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Awaaz

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Rahul Ranjan


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ईद मुबारक..:)

Posted On: 7 Jul, 2016  
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Religious Special Days मस्ती मालगाड़ी में

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होली की हार्दिक शुभकामनायें..

Posted On: 23 Mar, 2016  
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में

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नसीहत के साथ बधाई…

Posted On: 10 Nov, 2015  
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Hindi News Junction Forum Politics में

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असहिष्णुता

Posted On: 9 Nov, 2015  
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राजनीतिक तंत्र-मंत्र

Posted On: 26 Oct, 2015  
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राजनैतिक दृष्टिपत्र

Posted On: 5 Oct, 2015  
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भाषा-आधारित आरक्षण

Posted On: 16 Sep, 2015  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

जय श्री राम देश में असिहिसुनता को कोइ माहोल है एक दादरी की घटना पर हल्ला मचने के पीछे चर्च और कांग्रेस का हाथ है जब से सोनिया की सत्ता चली गयी चर्च बहुत दुखी क्योंकि उनका धर्मान्तरण रुख गया एक घटना को २१ दिन तक दिखाना यही दर्शाता की मोदीजी को हटाने की साजिस है कांग्रेस नेता ईयर और सलमान खुर्शीद पकिस्तान जा कर कहते की मोदीजी को आप हटाये बातचीत शुरू होगी पूरा मीडिया चुप कर्नाटक में ३ हिन्दू मारे गए कोइ नहीं बोला मुसलमान तो दामादो की तरह रहते जो लोग आज पदक लौटा रहे वे कांग्रेस और वाम डालो के कहने से कर रहे देश में इतने दंन्गे हुए सिख मरे गए, कश्मीर से हिन्दू निकले गए तब इनकी अंतरात्मा कहाँ चली गयी लन्दन का शो कांग्रेस ने करवाया था वैसे दादरी का मामला उत्तर प्रदेश का कानून का मामला था गृह मंत्री बोल चुके प्रधान मंत्री को हर बात में नई बोलना चैये वे बोल भी चूले परन्तु इस देश के कुछ सेक्युलर लोगो और बुध्जीवियो के कान बंद हो गए इसमें प्रधान मंत्री की कोइ गलती नहीं.जिस देश में लालू ऐसा लुटेरा अपराधी हीरो बन जाए उसका भगवान् मालिक है

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आज के दौर में राजनितिक गठबंधन का मतलब लिव इन रिलेशनशिप जैसा है जिसमे दिनचर्या पति पत्नी जैसा होता है परन्तु कानून अभी भी पेशो पेश में है की इस रिलेशनशिप को पति पत्नी माने या नहीं? केंद्र और राज्य की राजनीती की संगीत की धुन सदैब अलग अलग होती है और अगर इसमें मनभेद हो जाए तो राजनितिक केन्द्रविंदु उतनी प्रभावित नहीं होती लेकिन अगर मतभेद हो जाए तो दूरियां बनाने से अच्छा कोई मार्ग नहीं हो सकता। हर राज्य की अलग अलग समस्याएं होती है और इसी आधार पर राजनीती की दिशा और दशा भी तय होनी चाहिए। और अगर आपमें आत्मविश्वास है की जनता आपके साथ है तो इतनी संवाद की क्या आवश्यकता है? चुनाव का इंतज़ार करें…जनता आपकी ओर से संवाद करेगी। मल्टी टियर डेमोक्रेटिक सिस्टम में प्रयेक सिस्टम की जिम्मेदारी की अनुसार से ही जनता को मतदान करनी चाहिए मतलब राज्य के लिए राज्य के अनुसार और केंद्र के लिए केंद्र के अनुसार और तभी आप इस व्यवस्था से कुछ उम्मीद भी कर सकते है और दूसरी तरफ एक मतदाता प्रजातान्त्रिक व्यवस्था का छुपा रुस्तम मालिक होता है और आपके मतदान के नजरिये में परिवर्तन से ही केंद्र,राज्य और फिर गठबंधन जैसे राजनितिक फोर्मुले को अपनी जिम्मेदारी का एहसास होगा। नहीं तो आप यही सोचते रहेंगे की हैंगओवर हुआ किस वजह से? शुरू के पैराग्राफ से ही आपका लेखन आकर्षित करता है ! बहुत सटीक ! मित्रवर राहुल रंजन जी

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के द्वारा: aman kumar aman kumar

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ऐसी स्थिति में बिहार के लिए केंद्र को विशेष क्यों नहीं सोचना चाहिए? एक जमाने में सत्ता बिहार से चलती थी। जी हाँ चाणक्य तो स्मृति में होंगे ही! वैसे दोस्तों दुनिया भर में जहाँ भी लोकतंत्र है,सभी राजनीतिज्ञ जानते है की लोकतंत्र में आम जनता बड़ी नोट है और इसके खुल्ले कैसे करवाने है। चाहे वो खुल्ला चुनावी घोषणा पत्र के जरिये हो या फिर मीडिया पर सीधी बात नो बकवास के जरिये। पर एक बार अगर बड़ी नोट के खुल्ले हो जाये तो पैसे की क्या हश्र होती है तो ये तो हम जानते ही है। पैसेंजर ट्रेन अचानक राजधानी की गति में तब्दील हो जाती है वो वक्त भी था की बिहार सर्वश्रेष्ठ था और जिसके शिक्षा का दुनिया भर में लोहा माना जाता था और आज वाही बिहार अपने लिए भीख मांग रहा है ! हालाँकि ये तकनीकी रूप से गलत शब्द है किन्तु सच तो यही है ?

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पर्यावरण का हमारे जीवन में अत्यंत महत्व है। शुद्ध हवा,पानी,रहने के लिए भूमि और भोजन सभी कुछ हमें पर्यावरण से मिलता है। सभी प्राकृतिक संसाधन इसी पर्यावरण में पाए जाते हैं। जनसंख्या बढ़ने से लोगों की आवश्यकता भी बढ़ी है। और उसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए लगातार प्राकृतिक संसाधनों का अतिदोहन हो रहा है। हम प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग और संरक्षण कैसे करें, इस पर हमारी उलझाऊ नीतियों की मुश्किलें एक बार फिर कटघरे में हैं। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में सरकार कृषि सम्बन्धी योजनायें तो बनाती है लेकिन यह कोई काम की नहीं जब हम कोई आपात स्थिति में अपने आप को असहाय महसूस करें। मैंने देखा टीवी पर ! टैंकर की चपेट में आकर एक बच्चा मर गया था जो पानी के लिए दौड़ लगा रहा था ! लेकिन सोचने की बात ये भी है की उसी मराठवाडा से लोकप्रिय नेता शरद पवार आते हैं जिनके यहाँ पानी के फव्वारे लगे हैं !

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के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: Rahul Ranjan Rahul Ranjan

भाई राहुल रंजन जी, मैं यह देख कर हैरान हूँ की इस लेख को पांच सितारे मिले हैं किन्तु प्रतिक्रिया एक भी नहीं...चलिए जो भी कारण हो मेरी प्रतिक्रिया यही है कि १०० साल पहले से लेकर आज-तक मनुष्य फिल्मों को ज़्यादातर मामलों में सिर्फ सिनेमा हौल के अन्दर के मनोरंजन और दोस्तों के साथ गप-शाप तक ही सीमित रखता है....वही चीज़े जो उसे फिल्म में अच्छी लगती हैं उन्हें वह न तो अपनी सोंच में ला पाता है न ही अपने व्यवहार में....कई बार तो बहुत अच्छी फिल्मों का विरोध भी किया जाता है कि वह धर्म के खिलाफ हैं, जबकि व्यक्ति कभी मानव धर्म के बारे में सोंचता ही नहीं और उस धर्म जाती के चक्कर में पड़ा रहता है जो कुछ लोगों ने अपने स्वार्थ के लिए रच डाले हैं...सभी समझदार हैं किन्तु सभी नादानी करते रहते हैं... हमारी शिक्षण प्रणाली में बहुत बड़े बदलाव कि ज़रुरत है किन्तु यह करेगा कौन यह समझ में नहीं आता...कृपया मेरे इस जातिप्रथा विरोधी लेख को पढ़े और अपनी प्रतिक्रिया दें http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/07/23/bhaarat-bheedbhaav-ka-samarthak/

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

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