मन की बात

मेरे मन की बात ........

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राजीव नामदेव


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संस्कृति…..

Posted On: 18 Jun, 2017  
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भ्र्ष्टाचार….

Posted On: 5 Aug, 2014  
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माँ मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ ……

Posted On: 11 May, 2014  
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हमें पुलिस की ज़रुरत है …

Posted On: 22 Apr, 2014  
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कोई गरीब कब पंहुचेगा संसद …

Posted On: 20 Apr, 2014  
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ये पब्लिक है जो सब जानती है

Posted On: 25 Feb, 2014  
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शायद लोकपाल कि ज़रुरत ही न पड़े……….

Posted On: 14 Dec, 2013  
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”’आप ”’ कि मेहरबानी और चिंटू का गुस्सा …।

Posted On: 3 Dec, 2013  
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धन्यवाद सचिन…

Posted On: 13 Nov, 2013  
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ये उपलब्धि महान है …… ?

Posted On: 6 Nov, 2013  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

के द्वारा: शिल्पा भारतीय "अभिव्यक्ति" शिल्पा भारतीय "अभिव्यक्ति"

के द्वारा: राजीव नामदेव राजीव नामदेव

हमारे नीति नियंता शांति क़ि बात करते है क्योंकि हर समय कड़ी सुरक्षा में रहने वाले यह लोग कभी किसी वारदात का शिकार नहीं होते , यह लोग कभी देश क़ि सीमा पर जाकर गोली नहीं खाते बम धमाको में किसी अपने को गंवाने का गम क्या होता है उन्हें नहीं मालूम वह तो बस शांति चाहते है चाहे सामने वाला चाहे या नहीं l लेकिन सच ये है क़ि पिछले ६५ वर्षो से इस शांति क़ि बड़ी कीमत देश क़ि निर्दोष जनता को चुकानी पड़ी है और आगे भी चुकानी पड़ेगी l हाल ही में देश में मची अफरा तफरी और बिगड़े हुए साम्रदायिक माहोल के पीछे पाक क़ि भूमिका सामने आई है l सरकार कहती है क़ि इसे बर्दास्त नहीं किया जाएगा लेकिन सवाल ये है क़ि आखिर हम क्या करेंगे क्योंकि अमेरिका क़ि तरह किसी देश में घुसकर आतंकियों को मार गिराने क़ि हिम्मत तो हम कर नहीं सकते और पाक कभी अपने यहाँ मौजूद आतंकियों को सजा देगा नहीं तो भला हो भी क्या सकता है ल बहुत सही लेखन नामदेव जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

मान्यवर राजीव जी! नमस्कार,,, आपके लेख से कई सत्यता का पता चला जो मैं नहीं जानता था, ये बड़े अफ़सोस की बात है कि हम रामायण या हनुमान चालीसा, नमाज़ या कुरआन जैसे धार्मिक ग्रंथों का उपयोग अपनी आतंरिक ईर्ष्या को मिटाने के लिए करने लगे हैं,हम शांति का पाठ तो करते हैं लेकिन उसे केवल किताबों तक सीमित समझते है. गोपाल दास नीरज जी कि पंक्तियाँ हैं- "भारत माँ के दो नयन, हिंदू मुस्लिम जान. नहीं एक के बिना, दूजे कि पहचान." ऐसे स्थिति में हम विदेशियों से क्या टक्कर लेंगे, जब हमारे घर में ही एकता नहीं है. और जब भारत गुलाम हुआ था तो उसका एक ही कारण था अनेकता. "हम डरते हैं दुनियां के भय,प्रपंच,छल-छंदों से, सदा पराजय पाई है,अपने घर के जय-छंदों से."

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

राजीव जी, सादर नमस्कार। मेरा मानना है कि 15 अगस्त 1947 को काँग्रेस और अंग्रेजों के मध्य सत्ता के हस्तान्तरण का समझौता हुथा था। अंग्रेजों ने यह समझौता अपनी शर्तों पर किया था। काँग्रेसी नेताओं का सत्ता सुख भोगने की जल्दी थी। अतः आनन फानन में समझौता कर लिया गया। अंग्रेज नहीं चाहते थे कि दुनियाँ में यह संदेश जाये कि भारतीयों ने अंग्रेजों से अपनी आजादी छीनी है। अतः उन्होंने काँग्रेस के हाथों में भारत की सत्ता सौपी। क्योंकि वे अंग्रेजों की शर्त मानने का राजी थे। इलहावाद के अलफ्रेड पार्क में शहीद चन्द्रशेखर आजाद को घेरने वाले कोतवाल को उत्तर प्रदेश के पुलिस कमान सौपना उन्ही शर्तों में से एक शर्त थी। इस संबंध में आप स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी के आलेख पाढ़िये या उनके भाषण सुनिये। मेरा मानना है कि यह आधी अधूरी आजादी थी, यदि सच कहा जाये तो काँग्रेस और अंग्रेजों के मध्य सत्ता हस्तान्तरण का एक समझौता था। फिर भी आधी अधूरी आजादी की मुबारकबाद……

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

घिनौना सच ये भी है की कुदरत और अर्थव्यवस्था का सयकल जनता की सोच या भावना पर नही चलता । जनता की सोच ये रही है की मानव मल सब से खराब और घीन करनेवाली चीज है । बाकी प्राणी के मल से ईतनी घीन नही है । गाय और भैंस के मल को सुखा के उसे चुल्हे में डाल कर रोटी पकाई जा सकती है । गधे और घोडे के मल के साथ मट्टि मिलाकर उस के ड्रम बनाये जाते हैं अनाज को संग्रह करने के लिए, लेकिन मानव मल खाद से ज्यादा कुछ नही । कुसरत में अनाज ऐसे ही नही उग जाता । जमिन को फलद्रुप बनाना पडता है । रासायणिक खाद तो आजकल आया । हुदरत ही तरिके निकालता है की सब प्राणी के मल वापस जमिन को मिल जाए । एक तरिका खाद का है जो मानव को सुजाया कुदरतने । सब प्राणी का मल, ईन्सान का भी, खेतों जाता है । मल ढोनेवाले उसे दरियामें नही डालते । उस से उगा अनाज खाने में तकलिफ नही तो मल ढोनेका काम घीनौना कैसे हो जाता है । अगर ईसे जातिवाद की नजर से देखोगे तो आज गरीब ही सब से नीची जाति है । कोइ भी गरीब ना चाहते हुए ये काम करेगा, आखिर उसे जिन्दा रहना है । अर्थव्यवस्था का दोष ही प्रमुख कारण है, उन को कोइ पसंद काम नही दे सकती है, बडे यंत्र भी नही खरिद सकती की यंत्रों द्वारा ये काम किया जाए ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: राजीव नामदेव राजीव नामदेव

के द्वारा: Rajeev namdev Rajeev namdev

सादर नमस्कार! बहुत ही संवेदनशील विषय चुना है आपने और साथ ही सवाल भी. सर्वप्रथम इसके लिए आप को मुबारकबाद देता हूँ. दूसरी बात आपके बात रखने का ढंग मुझे बहुत पसंद आया. आज इस देश को आप जैसे क्रन्तिकारी सोचवाले और अपनी संस्कृति से प्यार करने वाले युवकों की जरुरत है. क्रांति की दीप जलाते रहिये.......... जय हिंद, जय विश्व. .......... एक और महत्त्वपूर्ण बात ये भी है की हरिद्वार में अनशन पर बैठे स्वामी सानंद को गंगा की अविरलता की तो चिंता है परन्तु यंहा गंगा में गिरने वाले आश्रमों के नालो और सीवर उन्हें नज़र क्यों नहीं आते हरिद्वार के बाद उत्तर प्रदेश में गंगा में बढ़ता प्रदूषण भी उन्हें क्यों नज़र नहीं आता l क्या कभी वह इसके लिए भी अनशन पर बैठेंगे l क्या आस्था के नाम पर विकास से समझोता करना उचित है l क्या इस पर कोई बीच का रास्ता नहीं निकाला जा सकता जिस से लोगो की आस्था व् भावनाए प्रभावित न हो और राज्य का विकास भी बाधित न हो l क्या कोई इसके लिए पहल करेगा ..........क्या खूब कहा अपने.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: Rajeev namdev Rajeev namdev

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat




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