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Anurag


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“ये पब्लिक है भाई सब जानती है”

Posted On: 2 Aug, 2015  
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सलमान की सजा और बॉलीवुड की भूमिका

Posted On: 6 May, 2015  
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Entertainment social issues में

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चार क्या साक्षी महाराज हम तो 6 बच्चे पैदा कर दें पर …..

Posted On: 7 Jan, 2015  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

अब जरा सोचिये जिस प्रदेश की पुलिस राज्य की सत्ता में नंबर दो की हैसियत रखने वाले मंत्री की बात न सुन रही हों उस प्रदेश में आम जनता की स्थिति क्या होगी ? यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि स्वयं मुख्यमंत्री अखिलेश ने कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम ये बात स्वीकार की थी कि उतर प्रदेश की अधिकारी उनकी बात नहीं सुन रहे है। ऐसे में बेहद मत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर उतर प्रदेश की सरकार चला कौन रहा है ? राज्य में सत्ता का केंद्र कहाँ है ? कहा जाता है कि शासन तंत्र इकबाल से चलता है। जो सरकार अपने तंत्र पर इकबाल कायम कर ले जाती है उस सरकार का शासन तंत्र सुचारू रूप से कार्य करता है और जो नहीं कर पाती शासनतंत्र के कार्य उसी सरकार के लिए कब्रगाह बन जाते है। वस्तुतः मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से यही चूक हो गयी। अपनी शालीनता और विनम्रता के चलते उन्होंने नौकरशाहों से मित्रवत व्यवहार किया। लेकिन बे-लगाम और घूसखोर हो चूँकि यूपी की नौकरशाही इसे मुख्यमंत्री अखिलेश की कमजोरी समझ बैठी है। जो किसी भी रूप में अखिलेश सरकार के लिए हितकर नहीं है। सटीक लेखन ! काठ की हंडिया बार बार आग पर नहीं चढ़ती

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय अनुराग जी, सादर! आपने बहुत ही अपेक्षित प्रश्न उठाया है जबकि यह अत्यंत ही ज्वलंत मुद्दा है फिर भी इसे ताल दिया जाना! क्या दर्शाता है. न्यायालय की जो प्रक्रिया है उसमे न्याय मिलने में कई जनम गुजर जायेंगे ...ऐसे में जरूरत के अनुसार जजों की नियुक्ति और अदालतों की संख्या में वृद्धि आवश्यक है.. इसके अलावा एक और सुझाव मैंने अपने आलेख में दिया था -आजकल सब कुछ आधुनिक तकनीक के आधार पर काम को आसान बनाया जा रहा है. न्यायिक फैसले भी सॉफ्टवेयर के सहारे प्रोग्राम किया जा सकता है,- जिसमे सभी साक्ष्य एवं नियमावली को प्रोग्राम कर फैसला निकाला जा सकता है, इसमे समय और संसाधन का सदुपयोग होगा और जल्द न्याय मिलने की संभावना बढ़ेगी. अंतिम फैसला जज का होना चाहिए! ताकि मशीनी भूल से बचा जा सके!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

इसका सीधा जवाब है इस मसले का भी राजनैतिककरण हो जाना। दरअसल किसी भी दल ने इस मसले पर गंभीरता से विचार किया ही नहीं । वो चाहे देश की सत्ता पर राज करने वाली कांग्रेस हो या फिर राज्य की सत्ता पर आसीन भाजपा हो। वोट बैंक की राजनीति में दोनों ही राजनैतिक दलों के आकाओं ने यह सोचने की जहमत नहीं की कि आम आदमी, राजनेताओं और सुरक्षा बलों के साथ खूनी होली खेलने वाले और लाशो का ढेर लगाकर प्रदेश में दहशत का पर्याय बन चुकी नकसली समस्या का समाधान क्या हो ? देश के राजनैतिक इतिहास में इससे पूर्व शायद ही कोई ऐसी बड़ी घटना घटी हो जिसमे एक साथ इतने नेताओं को नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया हो। ऐसे में यह विचार करने योग्य प्रश्न है कि आखिर हमारी सुरक्षा व्यवस्था में कहां छेद रह गया जिसके चलते इतनी बड़ी वारदात हो गय, नेताओं की हत्या होने के बाद ही ज्यदातर सरकारें ऐसे मामलों में जागती हैं !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

वास्तव में यही वो कारण जिनके कारण आज भारतीय सिनेमा के कथ्नांक में गिरावट आती जा रही है जिसका सीधा असर समाज पर रहा है। ये कहना गलत न होगा कि इन १०० सालो की यात्रा में भारतीय सिनेमा ने जितने मुकाम हासिल किये उतना ही इसने समाज को गलत दिशा भी दी। आज हमारी बॉलीवुड की फिल्मे सेक्स, थ्रिल, धोखे के काकटेल पर बन रही है ऐसी फिल्मे हिट भी हो रही है लेकिन यही फिल्मे जब अस्कार जैसे प्रतिष्ठित आवार्ड के लिए जाती है तो औंधेमुह गिर पड़ती है। इसके विपरीत स्लमडाग जैसी फिल्मे जो की सामजिक मुद्दों पर बनती है वो आस्कर जैसे आवार्ड को ला पाने में सफल होती है। कहने का तात्पर्य यह की विदेशो में भी अब ऐसी ही फिल्मो को पसंद किया जा रहा है जो किसी सामाजिक सरोकारों से जुडी हो। आज ये वक़्त की जरुरत है कि फिल्मे सेक्स, थ्रिल, धोखे के काकटेल से बाहर निकले और और ऐसे मुद्दों पर बने जो समाजिक मुद्दों से जुडी हो। हो सकता है कि ऐसी फिल्मे बाक्स आफिस पर हिट न हो पर लगातार अगर सामाजिक मुद्दों पर फिल्मे बनना शुरू होंगी तो कुछ दिन बाद ऐसी फिल्मे बॉक्स आफिस पर हिट होना शुरू हो जायेंगी क्योकि सिनेमा समाज को जो देता समाज उसी को लेता है और इसका सीधा से उद्धरण ८० की दशक की फिल्मे है जो उस दौर में काफी पसंद की गयी। बढ़िया लेखन

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: bebakvichar, KP Singh (Bhind) bebakvichar, KP Singh (Bhind)

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

जहाँ तक बात लोकसभा चुनाव २०१४ की है तो अभी केंद्र की कांग्रेस सरकार को कोई खतरा नहीं है क्योकि अगर ये सरकार गिरने पर आयेगी तो देश की राजनीत में हावी एम फैक्टर (माया और मुलायम) सरकार को बचा लेंगे और जब २०१४ में लोकसभा चुनाव होंगे तब तक राजनैतिक परिस्थितियाँ काफी ज्यादा बदल चूँकि होगी। जो मुद्दे आज राष्ट्रीय शिखर पर हावी है वो उस समय हवा में गोले की भांति गायब हो जायेंगे और कुछ नए मुद्दे निकलकर सामने आयेंगे। मित्रवर कांग्रेस के पास एक बहुत बड़ा सहयोगी दल है जिसे सी बी आई कहते हैं , और उसके साथ होते हुए उसे किसी का भी डर नहीं है ! मुलायम या मायावती उसके एक ही डंडे से सीधा १० जनपथ भागे चले आयेंगे !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आप ने एक काफी विवादित मुद्दे को उठाया है... रिसर्वेसन पढाई के दौरान मैं अनिवार्य समझता हूँ.. पर ये उसके बाद नौकरी और प्रोन्नति में ठीक नहीं है.. दूसरी बात एस सी / एस टी लोगो के लिए भी क्रीमीलेयर लागु किया जाय.. तीसरी बात भारत में अन्याय केवल आर्थिक आधार पर नहीं होता .. कई बार जातिगत आधार पर ही होता है.. सवर्णों को कुछ दिन त्याग करना ही होगा , या फिर पुराने पापो का पश्चाताप करना ही होगा.. जाती आधारित अन्याय की कहानी १२०० साल पहले शुरू हुई थी ,मुझे लगता है की सवर्णों को कम से कम इस १२०० साल के बदले १२० साल तक पश्चाताप तो करना ही होगा.. बाकि रही बात प्रोन्नति की तो मै इसमें किसी तरह के रिसर्वेसन के मैं खिलाफ हूँ.. मैं आपको अपने ब्लॉग पर आपकी बहुमूल्य राय जानने के लिए आमंत्रित भी करता हूँ.. http://drbhupendra.jagranjunction.com/2012/08/27/%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a5%8d%e0%a4%a8%e0%a5%82-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a4%95%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%b2-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%b5/

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

राही जी, विपक्ष  आदि कुछ  नहीं है, डिप्पल  के केश  में सौदेबाजी हुई थी। ये राजनेता सब एक  ही हैं। हम  जनता को बेवकूफ  बनाने के लिये आपस में एक  दूसरे का विरोध  का स्वांग  करते हैं। संसद  और  विधान  सभाओं  को इन्होंने बंदी बनी रखा है। जनता के अधिकार इनके बंगलों की पहरेदारी कर रही है। राजनीति में अपराधियों, भ्रष्टाचारियों एवं व्यापरियों का कब्जा हो गया है। यदि सच  कहा जाय  तो राजनिति वेश्यालय  और नेता वेश्या  बन चुके हैं। बिना महा क्राँति के कुछ  भी बदलने वाला नहीं है। राष्ट्रपति के चुनाव के संबंध  मे देख  रहें हैं न, ऐसा लगता है कि जैसे कोई फिक्स  किया हुआ   मैच  चल  रहा है। कौन  किसके तरफ  से खेल  रहा है पता ही नहीं चलता, जितने नाम  बताये जा रहें हैं हो सकता है कि इनमें से कोई न हो कोई और ही इन्होंने फिक्स  कर रखा हो। 

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik




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