YOUNG INDIAN WARRIORS

युवा भारत की दमदार आवाज : के.कुमार 'अभिषेक'

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K.Kumar 'Abhishek'


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क्या ‘मोदी भक्ति’ ही ‘देशभक्ति’ का पैमाना है?

Posted On: 17 Aug, 2017  
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Politics में

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एक अनुसंधान : ईश्वर क्या हैं?

Posted On: 12 Aug, 2017  
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Religious में

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आपका ‘धर्म’ क्या है?

Posted On: 18 Jul, 2017  
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मोदी नहीं तो कौन?

Posted On: 15 Jul, 2017  
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Politics में

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हाँ, मैं भ्रष्ट हूँ !

Posted On: 11 Feb, 2016  
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“बापू, हमें माफ़ कर दो …भटक गए तेरी राहों से”

Posted On: 31 Oct, 2015  
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जातिवाद बनाम राष्ट्रवाद

Posted On: 20 Sep, 2015  
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लोकतंत्र के मंदिर में अलोकतांत्रिक पुजारी

Posted On: 24 Jul, 2015  
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‘विकास’ की कसौटी

Posted On: 7 Jul, 2015  
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”मैं युवा हूँ”

Posted On: 19 Apr, 2015  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

बात तो आपकी शत प्रतिशत जायज है. इस पर बहस होती रही है, पर नतीजा अभीतक हासिल नहीं हुआ. दूसरी तरफ जाति को पूर्णत: समाप्त करने की भी तो बात नहीं हो रही न! जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रीयता गंभीर समस्या बनती जा रही है . बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों को इस पर विचार करनी चाहिए पर राजनीतिज्ञ तो जहाँ अपना फायदा देखते हैं, वहीं अपनी रोटी सेंकने लगते हैं. नहीं तो क्या जरूरत थी प्रधान मंत्री को अपनी जाति OBC बताने की, अमित शाह को यह कहने की कि भाजपा ने सबसे अधिक OBC मुख्य मंत्री और प्रधान मंत्री दिए हैं. अभी बिहार में टिकट देते वक्त हर क्षेत्र में जातियों के हिशाब से ही टिकट दिए जा रहे हैं, चाहे वह किसी भी पार्टी में हो. अत: इस पर बात तभी तक उचित जान पड़ती है जब तक अपना हित साधित होता रहे. सबके लिए योग्यता के अनुसार उचित और सामान अवसर देने की बात ही क्यों न की जाय? पिछड़े और दलित लोगों को अधिक से अधिक सुविधा देना अलग बात है पर उसे सुविधाभोगी बनाना गलत बात है. बाकी आप सब समझते हैं.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

यह भारतीय जनतंत्र के लिए संक्रमण काल है जहां दस वर्ष पहलेसत्ता का सत्तू चाट कर अपने को कर्मयोगी कहने वाली पार्टी फिर दस वर्ष बाद सत्ता में लौटी है । इसलिए नरेंद्र मोदी थ्योरी जो गुजरात में विकसित हुई है की एक बार सत्ता पा जाओ तो उससे चिपक जाओ येनकेन प्राक्ररेर्ण सत्ता बनाये रखो ? और गलती भारत रत्न श्री बाजपाई ने की थी की 6 माह पहले चुनाव कराये थे और उस समय के गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी को राज धर्म निभाने की हिमाकत की थी ? इसलिए आज देश में लोक तंत्र तो है जिसका धर्म केवल जनता जानती है और पांच वर्ष में जब उसे अवसर मिलता है उसका उपयोग भी कायदे से करती है ? इस लिए टुच्चे राजनेताओं से लोकतंत्र के आदर्शों की अपेक्षा करना शायद उचित नहीं होगा ।। ,spdingh

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

इसके लिए हमें एक ऐसी वैचारिक संरचना तैयार करनी होगी ..जिससे हमारी आने वाली पीढी आर्थिक विकास के साथ-साथ शैक्षणिक, मानसिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, और व्यवहारिक विकास का महत्वा भी समझ पाये…और इसे अपने जीवन में उतार सके | तभी हम सही अर्थों में सर्वांगीण विकास का लक्ष्य प्राप्त कर, राष्ट्र और समाज को एक स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित कर पाएंगे | कहते हैं जब तक परिवर्तन का प्रयास हर स्तर से न हो, यह सिर्फ एक शब्द बन के रह जायेगा | आज जरुरत है की हम सभी ‘विकास’ की सही अर्थ समझें…और समझाएं | विशेषकर हमारे समाज के बुद्धिजीवी, लेखक-विचारक,पत्रकार, समाजसेवी..जो अब तक विकास की घिसी-पिटी परिभाषा का समर्थन करते रहे हैं….आगे आएं और समाज को सही दिशा दिखायें | साथ ही हमारे माननीय नेतागण अगर संभव हो तो …अपनी राजनैतिक रोटी सेंकने के प्रयास में …अफवाहों की आंच न लगाएं तो समाज पर बड़ी मेहरबानी होगी | हम सभी को मिलकर हर हाल में यह तय करना होगा की…..हम एक राष्ट्र और समाज के रूप में विकास की ऐसी रफ़्तार पकड़ें, जो सभी मानकों के अनुरूप हों और जब हम अपने मंजिल पर पहुंचे ..हमारी मर्यादा, हमारे मूल्य, हमारी सभ्यता और संस्कृति जमापूंजी के रूप में हमारे साथ हो | हम सब मिलकर विकास का ऐसा स्वप्न संजोएं…जहाँ लोगों के पास शिष्टता भी होगी, ज्ञान-विज्ञानं भी होगा, स्वास्थ्य भी होगा, सभ्यता और संस्कृति के साथ-साथ ढेर सारा पैसा भी हो | bahut hee sundar! bahut bahut badhai

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आज हमारे भारतीय समाज में शिक्षा का उदेश्य ‘ज्ञानोपार्जन’ नहीं, अपितु ‘धनोपार्जन’ हो गया है! आज छात्र, अभिभावक, और गुरु …तीनो के लिए शिक्षा का औचित्य सिर्फ और सिर्फ प्रमाणपत्रों कि प्राप्ति रह गया है, जिससे नौकरी या, व्यवसाय के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाया जा सके! कड़वी परन्तु वास्तविक सचाई है कि, आज हमारे जीवन में पाठ्य पुस्तकों कि सिखाई गयी बातों का कोई महत्वा नहीं है! एक इंसान के रूप में हमारे कर्तव्यों और सामर्थ्यवान जीवन के सिद्धांतों कि जो सिख हमारी पुस्तकों में मिलती है, आज छात्रों के लिए सिर्फ और सिर्फ परीक्षा कि वस्तु मात्र है! आज छात्र सिर्फ पाठ्य पुस्तकों को रट्टा मार रहे है, जिससे वे परीक्षा में पूछे गए सवालों का सही जवाब देकर अच्छे अंक प्राप्त कर सकें.! एक बार परीक्षा समाप्त हुई …पुस्तकों कि पढ़ी गयी बातों को हम अपनी सोच के दायरे से बाहर निकल फेंकते है ..!बहुत सटीक और प्रभावी लेखन मित्रवर अभिषेक जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

.अभिषेक जी गीता मैं भगवान क्रष्ण ने अध्यात्म ज्ञान को ही ज्ञान कहा है वाकी सब अज्ञान । नैतिक शिक्षा के पक्षधर नैतिक शिक्षा को ही ज्ञान कहते हैं । नैतिक शिक्षा संस्कारों से भी मिलती है । संस्कार पुर्व जन्म से भी होते हैं । जीवन एक कला है कैसे उत्तम जीवन जी सकले हैं यह चतुर लोग ही जानते हैं । उनके लिए डिग्रीयां हासिल कर लेना भी एक कला ही है । नौकरी या व्यवसाय ,राजनीति भी एक कला ही है । शिक्षा की परिभाषा अपने क्षेत्र मैं प्रवीण होना ही है । यदि आप अपने क्षेत्र मैं प्रवीण हो चुके हैं तो आप उस क्षेत्र के शिक्षित हैं । जैसे हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्रमोदी जी । ओम शांति शांति ......................................

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

अभिषेक जी गीता मैं भगवान क्रष्ण ने अध्यात्म ज्ञान को ही ज्ञान कहा है वाकी सब अज्ञान । नैतिक शिक्षा के पक्षधर नैतिक शिक्षा को ही ज्ञान कहते हैं । नैतिक शिक्षा संस्कारों से भी मिलती है । संस्कार पुर्व जन्म से भी होते हैं । जीवन एक कला है कैसे उत्तम जीवन जी सकले हैं यह चतुर लोग ही जानते हैं । उनके लिए डिग्रीयां हासिल कर लेना भी एक कला ही है । नौकरी या व्यवसाय ,राजनीति भी एक कला ही है । शिक्षा की परिभाषा अपने क्षेत्र मैं प्रवीण होना ही है । यदि आप अपने क्षेत्र मैं प्रवीण हो चुके हैं तो आप उस क्षेत्र के शिक्षित हैं । जैसे हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्रमोदी जी । ओम शांति शांति शांति 

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

के द्वारा: PAPI HARISHCHANDRA PAPI HARISHCHANDRA

आज जब अमेरिकी राष्ट्रपति भारत दौरे पर है..निश्चय ही पडोसी देश की नजरें ..रिश्तें की गर्माहट को देख बार-बार बेचैन होंगी ! नवाज साहब की नींदें हराम हो जाएँगी..लेकिन देखना महत्पूर्ण होगा की इस दौरे में भारत-अमेरिकी की बढ़ती नजदीकियों से पाकिस्तान की हरकतें कितनी सुधरती है? क्या पाकिस्तान समय की चाल को समझ पायेगा ? सीमापार से लगातर आ रहीं गोलीबारी की खबरें ..क्या बदलेंगी? उम्मीद तो की जानी चाहिए अभिषेक जी नहीं तो ओबामा के साथ इतनी गर्मजोशी का फायदा क्या होगा... उम्मीद पर दुनिया कायम है वैसे पाकिस्तान को चेतावनी अमेरिका की तरफ से भी दी जाने लगी है...कही न कहीं भारत का पक्ष मजबूत दीख रहा है...

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: K.Kumar 'Abhishek' K.Kumar 'Abhishek'

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा:

जे.एल सिंह जी, बड़े भैया ....सादर नमस्कार! बधाई मुझे नहीं आपको मिलनी चाहिए...इस आलेख के लिए! ...........आपको जानकर आश्चर्य होगा कि, इस आलेख के निर्देशक तो आप ही हैं! आपने एक दिन फेसबुक पर एक आलेख प्रकाशित किया था, वह आलेख लेखकों के एक बड़े मंच से लिया गया था.....मैंने भी सोचा कि बड़े अनुभवी साहित्यकार हैं यहाँ...इनकी सोहबत में मेरी धार भी निखार जाएगी! मैंने उस मंच पर अपना प्रोफाइल बना लिया, लेकिन कुछ ही दिनों में जो मुझे महसूस हुआ....उसका वर्णन इस आलेख में हैं! वहां ऐसा लगा जैसे लोगों ने अपनी एक अलग ही दुनिया बसा ली हैं...बाहरी दुनिया से कोई तालुक्कात ही नहीं थे! वास्तव में साहित्य समाज का नैतिक मार्गदर्शन करता हैं, आज समाज के जो हालत हैं...उसके लिए साहित्य का उद्देश्यहीन होना भी एक बड़ा कारन हैं!

के द्वारा: KKumar Abhishek KKumar Abhishek

आदरणीय रविन्द्र कुमार जी, सादर नमन ! बड़े भैया...ये आलेख पिछले कुछ दिनों हुए एक अनुभव पर आधारित है! मैं एक ऐसे समूह के बीच फंस गया था, जहाँ सामाजिक सरोकार से जुडी रचनाओं के लिए कोई जगह नहीं बन पा रही थी, बड़े-बड़े नाम अपनी मनोरंजक रचनाओं के आदान-प्रदान में व्यस्त थे! मेरे आलेख पर कुछ लोग "प्रसंशा" कर भी रहे थे...तो उसका कारन ये था की मैं भी उनकी रचनाओ पर टिप्पड़ी कर सकूँ! मुझे लगा मैं किसी जेल में कैद हो गया हौं...जहाँ कुछ कैदी रहते हैं.....उन्हें बहरी दुनिया से मतलब ही नहीं....क्योकि उनकी अपनी एक दुनिया बदल गई है! उस समय मेरे मस्तिष्क में जो सवाल उपजे...उसके जवाबों की तरफ ध्यान दिलाने का प्रयास मैने अपने आलेख में किया है! .....जब तक साहित्य के जनता की भावनाओं को नहीं छुएगा....जब तक हमारी रचनाएँ जनता के लिए नहीं होंगी....साहित्य का उदेश्य पूरा नहीं हो सकता हैं! ....बड़े भैया, एक बार पुनः मेरे आलेख को नए नजरिये से पढ़े...निश्चय ही मेरे सवाल ....आपको एक गंभीर मंथन को उत्सुक करेंगे! ...धन्यवाद...!!

के द्वारा: KKumar Abhishek KKumar Abhishek

के द्वारा: jlsingh jlsingh

१९९१ में जब वे पी वी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में वित्त मंत्री बनाया गया था ... वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ ने उनसे साल किया था - डॉ. मनमोहन सिंह को राजनीति आती है?..उनका सरल जवाब था - सीख रहा हूँ... पर उन्होंने अपने ईमानदारी और सत्यनिष्टः का चोला नहीं उतारा.. हाँ कभी कभी कड़े फैसले लेने से नहीं चूके ...बेचारे करते भी क्या कभी लोक सभा का चुनाव लड़ा नहीं ..सोनिया के कृपा पात्र बने रहे . हाँ उन्होंने अपने अंतिम प्रेस कांफ्रेंस में कहा था - इतिहास उन्हें याद करेगा ...आप भी वही कह रहे हैं...इतिहास ऐसे व्यक्ति को याद जरूर रक्खेगा ...पर क्या फायदा? लोग ऐसे लोगों से सीख तो लेते नहीं...पाठ्य पुस्तक की चीज बनकर रह जाते हैं.... बहुत अच्छी विवेचन लिखते हैं आप लिखते रहें...सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट




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