गोल से पहले

सोचिए, विचारिए, फिर अमल कीजिए

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Kaushal Shukla, Jagran


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नीतीश ने झूठ क्यों बोला

Posted On: 29 Oct, 2013  
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Others Politics social issues पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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बड़ी साजिश

Posted On: 28 Oct, 2013  
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Politics पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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जिंदगी के इस कलाम को कीजिए सलाम

Posted On: 27 Oct, 2013  
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ना-ना, ना-ना…!

Posted On: 24 Mar, 2013  
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Others मस्ती मालगाड़ी में

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जीत को ठानने का संदेश है हादसा

Posted On: 9 Jan, 2013  
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एक राज लौटते हुए

Posted On: 23 Nov, 2012  
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जंग जारी रखने का एलान है हादसा

Posted On: 4 Nov, 2012  
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संभलिए, जिंदगी का हर पल है हादसा

Posted On: 6 Jul, 2012  
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तू है तो दुनिया, तू जो नहीं तो कुछ भी नहीं

Posted On: 6 Dec, 2010  
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जिंदगी झकझोड़े तो समझिए गुड सिग्नल

Posted On: 4 Dec, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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के द्वारा: Kaushal Shukla, Jagran Kaushal Shukla, Jagran

के द्वारा: mahipalsingh mahipalsingh

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय के बाद अब यह लगभग पक्का दिखता है कि अयोध्या मामले में कानूनी प्रक्रिया एक और महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही पिछले हफ्ते के स्थगन आदेश को खत्म कर इलाहाबाद हाईकोर्ट को अपना फैसला सुनाने की आजादी दे दी है। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच 30 सितंबर को फैसला सुनाएगी। अब पुन: सारे देश की निगाहें तीन सदस्यीय बेंच के फैसले की ओर लगना स्वाभाविक है। जब 24 सितंबर को फैसला आने वाला था तब जो तनावपूर्ण हालात देश में बने थे उससे लग रहा था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ ऐसा होगा कि विवादास्पद और धार्मिक रूप से संवेदनशील यह मामला लंबे समय तक टाला जाएगा। लेकिन मंगलवार को देश के मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाड़िया की अध्यक्षता वाली बेंच ने अपीलकर्ता की सारी दलीलें ठुकराकर शायद अच्छा संदेश ही दिया है। मामला 60 वर्षो से न्यायालय में विचाराधीन है। अलग-अलग तर्क-वितर्क के बीच मामला खिंचता ही जा रहा है। अब जब फैसला सुनाया जाएगा, उसके बाद दोनों पार्टियों का रवैया क्या रहेगा, यह कहना मुश्किल है। अमूमन हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। इस फैसले में भी यह संभावना है कि फैसला जिस पार्टी के खिलाफ जाएगा, वह न्याय मांगने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाएगी। जब सुप्रीम कोर्ट ने 24 सितंबर के फैसले को स्थगित कर दिया था तब लग रहा था कि राष्ट्रमंडल खेलों को देखते हुए, देश की सुरक्षा के मद्देनजर शायद यह निर्णय लिया गया है। पिछले सप्ताह देश का वातावरण काफी तनावपूर्ण लग रहा था, परंतु समाज के विभिन्न वर्गो, राजनीतिक दलों और सरकार तथा मीडिया द्वारा लोगों से शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील से अब तनाव में कुछ कमी सी लग रही है। फैसले की घड़ी फिर सामने है। भारत में विभिन्न धर्मावलंबियों में अक्सर भाईचारा और सामंजस्य रहा है। अयोध्या का 1992 का विवाद या गोधरा और बाद में हुए गुजरात के दंगों को छोड़ दें तो आंतरिक रूप से देश में एकता के अच्छे उदाहरण (और इतिहास) मौजूद हैं। फैसला जो भी आए, एक बार यह अनिश्चय की स्थिति समाप्त होनी आवश्यक है। साथ ही जरूरी है कि देश की शांति व्यवस्था किसी हालत में भंग न होने दी जाए। इसमें सरकार से अधिक नागरिकों की जवाबदार भूमिका का महत्व है।

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रचना जी, पहले तो आपको बधाई दे लूं कि मैं जिस टिप्पणी का इंतजार कर रहा था, उसे आपने और सिर्फ आपने दी है। संभवतः कविता के नीचे का खास नोट आपने पढ़ा हो, जिसमें मैंने लिखा ही था कि आपकी कोई भी टिप्पणी – सकारात्मक या नकारात्मक – शिरोधार्य होगी। दरअसल, दुष्यंत साहब की कविता से मेरी कविता की तुलना की बात है ही नहीं। मेरी पंक्तियां दुष्यंत साहब की पंक्तियों से प्रेरणा पाकर उपजीं थीं, जो मेरे ख्यालों-ख्वाबों में बार-बार आ रही थीं और उन दो-चार पंक्तियों का सृजन कर रही थीं, जिन्हें आपने पढ़ा और टिप्पणी की। दुष्यंत साहब की पंक्तियां उदात्त हौसलों को परवान चढ़ाने वाली है तो ये पंक्तियां आम जनमानस के सरोकारों और घरेलू झंझावात से जूझ रही है। मेरा सवाल आपसे है रचना जी कि क्या मेरी पंक्तियां संयुक्त परिवार के टूटते तिलिस्म, सिर्फ पत्नी-बच्चे के बीच गढ़े जा रहे फलसफे, बिखरते संस्कार, गायब होती संस्कृति के बीच क्या सिर्फ वही अर्थ रखती हैं, जो आपने समझा है? मेरा आग्रह होगा कि आप इन पंक्तियों को दोबारा पढ़े और सोचें कि क्या यह आज का आम हालात नहीं है।

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कौशल जी अभिवादन, इस बार काफी दिनों बाद लेख आया लेकिन किसी विषय के उपसंहार की तरह ही जिंदगी के उपसंहार वाला लेख. "उफ, मरता आदमी! जिंदा आदमी क्या करता है? सोचिएगा तो शर्म आ जाएगी। जो जिंदा आदमी को करना चाहिए, वह मरता आदमी करता है तो यह शर्म की ही बात है। लेकिन, मैं कहता हूं, जिंदा आदमी यही कर सकता है। क्यों? क्योंकि वह काउंटअप करता है। वह आगे की गिनती गिनता है, जिसका कोई अंत नहीं है। अंतहीन सिलसिले में फंसा आदमी दुख को ही प्राप्त हो सकता है, भय को ही प्राप्त हो सकता है। दुख और भय से निपटारा पाना हो तो करना होगा जिंदगी का काउंटडाउन। एक बार काउंटडाउन का मिजाज बना तो समझिए मिला उपाय, संवरा भविष्य, संभला व्यक्तित्व।" आपके लेख के इस उपसंहार को पढ़ने के बाद कोई और टिप्पणी नहीं सूझ रही है. धन्यवाद.

के द्वारा: siddequi siddequi

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के द्वारा: prashantkumar prashantkumar

के द्वारा: Kaushal Shukla, Jagran Kaushal Shukla, Jagran

आपने बहुत हद तक ठीक सोचा है। आदमी को कभी न कभी तो फैसले पर पहुंचना ही होता है। और खुद के लिए फैसले तो सुकून भी पहुंचाते हैं। हां, देखने की बात होती है कि फैसला सकारात्मक है या नकारात्मक? कोई भी संस्थान बदलने के लिए तीन चीजें देखी जाती हैं। पद, पैसा और संस्थान। इनमें से कोई भी दो चीज आपको दिख रही हो, हासिल हो रही हो तो फैसला किया जा सकता है। यह ख्याल रखना चाहिए कि जिंदगी कहीं रुकती नहीं है। हम रोक लें तो और बात है। साथी के लिए मौके खत्म नहीं होने वाले। जीवन में मौके मिलते ही रहते हैं। खासकर जो मौकों की तलाश में ही रहने वाला है, उसे क्या दिक्कत हो सकती है?  परिवर्तन प्रकृति का नियम है, इसे सहजता से स्वीकार करना चाहिए।

के द्वारा: Kaushal Shukla, Jagran Kaushal Shukla, Jagran

शुक्ला जी अभिवादन, मैंने 'हीन भावना ....' की तीसरी कड़ी में आपके लिए ऐसे ही उन शब्दों का प्रयोग नहीं किया था. लेखन में व्यक्तिव की झलक साफ़ मिलती है. आज १०० में से ९६ लोग औचारिकता के लिए हाल पूछते है. लेकिन आपने भी हाल पूछा और एक का सच में भला कर दिया. परिस्थितिवश व्यक्ति अपना दुखड़ा जाने-अनजाने रो ही देता है लेकिन सामने वाला क्या समझे और क्या नहीं, ये उस व्यक्ति के व्यक्तित्व पर निर्भर करता है. मैंने भी एक बार अपना एक दुखड़ा रोया था. जानते है मुझे क्या जवाब मिला था- "देखिये तुफैल जी ये आपका निजी मामला है, हमको इससे कुछ लेना-देना नहीं है." दुखड़ा रोया था परिस्थितिवश. कोई आश नहीं थी की वे मेरी मदद ही करे लेकिन सहानुभूति के चंद शब्द की अपेक्षा अवश्य थी. निश्चित ही उन्होंने मेरे पचड़े से स्वयं को दूर रखने के लिए ही ऐसा उत्तर दिया होगा. क्योंकि मैंने तो अपना पक्ष ही रखा था, हो सकता है दूसरा पक्ष मुझसे भी ज्यादा सच्चा हो. ऐसे में पचड़े से बचना ही अच्छा. लेकिन बचे हुए ४ फ़ीसदी लोग आप जैसा ही सोचते है. धन्यवाद.

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शुक्ला जी आपका लेख पढकर मुझे अपने साथ घटी एक घटना याद आ गई। घटना 1998 की है जब मै वनारस मे रहती थी। मेरे उपर अपने व्यथक्तित्व से इतर जाकर कार्य करने का दवाव पड रहा था जिस कारण मै अवशादग्रस्त थी। मेरे एक परिचित जो बनारस मे तैनात थे उन्होने मुझे परेशान देख परेशानी पूछा मैने उनसे सारी बात बताई। उन्होने एक कहानी सुनाई जो मुझे अपने रास्ते पर चलने के लिये प्रेरणा और दृढता प्रदान की । उन्हो्ने बताया कि जब अमिताभ बच्चन फिल्मी दुनिया मे आये तो लोगों ने उनकी लम्बाई को लेकर उनकी हंसी उडाई। लेकिन वे उससे विचलित नही हुए और अपनी ही स्टाईल मे काम करते रहे। परिणाम स्वरूप उनकी एक स्टाईल बन गई। इसी प्रकार जितने भी अभिनेताओं ने अपनी स्वयं की स्टाईल विकसित की वह उनकी स्टाईल हो गई लेकिन जिन लोगों ने उनकी नकल की वे डुप्लीकेट बन कर रह गये। उन्हों ॉने कहा कि व्यक्ति को अपनी मौलिकता नही खोनी चाहिए। हर व्यंक्ति अपने मे अद्वितीय है जिसकी तुलना दूसरे से नही की जानी चाहिए। आज मैने चाचा जी की सीख पर चलकर जो प्रतिमान कायम किये है कई लोग उसका अनुकरण कर रहे है। मुझे भरोसा है आपका लेख कई लोगों का मार्ग दर्शन करेगा। अगले पोस्टप की प्रतीक्षा रहेगी।

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कौशल जी अभिवादन, तीसरी सीरिज में मेरी प्रतिक्रिया पर आप रोमांचित थे. प्रश्न था की- "क्या हीन भावना से उबारने वाले लेख वास्तव में किसी को रास्ता दिखा रहे है?" क्या अब भी आप वही प्रश्न करेंगे ? आपकी पांचों सीरिज तमाम मन्त्रों की गाथा है. सहेज कर अमल में लेन के लिए साथ रखने वाली है. जैसे ही भटके, तुरंत निकाला, पढ़ा और फिर अमल शुरू. पूरी सीरिज में आपने व्यक्ति को परिवार से लेकर समाज में स्थान बनाने और उन्नति करने के तमाम फार्मूलें बता दिए. अब पढने वाला अमल ही न करे तो आपके लेखों का क्या कुसूर ? आज किसके पास समय है दूसरे का भला करने का ? "अच्छा है की फलाने को इस बात का पता ही नहीं, वर्ना वह भी हाशिल कर लेता." क्या हम में से ज्यादातर लोग यही नहीं सोचतें है ? ब्लोग्गर्स की तादाद तेजी से बढ़ रही है, सभी स्टार बनने की दौड़ में है, सोसाइटी का तो सब भला करना चाहते है लेकिन व्यक्ति विशेष का भला कितने कर रहे है ? व्यक्ति से समाज है, अतः पहले इसका विकास होना चाहिए. समाज अपने आप अच्छा होगा. ऐसे में यदि व्यक्ति विकास पर पूरी सृंखला आप लिख रहे है तो साधुवाद के पात्र ही है. भला मै कौन होता हूँ तारीफ करने वाला. धन्यवाद.

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श्री शुक्ला जी, जैसे-जैसे आप आगे बढ़ रहे हैं, आपके विचारों का प्रवाह संतुलित और असरदार होता जा रहा है। आपके आलेख की पांचवी कड़ी भी कम जानदार नहीं है। ...हारने का मतलब होता है, जीत की तैयारी... यह कोई साधारण वाक्य नहीं, बल्कि मंत्र है। हताशा को जुगत में बदलने का मंत्र। आप लिखते रहें। हमारे जैसे हजारों लोग पढ़ रहे होंगे। और हां, एक बात मैं और स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि मैं केवल आलोचना ही नहीं करता। जो अच्छा लगता है, उसकी तारीफ भी उसी शिद्दत से करता हूं। यह अलग बात है कि झूठ-मूठ की तारीफ से मुझे नफरत है। ऐसी तारीफ दूसरे को तो भुलावा में रखती ही है, यह एक तरह की आत्मप्रवंचना भी है। इसलिए आपसे आग्रह है कि मैं बेबाक हूं, बेबाक ही रहने दीजिए। आप जैसे मित्र मेरी अभिव्यक्ति को अगर आलोचना जैसे शब्दों से अलंकृत करेंगे तो शायद मैं, मैं न रहूं। फिर ऐसे मित्रों का होने का क्या मतलब, जो अपनों का अस्तित्व (मूल प्रकृति) मिटाना चाह रहा हो। बहरहाल, आपका लिखा पढ़ता रहूंगा, अच्छा या बुरा कमेंट भी करता रहूं, इसके लिए आपसे आग्रह है कि मुझमें किसी तरह का परिवर्तन न तलाशें।

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आदरणीय वत्स जी, आपने एक बढ़िया सवाल उठाया है। अपनी जीवन यात्रा में कुछ इन्हीं सवालों से घिरने के बाद मैंने कुछ सूत्रों पर सोचना शुरू किया। कुल जमा अनुभव नतीजे के रूप में व्यक्तित्व विकास पर लिखे जाने वाले इस ब्लाग पर एक-एक कर दिए जा रहे हैं। यदि उन सभी का आप गंभीरता से अवलोकन-अध्ययन करते रहे तो निश्चित रूप से बेहतरीन जवाब आपके सामने होगा। इस सवाल के सीधे जवाब से पहले के कई पर्दों को हम हटा लें, फिर इसका पर्दा भी हटेगा। निश्चित रूप से जब किसी पोस्ट की हेडिंग के रूप में आप यह पढ़ेगे कि सामने वाला पगला, चमचागीरी न कीजिए और मेरा विकल्प तू तो तेरा विकल्प कौन, तो न केवल आप चौंक उठेंगे, बल्कि जवाब मिलने की खुशी में झूम भी उठेंगे। क्या आप एक सिलसिले के तहत इस लेख की बारी आने तक इंतजार नहीं कर सकते हैं? मैं चाहूंगा कि गंतव्य तक तो हम पहुंचें, मगर यात्रा का भी मजा लें।

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समाधान जाते हुए आपने और आपके साथी ने पहली नौकरी क्यों छोड़ी समझ नहीं सका ! मैंने भी इन्हीं वजहों का हवाला देकर कभी नौकरी छोड़ी थी। इलेक्ट्रानिक मीडिया में अच्छी स्थिति में गया। मेरा त्याग पत्र देखकर मेरे वरिष्ट ने कारण पूछा तो मैंने कुछ ऐसी ही वजहें बताईं जिनका आपने उल्लेख किया है। उनका जवाब जो उस वक्त मुझे सच नहीं लग रहा था इस समस्या का निदान है। उन्होंने कहा था - आलोक दुनिया के किसी भी संस्थान में काम करोगे तुम्हे ऐसे लोग मिलेंगे। पात्रों के नाम बदले होंगे, भीतर वही शैतान। हमें अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करना चाहिए। हमारे परिश्रम को कोई ज्यादा देर तक झुठला नहीं सकता। देर लग सकती है, अन्धेर नहीं होगा। आज अनुभव करने के बाद सोचता हूं उन्होंने कितना सच कहा था। -आलोक त्रिपाठी (09044585380 & 09453408284)

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जन्म से लेकर संभावनाओं पर नजर टिक जाती है। पहले मां संभावनाएं तलाशती हैं, मां परखती है, जांचती है, गौर से निहारती है। बेटा है तो बड़ा बनने की संभावनाएं तलाशती है। बेटी है तो सुलक्षणी बनने की संभावनाएं तलाशती है। अपने अलहदा मंसूबों के साथ बाप भी संभावनाओं की तलाश में जुट जाता है। दादा-दादी, नाना-नानी, मौसा-मौसी, चाचा-चाची, ताया-तायी सभी की अलग-्लग आकांक्षाएं होती हैं और उसी के आयने में संभावनाओं की तलाश की जाती है। हम अपने अंदर की संभावनाओं को जब तक खोज-परख रहे होते हैं, एक निर्घारित रास्ते पर निकल चुके होते हैं। बावजूद इसके संभावनाओं के अनुरूप जिंदगी के सफर पर चलने की गुंजाइश बनी रहती है। आपके विचार पढ़ने के बाद जिंदगी के इस फलसफे पर एकबार फिर चिंतन करने की जरूरत महसूस हो रही है।

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