सच

Just another weblog

49 Posts

6127 comments

ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

chief subeditor जागरण मुरादाबाद
Year of Exp: 18 years

Sort by: Rss Feed

हे पुत्रों तुम्ही भगीरथ, उबारो मुझे

Posted On: 13 Nov, 2016  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Social Issues में

0 Comment

Page 1 of 512345»

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा: ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

के द्वारा: ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

आदरणीय त्रिपाठीजी,क्या विडम्बना है इस प्रदेश की?जहाॅ लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा है,सभी को रोटी सुनिश्चित नहीं हो पा रही है,पढ़ने वाले सभी बच्चों के लिए शिक्षक नियुक्त नहीं हो पा रहें है ,ऐसे ग़रीब जनता के प्रतिनिधियों को सरकारी राजस्व से बीस बीस लाख की गाड़ी दी ज रही थी ।ऐसी सोच को कौन सी गाली दी जाय,समझ में नहीं आ रहा है ।इससे तो अच्छी मायावती बहन जी थी,जो जनता के पैसे से लखनऊ और नोएडा में जनता के लिए पार्क बनवाया ।साराशंतःसमाजवाद की इस विदेशी नई पीढ़ी को मेरा सलाम ।अब भगवान ही इस देश की रक्षा कर सकता है क्योंकि बिना चुनाव जीते न तो इन क्षद्म सिद्धान्तवादियों को हटाया जा सकता है और न ही अच्छे लोग चुनाव लड़ सकते हैं ।विश्लेषक&याहू .इन ।

के द्वारा: vishleshak vishleshak

त्रिपाठी जी,धन्यवाद ।क्या सुन्दर ढ़ग से सच्चाई का वर्णन किया गया है ।मुझे किसी के द्वारा सुनाई गयी एक कहानी याद आ रही है,सुनाना चाहूंगा ।एक राज्य में राजा को कोई वारिस नहीं थी ।राजा की मौत के बाद मन्त्रियों द्वारा यह निर्णय लिया गया कि जिस व्यक्ति के सिर पर गिद्ध बैठ जाएगा,उसी को राजा बनाया जाएगा ।ऐसा होने पर एक व्यक्ति को राजा बना दिया गया ।ऐसे व्यक्ति के राजा बनते ही पडो़सी राजा ने आक्रमण कर दिया ।आक्रमण होते ही राजा को ख़बर की गयी ।राजा कुछ बोले न ।जब सेना महल के अन्दर घुसने लगी,तो जब राजा को अवगत कराया गया,तो राजा ने दरबारियों से कहा कि सामान समेंटो और चलो ।दरबारियों ने पूंछा कि कहाँ चलना है?राजा ने कहा,जहाँ से आए थे ।कही इस देश मे भी ऐसा न हो जाए ।विश्लेषक&याहू .इन ।

के द्वारा: vishleshak vishleshak

श्रीमान जी आपने एक सामयिक विषय पर बहुत अच्छा लेख लिखा है, धन्यवाद ! पहली बात तो आज राजनीती को एक गंदे शब्द के रूप में प्रयोग कर के सभी को इससे दूर रहने का उपदेश देना फैशन हो गया है. किसी भी देश को चलाने के लिए जो नीति होती है, उसे राजनीती कहते है. तो क्या बिना राजनीती के देश चल सकता है ? समस्या नीति से नहीं अनीति से है. देश को चाणक्य जैसे राजनेतिग्य की आवस्यकता है. चाणक्य को जानने के लिए उनके जीवन को समझना पड़ेगा.आज समाज में और विसेशकर नेताओ में अध्ययन के लिए सोच ही नहीं है, इसीलिए अराजनेतिक जैसे शब्द प्रयोग किये जाते है. जिसमे राजनेतिक समझ न हो ऐसा व्यक्ति तो देश के किसी भी दायित्व को सँभालने के अयोग्य है. रास्ट्रपति जैसे पद पर बैठने वाले व्यक्ति को देश की परम्पराओ, इतिहास की समझ और भविष्य की दृष्टी,होनी चाहिए. इस पद पर कोई ऐसा व्यक्ति न आशीन हो जाये जो अपने को किसी व्यक्ति के अहसानों से दबा मानता हो. पिछले कुछ समय से रास्ट्रपति जैसे सम्मानित पद को भी विकृत मानसिकता वाले नेताओ ने वोट बटोरने का औजार समझ लिया है, और इस गरिमामई पद को जाती- सम्प्रदाय को तुष्ट करने का साधन मान लिया है. ऐसे लोग इस महान रास्ट्र को टुकडो में बाँटने की साजिश रचने वाले गद्दार है. हमे उनके चेहरे पहचान लेने चाहिए. देश के सर्वोच्च पद पर आने की एक ही योग्यता हो, उसका देश के प्रति समर्पण.

के द्वारा:

के द्वारा: ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

के द्वारा: ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

के द्वारा: ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

के द्वारा: ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

के द्वारा:

के द्वारा: ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

के द्वारा: jyoti gautam jyoti gautam

के द्वारा: ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

के द्वारा: ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

tripathi ji baat sahi aajkal badhayoion ka tata hota jagh जगह badhai miney ka सिल्सिल है अगों walo ko badhai milrahi बात कुछ और है agar gaon meie ke yahan कुछ hojaye प्रधानजी aisi badhai deytey hki bechara zindagi bhar unko dua ही देता उसके दिखो per bhi yahi kaha jata है govt.ke aagey tunhare kashat ko likh diya gaya है badho tumhari sunyahogi arey sunti ल्लौकी माँ कल जो तुमने master se kaha tha master per karyvahi hogi woh saura maafi maang raha tha tumhey badhai ho ab to pradhai ke chunav ka muddha banngay है badhai ho woh hum जो hum कल rashter ke naam बात kar rahey thhey uss per bhi hamu badhaiyon ka एक पैर एक लोग wahawahi deyrahe arey oh llauke babpu badhai ka karogey atta naahi है masale naahi है badhai ka करोगे प्रधान से कुछ intazam karona lalu ka bapu प्रधान ji ke pass gay कुछ kahata woh bola suney oh llalu sarka tumhey ab garibi से bachney ke liye naye kanoon la rahi badhai ho लालू कुछ kahaye phir praboley ab ki tumjo voteva hamu dogey hum sab gavon ka bahal karney ki soch rahe hain ki ek kabbdi ka maidan bhi bannva daaley yu sasuri sadak ko gaddey hogay bharvnaney ki koshis karney ja rahe hain thabhi ram bola iss baat ki badhai ho aapne socha to sahi hum logva aapko badhai dey skte hai humgarionn ke pass ek h baat hai garbi hi hamrri badhai hai jeena badhai ke saath marna hai badhai ke saath, pradhani dekhi badhi ke saath jhanda dekha farhtey huye badhai ke saath , bachhey n samjhe azadi kya yah bhi badhai, gaon meie school na khuley yah bhi badhai hai, koi kya samje kya yah hai badhi jo miljati hai har baat per jo samjhe iss badhi ko gaon ka shaeed woh insaan badhai ke saath pradhan ko samjha diya gay charon taraf badhi milni chaiye sab ko inko samha do detey rahngey badhi aur letey rahna badhai yeh sab samyo ka ek malmunter nara jo kisi ko aasani se nahi milta jaisey kisi ke ghar ladkiyon 2 se jayada hojaye usski aas chutt jati aur jab ek ladka ho woh kush ho jata badhai badhai per badhai paata jab ko garib galti se pradhan bannjata aur jaldi se swarjata hai badhai kewal isski pata hai garib ke hissey mein yahi likha hai badhai hi....badhai ho,kyunk jab usko milti rahey gi adhaaai woh na puchey ka mehangi kaub kam hogi, bijli kab milegi, gaon meie school khul gaya masterji kab aaynegay, t.v. aagay per light kab milegi, telphone aayegey, per connection kab aayega, mobile aagay per connection kab jodega , sab ki adhiyan milgayi unko per jeeney ka sahi matlab kab milega isskelye badhai ek naara pahela ek p.m.ne lagaya tha garibi hatoa ke rahney garibi door karangey per dookh woh chaligayi dusri aayi hain iteli se kaharahi garibi hatayengi badhai ho ek gaon godd leyliya garibi hattney ke naam garib hata rahi lo yeh badhai badhai kab aap ki baari aaye badhai ho badhai ho

के द्वारा:

त्रिपठी जी बढ़िया लेख के लिए बधाई अपने बहुतो की भावनाओ की अभिव्यक्ति दी है.वास्तव में यह मुक्बधिरो की सर्कार है जहा का प्रधानमंत्री सिर्फ पुजीपतियो के लिए उपलब्ध होता है और ख़ामोशी केवल उसी समय टूटती है जब तोड़ने का निर्देश हाई कामन से मिलाता है.चिदुम्बेरुम महोदय की परेशानी उनका वेदान्त का भूतपूर्व निर्देशक होना है जो आदिवासियो और नाक्स्सल्वाडियो के खिलाफ कार्यवाही करने में अपराधबोध से भर डेरा है क्योकि वास्तविकता यही है की चिदुम्बेरुम महोदय जिन नाक्स्सलियो को गजर्मुली समझ केर पहले भादव बयां दे रहे थे अब नाक्स्सलियो का प्रतिरोध देख केर दहशत में है उन्हें लग रहा है की गलत घर बयाना दे ए है.

के द्वारा:

अपनी नयी पोस्ट में आपने निकट भविष्य की राजनीति का रेखाचित्र खींच दिया है. आपकी बातों में मुझे काफी दम नज़र आता है. .क्या मान लिया जाय की मनमोहन सिंह की उपयोगिता समाप्त हो गयी है. उन्हें संकेत दे दिया गया है कि अब विदाई की बेला करीब है. अन्तोगत्वा तो राहुल को गद्दी संभालनी ही है. ऐसे में उनको सभी उपलब्धियों का श्रेय दिया जाना और गलतियों का ठीकरा औरों के सर पर फोड़ना स्वाभाविक ही है. जहां तक सोनिया जी के मौन व्रत का सवाल है, वह कितनी भी मौनव्रत धारण किये नज़र आती हों, कहा जाता है कि कांग्रेस में उनकी इजाज़त के बगैर कोई छींक भी नहीं सकता है. वे त्याग, बलिदान और तपस्या की प्रतिमूर्ति जो हैं. मेरी एक बात से आप निश्चित रूप से सहमत होंगे कि इस परिवार नें हमारे देश की अहर्निश सेवा की है. देश को इतने प्रधानमंत्री दिए. अगर यह परिवार न होता तो हमें प्रधानमंत्री कहाँ से मिलता. ऐसे में भगवान् ही देश की रक्षा कर सकता. .

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा: ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

त्रिपाठी जी अभिवादन, अर्थशाश्त्र में एक नियम पढ़ा था कि "पुराने नोट नए नोटों को प्रचलन से बाहर कर देते है." हम अक्सर देखते है कि घर-परिवार हो या व्यवसायी या फिर कोई और जैसे ही हमें नए नोट मिलते है, हम उन्हें अपने पास संभाल कर रखते है और बाज़ार आदि में अपने पुराने नोटों को चलाते है. नया नोट तब तक हम जेब से बाहर नहीं निकालते जब तक कि पुराने नोट हमारे पास से समाप्त न हो जाये. लेकिन अन्य सामाजिक बातों में ऐसा नहीं होता है. यहाँ तो हर नई चीज, नियम, परम्परा आदि हर पुराने नियम, परम्परा आदि को बाहर कर देती है. कुछ ऐसा उपाय करने कि जरुरत है जिससे हम नयी परम्पराओं आदि को बुद्धि के साथ ग्रहण तो करे लेकिन पुरानों को भी संभाल कर रखे वह भी बाइज्जत. धन्यवाद. http//:siddequi.jagranjunction.com

के द्वारा:

के द्वारा: ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी ज्ञानेन्‍द्र त्रिपाठी

त्रिपाठी जी अभिवादन, मेरे एक परिचित है, अंग्रेजी के प्राध्यापक है. शुरूआती मुलाकात के दौरान एक बार उन्होंने मुझसे मेरे माता-पिता की शिक्षा के बारे पूछा. जिस पर मैंने कहा- ....माता जी अशिक्षित है. इस पर उन्होंने टोकते हुए कहा- "वो अशिक्षित नहीं है. हमारी-आपकी तरह उन्होंने औपचारिक किताबी शिक्षा भले ही नहीं ली है लेकिन जीवन की वास्तविक शिक्षा इन्ही लोगों ने ले रखी है." अंग्रेजी के प्राध्यापक से ऐसी बात सुन मै उनका मुह ताकता रह गया. आज यदि हमने बड़े-बुजुर्गो और गाव-खेत का साथ नहीं छोड़ा होता तो शायद तस्वीर कुछ और ही होती. यही कारण है की अब हमें हर बात के लिए 'दिवस' मनाना पड़ता है. खैर इस पर भी हम चेत जाये तो गनीमत होगी. धन्यवाद.

के द्वारा:

के द्वारा:

अम्‍बुज साहब को बताइए कि आप जोत रहे हैं तभी वह टिप्‍पणी कर रहे हैं। वैसे अम्‍बुज साहब एक बेहतर टिप्‍पणीकार है। शब्‍दों के चयन में उन्‍हें थोडी और सावधान बरतनी चाहिए। उनके कइ कमेंट मुझे बहुत अच्‍छे लगे हैं। इस बार आप ने भी बेहतर टिप्‍पणी की है। शायद आप के उस इशारे को अम्‍बुज साहब समय नहीं दे पाए हैं। उनकी सलाह को सकारात्‍मक ढंग से लेते हुए और खरी टिप्‍पणी करें तो और बेहतर होगा। एक बात और हर लिखने वाला प्रत्‍येक पढने वाले के सौ फीसदी अनरूप नहीं हो सकता। अरे भाई किसी अरहर की दाल अच्‍दी लगती है तो कोई दाल मखान का आर्डर दे अपनी इच्‍छा को प्रकट करता है। आप दोनों लोगों धन्‍यवाद। एक बेहतर बहस शुरू करने के लिए।

के द्वारा:

त्रिपाठी जी अभिवादन, यदि ये व्यंगात्मक लेख किसी 'फलाने' ने लिखा होता तो चलता. आप जिस कुर्सी पर विराजमान है, वहा से एक गंभीर मुद्दे पर निश्चित ही गंभीर बात की आश रहती है. कर के पैसो से देश की उन्नति जुडी रहती है. जिन शर्मा जी, वर्मा जी का आपने जिक्र किया है, क्या वे ठीक कर रहे है ? कर की सीमा में आने वाले समर्थ होते है और उन्हें खुशी-२ कर अदा करना चाहिए. थोडा सा डर और थोडा सा व्यंग और इस चक्कर में मेन मुद्दा हवा हो जाये ये ठीक नहीं है. कर अदा करना चाहिए- इस मुद्दे पर देश भर में साफ़-सुथरी बहश होनी चाहिए, ताकि अधिक लोग ऐसा करने लगे, जिसका की अभाव है. आखिर कर का पैसा हमारे ही ऊपर खर्च होता है फिर उसे देने में कैसा डर ? मेरे कुछ परिचित है, जो कर के दायरे से बाहर है, फिर भी उन्होंने पेन कार्ड बनवा रखा है और हर साल Accountant को ५०० से ७०० रूपए देकर अपना रिटर्न जमा करवाते है. वे रिटर्न न भी जमा करे तो भी चलेगा और उनके ५०० से ७०० रूपए भी बच जायेंगे. वे ये भी कहते है की जिस दिन कर के दायरे में आयेंगे तो कर भी अदा करेंगे. भारतेंदु हरिश्चंद ने कहा भी है की हमारे यहाँ रिक्शा वाला, तांगा वाला समय लगते ही गप्प मारता है, बीड़ी पीता है, ठिठोली करता है, चौकड़ी लगाता है, जबकि विदेशी बग्घी वाला, तांगे वाला अपने सीट के नीचे अख़बार रख कर चलता है और समय मिलते ही वह अख़बार पढता है. धन्यवाद.

के द्वारा:

त्रिपाठी जी अभिवादन, कहते है की दूर के ढोल सुहावने लगते है. लेकिन आपने जिस प्रकार कम्बल में लपेट-२ कर मारा है, वो और किसी को सुनाई दे या न दे, लेकिन मुझे उसकी आवाज साफ़ सुनाई दे रही है और सच पूछिए तो मज़ा भी बहुत आ रहा है. और साथ ही ये भी बता दूं की शहीदों की शहादत मेरे इस मज़े को किरकिरा कर रही है, जिसका मुझे गर्व है. मूल कारण क्या है त्रिपाठी जी की नेताओं को छोड़कर बाकि सभी के लिए कुर्सी पाने के लिए डिग्री तय है. मसलन आपने पत्रकारिता में गहरे तक हाथ आजमाया तो ही कहीं जाकर आपको जिला प्रभारी की कुर्सी मिली होगी, ऐसा मेरा मानना है. लेकिन क्या ये संभव है की आपको सरकार बदलने पर या आपकी पहुँच होने पर जिला स्वस्थ्य केंद्र में वरिस्थ सल्य चिकित्सक नियुक्त कर दिया जाय ? यदि हाकी कप्तान को क्रिकेट कप्तान बना दिया जाय तो क्या होगा ? धन्यवाद. एक और विनती है आपसे की लेख की विसंगति पर लिखने के लिए कहकर मुझे आसमान में पत्थर फेकने के लिए न कहें क्योंकि वह मेरे ही सिर पर गिरेगा, ये मै जनता हूँ. लेकिन मेरी प्रतिक्रिया का आपको इंतजार रहता है, ये कहकर आपने मुझे गदगद कर दिया. बहुत शुक्रिया.

के द्वारा:

हिंदुस्तान की सहनशक्ति वास्तव मे कमाल की है कुछ भी हो जाय हम छाती पीटकर रह जाते हैं चिल्लाते चिल्लाते हमारी आवाज़ मंद हो जाती है इसके सिवा हम कुछ कर ही नहीं सकते आपने सही लिखा है हमारी सहने की क्षमता लाजवाब है। कभी २६/११ कभी दंतवाडा काण्‍ड और कभी कुछ और कभी पाकिस्तान तो कभी नक्सली वाकई जिसका जो मन करे वह इस देश मे करता रहता है वह भी जानते हैं की भारत चिल्ला कर चुप हो जायेगा क्योंकि हम अनुयाई है गाँधी के हम चलते हैं उनके आदर्शों पर उन्होने ही तो कहा था की सामने वाला जब एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा आगे कर दो इससे अच्छा तो इसराइल है की वह अपने को जख्म देने वालों से हिसाब बराबर करना जानता है शयद दोष हमारे नीतियों का है की हम चाह कर भी कुछ कर नहीं सकते फिर चाहे कोई अपना बेटा खो दें, किसी मां की कोख सूनी हो जाय या फिर किसी के सिर से बाप का साया उठ जाय या किसी की मांग का सिदुर पुछ जाय अपना क्या जाता है!

के द्वारा:

चर्चित हस्‍ती की जिन्‍दगी मीडिया की सुर्खी हमेशा बनी है। सानिया के साथ भी ऐसा ही हो रहा है, लेकिन आपकी शंका भी सच है। मशहूर अदाकारा रीना राय ने भी तो पाकिस्‍तान को ही ससुराल बनाया था। खुदा न करे कि सानिया के साथ भी ऐसा हो। ऐसा न होने पाए इसके लिए मेरी एक सलाह है। दोनों को अपने अतीत को आदर्श बनाना होगा। स्‍कूटर पर सैर के दौरान अमृता प्रीतम अंगुलियों से इमरोज की पीठ पर साहिर का नाम लिखती थी और पूछने पर इमरोज हंस कर कहते कि तुमने साहिर लिखा है। साहिर जिसे अमृता ने प्‍यार किया था। कुछ भी पाने की किसी भी इच्‍छा से दूर इन दोंनों के प्रेम को क्‍या सलाम करने को इस नई जोडी का मन नहीं करेगा। आमीन                      

के द्वारा:

के द्वारा:

त्रिपाठी जी अभिवादन, बेहतरीन विश्लेषण किया है आपने. हमारे यहाँ कुछ ज्यादा ही हल्ला मचाने का रिवाज है. इसका सेहरा सबसे पहले मीडिया के सिर मढ़ना चाहिए. चूंकि खबर चाहिए तो ऊल-जुलूल, बस दिखाना है. सम्बंधित का औचित्य भी नहीं देखते. पहले ब्रेकिंग न्यूज़ बनी फिर एक पूरी कड़ी ही चला दी फिर तरह-२ की चर्चाये शुरू की, कही-२ पर तो इस विषय को बहस का मुद्दा ही बना दिया गया. ये ठीक नहीं है. जरा सी बात का बतंगड़ बना देना फैशन ही बना दिया गया है. देखा-देखी व्यक्तिगत स्तर पर लोगों ने भी हाथ आजमाना शुरू कर दिया. जिसके मन जो आ रहा है, अभिव्यक्त किये जा रहा है. सवा अरब लोगो पर इक्के-दुक्के व्यक्ति का भला क्या असर ? वो भी जिनका इतिहास-भूगोल देखा हो. बहस ही करनी है तो समाज में दुनिया भर के सामाजिक मुद्दे भरे पड़े है. उस पर चर्चा होनी चाहिए. समस्या का निदान ढूँढना चाहिए. धन्यवाद.

के द्वारा:

आज मायजी की माला पर इतना हॉल हो रहा है जैसे बाकी सब सारीफ़ है. आज लोग मायजी की प्रसीधी से इतना दर गये है. जिसका कोई जवाब� नही. आज अगर मेरे पास इतना धन होता तो मे मायावतीजी का इतना भव्या मंदिर बनवाता जैसा आज तक किसी देवी या देवता का नही बना होगा. एक दिन ज़रूर बाँवौनगा. सब दलित बीरोधी मानसिकता के लोग मायावतीजी के खिलाफ हो गये है. सारा धन कार्यकरताऊ के द्वारा जुटाया गया. देश मा एटने लोग है अगर एक रुपया भी देंगे तो करोरो इकाता हो जाएगा. सारे देश के लोगो ने पैसा दिया है जो भी दलित बीरोधी नही है.� पुराने नेताओ ने इतना देश को लूटा है जिसका कोई हिसाब नही है. कभी उनसे भी पुंच्छो उनके पास इतना पैसा कान्हा से आया. मंदिरो मे इतना दान आता है कभी उसका भी टॅक्स ले लिया करो. मंदिरो मे अराबो की कमाई डेली होती है जिसका कोई हिसाब नही है. कभी वान्हा भी इंकों टॅक्स वेल जाके पता करने का कास्ट करे पैसा कानहासे आता है� और उसका क्या होता है. मेरा लेख मत काटीएगा संपादक महोदैजी. आपसे� बिनाम्रा अनुरोध है. हमारे देश मे लाखों मंदिर है जिनमे अरबों रुपये का चदवा डेली आता है. उस पैसे का क्या होता कान्हा जाता है वो पैसा और किसकी मेहनत का होता है. आज मायावतीजी को भेंट की गयी माला जो की डेस्क के लाखों करकर्ताओ के द्वारा भेंट की गयी है. उसपे इतना हे हल्ला क्यूँ हो रहा है. सारे बीरोधी दल मायजी की शक्ति से घबरा गये है. आज अगर मेरे पास इतना धन होता तो मई मायावतीजी का इतना भव्या मंदिर बनावता जैसा आज तक नही बना होगा. कभी ना कभी तो ज़रूर बनवावँगा. आप सकच्छत देवी का रूप लेकर आवत्वरित हुई है. आप भगवान से भी बदकार है. ग़रीब समाज को आप पर गर्व रहेगा.आज हम जगा जाहाः मंदिर का निर्माण कर रहे है और लाखों म्ण्दिर पहलेब से बने हुए है. जिन पर अराबो रुपया खर्च हुआ है और हो रहा है. क्या वा पैसा ग़रीबों का नही होता है क्या ज़रूरत है ह्यूम मंदिर बनाने की जो सिर्फ़ एक ज़रिया है पैसा कमाने का कुछ खास लोगो के लिए. और उसमे जो भी प्पैसा आता है वो भी लाखों अराबो रुपये उस पैसे का क्या होता है मंदिर बनाने के बजे हम स्कूल अस्पताल डिग्री कॉलेज और भी इंसानो के लिए ज़रूरी चीज़े क्यूँ नही बनाते है. हम जाती धर्म का बँधा क्यूँ नाहो तोड़ राहेब है कोई ठाकुर कोई प्पांडित क्यूँ है जबकि सब इंसान समान है . हम मानव और हमारा धर्म मानवता क्यूँ नही है. देश में एक धर्म ऐसा भी होना चाहिए जो किसी धर्म को न माने सिर मानव और मानवता ही सब कुछ होना चाहिए. अमिताभ का मंदिर बन सकता है तो मायावतीजी का क्यूँ नही मूर्तिया तो शृुख ख़ान सलमान सचिन और ना जाने किसकी लगी हुई है और सब जिविवत् व्ही तो मवावाती जी की क्यूँ नही लग सकती.आज कल हाथी चुनाव चिन्ह को लेकर लोग ज़हीत याचकाय दायर कर रहे है. साइकल और हाथ के खिलाफ क्यूँ नही कर रहे है हाथ लेखार सब गुम्ते है सबके हाथ ही काट जाने चाहिए सब साइकल चलते है उस पर बैन लगना चाहिए क्यूंकी वो सब चुनाव चिंग का ग़लत प्रचार कर रहे है मिसयूज़ कर रहे है.मंदिरो के बाहर और बड़े बड़े धार्मिक कामो मे हाथी को स्वागत के रूप में पेस किया जाता है. अंबेडकर स्मारक में भी हाथियों का प्रयोग स्वागत के रूप मई किया गया है जिसमे हाथियों की ज़्ड ओपर की ओर है जबकि चुनाव चिन्ह मे नीचे की ओर है इतने जल्दी सबको चुनाव चिन्ह सताने लगा है. हाथ और साइकल के चुनाव चिन्ह एकदम कॉपी है उनके ग़लत प्रचार प्र बैन लगना चाहिए. दोनो के चुनाव चिंग ज़ॅप्ट होने चाहिए.देस के लखो मंदिरो मे अरबो रुपये का चढ़वा डेली होता है. और वा कान्हा जाता है किसी को कुछ पता नही चलता. और उसके लिए कभी टॅक्स भी नही लिया जाता है. क्या मंदिरो की आय पर टॅक्स नही लगना चाहिए. ? सबसे बड़ी बात वान्हा पैसा चढ़ाया ही क्यूँ जाता है. और वा भी उन पठार की मूर्तियो पर जो की काल्पनिक है मायजी तो जीती जागती देवी है. जिन्होने ग़रीबो को नया जीवन दिया है. जो की अपने है देश मे उपेक्षित थे. देस के सारे मंदिरो को बदलकर स्कूल, अस्पताल, और लोगो के ज़रूरी स्थान बना देना चाहिए. मंदिरो की कोई ज़रूरत नही है. जो एक ज़रिया है पैसा कमाने का. ह्यूम अच्छे कर्म करने चाहिए जो की देश हिट मे हो. मायावती जी वा सब कर रही है जो देश के लिए ज़रूरी है. हम बीक्सित देश तभी बन पाएँगे जब देश का हर नागरिक समान होगा. और सभी सिक्षित होंगे. सब को बराबर का हक हो. कोई उँचू नीच ना हो. सब को बराबर का जीने का हक है.

के द्वारा:

के द्वारा: darshanbaweja darshanbaweja

के द्वारा:

के द्वारा:

महोदय ; यु कहे की पूर्तिया यह ३ यादवो ने समझ लिया है ; जो जन साधारण के समझ के परे है – मतलब साफ़ है – अगर चुनाव और चयन में सबल, मंत्री या स्वर्ण जाति की महिलाये अथवा पत्नियो के सामने कोई निर्बल और दलित या pichari जाति की महिला सामना करती है ; तो निष्कर्ष साफ़ है की कौन जीतेगा …. ना पैसो में यह सबल है न शिक्षा में और ना ही जागरूकता में ? तो सत्ता का सुख कौन भोगेगा ? ऐसे में महिला आरक्षण बिल से : न की सामंतवादी सोच को और बल मिलेगा बल्कि BACKWARD और दलित हो जायेगे , और सदीओ से दबे कुचले दलित सिस्टम के चलते उनका पूर्त्य दमन हो जायेगा ! अधिकांश उची या स्वर्ण जाति के लोगो की संख्या कांग्रेस , बीजेपी और सीपीएम में प्रचुर मात्रा में है …. जिन्होने इस बिल का विरोध नहीं किया ….. भाई साहब – मतलब साफ़ है ; अभी प्रधान पति हो रहे है … और कल को संसद पति होंगे …. बागडोर न बदलेगी और दलितों की और पिचड़ो की गुलामी यु हे चलती रहेगी … सच कहा था किसी ने अगर यह तबका ऑफिसर या नेता बन जायेगा तो सलाम कौन करेगा ! जय हो ?

के द्वारा:

महोदय ; यु कहे की पूर्तिया यह ३ यादवो ने समझ लिया है ; जो जन साधारण के समझ के परे है - मतलब साफ़ है - अगर चुनाव और चयन में सबल, मंत्री या स्वर्ण जाति की महिलाये अथवा पत्नियो के सामने कोई निर्बल और दलित या pichari जाति की महिला सामना करती है ; तो निष्कर्ष साफ़ है की कौन जीतेगा .... ना पैसो में यह सबल है न शिक्षा में और ना ही जागरूकता में ? तो सत्ता का सुख कौन भोगेगा ? ऐसे में महिला आरक्षण बिल से : न की सामंतवादी सोच को और बल मिलेगा बल्कि BACKWARD और दलित हो जायेगे , और सदीओ से दबे कुचले दलित सिस्टम के चलते उनका पूर्त्य दमन हो जायेगा ! अधिकांश उची या स्वर्ण जाति के लोगो की संख्या कांग्रेस , बीजेपी और सीपीएम में प्रचुर मात्रा में है .... जिन्होने इस बिल का विरोध नहीं किया ..... भाई साहब - मतलब साफ़ है ; अभी प्रधान पति हो रहे है ... और कल को संसद पति होंगे .... बागडोर न बदलेगी और दलितों की और पिचड़ो की गुलामी यु हे चलती रहेगी ... सच कहा था किसी ने अगर यह तबका ऑफिसर या नेता बन जायेगा तो सलाम कौन करेगा ! जय हो ?

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

२०० करोड की भीम नगरीऔर ५ करोड की माला, मायावती ने किया,आज प्रजातन्त्र का मुंह काला ! लगता है जनसेवक नही,उनके नाम पर अभिशाप है, दलितों की बातें करती है,पर राजाओं की भी बाप है! ३००० शौचालय लख्ननउ भीम नगरी में बनवाए गए, और दलितों को कितने ही,स्वप्न-सलोने दिखाए गए! दलितों को खेतों और सड्कों पर शौच करना पड्ता है, स्वास्थ से उनके खिलवाड -घूरा उनके द्वार पर सड्ता है! काश कोई उनकी समस्याओं को उनकी नज़र से देखता, हर दल दलित वोट बैंक हथिया उस पर रोटी नही सेकता! समस्याओं को छोड,हर कोई,अपनी-अपनी झोली भर रहा है, कहांसे आता है इतना पैसा?,बताने से भी हर कोई डर रहाहै! गरीब दो वक्त की रोटीके लिये ,क्या क्या जुगाड करता है, तब कहीं जाकर कहीं उसके परिवार और उसका पेट भरता है!

के द्वारा: bodhisatvakastooriya bodhisatvakastooriya

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

ज्ञानेंद्र त्रिपाठी जी, अभिवादन, आपने जो मुद्दा उठाया है, उसके लिए धन्यवाद. लेकिन जिस राज्य से आप ताल्लुक रखते है, उसी राज्य की शासिका करोडो, अरबो रूपये खर्च करके अपना और अपनी पार्टी का इतिहास बनाने में जुटी है. अब आप ही बताइए की विकास के लिए खर्च करने के लिए पैसे कहा से आयेंगे? इसीलिए इसी सरकार के एक विभाग ने विकास के लिए पैसे जुटाने के लिए ये फार्मूला अपनाया है. क्या इस देस में नेताओ और बड़े अधिकारियो द्वारा जनता के डकारे गए धन के बारे में इस देस की जनता नहीं जानती है? लेकिन उनसे वसूली करने की हिम्मत किसी के पास नहीं है. एक और बात, जिन गाँव की बिजली काटने की बात हो रही है, क्या वहा बिजली आपूर्ति की दसा किसी से छिपी है? सीधी सी बात है, इस देश में कल भी गरीब का सोसण होता था और आज भी यह बदस्तूर जारी है.

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:

के द्वारा:




latest from jagran