के लिये कानून और धर्म के सिध्धान्त हम पर थोपे जाते है । आपके अनूसार हम पेहलेसे ही सीधा होते तो कानून या पोलिस की क्या जरूरत । हा, हमको कन्ट्रोल करनेवाले सब ( नेता, नौकरशाह, गुरु ) भ्रष्ट नही होने चाहिए । वो भ्रष्ट नही होन्गे तो हमारे लिए भी कोई रास्ता नही रेहता । मै अपना अनुभव बताता हु । १९७४ की बात है । हमारे कारिगर के भाई को किसीने मारा । अस्पतालमे खबर पूछने गया । मारपीट का केस मजबूत बनाने के लिये डोक्टरसे रेपोर्ट हमारे पक्षमे लिखवाने के लिए मुजे बलीका बकरा बना दिया । २० रुपिया थमा के मुजे भेजा गया डोक्टर के पास उसे खरिदने । २० रुपिये का मुल्य कम नही था उस समय । डोकटरने मुजे थप्पड मारना ही बाकी रख्खा वो तो मुजे पोलिसमे ही दे देता अगर मै उमरमे बडा होता । आज भी मै सलाम करता हु वो डोक्टर साहब को । अन्नाने मुल पर ही हथौडा मारा है । उनका प्लान शासको को मेरे डोक्टर साहब जैसे बनाना चाहते है । नेता की संख्या कम है उसे सुधारा जा सकता है, प्रजा की संख्या ज्यादा है उसे कोई सुधार नही पाया है न सुधार पायेगा ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

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