वेद विज्ञान

वेद केवल धर्म नहीं बल्कि जीवन की सच्ची राह है

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पण्डित आर. के. राय


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भद्रलिंगम – पारद शिवलिंग

Posted On: 25 Feb, 2017  
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ज्योतिष में

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—ज्योतिष गणना एवं फल कथन में विचलन—-

Posted On: 3 Jan, 2017  
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ज्योतिष में

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पारद शिवलिंग एवं वेदविज्ञान

Posted On: 31 Dec, 2016  
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ज्योतिष में

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पारद शिवलिंग एवं संस्कार

Posted On: 31 Dec, 2016  
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ज्योतिष में

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पारद शिवलिंग रखने वाले ध्यान दें—

Posted On: 25 Dec, 2016  
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ज्योतिष में

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व्याधि, निदान एवं निराकरण —-

Posted On: 10 Sep, 2016  
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ज्योतिष में

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ह्रदय रोग, रक्तचाप, मधुमेह एवं गंठिया

Posted On: 28 Aug, 2016  
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ज्योतिष में

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संतान का सुखमय दाम्पत्य जीवन-

Posted On: 2 Aug, 2016  
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ज्योतिष में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: jlsingh jlsingh

भाई सिंह साहब, मेरा ज्यादा लेख फेसबुक पर आ रहा है. एक फौजी इधर से उधर आते जाते जहाँ कहीं जो कुछ मिला लिख दिया. आप को यह सब ज्ञान वर्द्धक लगता है, मैं कृतकृत्य हुआ. वरना बहुत से लोगों को इससे अनूर्जता हो गयी है. क्योकि उनके जजमानी की दुकान बंद हो गयी है. मुझे लोग कहने लगे हैं कि जागरण जंकशन एवं फेसबुक के माध्यम से मैं अपना प्रचार प्रसार कर रहा हूँ. लेकिन कर भी क्या सकता हूँ. अब मेरी सेना की सेवा समाप्त होने वाली है. तो आखीर घर जाकर क्या करूँगा? थोड़ा बहुत ज्योतिष, कर्मकाण्ड एवं आयुर्वेद का ज्ञान रखता हूँ. बस मैं भी अपनी जजमानी की दुकान चलाऊँगा. इसीलिये पहले से ही जागरण जंकशन एवं फेसबुक के माध्यम से अपना "Market" तैयार कर रहा हूँ. ताकि पहले से ग्राहक बन जायें.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

सीप में पायी जाने वाली मोती के बारे में बहुत भयंकर भ्रम है जिसके बारे में यहां कुछ भी लिखूँगा तो पता नहीं कितनो को जुड़ीताप हो जायेगा और बौखलाहट में उनका रक्तचाप आसमान छूने लगेगा। "संकुलितामवर्द्धनुः मुक्ता चुल्लिनाप्तु वहतुमसायाम्। फलमस्वप्नायतु यया ऋषयः न जिग्विशुः जायते।।" यह एक दन्त कथा है कि सीप में से ज्योही जीव बाहर निकलता है और उसके निकलने के बाद से लेकर उसमें स्वाति नक्षत्र की बूँद पड़ने के मध्य तक यदि उस सीपी के खुले मुँह में सूर्य का प्रकाश न पड़े तो वह स्वाति की बूँद मोती बन जाती है. मेरे लेख का तीसरा "मेघ मुक्ता" वही है. सीप में कोई मोती नहीं होता है. सीप मोती नाम का यदि कोई मोती होता तो यह ठीक है कि मेरी जानकारी या ज्ञान में नहीं होता किन्तु महाविद्वान एवं उद्भट आचार्य वराह मिहिर से यह कैसे अज्ञात रह जाता? उन्होंने तो अवश्य इसका उल्लेख किया होता। अब यदि सीप मोती किसी के पास हो तो मैं चुनौती नहीं देता। मेरे पास तो मेघमुक्ता ही है.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

किसी एक विद्वान जैसा प्रतीत होने वाले महाशय की टिप्पड़ी मेरे इस ब्लॉग पर आई है. किन्तु दिखाई नहीं दे रही है. कोई तकनीकी कारण हो सकता है. उन्होंने मुझे आदेश दिया है कि भ्रमित न करें। यदि ज्ञान है तो उसे स्पष्ट करें। ----मुझे सिर्फ इतना ही कहना है कि भ्रमित उसे किया जाता है जो पहले ठीक ठाक हो. भ्रमित न हो. जो शुरू से भ्रम में ही पला बढ़ा हो उसे क्या भ्रमित करना? -----तो भ्रमित महाशय आप के लिये कोई बाध्यता तो है नहीं जो मेरे ब्लॉग पढ़ें। आप भूलकर भी मेरे ब्लॉग न पढ़ें। ----मैं अपनी मर्जी, अपनी इच्छा और अपने निर्णय से प्रेरित होकर ब्लॉग लिखता हूँ. जिसे सही, उचित और उपयोगी लगे वह पढ़े अन्यथा आगे बढे. ----वैसे जिस आँख को कभी रोशनी मयस्सर न हुई हो उसकी आँख कभी तेज रोशनी बर्दाश्त नहीं कर सकती।

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

अनाड़ी ज्योतिषाचार्यो++++++++ नक्षत्रो की गणना अश्विनी से प्रारम्भ होती तथा रेवती पर समाप्त होती है. किन्तु वर्तमान समय में यह कृत्तिका से आरम्भ किया जाता है. देखें विंशोत्तरी दशा की गणना जो सूर्य को महादशा के लिये कृत्तिका आरूढ़ ग्रहण किया जाता है. क्या इसके कारण को जानने का प्रयत्न कभी किये हो कि ऐसा क्यों? आदि कवि बाल्मीकि ने श्री राम के जन्म के समय समस्त ग्रहो को उच्चस्थ बताया है. वर्तमान समय में सूर्य मेष एवं बुध कन्या में उच्च का माना जाता है. इस प्रकार सूर्य और बुध के बीच की दूरी 180 अंशो तक पहुँच रही है. जब कि आज मूर्द्धन्य ज्योतिषाचार्य अपनी हठवादिता का जूठन खाते हुए बुध-सूर्य के बीच 28 अंशो से ज्यादा अंतर मानने को तैयार नहीं। आखिर क्यों? क्या बाल्मीकि भी किरयाना की दुकान चलाते थे जिसमे मिलावट कर के ज्यादा कमाई करना चाहते थे? महामति वराह जिन्हें आधुनिक ज्योतिष का जनक कहा जाता है और जिनकी प्रसिद्द दोनों अमर कृतियों का अध्ययन भारत तो दूर विदेश की उच्चस्तरीय वेधशालाओं में सफलता पूर्वक किया जा रहा है उन्होंने अपने सिद्धांत ग्रन्थ "वृहज्जातकम्" के राजयोगाध्याय के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक संख्या 3 एवं 20 में यह दूरी 90 से 180 अंशो तक बताई है. तो क्या वराह मिहिर के पास "ज्योतिष सम्राट, तंत्रवाचस्पति, ज्योतिषमार्तण्ड" आदि की "डिग्री" नहीं होने से उन्होंने बार बार गलतियाँ की है? सोचो! हे ज्योतिष के कुष्ठ स्वरुप तथाकथित वर्तमान ज्योतिषाचार्यो! कुछ तो शर्म करो! थोड़ा तो गणित एवं सिद्धान्त का अध्ययन कर लो. नहीं तो आने वाली अपनी पीढ़ी के भविष्य के बारे में कुछ सोच रखा है या नहीं?

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

श्री मनीष जी आप ने एक बड़ा विचित्र प्रश्न पूछा है. आप ने मेरा परिचय पूछा है. पता नहीं आप मेरे परिचय से क्या लाभ प्राप्त करना चाहते है. किन्तु शायद आप को कोई लाभ हो, इसलिये मैं अपना परिचय दे रहा हूँ. ====मेरा नाम रमेश कुमार राय है. मैं उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का रहने वाला हूँ. वर्त्तमान समय में भारतीय थल सेना में बतौर कनिष्ठ कमीशंड अधिकारी कार्यरत हूँ. तथा कश्मीर में सीमावर्ती क्षेत्र में तैनात हूँ. मेरी प्राथमिक शिक्षा ग्रामीण विद्यालय से प्रारम्भ हुई. स्नातक एवं परास्नातक शिक्षा मैंने बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से प्राप्त किया। परास्नातक (जैव रसायन) उपाधि में अंक कम प्राप्त होने के कारण न तो मैं शोधकार्य कर सका और न ही कही प्रवक्ता पद का उम्मीदवार बन सका. मैं गणित का एक अति कुशल छात्र था. अतः मुझे सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में ज्योतिष में प्रवेश मिल गया. और मैंने प्रथमा से प्रारम्भ कर अपनी ज्योतिष की शिक्षा पूर्ण किया। किन्तु ज्योतिष का प्रयोग ठगो एवं पाखंडियो द्वारा करते हुए इसके रूप एवं गरिमा को बड़ा निंदनीय बना दिया गया था. अतः मेरा मन इस व्यवसाय से घृणा से भर गया. और मैंने भारतीय सेना में सेवा स्वीकार कर लिया। आप बता रहे है कि आप की कुण्डली में ग्रहो की स्थिति सदृश है. तो जिसने आप की कुंडली बनाई उसने क्या उसका फल नहीं बताया। और यदि फल नहीं बताया तो उस कुण्डली का क्या औचित्य? या तो कुण्डली बनाने वाला पण्डित मूर्ख या फिर कुण्डली गलत. बुरा न मानियेगा। मैं फौज़ी हूँ. ठेठ एवं सपाट भाषा में बात करने का आदती हूँ. मेरा मेल ID मेरे प्रत्येक लेख के अंत में दिया रहता है. मेरा फोन नंबर है=09086107111, तथा 09889649352 . फोन करने के पहले मेरी उपलब्धता अवश्य सुनिश्चित कर लें. धन्यवाद पण्डित राय

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

सुश्री निर्मला सिंह जी राशियाँ तीन तरह की होती है ==पृष्टोदयी, शीर्षोदयी एवं उभयोदयी ====अर्थात जिस राशि का उदय पीठ की तरफ से या पीछे से होता है उसे पृष्टोदयी कहते है. जैसे मकर राशि, जिस राशि का उदय सिर की तरफ से या सामने से होता है उसे शीर्षोदयी कहते है जैसे मीन राशि तथा जिस राशि का उदय दोनों तरफ से अर्थात स्थिति के अनुसार होता है उसे उभयोदयी कहते है. इसका विस्तृत वर्णन संहिता ग्रंथो में सहज ही उपलब्ध है. ======पुनः अतिक्रमण का तात्पर्य है Supersede करना। अर्थात शुरू में पीछे हो और शीघ्रता पूर्वक चलकर अपने आगे वाले को छोड़ कर आगे निकल जाना। मैंने इससे सम्बंधित कई पोस्ट फेसबुक पर लिखा है. यदि उचित एवं आवश्यक समझें तो निम्न link पर देख सकती है. facebook.com/vedvigyan

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

श्री भार्गव जी कृपया महर्षि पाराशर के श्लोको का अन्वय (Ordering) कर के पढ़े तो मेरी समझ से उसका विश्लेषण आसान होगा। ====="अध्यश्रुत चतुरस्र चरादृद्भावा"=== लग्नेश के साथ अष्टमेश यदि चर राशि में वृद्धि क्रम में होगा ===श्लोक पर ध्यान दें==यागणाद्यत्यु लघुत्तमः=== छन्द रचना के अनुसार चरादि गणो की अनु, वय, साम के अनुसार अग्रसारण हो रहा है===अतः यदि लग्नेश आरोही अर्थात अपने नीच को लाँघ कर आगे जा रहा हो तथा अष्टमेश अपने उच्च का संक्रमण कर अवरोही हो तब दीर्घायु योग होगा। वैसे महर्षि पाराशर इस सम्बन्ध में द्विस्वभाव राशि को प्राथमिकता देते है, जैसा कि उन्होंने "प्रकारान्त्ये भूतस्त्वाम तदनुलये गृह्यताम्" कह कर इसका समापन किया है.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

Jitendra Kumar Mishra प्रणाम सर। अगर लग्न कुंडली मेँ गुरु द्वादश मेँ कर्क राशि में हो तथा तृतीय भावस्थ मंगल और शुक्र से दृष्ट हो तो क्या फल होता है। कृपया समाधान करेँ। गुरु बारहवें कर्क राशि में है. तथा तीसरे मंगल शुक्र है. और आप ने कहा है कि इस गुरु को मंगल और शुक्र देख रहे है---- अब मैं सब ऋषियों एवं आर्ष मत का यहाँ उल्लेख न कर के सर्व विदित एवं आज कल के ज्योतिषियों के जीने खाने के प्राणाधार महर्षि पाराशर का ही उल्लेख करता हूँ ------- "ग्रहास्त्र्यन्शम त्रिकोणं च चतुरस्रं तु सप्तमम्। पश्यन्ति पादसमवृद्धया फलदाश्च तथैव ते.. पश्यन्ति सप्तमं सर्वे शनि-जीव-कुजाः पुनः। विशेषतश्च त्रिदश-त्रिकोण-चतुरष्टमान।। (बृहत् पाराशर होराशास्त्र अध्याय 27 श्लोक 2 एवं 3) अर्थात सभी ग्रह त्र्यंश (3/10), त्रिकोण (9/5), चतुरस्र (4/8) एवं सप्तम को चरणवृद्धि से देखते है. और तदनुसार ही फल देते है. सप्तम को सभी ग्रह देखते है. किन्तु शनि-जीव (गुरु) तथा कुज (मंगल) की पृथक विशेष दृष्टि होती है. ये क्रमशः त्रिदश, त्रिकोण एवं चतुरष्ट को पूर्ण दृष्टि से देखते है. आगे---------- "एवं सामान्यतो दृष्टिसाधनाय विधिः स्मृतः। मन्दक्षितिज-जीवानां दृष्टौ बोध्या विशेषता।" (बृहत्पाराशर होराशास्त्रम् अध्याय 27 श्लोक अर्थ स्पष्ट है. शनि मंगल एवं गुरु की विशेष दृष्टि होती है. अर्थात उनकी सामान्य दृष्टि से कोई संलग्नता नहीं। ----------यह तो रहा हमारे ऋषि का मत.----- आगे देखें यवनाचार्य का मत----- "तुङ्गस्थे खेटाश्चसौम्या रिष्फगे वा षडाष्टगे। रिपु संयुते अपि वा खेटा दृष्टि भेदं विनश्यति।" (वृद्ध जातकाख्यानम अध्याय 46 श्लोक 34) अर्थात यदि शुभ ग्रह आठवें, छठे बारहवें उच्चस्थ है या कोई ग्रह अपने शत्रु के साथ युति बनाया है तो उसकी सामान्य दृष्टि भंग हो जाती है. आप के प्रश्न में भी यही स्थिति है--------गुरु बारहवें उच्चस्थ है. तथा शुभ ग्रह शुक्र अपने शत्रु ग्रह मंगल से युक्त है. फिर इनकी स्वाभाविक दृष्टि कहाँ? ----------------मिश्र जी, आप की जिज्ञाषा सम्भवतः शांत हो गई होगी। किन्तु एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही है. आप ने जहाँ यह पढ़ा कि आप के द्वारा प्रश्न में उल्लिखित ग्रहो की दशम दृष्टि होती है वहाँ पर इसका फल भी दिया है. फिर मुझसे इसका फल पूछने का क्या तात्पर्य? अर्थात आप मेरी परीक्षा लेना चाहते है. कोई बात नहीं आगे से ख़याल रखूंगा। मुझे ऐसे प्रश्न या परीक्षा में न तो कोई रूचि है और न ही इसकी आवश्यकता। मैं ऐसे प्रश्नो का उत्तर नहीं दे पाउँगा। पंडित जी! प्रणाम! १२ वे गुरू को मंगल व् शुक्र तीसरे से केसे देख रहें हैं? क्या तृतीय मेष राशि की दृष्टि से देख रहें हैं? सामने द्र्ष्टि से तात्पर्य क्या केवल सातवीं दृष्टि से है, या उन 'गृह विशेष' की 'विशेष दृष्टि' 3-7,4-8,5-9 से भी हैं? पंडित जी कृपया मार्गदर्शन अवश्य कियिए, मुझे आपसे ही उम्मीद रहती है!

के द्वारा: sanjay kumar garg sanjay kumar garg

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

श्री गर्ग जी आप का श्लोक है-- सहस्ररश्मितश्चन्द्रे कण्टकादिगते सति. न्यूनमध्यवरिष्ठानि धनधीनैपुणानि हि. यद्यपि इसके छन्द उपबंध से स्वतः स्पष्ट है. किन्तु मैं इसमें उलझाना नहीं चाहता। आप सीधे देखें- कुण्डली में सूर्य एवं चन्द्रमा में चतुर्थ एवं दशम भाव को छोड़ कर शेष कही भी इन दोनों में से एक शुभ भाव का तो दूसरा अशुभ भाव का स्वामी होगा। यदि इनमें से कोई भी एक दूसरे से शुभ भाव में बैठता है तो फल अशुभ ही होगा। अब बात आती है चौथे एवं दशवें भाव की. चौथे, दशवें एवं पांचवें भाव में चाहे सूर्य हो या चन्द्रमा इनका फल अशुभ ही होगा यदि इन पर किसी और ग्रह का दृष्टि युति आदि सम्बन्ध न हो. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य अपने आगे पीछे के ग्रहो का नाश कर देता है. सत्य भी है, इसकी प्रचण्ड किरणो में सब तिरोहित हो जाते है. और पाँचवाँ भाव पुत्र, चौथा भाव माता एवं दशवाँ भाव पिता का होता है. अतः सूर्य इनका नाश कर डालता है. इसीलिए सूर्य का नीच होना ही शुभ माना गया है यदि वह लग्न का स्वामी नहीं है. कारण यह है कि चौथे भाव में हो या दशवें भाव में इसकी समसप्तक अर्थात सीधी दृष्टि होगी। दशम में से या चतुर्थ में से किसी एक (माता या पिता) के लिये घातक होगा, हाँ यह अवश्य है कि एक के लिये घातक होगा तो दूसरे को यमराज भी नहीं छू सकता। अस्तु मुख्य विषय है कि इनमें जीतनी दूरी अशुभ भाव के स्वामियों के रूप में होगी फल उतना ही अशुभ होगा। क्योकि तब चन्द्रमा भी अस्त न होने की वजह से अशुभता प्रकट करेगा। और ऐसी स्थिति में जब अशुभ चन्द्रमा सूर्य के नजदीक होगा उसकी अशुभता तिरोहित हो जायेगी। इस प्रकार चन्द्रमा एवं सूर्य द्विविधा फल देने वाले कहे गए है. इसी लिए दोनों एक ही राशि का स्वामी होकर दोनों फल देते है. जब कि शेष ग्रहो को दो दो राशियाँ मिली हैं.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

पंडित सादर नमन! एक नया ज्ञान दिया हैं आपने उसके लिए धन्यवाद! पंडित जी एक प्र्शन है महर्षि पराशर कृत ग्रन्थ के रवि-चन्द्र-योगधयाय पाठ -35 से, उसमे श्लोक आया है-"सूर्य से केंद्र में चन्द्र हो तो मनुष्य में धन, चातुर्य आदि कम, पढ्फर में मंध्याम, आपोक्लिम में हो तो श्रेस्ट होता है" पंडित जी मैंने कही पढ़ा है, सूर्य-चंद्रमा आपस में जितने दूर हो व्यक्ति का मानसिक स्तर व् उपरोक्त गुण अधिक होते हैं? इस स्लोक में आपोक्लिम में यदि सूर्य -चंद्रमा को स्थिति को उत्तम बताया गया है, जबकि इस स्थिति में तो सूर्य-चन्द्र आगे पीछे होंगे, तो क्या वे जातक के मानसिक व् उपरोक्त सुखो में कमी नहीं करेंगे? पढ्फर में भी सूर्य-चन्द्र एक-दूसरे से केवल दो भाव ही दूर होंगे? पंडित जी आप से निवेदन है कि मेरा मार्गदर्शन करके मुझे अनुगृहीत करें, मैं आप के ज्ञान से लाभान्वित होना चाहता हूँ!

के द्वारा: sanjay kumar garg sanjay kumar garg

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

श्री गर्ग जी मैंने यहाँ पर मैंने दोष प्राप्ति के बाद उसके वर्गीकरण की विधि बताई है. घर में दोष है या नहीं, इसके निर्धारण की अलग विधि है. बधिर जौ - यह एक प्रकार का जंगली जौ होता है जो अक्सर किसानो के खेत में उग आता है तथा लोग इसे उखाड़ कर फेक देते है. आज कल तो इसकी बुआई लोग खेतो में करते है तथा पशुओ के चारे के रूप में उपयोग करते है. इसे लगभग सवा-डेढ़ किलो लेकर सिलबट्टा या मशीन में पिसवा लें. इसमें कोन (चावल की भूसी ) उतनी ही मात्रा में मिला लें. ध्यान रहे चावल की भूसी होनी चाहिए न कि धान की भूसी। उसे गाय के गोबर में मिलाकर आँगन में लगभग एक-डेढ़ हाथ लम्बाई चौड़ाई में मोटा लेप लगा दें. अगले दिन उस लेप को हटाकर उसके बीचो बीच पूरा एक हाथ गहरा गड्ढा चाहे कितनी भी चौड़ाई का खोदें। उसे हल्दी मिली हुई पानी से भर दें. जब भर जाय तो उस स्थान से दूर लगभग दो सौ कदम जाएँ और फिर वापस उस गड्ढे के पास आयें। यदि पानी आधा से ज्यादा नीचे चला गया हो तो दोष है. अन्यथा नहीं। रही बात दिशाओं की, तो गर्ग जी दिशाएँ 49 होती है --"हरि प्रेरित तेहि अवसर चलेउ मरुत उनचास। अट्ट हास करि गर्जा कपि आगि बढ़ि लगी आकाश।" सुन्दर काण्ड में ही यह बताया गया है. दूसरी बात यह कि मैंने इसे जहाँ से पढ़ा है उसमें शेष दिशाओं के बारे में कोई वर्णन उपलब्ध नहीं है. किन्तु अन्य उल्लेखों से यह पता चलता है कि किसी भी दिशा के पहले पड़ने वाला कोण उसी दिशा का होता है. मैं भी कोई बहुत बड़ा विद्वान, ऋषि मुनि नहीं हूँ. आप ही की तरह का एक आदमी हूँ. यह आवश्यक नहीं है कि मैं सकल वेद पुराण उपनिषद्, दर्शन एवं संहिताओं का अध्ययन कर लिया हूँ. हो सकता है मैं आप के अनेक प्रश्नो का उत्तर न दे पाऊँ।

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

श्री गर्ग जी, क्षमा कीजियेगा। मुझे नहीं ज्ञात है कि आप को संहिता स्कंध के करण प्रभाग का कितना ज्ञान है. किन्तु मैं यह मानकर चलता हूँ कि आप को करण प्रभाग का ज्ञान है. मैं विशेष कुछ न कह कर के इतना ही कहना चाहूँगा कि आप भारत प्रसिद्द "श्री वेंकटेश्वर पञ्चांग" में 8 सितम्बर 2006 को देखें तथा इसी तारीख को कम्प्युटर में डालकर देखे। दोनों में बहुत अंतर आप को दिखाई देगा। कम्प्युटर में विवरण भरने वाले मेरे जैसे पण्डित ही है जो अपने ओछे आधे अधूरे ज्ञान को भुनाकर पैसा बनाने के चक्कर में रहस्यमय विवरण का उल्लेख श्रम भय या जटिलता के भय या दुर्बुद्धि के कारण नहीं डाल पाते है. कम्प्यूटर के कुण्डली साफ्ट वेयर को महर्षि पाराशर या वराह मिहिर ने डेवेलप नहीं किया है. इसीलिये इसमें विचलन आ जाता है. गणित भय के कारण ही कुण्डली साफ्ट वेयर में आज तक प्राण दशा, पाचक दशा, छाया दशा, संध्या दशा, सहम भाव सारणी या विंशोत्तरी तथा अष्टोत्तरी महादशा के अलावा कोई भी ग्रह दशा नहीं डाली गयी है. जब कि ग्रहो की महादशाएँ कुण्डली में उनकी विविध स्थिति के अनुसार अस्सी के लगभग होती है. इसके विपरीत कुण्डली साफ्ट वेयर में अष्टोत्तरी एवं विंशोत्तरी के अलावा तीसरी ग्रह दशा का उल्लेख आप को कही नहीं मिलेगा। इसके पीछे कारण ज्योतिष के सिद्धांत का दृग्गणित से सामंजस्य स्थापित न हो पाना है. और जिसे एक करण ग्रन्थ के प्रायोगिक ज्योतिषी द्वारा ही किया जा सकता है. ज्योतिष के तीन प्रभाग या स्कंध होते है. गणित, फलित एवम सिद्धांत फलित के तीन स्कंध होते है- भूगोल, शरीर विज्ञान एवं रसायन विज्ञान मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि कुण्डली की गणना संयोग से दश हजार कुंडलियो में कही एक की वह भी आंशिक रूप से सही होगी तो होगी अन्यथा नहीं होगी। अस्तु, मैं इस विवाद में उलझना नहीं चाहता। मैं कुण्डली के सन्दर्भ में कम्प्युटर को असमर्थ एवं अप्रायोगिक मानता हूँ. दूसरे मानते है तो मुझे उससे कुछ लेना देना नहीं है.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

इसके लिये आप चौखम्भा प्रकाशन या कचौड़ी गली वाराणसी से या बाम्बे मुद्रणालय मुम्बई से प्रकाशित एवं डॉ सुरेश चन्द्र मिश्र द्वारा टीकाकृत महर्षि पाराशर का पाराशर संहिता, पाराशर होरा शास्त्र, रंजन पब्लिकेशन दिल्ली से प्रकाशित आचार्य वराह कृत वृहज्जातकम्, तथा डॉ माधव मुकुंद की टीकाकृत सूर्य संहिता का अध्ययन करें। पुनः शरीर संरचना एवं ग्रह प्रभाग के लिये कुमार तरंगिणी, जीवनिकायम एवं आयुर्वल्लभ आदि पुस्तको का अध्ययन करें। आगे- क्षीणश्चंद्रो रवीरभौमः पापो राहुश्शनिः शिखी। बुधो अपि तैर्युतो पापो होरा राश्यार्ध उच्यते। हीनकिरण (कृष्णपक्षीय), हतकिरण (सूर्य से अस्त), दंशकिरण (युद्ध पराजित), विषकिरण (छठे, आठवें या बारहवें भाव के स्वामी), अघोरकिरण (आगे पीछे कोई ग्रह न) होने पर चन्द्रमा पापी हो जाता है. किन्तु- कृष्ण पक्षे दिवा जातः शुक्ल पक्षे यदा निशि। शष्टाष्टम् गतो चन्द्रः मातरेव परिपालयेत्। कृष्ण पक्ष में दिन में जन्म हो या शुक्ल पक्ष में रात में जन्म हो और चन्द्रमा छठे या आठवें भाव में ही क्यों न हो, वह चन्द्रमा माता के समान पालन करता है. आप ने सही कहा. सैन्य जीवन में समय निकाल पाना बहुत दुष्कर कार्य है. फिर भी मैं कोशिश करता हूँ, शीघ्र से शीघ्र प्रत्येक जिज्ञासु का उत्तर दे सकूँ। धन्यवाद।

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

पडित जी, सादर प्रणाम! पंडित जी मैंने कही पर राशियों कि दृष्टि के बारे में पढ़ा ही नहीं है, केवल गृहों कि द्रिष्टि के बारे में पढ़ा है. आप मुझे इस किताब या ग्रन्थ का नाम बताइये, ताकि मैं इसको पढ़कर कुछ ज्ञान में इजाफा का सकूँ, पंडित जी इक प्र्शन और "चन्द्र" कब पापी होते है? क्या "सूर्य" के साथ युति-द्रस्ट होने पर ही पापी होते है, या किसी भी "भाव" में बैठकर, यदि इनके अंश, सूर्य के अंश के निकट हों तब भी ये पापी हो सकते हैं? इसका जातक पर क्या प्रभाव होता है? इसके लिए क्या उपाय करने चाहिए? पडित जी, बहुत जिज्ञासाएं है, परन्तु समाधान करने वाला कोइ नहीं है, शायद ईश्वर ने मेरा योग आपसे, मेरी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए कराया हो!! पडित जी जल्दी नहीं है, जब समय मिले मेरे प्रश्नों का उत्तर दे देना, क्योंकि दूसरी जिज्ञासा तैयार है! धन्यववाद पंडित जी!!!

के द्वारा: sanjay kumar garg sanjay kumar garg

रंजना जी मुझे नहीं मालूम मैं आप को क्या सम्बोधन दूँ. चलिये, यदि छोटी है तो बेटी होंगी, बड़ी होगी तो माँ या बहन होगी। और यदि हमउम्र होगी तो "तथागत" होगी। चूँकि आपने अपने जीवन के एकाँगी एवं एकाकी जीवन का पहलू देखा और सहज ही उसे अति संघर्ष पूर्ण बता दिया। जब कि आप के मनोद्गार को आप की रचना में उदात्त अनुदात्त भेद से मैंने देखा तो आप मनुष्य के सांसारिक जीवन में आने वाली समस्त अनुकूल प्रतिकूल आदि अपेक्षित सम विषम परिस्थिति जन्य मार्ग पर अग्रसर होने वाली लगी. अस्तु, आप जन्म पत्री को निम्न पते पर भेज सकती है- पण्डित आर के राय कनिष्ठ कमीशन्ड अधिकारी 135 (स्वतंत्र) कर्मशाला ई एम् ई (संकेत संवर्ग) द्वारा 56 ए पी ओ विशेष- कृपया हाथ की बनी जन्म पत्री ही भेजें। यदि आप दिल्ली में है तो 17 नवम्बर को मैं दिल्ली में रहूँगा। आप चाहे तो मिल भी सकती है.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

श्री गर्ग जी बहुत प्रसन्नता हुई यह जानकार कि आप भी ज्योतिष महाविज्ञान में रूचि रखते हुए इसकी सतत साधना में रत है. मैंने तो जो कुछ पढना था पढ़ लिया तथा पेट एवं परिवार पालन जैसे अनेकानेक पापपूर्ण कृत्यों पर अवलम्बित तत्सम्बन्धी साधन संसाधन व्यवस्था प्रबंधन में संलग्न हो गया. यद्यपि मैं जैवरसायन (Biochemistry) में स्नातकोत्तर (M. Sc.) की उपाधि से विभूषित हूँ. किन्तु ज्योतिष के मूल ठोस एवं प्रामाणिक वैदिक (न कि भ्रममूलक, निराधार एवं पोंगापंथियों की लकीर फकीरी) से अभिभूत होकर मैंने ज्योतिष का थोड़ा बहुत अध्ययन कर लिया। और सेना की असहज नौकरी करते हुए भी इसके प्रचार प्रसार में अपनी क्षमता के अनुसार प्रयत्नशील हूँ. आप मेरे अन्य लेख भी अवश्य पढ़े होगें। कई पोंगापंथी पापकर्मरत पाखण्डी उदर भरण पोषण में रत दुष्कर्मी तथाकथित पंडितो ने मेरे लेखो पर टीका टिप्पडी की है. किन्तु मुझे इसका कोई मलाल नहीं है. कारण यह है कि मुझे "जजमानी" तो करनी नहीं है. भारत के केंद्र सरकार द्वारा एक निर्धारित मोटी "रकम" हर महीने मुझे वेतन के रूप में प्राप्त हो जाती है. हाँ, इन ज्योतिष के लिए "विष" स्वरुप पंडितो की "जजमानी" पर ज़रूर विपरीत प्रभाव पड़ना शुरू हुआ है. और इनकी "लाबी" में खलबली मची हुई है. खैर इसका कोई प्रभाव मेरे ऊपर नहीं होने वाला। अस्तु, मुख्य विषय पर आते है. एकादशेश एवं व्ययेश तो चाहे नैसर्गिक शुभ ग्रह ही क्यों न हो, सदा ही पापी हो जाते है. किन्तु जहाँ तक शनि का सम्बन्ध है, इसके पापी होने का कारण दूसरा है. सप्तमस्थ शनि की मीन लग्न में वृश्चिक, मीन एवं कर्क राशियों (चतुर्थ, नवम एवं लग्न) पर पूर्ण दृष्टि होगी। मीन लग्न में इन तीनो राशियों की दृष्टि सप्तम एवं अष्टम भाव पर चारो तरफ से उत्कट एवं तिर्यक पड़ती है. "अंत्ये भवे जाया रश्मिपरितः धर्मे सूखेर्कटे सँगसारँग।" परिणाम स्वरुप मीन लग्न में सप्तमस्थ शनि पापी हो जाता है. किन्तु इसके साथ कुछ तथ्यो पर ध्यान रखें- इसका चतुर्थेश के किसी विषम अंश में होना इसे पाप मुक्त कर देगा। लग्नेश यदि कर्क राशि में तथा चन्द्रमा धनु में या मंगल भाग्य में सवर्ण स्थिति में हो तो शनि कभी पापी नहीं हो सकता। यदि किसी भी तरह लग्न एवं सप्तम भाव कृत्यांगी या भावतरी नक्षत्रो में हो तो शनि पापी नहीं हो सकता। यदि जन्म के समय भाव की संध्या दशा में उसी की पाचक दशा एवं भावेश की महादशा एक साथ हो गई हो तो शनि जीवन में हर सुख देने वाला हो जाता है. बुध एकादश भाव में एवं चन्द्र पञ्चम भाव में दशमेश के साथ सम्बन्ध बना रहे हो तो शनि कभी पाप फल नहीं दे सकता। शर्त यह है कि गुरु को किसी भी स्थिति में शुक्र से दूना षड्बल प्राप्त हो रहा हो. यदि षड्वर्ग में कन्या राशि को 28 से ज्यादा अंक मिल रहे हो तो शनि सप्तम भाव में कभी पापी नहीं हो सकता। ये कुछ मुख्य तथ्य है जो शनि के सप्तम कृत पाप पूर्ण प्रभाव को निर्मूल करते है.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

"वृथा न जाइ देव ऋषि वाणी।" देवताओं एवं ऋषि-मुनि की वाणी बेकार नहीं हो सकती। तुलसी दास ने तो रामचरित मानस के कलियुग वर्णन में आज से लगभग 600 साल पहले ही लिख दिया है- "नारि मुई गृह सम्पति नासी। मूँड मुड़ाय भये सन्यासी। ते विप्रं तें पाँव पुजावेँ। उभय लोक निज हाथ नसावें। -------------------- जाके नख अरु जटा विशाल़ा। सोइ तापस कराल कलि काला। अभी कलिकाल का पूरा पूरा प्रभाव दिखाई पड़ रहा है. मेरे इन कटु उक्तियो के लिये पंडितो की बड़ी अभद्र बातें भी सुनने को मिलती हैं. किन्तु मैं ठहरा एक सक्रिय फौजी। मेरे इस साढ़े तीन हाथ की लम्बी काया पर इसका कोई असर नहीं होने वाला। किन्तु अफसोस तो होता ही है. विचार अभिव्यक्ति के लिये धन्यवाद

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

क्षमा कीजियेगा। अब कही भी जाने से बड़ा डर लगता है. एक बार गया तो बड़ी ज़िल्लत सहनी पड़ी. कारण यह है कि मैं ठहरा फौजी। शुद्ध ठेठ एवं फक्कड़ नीरस भाषा भाषी। और आज कल चाहिये चाटुकारिता पूर्ण लच्छेदार भाषा में मन भावन, लुभावन शब्द गुम्फित Comment. और यही मैं मार खा जाता हूँ. क्योकि "ब्लॉगर" बिरादरी का बड़ा तीखा अनुभव मिल चुका है. एक बार एक कुत्ता अपने घर परिवार एवं बिरादरी में विचार विमर्श कर के तीर्थ यात्रा पर निकला। लगभग सब तीर्थो में जाने एवं वापस आने में एक महीना लगने वाला था. उसने सारी व्यवस्था कर ली. और घर से निकल पडा. जब अपने गाँव से निकल कर दूसरे गाँव में पहुँचा तो वहाँ के कुत्तो ने इस नये कुत्ते को देख कर भौंकना शुरू कर दिया। फिर गाँव के सारे कुत्ते मिलकर उसे खदेड़ कर अगले गाँव में कर आये. उस गाँव के कुत्तो ने भी अपरिचित नये कुत्ते को गाँव में देख कर भौंकते हुए उस पर पिल पड़े. यह भाग कर अगले गाँव में पहुँचा। वहाँ भी बिरादरी वालो ने इसे खदेड़ कर अगले गाँव में पहुँचा दिया। इस प्रकार यह कुत्ता भागते दौड़ते किसी प्रकार दो तीन दिन में वापस अपने गाँव पहुँच गया. जब गाँव वालो ने पूछा की बहुत जल्दी तीर्थ यात्रा से लौट आये. यह किस तरह संभव हुआ. उसने उत्तर दिया - "बिरादरी का जोर था. बहुत जल्दी पूरा हो गया."

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

आदरणीय पंडित जी नमन ! श्राद्धपक्ष या पितृपक्ष की भ्रांतियों का निवारण प्रस्तुत लेख में विविध दृष्टिकोण से आपने सुन्दरतम और तर्कसंगत किया है. निःसंदेह लेख अत्यंत प्रशंसनीय है किन्तु एक संदेह बहुत समय से मन में विचरण कर रहा है. कदाचित मेरा संदेह और लोगों से भी सम्मत हो. श्राद्ध कर्म यदि श्रद्धा से प्रेरित न हो तो क्या यह एक औपचारिकता नहीं ….? और श्रद्धा कैसे उपजेगी यदि विचारों और कर्म का कोई मेल ही न हो … क्या ऐसा कहीं लिखा है कि श्राद्ध कर्म केवल हिन्दू व्यक्ति ही कर सकता है अन्य धर्म के व्यक्ति नहीं। अगर हम किसी व्यक्ति का श्राद्ध कर रहे तो सीधा सा अर्थ यह नहीं की हम उसके जीवनकाल में किये गए सभी कृत्यों से सहमत हैं ? आतंकवादियों, डाकुओं, भष्ट बेइमान कुटिल व्यभिचारियो की संताने कैसे श्रद्धा रखें यदि उनके पूर्वजों का पूरा जीवन पापमय रहा हो. कृपया शंका का निवारण करें। मैंने ऐसे लोगों को भी देखा है जो श्राद्ध कर्म में उन सभी चीज़ों की आहुति देते हैं जो उनके पूर्वज पसंद करते थे या खाते पीते थे जैसे कि - मांस मछली शराब पान और बीडी सिगरेट भी हवन के पास में रखी जाती है. बाद में उन सभी वस्तुओं को पूरा परिवार जम कर खाता है मज़े लेकर। अब बताइये . .......!

के द्वारा: AJAY KUMAR CHAUDHARY AJAY KUMAR CHAUDHARY

यह विज्ञान प्रमाणित है कि नर्मदा के जल में आज भी आंशिक ही सही दृगरन्जक अवलेह (आफ़्थोरिमेट्री लोसन) यत्र तत्र प्राप्य है. यह तुलसी के पत्ते में पाये जाने वाले ज्योतिरार्णव (रेसिफिलिक क्लोरोप्लास्ट) की विलेयता को त्वरित श्रींखलाबद्ध गति प्रदान करता है. और आँखों की पुतली (Pupil) के अक्ष विन्दु (फोकल लेंथ) को “क्रोशम पात निपातितम” अर्थात कई कोस की दूरी तक के अँधेरे में देखने में सक्षम बना देता है. यह निर्विवाद सत्य है कि इन तीनो का – शालिग्राम, पारद शिवलिंग एवं दक्षिणावर्ती शँख, एकत्र संग्रह अनेक उपद्रवो को शान्त करने में सक्षम है. राज्यक्षमा, रक्तार्बुद, कर्कट, ग्रंथि भंजन, अपष्मार आदि दुःसाध्य या असाध्य व्याधियो का संशमन, कुंडली के विषघात, कालसर्प, देवदोष, केमद्रुम, दुरुधरा, महापातक आदि अनेक दोषों-दुर्योगो का नाश, संतान बाधा, दरिद्रता, हताशा-निराशा आदि अनेक पीडाओं को समाप्त करने में सर्व समर्थ यह त्रिसंग्रह प्रत्येक प्राणी को यत्न पूर्वक अवश्य ही करना चाहिये। विशेषतया कलिकाल में तो इसे अवश्य ही घर में रखना चाहिये। सुन्दर आलेख

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय पंडित राय जी, इस प्रस्तुत 'बलात्कार-यज्ञ की हवन-सामग्री' आलेख में आप ने काम्शास्त्रीय एवं मनोवैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर बड़े सटीक और विश्लेषणात्मक रूप में अत्यंत जरूरी जानकारी दी है | काश, यह जानकारी हमारे देश के नियंताओं, मंत्रियों-सांसदों, फिल्म-निर्माताओं, दूरदर्शन के प्रभारी निदेशकों-निर्देशकों आदि तक पहुँच सके --- "शुक्राणुओं का पतन एक निश्चित उत्प्रेरक से निर्देशित होता है. ह्त्या आदि करने के लिए बलपूर्वक हाथ को शस्त्र उठाकर वार करवाया जा सकता है. किन्तु बलपूर्वक शुक्राणु पतन नहीं कराया जा सकता। जबकि उसके कारक स्वरुप उत्प्रेरक उपस्थित न हो. और मात्र इन शुक्राणुओ के परस्पर विपरीत जननांगो के आदान-प्रदान के कारण ही एक सामान्य हाथा पाई बलात्कार का रूप ले लेती है." xxxxxxx "बलात्कार एक मानसिक विकार का उद्वेलित विक्षोभ है. इसे भौतिक सम्पन्नता या सुख संसाधनों से किसी भी स्थिति में नहीं संलग्न किया जा सकता। अतः बलात्कार जैसी घटना के स्थाई एवं ठोस निवारण के लिए यह आवश्यक एवं एकमात्र उपाय है कि इसके कारको को ही सक्रिय न होने दिया जाय." xxxxxxxx "जननांगो का नग्न प्रदर्शन, अनुचित एवं व्यसन वासना को भड़काने वाले वस्त्र धारण करना, विपरीत योनि वालो के कामुक आलिंगन का सार्वजनिक प्रदर्शन एवं सामाजिक सम्बन्ध भेद की मर्यादा का उल्लंघन, जब तक प्रतिबंधित नहीं होगा, दुनिया का कोई भी क़ानून चाहे कितना भी कठोर क्यों न हो, काम के उग्र आवेग को नहीं रोक सकता। तथा बलात्कार नहीं रोका जा सकता।" xxxxx "जब तक कामुकता को भड़काने वाले कारक समाप्त नहीं किये जायेगें, किसी भी तरह से बलात्कार को नहीं रोका जा सकता। पारदर्शी झीने वस्त्रो से स्तन, नितम्ब, गुप्तांग को झलका कर दिखाना, इन अंगो के गोलाई, नुकीलापन एवं उभार आदि नख-शिख को विशेष रूप से इंगित करते हुए ऐसे चुस्त वस्त्र पहनना जिससे लोगो की दृष्टि सहज ही उन अंगो को देखने के लिए आकर्षित हो जाए, बालो की वेणी न बनाकर उन्हें हवा में लहराते हुए चलना (औरतो को बेहतर मालूम है कि किस अवस्था अर्थात “राजोकाल” से निवृत्ति के बाद विशेषतया पति सहवास के समय बालो को खुला रखा जाता है.) आँख, ओठ एवं गाल आदि पर ऐसे रंग-रोगन चढ़ाना जिसके प्रत्येक हावभाव से अश्लीलता टपकती हो, आखिर ऐसे प्रदर्शन के पीछे क्या कारण हो सकता है सिवाय लोगो में काम वासना भड़काने के." xxxxxxx "जबरदस्ती लार नहीं टपकाया जा सकता। उसे टपकने के लिए सुन्दर स्वादिष्ट भोजन की सुगंध चाहिए। काम वासना अपने आप नहीं भड़कती। उसे भड़काने के लिए कामोत्तेजक कारको का उपस्थित होना आवश्यक है." xxxxxxx "बलात्कार यज्ञ की पूर्णता तभी संभव है जब उसमें कामुक अंग प्रदर्शन एवं कामुक हावभाव प्रदर्शन की हवन सामग्री को मूक अश्लील आमंत्रण के मन्त्र से वासना आवेग के घी के साथ व्यसन के हवन कुंड में आहुति दी जाय." ....... अतएव जब नीचों के कुकृत्य सारी हदें पार कर चुके हैं और सारे उपाय निष्फल हो रहे है तो जाने-अनजाने में कामुकता का प्रदर्शन करनेवालों को नए सिरे से विचार करना पड़ेगा और इस दौर का अंत होना चाहिए | इतने प्रासंगिक, तथ्यात्मक, वैचारिक आलेख के लिए हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

सम्भवतः आप रत्न विज्ञान से सर्वथा अनभिज्ञ है, गोमेद को आप ने बहुत नुकसान दायक पत्थर बताया है. अनियमित, अनुचित एवं असामयिक प्रयोग से मोती जैसा सौम्य पत्थर भी मानसिक विकृति देता है, गोमेद तो बहुत दूर की चीज है. वैसे इसके विश्लेषण के लिए आप को किसी अति दुर्लभ ग्रन्थ की आवश्यकता नहीं है. आप एक छोटा सा सर्वत्र एवं आसानी से उपलब्ध "आयुर्वेद सार संग्रह" नामक अनद्यतन प्रामाणिक ग्रन्थ गोमेद के परिप्रेक्ष्य में पढ़ लें, आप के लिए इतना ही पर्याप्त होगा। मैं आप के इस दावे को कि आप के पास दुनिया के सारे ग्रन्थ उपलब्ध है, चुनौती नहीं दे रहा हूँ. आप के पास अवश्य होगा। आप के पास दुनिया का सबसे सर्वोत्तम ग्रन्थ संग्रहालय है, यह जान कर प्रसन्नता हुई. जहाँ तक ग्रंथो की प्रामाणिकता का प्रश्न है, किसी भी ग्रन्थ की प्रामाणिकता का क्या मापदण्ड आप ने निर्धारित कर रखा है? क्या किसी सरकार या न्यायालय ने यह प्रमाणित किया है कि रामचरित मानस को तुलसीदास या पुराणों को वेदव्यास ने लिखकर किसी सक्षम न्यायालय या प्राधिकरण से पंजीकृत या अपने नाम का "पेटेंट" प्राप्त किया है? अस्तु, प्रमाद पूर्ण तर्क कुतर्क से कथोपकथन की विकृति दोष के अतिरिक्त और कुछ नहीं प्राप्त हो सकता है. कथा के सन्दर्भ में आप "चौखम्भा प्रकाशन" से प्रकाशित तथा "द्विजेन्द्र" कृत व्याख्या वाला "श्रीमद्देवी भागवत महापुराण" को एक बार अवश्य पढ़ लें. गोमेद कितना फायदेमंद या नुकसानदेह है, इसका मैंने वैज्ञानिक तथ्य भी अपने अलग ब्लॉग में स्वतन्त्र रूप से अन्यत्र दिया है, अपेक्षा है, आप एक बार उस पर भी दृष्टिपात कर लें. मैं आप जैसे विद्वानों द्वारा प्रस्तुत आंकड़ो एवं आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर ही ये सब आख्यान लिखता हूँ. मैं एक फौजी हूँ. संभवतः मेरा शब्द समुच्चय कठोर होने के कारण आप को ठेस पहुचाता हो, किन्तु यह मेरी स्वाभाविक प्रवृत्ति है, इसलिए मैं क्षमा याचना तो कर ही नहीं सकता। आप ने कुछ लिखने की ज़हमत उठाई इसके लिए मैं उपकृत हुआ. धन्यवाद

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

विचार प्रस्तुत करने के लिये धन्यवाद। किन्तु यह नितांत आप का अपना व्यक्तिगत विचार हो सकता है। कारण यह है कि (१)- आप ने यह स्वतः स्वीकार किया है कि "किताब मे पढ़्ने योग्य एक अच्छी बाते" है। (2)- यह सर्व मान्य है कि लाभकारी एवं अच्छी वस्तुओं का संग्रह कही से भी किया जा सकता है। यथा लाभकारी (नौकरी या व्यवसाय) प्राप्त करने के लिये उच्च शिक्षा प्राप्त चिकित्सक, अभियंता या प्रशासनिक अधिकारी अनपढ़, जाहिल एवं अपराधी मंत्रियो के नीजी सचिव तक बने हुए है। (यह यथार्थ है) (3)- यदि जानबूझ कर अच्छी बातो को उपेक्षित कर उसे आत्मसात या अंगीकृत न किया जाय तो उसे किस संज्ञा से विभूषित किया जा सकता है? (4 )- ज्ञान राशि के संचित कोष को साहित्य कहते है। अब यदि ज्ञान या लाभ की बातें पुस्तको में उपलब्ध है, तो लेना भी वही से पडेगा। (5)- खान में पड़े हीरे का क्या औचित्य? उसे बाहर निकालकर तथा तराश कर उसे औषधि-आभूषण के रूप में धारण करना ही बुद्धिमता एवं उसका उपयोग है। (6)- यह दुर्भाग्य है कि जानबूझ कर हितकर तथ्यों की उपेक्षा की जा रही है। "जानि कष्ट जे संग्रह करहीं। कहहि उमा! ते काहे न मरही?" --रामचरित मानस

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

यह ज्योतिषी के नाम पर पाखण्ड करने वाले, श्रम से जी चुराने वाले, पूर्णतया आधुनिक अपूर्ण विज्ञान की शरण में गिरे हुए, आधे अधूरे ज्ञान रखने वाले, त्रिस्कन्ध ज्योतिष के मूलभूत, गूढ़ एवं श्रमसाध्य सिद्धांतो से घबराने वाले ज्योतिषाचार्यों के कुकृत्य का परिणाम है। ये लोग स्वयं चरपल, भुज, कोटि, अयनाश साधन, प्रकल्पित एवं प्रत्यक्ष क्षैतिज लग्न आदि में विभेद, भाव, ग्रह, नक्षत्र तथा दशा (संध्या दशा, पाचक दशा, छाया दशा, कूटकेतु, योगिनी आदि) के कठिन एवं रहस्यमय गणित क्रिया का या तो साधन करने से घबराते है, या ज्ञान नहीं रखते है या उचित पारिश्रमिक (दक्षिणा) न मिलने के कारण इनका साधन करना नहीं चाहते है। पंडित जी , नमस्कार ! आपने सही कारण बताया है

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

श्री चौधरीजी, ज़रा ध्यान दें- "अन्त्ये जीवायुर्क्षतो पितरौ वक्रेशोखेटश्च युग्मे। चरे विलग्नेषु प्लुत्वादि हतो संजातेंदु तज्जः स्यात।" मीन लग्न का गुरु अशुभ स्थानों को रक्षित करता है। आठवें भाव की रक्षा से तात्पर्य मोक्ष दिलाता है। किन्तु यदि उसके घर (मीन एवं धनु राशियाँ) दूषित हो तो वही गुरु संकट दाता हो जाता है। इसलिए आप के द्वारा प्रस्तुत विवरण में गुरु का अष्टम भाव में दृष्टि-युति हीन होकर बैठना भाग्य को किसी भी तरह प्रभावित नहीं करेगा। यदि रेवती के चतुर्थ चरण में लग्न हो तो यह भाग्य की रक्षा बलाबल के आधार पर बहुलाश्व पद्धति के अनुसार किञ्चित मात्र कर सकता है जो सर्वथा नगण्य है। महामति मेधाचार्य के उपरोक्त कथन में यह स्पष्ट है कि केन्द्रस्थ रंध्रेश सूर्य में भाग्येश मंगल अस्त हो जाय तो विधाता भी उसकी भाग्य हीनता पर पश्चात्ताप करेगें यदि नवम भाव किसी शुभ दृष्टि-युति से रहित हो। आप के बताये विवरण में सुखेश-जायेश बुध की स्थिति स्पष्ट नहीं है। क्योकि बुध या तो द्वितीय भाव में होगा, सूर्य से युक्त होगा या शुक्र युत होगा (जैसा की लकीर के फकीर वर्त्तमान ज्योतिषी आज भी मानते चले आ रहे हैं) इन स्थितियों में यदि बुध वृष राशि का होगा तो मात्र अपनी दशा में ही थोड़ा बहुत भाग्य को संरक्षण दे सकता है। अन्यथा केन्द्राधिपति दोष के कारण वह भी भाग्य को दूषित ही करेगा। संक्षेप में समस्त भौतिक सुखो से युक्त होने के बावजूद भी यह जातक इनका किसी भी तरह उपभोग नहीं कर पायेगा। और भाग्यहीनता पर पश्चात्ताप करेगा। निवेदन- यह प्रश्न नितांत व्यक्तिगत है। कृपया इसे ब्लॉग पर न पूछें। इसके लिये मेरे मेल आईडी का प्रयोग करें। धन्यवाद।

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

श्री संदीप ठाकुर जी, जैसा कि मैं पहले ही आग्रह कर चुका हूँ कि व्यक्तिगत विषय कृपया ब्लॉग पर न पूछें। इससे लोगो में गलत सन्देश जाता है। लोग सोचते है कि मैं अपने प्रचार-प्रसार के लिए यह सब कर रहा हूँ। जो मुझे पसंद नहीं है। एक भावना लोगो में जाती है कि मैं अपनी यंत्र-मन्त्र की दूकान खोल रखा हूँ। इसलिए कृपया कोई भी व्यक्तिगत समस्या या आशंका मेरे व्यक्तिगत मेल आईडी पर प्रस्तुत करें। बड़ी कृपा होगी। इस बार यहाँ मैं आप के प्रश्न का उत्तर दे रहा हूँ। शायद आगे मैं आपके प्रश्नों का उत्तर अपने ब्लॉग पर न दे सकूँ। खन्चितार्णवोएका विररामते यत तदर्थ यामे अभिभंजितो वा। मध्यस्थिते या स एव भूता खलु तर्पणे तीरथ पाणि भावे। यहाँ बड़े ही सपष्ट शब्दों में आचार्य श्रुतपाद ने कह दिया है कि यदि एक ही चिन्ह प्रत्येक ऊँगली में हो तो यामे अर्थात कुंडली के दशमेश एवं नवमान्शेष में जो बलवान हो, या जिस ऊंगली के पुरोपाद अर्थात सामने निचले संधि पर पर्वत उठा हुआ हो उस ऊंगली में जो निशान हो या जिस ऊंगली में संधिधाम- जिस अस्थि में उंगलियाँ जुटती है, रेखा विभाजित हो उस अंगुली के चिन्ह को ग्रहण करना चाहिये।

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

के द्वारा: sandeepthakur sandeepthakur

एक नक्षत्र 13 अंश 20 कला का होता है। तो एक चरण 3 अंश 20 कला का होगा। दूसरा चरण पूरा होते 6 अंश 40 कला का हो जाएगा। यदि पांचवें अंश में जन्म हुआ तो दूसरे चरण के अन्दर ही होगा। जन्म कालीन नक्षत्र के चरण एवं अंश निकालने की विधि भयात भभोग के द्वारा सर्व विदित है। इसलिए अंश निकालना कोई ज़टिल विधि नहीं है। भयात भाभोग के द्वारा यह जाना जा सकता है की जन्म का अंश क्या है। दूसरी बात यह कि अंगुल-व्यंगुल आदि एक निश्चित एवं निर्धारित वैदिक माप है। फिर भी प्रचलित मान्यता के अनुसार हाथ के मध्यमा अंगुली की मोटाई को एक व्यंगुल माना गया है। तर्जनी अंगुली की लम्बाई 6 अंगुल नहीं होती है। किन्तु हमारा शास्त्र यह नहीं मानता है। उसके अनुसार लम्बाई कितनी भी हो सकती है। इसीलिए जो भी लम्बाई हो उसका सवा तीन गुना करते है। और उसमें लम्बाई की एक वृद्धि कर के उस गुणनफल को विभाजित कर देते हैं। जैसे आप ने लम्बाई 6 अंगुल बताई है। 6 का सवा तीन गुना साढ़े उन्नीस हुआ। इसमें 6 में एक वृद्धि कर के अर्थात 7 से विभाजित किया। फल पौने तीन अंगुल आया। अर्थात यंत्र की लम्बाई चौड़ाई पौने तीन अंगुल होनी चाहिए। हाथ की एक एक अंगुली में 27-27 संवेदना वाही नाडिया होती है। ये ही नाडिया नक्षत्रो का प्रतिनिधित्व करती हैं। किन्तु अंतिम अंगुली तर्जनी में अट्ठाइसवें नक्षत्र अभिजित का समावेश माना गया है। अर्थात अंतिम अंगुली में 31 नाडिया हो जाती हैं। यही कारण है कि सिर्फ तर्जनी का ग्रहण किया जाता है। इसे ही महान गणितज्ञ एवम रामानुजाचार्य के गुरु ऋषि देवल सह्याद्रि ने इस पूरे प्रकरण को एक ही श्लोक में व्यक्त कर दिया है- षड्रुद्राणि रसो भेदों आवर्त्याम देवेश्वरः। तदनाडियेश्वशेष्यमनुगमनम भव कुर्यताम। निवेदन- कृपया ऐसे लम्बे एवं ज़टिल प्रश्न मेल आईडी के माध्यम से पूछें। मेरी जितनी जानकारी होगी, अवश्य बताऊँगा। जहां मेरा ज्ञान कुंठित हो जाएगा, वहाँ क्षमा माँग लूंगा। धन्यवा

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

धन्यवाद पंडित जी आपने यहाँ पर जो भी जानकारियां प्रदान की है वह अमूल्य है. परन्तु इन्हें पड़ने के पश्चात मेरे मन में कुछ सवाल आये है । जैसा की आपने बताया की किसी का जन्म अश्विनी नक्षत्र के दुसरे चरण में हुआ अर्थात पांचवा अंश और तर्जनी की लम्बाई सवा तीन अंगुल बताई आपने, तो यह जो आपने तर्जनी की लम्बाई नापी है वोह दुसरे हाथ की तर्जनी से ही नापी है या किसी भी अंगुल से इसे नाप जा सकता है और आपने इसमें तर्जनी को लिया है इसके अतिरिक्त किसी और अंगुली को भी लिया जा सकता है क्या ?. और आपने जो मैथ में ३-१/४(५)/ ५+१ का उपयोग किया है यह नहीं समझा की आपने /५+१ किस अनुसार लिया एवं आपने नक्षत्र का पांचवा अंश कैसे ज्ञात किया। अगर किसी का जन्म अनुराधा नक्षत्र १ में हुआ तथा दुसरे हाथ की तर्जनी से तर्जनी की लम्बाई ६ अंगुल हुई तो उसका कितना अंश होगा या कुछ और उदहारण से बता सके तो जो मन में शंका है उसका समाधान हो जायेगा, धन्यवाद ।

के द्वारा: sandeepthakur sandeepthakur

शर्मा जी मेरा जन्म १३/०८/१९८६ २२:३० विदिशा मध्य प्रदेश में हुआ है, कृपया क्या आप मुझे बता सकते है की मुझे किसकी साधना करना चाहिए, चूँकि मेने किताबों में पड़ा है की ९ वे स्थान पर गुरु की मित्र राशी में मंगल होने की वजह से मुझे शिवजी की आराधना करनी चाहिए। लेकिन मन से में शिवजी को अपना गुरु एवं श्री राम को अपना इष्ट मानता हूँ, लेकिन कुछ पुश्तकों में मेने पड़ा है की श्री राम की साधना से संन्यास प्राप्त होता है, और गुरु अपने इष्ट की ही दीक्षा प्रदान करते है । इसलिए में माँ दुर्गा की नामावली जप करता हूँ, क्योंकि मेने कही पडा है की अगर कुंडली में कोई गृह बलि हो तो उसके इष्ट की साधना करनी चाहिए वोह शीघ्र ही प्रसन्न होते है, और मेरी कुंडली में सूर्य ४ घर में चन्द्र की राशी में २६.५९ डिग्री का है तो में उन्हें अपनी गुरु माता के रूप में उनकी नामावली का जाप करता हूँ, अपनी मनोकामना पूर्ती के लिए एवं उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए और मेने कहीं पडा है की सूर्य जब बलिष्ठ गृह हो तो शक्ति की साधना करनी चाहिए। और बृहस्पति गृह भी मेरी कुंडली में ११ भाव में कुम्भ राशी में है जो की २७.३६ डिग्री का वक्री गृह है । कृपया कर आप मेरा मार्ग दर्शन करेंगे तो आपकी काफी कृपा होगी ।

के द्वारा: sachinbaghel sachinbaghel

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

आपका कहना सही है। किन्तु क्या ज़रूरी है कि पैसा झूठ बोलकर ही कमाया जाय? ईमानदारी से सच बोलकर भी तो कमाया जा सकता है? मैं पैसा कमाने के विरोध में नहीं हूँ। आखिर जिस पंडित या विशेषज्ञ ने अपना समय एवं पैसा लगाकर यह विद्या पढी है। वह निःशुल्क सेवा क्यों करेगा? क्या इंजीनियर, डाक्टर या वकील पैसा नहीं कमाते है? क्या वे सब नाजायज लूट नहीं करते है? लेकिन पंडित जात सबसे लाचार, निरीह एवं असहाय है। इसकी तरफ सबकी ऊंगली एवं ध्यान झटके से उठ जाता है। फिर भी मैं यही कहूंगा कि इस अनमोल प्राचीन धरोहर रूपी ईश वरदान का दुरुपयोग न किया जाय। क्योकि बाकी सब रोजगार करने वाले एवं एक पंडित की भूमिका एवं चर्या में बहुत अंतर होता है। इसे बहुत संभालकर एवं सहेजकर रखना चाहिए। ताकि इसे कोई बाहरी दूषण (Adulteration) दूषित न कर सके। और जनता का बहुविध कल्याण हो सके। एक बार आप का पुनः धन्यवाद।

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

आदरणीय पंडित जी .. सादर प्रणाम आपसे पूर्णतः सहमत .. हमारे पुरातन संस्कृति की कोई भी विधा झूठी और व्यर्थ नहीं है /सभी आधुनिक वैज्ञानिक मानको पे खड़ी उतरती है ... और जीवन की कठिनाइयों को सरल बनाने के लिए है ... पर सदियों बीत जाने के कारण, तथा सामजिक और राजनितिक उठापटक इतनी हुयी है हमारे समाज में की इसका सच्चा मर्म समझाने और जाने वाले विद्वान् नहीं रहें उसमे से एक हमारा ज्योतिष भी है .. और जो थोड़े बहुत कच्चा पक्का जानते है वो ज्ञानी बन भ्रम फैलाते है .. तो आपका कहना बिलकुल सही है .इससे ज्योतिष की बदनामी ही हुयी है .. आपका सभी आलेख तर्क संगत और संवेदना के साथ होता है .... मेरी बधाई स्वीकार करें

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

श्री सिंह साहब, मैं संतोष जी की टिप्पड़ी पर बहुत देर तक हंसा हूँ। "बिगडैल पुत्र", "व्याहता पत्नी" इन दो शब्दों पर बहुत जोर दार हंसी आयी। हालाकि इसकी व्याख्या बहुत लम्बी चौड़ी हो जायेगी। किन्तु ध्यान दें इन दोनों से अलग एक माँ होती है। वह माँ नहीं जो अपने नवजात ह्रदय के टुकडे को कूड़े के ढेर पर फेंक देती है। सिंह साहब इन शब्दों की परिभाषा मन की तरह जटिल है। ध्यान दीजिएगा, मैंने मन की तरह कहा है, बुद्धि की तरह नहीं। यदि बिना किसी घुमाव के कहा जाय तो माँ की महिमा मेरे शब्दों की पहुँच से बहुत दूर है। दूसरी बात यह कि माँ अपनी प्रबल मातृत्व भावना से आच्छादित होने के कारण बहुतेरे "बिगडैल" कार्यो की अनदेखी कर जाती है। यहाँ तक की अपनी इसी भावना के कारण अपने पुत्र के अपराध के कारण उसे दण्डित किये जाने पर आतुर हो जाती है। जब की वह जानती है की उसका पुत्र अपराधी है। ऐसी माँ बहन एवं बेटी को समाज में बराबरी का दर्ज़ा देना मेरी समझ से उनका अवनयन या अपमान ही होगा। अब रही बात माता दुर्गा के पूजन की सरल विधि की। अर्थात श्रम या कठिनाई से संभवतः आप भयभीत हैं? अर्थात यहाँ भी शार्टकट। चलिए कोई बात नहीं। मुझे भी तो जजमानी चलानी है। जैसा जजमान चाहे। वैसे मैं अगला लेख लिख रहा हूँ। शायद आप को सरल लगे।

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

श्रद्धेय ,.सादर प्रणाम मां सदा पुत्रों को क्षमा करती है ,.... बिगडैल पुत्र को सुधारने के लिए उचित दंड का आग्रह भी रखती हैं ,...ब्याहता पत्नी सदा पति का आराम देखती है भले ही उसके लिए वो पति से ही क्यों न लड़े,.नारी अधिकार पर हो हल्ला मचाने वाले पता नहीं किस स्वतंत्रता के पक्षधर हैं ,....जहाँ महिला आरक्षण मिला है वहां पार्षद पतिओं और प्रधान पतियों के कारनामे जग जाहिर हैं ,...हमारी संस्कृति में सदा उनका सम्मान होता है ,.बिना पत्नी के पूजा भी अधूरी मानी जाती है ,..आपका समय अमूल्य है फिर भी एक निजी प्रकरण बता ही देता हूँ ,.....सामान्य वार्तालाप में एक दिन पत्नी ने कहा की अपने घर में सबकी पसंद अलग है (भोजन के मामले में ),.. बच्चों ,..मां बाबूजी ,.आपका (मेरा ) सबका ध्यान रखना पड़ता है ,...मैंने अचम्भे से पुछा लेकिन मुझे तो सबकुछ पसंद है ,..सबकुछ खाता हूँ !..तुम पूछती भी हो की क्या बनाऊं तो यही कहता हूँ की जो मर्जी बनाओ !...उन्होंने कहा की आप नहीं बताते तो क्या,... मुझे तो पता है ,..तब मुझे ख्याल आया की अक्सर घी नमक मिर्च के साथ बेसन की रोटी क्यों मिलती है ....,......परम्परा की अनमोल बातों को किसी कथा के माध्यम से लिखना चाहता था किन्तु आवश्यक प्लाट नहीं बन रहा था ,....आपकी कृपा से आज बन गया लगता है ,.. .ह्रदय तक चोट करते लेख के लिए सादर अभिनन्दन ,...आपसे एक विनती है ,..नवरात्रि पूजन की सरलतम शुद्ध विधि से हमें अवगत कराएँ तो महान कृपा होगी ,..पुनः सादर प्रणाम

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

आज जितना शासकीय सहयोग विदेशी साहित्य, ज्ञान, संस्कार, आचार-विचार एवं रहन-सहन के विकाश एवं रख रखाव पर दिया जा रहा है उसका एक प्रतिशत भी स्वदेशी विकाश पर नहीं दिया जा रहा है. आज सदा नीरोग रखने वाले खादी वस्त्र के निर्माण, उसके विकाश एवं संरक्षण के प्रति सरकार उदासीन है. हमारे भारत का यह मौलिक व्यवसाय आज बर्बादी के कगार पर है. इसके लिये कोई सब्सीडी नहीं है. जब क़ि इसके विपरीत विदेशी वस्त्रो के आयात-निर्यात पर भारी भरकम धन राशि व्यय की जा रही है. और लोगो को भ्रम में रखा जा रहा है क़ि जनता को सस्ता कपड़ा मुहैय्या कराने की दृष्टि से यह किया जा रहा है. यह सस्ता कपड़ा मुहैय्या कराया जा रहा है या अनेक जटिल रोग एवं बेरोज़गारी को जन्म दिया जा रहा है? आप स्वयं देखें, भारतीय ज्योतिष के विकाश, उसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिये सरकारी स्तर पर क्या किया गया है? पाश्छात्य देशो के आविष्कार पर आधारित आधुनिक विज्ञान की मौसम पूर्वानुमान प्रयोग शाला स्थापित हुई है. यहाँ पर जब कोई भूकंप गुजर जाता है तो उसकी तीव्रता मापी जाती है. किन्तु यह नहीं बताया जाता है क़ि किस स्थान पर कब भूकंप आयेगा? अब उस तीव्रता को लेकर जनता चाटेगी क्या? भविष्य वाणी की जाती है क़ि अगले दो-तीन दिनों में मानसून दिल्ली में प्रवेश कर जाएगा. और झमाझम वारिश होगी. और जब अगले चार-पांच दिनों तक बारिस नहीं हुई तो यह कह कर टाल दिया जाता है क़ि अचानक मानसून का रुख तटवर्ती प्रान्तों की तरफ मुड़ जाने से अभी मानसून में विलम्ब की संभावना बढ़ गयी है. यह पूर्वानुमान प्रयोग शाला है या ढकोसला विज्ञान प्रयोग शाला, इस पर कोई कुछ नहीं कहता है. फिर भी इस के विकाश पर हजारो- लाखो क्या करोडो वारे न्यारे हो रहे है. किन्तु ज्योतिष का नाम आते ही ज़ुकाम हो जाता है.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

आदरणीय गुरुदेव, इसमें कोई संदेह नहीं कि ज्योतिष एक पूर्ण विज्ञान है. विज्ञान आधुनिक ऊहापोह का परिणाम है. जब कि ज्योतिष का आविर्भाव तभी हो चुका था जब अभी विज्ञान कही भविष्य के गर्भ में रहा होगा. और आज उसी के सिद्धांतो को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करने का लाभ आज का तथा कथित आधुनिक विज्ञान ले रहा है. आज जितना धन, प्राथमिकता एवं सहयोग प्रशासनिक या सामाजिक स्तर पर आधुनिक विज्ञान को दिया जा रहा है, उसका एक प्रतिशत भी इस विज्ञान को दिया जाता तों आज संभवतः पुरा विश्व इस भारतीय प्राच्य विद्या का मुरीद होता. किन्तु पश्चाताप इस बात का है कि आज भारतीय मान्यताएं, परम्परा, साहित्य, ज्ञान एवं आचार-विचार अपने ही देश में दोयम दर्जे क़ी हो गयी है. जाको प्रभु दारुण दुःख दीना. ताकी मति पहिले हरि लीना. भगवान जब किसी को दुःख देना चाहते है तों वह डंडा लेकर मारने नहीं आते है. बल्कि पहले उसकी बुद्धि ही हरण कर लेते है. हे राम !!!!

के द्वारा: गिरिजा शरण गिरिजा शरण

के द्वारा: jlsingh jlsingh

संतोष जी जिस आशा और सपना की बात कर रहे है, वह भी तो एक मनोभाव ही है. उसका भी कोई स्थूल रूप होता है थोड़े नहीं. जैसे मायूसी और पीड़ा हम इंसानों के भाव है, वैसे ही आशा और सपना भी इंसानों के मनोभाव ही है. हर खुशी एवं पीड़ा के पीछे कोई न कोई कारण होता है-चाहे वह स्थूल हो या सूक्ष्म. चाहे पाने की खुशी या खोने का गम. दूसरी बात यह क़ि यही हमारी भूल या स्वार्थ परता है क़ि हम केवल इंसानों में ही भाव-अनुभाव के अस्तित्व को मान्यता देते है. सभी व्यथित एवं उल्लासित होते है. क्या आप ने देखा है क़ि छुईमुई केवल स्पर्श मात्र से ही सिकुड़ जाती है? क्या आप ने महसूस किया है क़ि जब किसी पेड़ को काटा जाता है तो वह चिल्लाता हुआ धरती पर गिरता है. आंधी में भी यदि किसी वृक्ष की कोई शाखा टूट कर गिरती है तो भयंकर आवाज के साथ गिरती है. किसी भी पेड़ को काटते ही उसके पत्ते मुरझा जाते है. क्या यह हमारी स्वार्थ परता नहीं क़ि केवल हम इंसानों में ही ऐसी भावनाओं का समावेश मानते है? "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत." संतोष जी रहस्य या गूढता उत्सुकता को जन्म देती है. उत्सुकता से तदनुरूप भाव उत्पन्न होते है. पुनः तत्संबंधित कल्पना के विविध प्रारूप जन्म लेते है. और अंत में कल्पना को मूर्त रूप दिया जाता है. अब यह पता नहीं क़ि यह मूर्त रूप अनुकूल होता है या प्रतिकूल. क्योकि कल्पना तो हमारी सोच के अनुसार बनी होती है. विचार अभिव्यक्ति के लिए धन्यवाद

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

आदरणीय डाक्टर साहब संभवतः आप ने मेरे और सारे लेख नहीं पढ़े है. भाग्यफल या भविष्य के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिये आप के पास हाथ से बनी जन्म पत्री होनी चाहिए. यदि हो तों कृपया उसकी स्केन कापी मेरे मेल आईडी पर ड़ाल दीजिये. जैसे ही मुझे समय मिलेगा, मै अपनी बुद्धि एवं क्षमता भर आप के प्रश्न का उत्तर देने का अवश्य प्रयत्न करूंगा. एक बात का अवश्य दुःख है कि सूर्य-चन्द्रमा आदि के बारे में सुनकर आप को पूछने क़ी इच्छा जागृत हुई है. तर्क, प्रमाण एवं वास्तविकता के आधार पर नहीं. मै आप से यही निवेदन करना चाहूँगा कि यदि आप को इसकी प्रामाणिकता पर संदेह हो तों कृपया इस कुंडली, ज्योतिष एवं भाग्य आदि के फेरे में न पड़ें. क्योकि इससे और भी दुविधा हो जायेगी.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

प्रिय विभूति जी बड़ा अच्छा लगा जो आप ने सटीक प्रश्न पूछा. वैसे मुझे भरोसा था, कोई यह प्रश्न अवश्य पूछेगा. यद्यपि इसके ऊपर मै एक स्वतंत्र लेख ही लिखने वाला था. किन्तु मै इसे यही स्पष्ट कर देना चाह रहा हूँ. आप ने इस लेख के दो बातो पर शायद ध्यान नहीं दिया. एक तों मैंने वेद के कथन को ज्योतिष क़ी दृष्टि में बताया. दूसरे चन्द्रमा क़ी यह गति धरती के लिये प्रमाणित होती है. अब आती है तीसरी बात. प्रकाश क़ी गति क़ी चन्द्रमा से तुलना. धरती चौबीस घंटे में अपने अक्ष पर एक बार घूम जाती है. तथा सूर्य के बाहरी वलय में निर्धारित अपनी कक्ष्या में एक वर्ष में सूर्य का एक चक्कर पुरा कर लेती है. अब आप यह सोचिये कि चौबीस घंटे में पृथ्वी कितनी दूरी तय करती है? यह विज्ञान भी अपने अत्याधुनिक संयंत्रो एवं उपकरणों से गणित कर चुका है कि इसकी परिधि दो करोड़ बत्तीस लाख बीस हजार किलोमीटर है. तों यदि चौबीस घंटे में इतना तों एक सेकेण्ड में कितना? यह एक सेकेण्ड में लगभग 27000 किलोमीटर आता है. अर्थात पृथ्वी एक सेकेण्ड में इतना चल देती है. अब आप देखिये कि चन्द्रमा इतनी गति वाली पृथ्वी का एक चक्कर लगाता है. तों यदि धरती इतनी भयंकर गति से घूम रही है. तों इतनी भयंकर गति से घूमने वाली पृथ्वी का चक्कर चन्द्रमा कितनी गति से लगाएगा? क्योकि उसे सूर्य का तो चक्कर लगाना ही है. साथ में इस पृथ्वी का भी चक्कर लगाना है. और चक्कर भी पृथ्वी पर रह कर नहीं बल्कि बाहरी वलय में रह कर. लगाना है. श्री विभूति जी, यह गति प्रकाश क़ी भी गति पार कर जायेगी. किन्तु यह गति तब किसी अन्य ग्रह के लिये प्रायोजित होगी. क्योकि यह गति धरती से सूर्य के सापेक्ष निकाली गयी है. जिसे किसी ग्रह के लिये सिद्ध किया जा सकता है. धरती के लिये यह गति संभाव्य नहीं है. क्योकि गणित से भी यह सिद्ध नहीं हो पायेगा. जब हम किसी गाडी को मोदते है. तों भीतरी पहिया जब धीरे चलता है. तों बाहरी पहिया उससे बहुत ज्यादा गति से चलता है. बस आप इसी उदाहरण से देख लीजिये कि चन्द्रमा क़ी गति पृथ्वी से कितना गुना ज्यादा होगी? इसे गणित द्वारा स्वयं सिद्ध कर के देख लीजिये. इसमें किसी सिद्धांत या मान्यता क़ी आवश्यकता नहीं है. मेरी समझ से आप के प्रश्न का उत्तर मैंने दे दिया है.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

आदरणीय पण्डित राय जी, सादर प्रणाम, मैंने पुनः आप के किसी लेख पर मुँह खोला है. क्षमा कीजिएगा. सच मानिए तों मुझे ज्योतिष का तनिक भी ज्ञान नहीं है. किन्तु प्रमाण से मै कदापि मुँह नहीं मोड़ सकता. किन्तु यहाँ पर एक बहुत जबरदस्त शंका उत्पन्न हो गयी है. तीन लाख किलोमीटर जो गति आप ने बतायी है, वह प्रकाश क़ी गति है. न कि सूर्य क़ी. और चन्द्रमा के गति सूर्य से दश गुना हो सकती है. फिर प्रकाश क़ी गति से आप ने दश गुना चन्द्रमा क़ी गति कैसे निर्धारित कर दी. किसी ग्रह क़ी गति प्रकाश क़ी गति से कैसे तुल्य हो सकती है. क्षमा कीजिएगा. यदि प्रश्न गलत या अतार्किक हो तों क्षमा कीजिएगा. मुझे आप क़ी विद्वता पर पूर्ण भरोसा है.

के द्वारा: vibhootiprasad vibhootiprasad

आप दोनों महानुभावो से मेरी प्रार्थना सबसे पहले मैं आदरणीय गुरुदेव पंडित राय जी से प्रार्थना करना चाहूंगा क़ि मंच की बातें यदि मंच तक ही सीमित रहें तो अच्छा है. आप लोगो की वार्ता से भय उत्पन्न हो रहा है. समस्त विषय ही कलंकित हो रहा है. क्योकि जैसा क़ि मुझे इस विषय का कोई ज्ञान नहीं है. किन्तु तर्क-वितर्क के इस व्यवहार से रही सही रूचि भी दम तोड़ने लगती है. न तो इस विषय पर भारत सरकार कुछ कर सकती है और न ही उच्च न्यायालय. हाँ, आप दोनों अवश्य परेशानी में पड़ सकते है. अब मैं इस बेनाम महानुभाव से प्रार्थना करना चाहूंगा क़ि इस मंच पर सभी ब्लॉगर अपने ज्ञान को अपने स्वतंत्र ब्लॉग के रूप में प्रस्तुत करते है. किसी के लिखने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है. सब का अपना अपना विचार है. आप भी अपने ज्ञान को पाठको के सम्मुख रखें. क्या इस मंच पर जितने भी ब्लॉग प्रकाशित होते है उसे सभी पढ़ते ही है? जी नहीं. जिसको जो रुचिकर लगता है, उसे वह पढ़ता है. जिसे नहीं रूचि है, या कोई खोट नजर आता है, उसे नहीं पढ़ता है. आप भी अपने लेख लिखें. पाठको के सम्मुख रखें. ज्ञान बाँटें. पाठको को यदि अच्छा लगेगा उसे पढ़ेगें. नहीं अच्छा लगेगा नहीं पढ़ेगें. किन्तु इस तरह के विवाद से इस महान धरोहर के प्रति लोगो में जो सन्देश जा रहा होगा, उसे मुझसे ज्यादा आप दोनों जान रहे होगें. एक राह के दो पथिक मित्र होते है. राह बहुत आसानी से कट जाती है. मै यह प्रार्थना करना चाहूंगा क़ि आप दोनों महानुभाव अपनी विद्वत्ता के अनुरूप गले मिलें. या इस मंच पर ही एक दूसरे के प्रति अपने सम्बन्ध को प्रेम पूर्ण प्रगाढ़ता दें. मुझे उम्मीद है, इससे आप दोनों इस महान विज्ञान के लिए बहुत कुछ कर सकते है. इस लम्बे मार्ग में ईर्ष्या, द्वेष, कटुता एवं शत्रुता का पत्थर रख कर मार्ग को न बदलें. गिरिजा

के द्वारा: गिरिजा शरण गिरिजा शरण

महोदय, वृत्तीय ज्याखंड, भूमिति, परिधि एवं व्यास आदि के लिए आप ज्यामिति, त्रिकोणमिति आदि से सम्बंधित किसी भी पुस्तक का अध्ययन कर सकते है. वृत्तीय प्रकृति, आकार-प्रकार एवं रूप-रंग आदि के निर्धारण के लिए स्नातक स्तर पर पढ़ाई जाने वाली किसी भी पुस्तक से या चिकित्सा विज्ञान में पढ़ाई जाने वाली किसी भी पुस्तक से अनुलोमन (आवाज परावर्तन- अल्ट्रा साउंड) का अध्ययन कर सकते है. इसी के आधार पर आवाज के सहारे यह पता लगाया जाता है क़ि पेट में पथरी आदि कितनी दूरी पर और कितनी लम्बी चौड़ी है. आवाज की गति उसके कही आने और जाने में कितना समय लगा, के आधार पर दूरी निर्धारित कर देती है. थोड़ा श्रम अवश्य करना पडेगा. आप की शंका मुझे याद नहीं आ रही है. कृपया उसका एक बार और उल्लेख करें. मै हर संभव प्रयत्न करूंगा, क़ि आप संतुष्ट होवें. धन्यवाद

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

मै आप के जिस रूप को दर्शको को दिखाना चाहता था उसे आप ने खुद ही दिखा दिया. खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे वाली कहावत आप ने चरितार्थ कर डाली. रही बात भारत सरकार को लिखने की, तो जो शख्श एक छोटा या बड़ा किसी भी तरह का लेख पाठको को नहीं लिख सका, वह भारत सरकार को क्या लिखेगा? गलत मान्यताओं एवं सिद्धांतो पर निर्णय वही दे सकता है जो स्वयं परिपूर्ण एवं न्यायबद्ध हो. जिस सरकार ने अपने अन्याय को खुलने न देने के भय से जानलोकपाल बिल नहीं पास होने दिया, उससे किस न्याय की आशा की जा सकती है? मुझे भयभीत करने की आवश्यकता नहीं है. आज भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय में ऐसी कई परिविक्षायें मेरे विरुद्ध विचाराधीन है. दुःख इस बात का है क़ि इसमें कई अन्य महाशय भी लपेटे में घूम रहे है. कृपया धमकी देने से पहले खूब सोच विचार लें. रही बात बुध-शुक्र के साठ एवं नब्बे अंशो पर होने की, तो अब तो आप के इस कथन के साथ ही इन सबका औचित्य ही समाप्त हो गया. अब मुझे उम्मीद है, आप से मेरी मुलाक़ात उच्च न्यायालय में होगी. धन्यवाद.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

आप ने बहुत अच्छा उदाहरण दिया है. नल का जितना वाल्यूम होगा उससे ज्यादा जल की अपेक्षा की भी नहीं जा सकती. तो अब आप के बौद्धिक वाल्यूम के बारे में क्या कहना? महाशय, बुद्धि का वाल्यूम बढायें. मोटा उदाहरण देखें. चश्में में जितने तरह के शीशे लगायेगें, उतने तरह का दृश्य दिखाई देगा. ग्रहों के जितने रूप एवं जितनी स्थिति होगी उसका बल भी उतने प्रकार का होगा तथा उतने फल मिलेगें. उन्ही स्थितियों के आधार पर उनके बल का निर्धारण होगा. बल ही फल का आधार होता है. दोनों को अलग अलग नहीं किया जा सकता. मैंने उनचास स्थितियों का स्पष्ट उल्लेख किया है. वह भी स्थैत्य गणित से प्रमाणित. बार बार उसे पढ़ें, ज्ञात हो जाएगा. रही मिसगाइड होने की बात, तो गाइड भी विजिटर को नहीं बल्कि पोजीशन नैरेट करता है. नल का वाल्यूम उसकी अधिकतम क्षमता को दर्शाता है. क्या नल की क्षमता से कम पानी उस नल से नहीं निकाला जा सकता? अहम् की भावना को छोडिये. जैसा क़ि आप की भाषा से स्पष्ट है, आप अपने आप को विशेष पाठक मान रहे है. शायद आप को यह नहीं मालूम क़ि पाठको में कितने ऐसे है जो हो सकता है हम से ज्यादा ज्ञान रखते हो. रही बात रूचि की, तो रूचि के लिए सिद्धांत से समझौता मेरे वश के बाहर की चीज है. यह कोई बाजार की सब्जी नहीं है जिसमें दवा का इंजेक्शन लगाकर रातो रात बड़ा किया जा सके. और अंत में यदि कुछ समझना या समझाना है तो उसके अनुरूप क्रिया-प्रतिक्रया व्यक्त कीजिये. यह छोडिये क़ि आम या ख़ास पाठक क्या चाहता है. शिक्षक एक होता है. शिक्षार्थी अनेक. फिर उन्ही शिक्षार्थियों में से अनेक शिक्षक बनते है. आम पाठको के बारे में आप अपनी धारणा को बदलिए. और कुछ सीखिए, ताकि औरो को भी आप ख़ास बना सकें.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

यहां भी मिसगाईड कर रहे होफल कितने प्रकार से देता है व बल कितने प्रकार का दोनो को मिकस कर रहे  हो जबकि दोनो अलग है  जैस एक नल का व्योलूम कितना है तथा प्रैशर कितना दोनो अलग है बल गणना तो 24 प्रकार होती है  मैने सोरस भी बता दिए पर आप बल गिनने के 49 तत्वो का सोरस नही बता सके पुन ध्यान रहे  जो आप 49 प्रकार बता रहे है ईससे ये पता लगेगा कि ग्रह क्या फल देगा उसका सफीयर क्याहोगा   तथा बल से  उस फल की मात्रा  व गुण का पता लगेगा बाकी करम बिकता है धन्यवाद  दूसरे लेख मे जो गैसो का वर्णनकरते हो आम पाठक की ऊसमे कोई रूची नही उलटा चाहकर भी भाषा देख कर   छोड कर आगे बढ जाते है सिर्फ प्रभाव डिसकस करो तो कोई रूची भी ले

के द्वारा: snsharmaji snsharmaji

के द्वारा: shailesh001 shailesh001

किसी भी ज्ञान को हठ वश या अज्ञानता वश छिपाने या न प्रकट करने का ही परिणाम है क़ि आज हिन्दुस्तान में हिन्दुओ को दोयम का दर्ज़ा प्राप्त है. धर्मगुरु का शिक्षण-प्रशिक्षण मैंने उसी संगठन से प्राप्त किया है जिसे आप बताना नहीं चाहते क्योकि मुझे ऐसा लग रहा है क़ि आप की स्थिति संगठन में अब धर्म गुरु की नहीं रह गयी है. और मुझे विश्वास है क़ि आप मेरे बारे में बहुत कुछ जान गए है. तो फिर आप क्यों डर रहे है क़ि आप की रोजी रोटी पर मै लात मार रहा हूँ. क्या आप के जजमान इतना भी आप पर विश्वास नहीं रखते क़ि वे इतना जल्दी टूट जाने पर उतारू हो जाते है. इस बात का संकेत आप के इस प्रकाशन से मिलता है क़ि आप को मै जजमान पटाने वाला लगता हूँ. तो आप चिंता न करें, आप जजमानी निर्भीक होकर करें. दूसरी बात यह क़ि मै तो मानने वाला हूँ क़ि- "यद्यपि जग दारुण दुःख नाना. सब तें अधिक जाति अपमाना." आप जैसा क़ि कह रहे है, और हठ वश याद दिला रहे है क़ि आप जन्म से ही ब्राह्मण है. कर्म से क्यों नहीं है? तो यदि कर्म से ब्राह्मण नहीं है तो यह आप के अनुरूप ही है क़ि ब्राह्मणत्व, हिंदुत्व एवं जाति महत्ता एवं गुरुता को न समझें. मेरे विचार से कर्म से भी यदि ब्राह्मण आप बनना सीख लें तो अच्छा रहेगा. शिव, विष्णु दुर्गा या अन्य देवी देवता या उनका अस्त्र-शस्त्र कभी नहीं आता. यहाँ दो बातें है. खूब साफ़ हाथ पर भी चिपके विषाणु कीटाणु नंगी आँखों से दिखाई नहीं देते है. इसके लिए सूक्ष्म दर्शी जैसे यंत्रो की आवश्यकता पड़ती है. दृष्टि, ध्येय एवं परिणाम तदनुरूप बनाएं, सब कुछ दिखाई देने लगेगा. सब देवी देवता एवं उनके अस्त्र-शस्त्र दृष्टि गोचर हो जायेगें. मेरा प्रशिक्षण ही ऐसे संगठन के परिवेश में हुआ है क़ि क्रोध उसका एक आवश्यक अँग बन कर रह गया है. आप को ज़ुल्म सहने की आदत सी पड़ गयी है. अब यह पता नहीं क़ि ज़ुल्म करने की भी आदत है या नहीं. मै तो नहीं सह सकता. वैसे यदि विषय से सम्बंधित थोड़ा बहुत ज्ञान अर्जित कर लें तो कल्याण हो. वरना उसी अंधे भिखारी की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी जिसके हाथ में रखा सोने का सिक्का भी कंकड़ ही प्रतीत होता है.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

श्रीमान जी आप बुध को अधिकतम 28 अंशो पर सीमित करते है या 8 अंशो पर यह आप क़ी गणना हो सकती है. किन्तु सिद्धांततः यह अधिकतम 48 अंशो तक जा सकता है. सच्चाई का पता लगाने के लिये आप को पहले इसके मूलभूत सिद्धांतो का अध्ययन करना पडेगा. पहले यह जाने कि सूर्य के सापेक्ष बुध धरती से कम से कम और अधिक से अधिक इसके वलय परिखा से बनने वाले कल्पित त्रिज्या से कितने अंश का कोण बना सकता है. अस्तु, यह आप क़ी समस्या है. वैसे संकेत कर दूँ कि आदि कवि बाल्मीकि ने श्री राम के जन्म के समय समस्त ग्रहों को तुन्गस्थ बताया है. क्या आज क़ी आप क़ी गणना इसका अनुमोदन करती है? तों क्या बाल्मीकि जी लबार थे? कृपया अवश्य देखें.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

जब अंगूर नहीं मिल सके तो लोमड़ी ने बहाना बनाया क़ि अंगूर खट्टे है.जब मूल भूत सिद्धांतो के मनन एवं चिंतन आदि में असमर्थता प्रगट हुई तो एक नहीं अपितु अनेक सिद्धांत प्रकाश में आ गए. श्रीपति, नीलकंठ एवं केशव आदि जिनके आप पाठक है, ऐसे ही सिद्धांतो के प्रणेता है. ज़रा पूर्वाग्रह छोड़कर ऋषिप्रणीत सिद्धांतो को देखें, उनमें अपने सिद्धांतो के प्रति दृढ विश्वास था. और तभी उन्होंने समयानुसार ग्रह-नक्षत्र परिभ्रमण के अनुपात में काल गणना को निर्धारित करने का निर्देश दिया था. अन्यथा गणना के शुरूआत में महादशा की गणना के लिए प्रारम्भिक नक्षत्र अश्विनी ही था. यह उन्ही नियमो एवं गणना का परिणाम है क़ि विचलन को ध्यान में रखते हुए आज इसकी अर्थात महादशा की शुरुआत कृत्तिका से के जाती है. यह पौराणिक गणितीय परम्परा ही है क़ि कभी मीनांत में उच्च का होने वाला सूर्य आज मेष राशि में उच्च का माना जाता है. किन्तु अंगरेजी गणना प्रत्यक्ष विचलन के बावजूद भी परिवर्तन के लिए आवश्यक नहीं समझी गयी. किन्तु आप भी संभवतः इससे परहेज रखना चाहते है. तभी हठ पूर्वक सिद्धांतो में ही परिवर्तन चाहते है, अपनी चर्या में नहीं. आगे, आप ज्योतिषीय सिद्धांतो को या तो सीमित कर उसकी महत्ता को लांछित या विद्रूप करना चाहते है या फिर सम्बंधित गणित का शायद सम्यक ज्ञान नहीं है. कर्क हो या मकर, रेखाओं से ही वृत्त का विभाजन होता है. और रेखाओं से घिरे खंड को कर्क, मकर आदि संज्ञा दी गयी है. कोई भी गोल जिन रेखाओं के द्वारा विभाजित होता है, और उन्हें जो नाम दिया गया है, वे ही राशियाँ है. कर्क रेखा केवल भारत में ही नहीं गुजराती है. यह धरती के अनेक देशो से होकर गुजराती है. पृथ्वी के मानचित्र का अवलोकन करें, स्पष्ट हो जाएगा. प्रत्येक वृत्त या गोल, रेखाओं या राशि खंडो में विभाजित है. प्रतेक ग्रह का अपना भ्रमण क्षेत्र या कक्ष्या निर्धारित है. भ्रमण के कारण किसी ग्रह का कोई खंड किसी ग्रह या पृथ्वी के किसी भाग के सम्मुख पड़ता है तथा कभी अन्य हिस्सा. अब यदि आप कहे क़ि केवल धरती पर ही कर्क वृत्त है, दूसरे ग्रह पर नहीं, तो आप के नहीं का मेरे पास कोई उत्तर नहीं है. क्योकि शेष लोग जो ज्योतिष को माने या न माने, इतना अवश्य पढ़े है क़ि प्रत्येक गोल व्यास, त्रिज्या एवं जीवा आदि चाप खंडो के द्वारा ही विभाजित किया जाता है. किन्तु आप सिर्फ धरती को ही गोल मानते है. हठ के सिवाय आप के इस कथन का कोई आधार नहीं है. ज़रा एनी सिद्धांत ग्रंथो का भी अवलोकन करें, किन्तु यह मेरी सम्मति है क़ि केवल आर्ष ग्रंथो का ही अवलोकन करें. जहाँ तक कर्म का सवाल है, उसका निर्धारण आप किस सिद्धांत पर करते है, इसका उल्लेख आप ने कही नहीं किया है. सबके अपने अलग अलग कर्म है. पैसा एक शिक्षक भी कमाता है तथा एक वैश्या भी. शिक्षक ज्ञान बेच कर तथा वैश्या शरीर बेच कर. आप किस कर्म को बेचने का संकेत कर रहे है, यह मै नहीं समझा.

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जिन सोम आदि सूर्य सिध्दातो का आप ने जिकर किया वो चौथी शताब्दी से पहलेके थे व गणना मे भेद से  अव्यवहारिक हो गये थे इसलिए चौथी सदी मे नया सूर्य सिध्दान्त बनाया गया ये 19सदी तक यो ही चला  फिर पता चला कि रेवती अन्त से  3 दिन का फर्क हो गया है केतकर आदि विद्वानो ने गहरा मंथन किया था  दूसरी बातफिर दोहराता हूं 24 तत्व ग्रह बल निर्धारणकरते है सन्दर्भ ग्रन्थ श्रीपति व केशव पद्धति व  अनेकजातक ग्रन्थ  कहो तो कुछ आपकी ईमेल पर भेज सकता हूं   अब आप अपने आधार को स्पष्ट,करे49 तत्व कौन से हैं तीसरी बात मै ध्रुवो की बात नही करता वरन भारत की करता हू जिसके मध्य से कर्क रेखा जाती हैं व हम रहते है साल का मान तो ध्रुवो पर भी ईतना ही है हा दिन रात व मौसम अवधि का फरक है  चौथी बात राशी चक्र एक ही है जो धरती के भ्रमण पथ के उपर चारो ओर परिधि    मे नभ स्थित तारो का समूहहै व निश्चित है वअपने हिसाब से भ्रमण करता है सिरफ ग्रहो का भ्रमण पथ अलग है  राशी चक्कर एक है दोस्त ध्यान रखो करम बिकता है करम बलवान तो  बूम्बला भी सोने के भाव बिक जाता है  आपने अपने लेखो मे खुद ये स्वीकार किया है जहांबिलगेट बाल साहिब दिलिप सोनिया आदि का  जिकर किया है धन्यवाद विषय से भटकाव से कुछ नही मिलने वालागैगरीन सही था हमारी तरह जिदी नही  किहम अपनी गलती नही मानेगे

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इस बारे एक कडवी बात है कि मास्टर पटवारी पुजारी सेलसमैन  नेता कभी अपनी बात को हीन नही होने देते  चाहे गलत हो या विषय से हट कर  इन्हे चापलूसी की आदत होती है आपने इतनी मेहनत की पर  कथा वाचन  ने नीरस बना दिया कुछ लेखो मे सार है वह  भी इस की भेंट चढ गया  वैष्णो देवीका चमत्कार हो या दूसरेी पौराणिक कथा इन मे कम लोग रूची लेते है  न विष्णु बोलते है न शिव न पार्वती कोई देव नही आया था लेखको ने अपने विचार समझाने  के लिए संवाद रूप मे लिख दिए  फिर  पिछला समय इन बातो पर विश्वास नही करने देता सिर्फ हिन्दू ही इन पुस्तको को मान्यता देते है मुस्लिम नही 1500 साल से हिन्दू गुलाम है जजिया दिया धन लुटा कत्ल हुए बहू बेटिया अरब के बाजारो  मे   कमाया मन्दिरों मे रखा मुसलमान लूट ले गये  भारत मे आज भी हिन्दू दोयम दरजे के नागरिक है ,न तो विष्णु का सुदर्शन आया न शिव की  त्रिशूल,न देवी की तलवार आई न राम का धनुष और न हनुमान की गदा झूठी वाह वाही का शोक है तो  अलग बात है वरना बाजार मे चीज रखी है तो भाव बताने से चिड क्यो लोग भाव पूछ कर खरीदे या न  गुस्सा हैतो बाजार मे सौदा मत रखो अधिकतर ळेख इसी स्तर के है समाज का क्या हित हुआ इसलिए फीचर्ड  नही हुए कडवी सचाइ के लिए माफ करना पढ कर एसा लगा जैसे ग्राहक पटा रहे हो मै भी जन्म से ब्राहमण हू जातीवाद से हिन्दुओ का ह्रास हीहुआ है जब हिन्दू ही नही रहेंगे ब्राहमण कहा बचेंगे  धन्यवाद आप के लेख  न पढे तो क्या नीन्द न आयेगी ये धर्म गुरू का आचरण नही हैकि बेकार गुस्सा करो  

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नहीं का जबाब एवं मौत का इलाज़ आज तक इजाद नहीं हुआ है. मै कुछ भी कहू तथा आप ना कहते जाय. फिर मुझे झक मार कर निरुत्तर होना ही पडेगा. यदि मन्त्र में शक्ति नहीं होती तो गाली का एक छोटा सा शब्द बोलते ही दूसरा व्यक्ति क्यों पिल पड़ता है? और पुचकारने पर कुत्ता नजदीक क्यों चला आता है? संभवतः आप ने इधर ध्यान देना उचित नहीं समझा. जिससे आप इसकी गुरुता से अनभिज्ञ रहे. आप ज़रा भारतीय ग्रंथो का भी मौक़ा निकाल कर कभी कभार अध्ययन कर लिया करें. रही बात हिन्दुस्तानी औरतो के अरब के बाजारों में नीलाम होने की, तो वह तो गनीमत थी. कम से कम अपने देश के लोग तो उनका सम्मान करते थे. आज तो अपने देश की औरतें अपने ही देश में नीलाम हो रही है. वह भी जबरदस्ती. जब क़ि थोक के भाव में समाज सुधारक नीजी तथा सरकारी स्तर पर दिनरात कार्यरत है. और विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र आज हिन्दुस्तान में अपना पाँव जमाये हुए है. जब क़ि उस समय में राजतंत्र हुआ करता था. और तब औरतो की यह स्थिति है? एक स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है. जिस तरह से प्रथम कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे को "क से कबूतर, ख से खरहा या ए फार एपिल, बी फार बाल" पढ़ाया जाता है, इस इच्छा से क़ि वह बच्चा एक प्रसिद्ध डाक्टर, वकील या शिक्षक बनेगा. किन्तु फिर भी उसे प्राथमिक कक्षा में ही पायिथागोरस का प्रमेय या हाब्स, लाक एवं रूसो के सिद्धांत या दर्शन नहीं पढाये जाते. ठीक उसी प्रकार मन एवं तन को शक्तिशाली बनाने के लिए प्राथमिक स्तर पर इन मन्त्र-यंत्र-तंत्र का सहारा लेना ही पडेगा. एक बात की मुझे अवश्य खुशी है क़ि आप ने कम से कम मन्त्र को यह तो माना क़ि यह मन को एकाग्र करता है. चलिए प्राथमिक स्तर की पढ़ाई तो आप ने पूरी कर ही ली. दूसरा चरण आप ने इस तरह पूरा कर लिया क़ि कोंहड़ा कहते ही एक सुन्दर लाल फूल की कल्पना बन जाती. एक शब्द "कोंहड़ा" शब्द में इतनी तो ताक़त है. एक शब्द ने कितना चित्र खींच दिया? यह है मन्त्र की शक्ति. साधन, साधक, साध्य एवं साधना आदि की बात पढ़ने एवं सुनाने तथा सुनने में ही अच्छी लगती है. जैसे भूख मिटाने की बात आप ने कही है. पैसे से भूख नहीं मिटती है बल्कि अन्न से भूख मिटती है. तो अन्न से ही कहाँ भूख मिटती है? अगर भूख मिटने को होती तो फिर यह दुबारा या बार-बार क्यों लगती रहती है? "भोगो न भुक्ता स्वयमेव भुक्ता." ये सब दार्शनिक या दूसरी तरह से अपने मिथ्या सिद्धांत को कुतर्को द्वारा आधार प्रदान करने की एक प्रक्रिया है जो आज कल धड़ल्ले से स्थान पाती चली जा रही है. आज जरूरत है इसे ही लोगो को समझाने एवं हमारी समृद्ध भारतीय ज्ञान रूपी धरोहर को सुरक्षित एवं संरक्षित करने की. मुझे विश्वास है, आप भी अपनी क्षमता के अनुरोप अवश्य योग दान देगें. धन्यवाद

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जब हमारे स्वदेशीय ग्रन्थ ऐसे अक्षुण ज्ञान से भरे पड़े है जिसका अनुकरण कर आज विदेश विकशित देशो की श्रेणी में स्थान पा रहा है और हम इसकी उपेक्षा कर अभी भी विकाश शील ही है, तो फिर मै ऐसे संपन्न ज्ञानोदधि Astrology को छोड़ कर Astronomy जैसे एकांगी सिद्धांत का अध्ययन क्यों करूँ? सूरदास प्रभु काम धेनु तजि छेरी कौन दुहावे. जिसे अपने धर्म ग्रंथो पर भरोसा नहीं उसे सही तथ्यों का ज्ञान एवं उपलब्धि हो ही नहीं सकती, यह मेरा मानना है. भिखारी भिखारी ही बना रहेगा यदि उद्योग न करे. मरीज रोगी ही बना रहेगा यदि चिकित्सा न करे. ग्रह गोल आधारित ज्योतिषीय गणनाएं रोग, भय, लाभ एवं हानि को चिन्हित कर उसका कारण बताती है. और प्रभावित को उसके अनुकूल आचरण करना पड़ता है. और तभी भिखारी राजा एवं राजा भिखारी बनता है. इसी तथ्य को समझे बिना ज्योतिषी लोग इस पर ऊंगली उठाने का मौक़ा देते है. आप के कुछ एक संशय स्पष्ट नहीं है. जैसे "पेरीजी, चन्द्र का महाद्वीप सम्बन्ध आदि". इसलिए उनके सम्बन्ध में मै कुछ नहीं कह पा रहा हूँ. धन्यवाद

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संभवतः आप ने अब तक सही तथ्य का अध्ययन नहीं किया है इसीलिए आप को मेरी बात गलत लगी है. आप निम्न प्रश्नों का उत्तर अपने आप से मांग लीजिएगा. सही का प्रत्यक्षीकरण एवं धरातलीय अनुभव भी प्राप्त हो जाएगा. ज्योतिषीय सिद्धांत प्राचीन है या कम्प्युटर? ज्योतिष के सिद्धांत के आधार पर कम्प्युटर का साफ्ट वेयर बना है या कम्प्युटर के साफ्ट वेयर के सिद्धांत के आधार पर ज्योतिष? कम्प्युटर की तकनीक प्राचीन है या ज्योतिष की? कम्प्युटर के साफ्टवेयर डेवेलपिंग एवं प्रोग्रामिंग में ज्योतिष के किन सिद्धांतो एवं तथ्यों को उपेक्षित एवं गृहीत किया गया है? इसके लिए आप को थोड़ा समय महर्षि पाराशर कृत पाराशर होरा शास्त्र एवं पाराशर संहिता के कुछ श्लोको पर ध्यान देना पडेगा. यथा अध्याय 38 श्लोक 69 एवं अध्याय 57 श्लोक 36. मुझे आप की योग्यता पर अविश्वास नहीं है. किन्तु आप की भविष्यवाणी या फल कथन किन तथ्यों पर आधारित है यह मुझे नहीं मालूम. यह कम्प्युटर की कुंडली पर आधारित होने का ही परिणाम है क़ि आप की भविष्यवाणी या फल कथन शत प्रतिशत सत्य नहीं होता है. बल्कि केवल 90% ही सही होता है. क्योकि कम्प्युटर की ज्योतिषीय प्रोग्रामिंग ही इतनी ही सही होती है. आप का कम्प्युटर पर शुद्ध गणित के लोभ में आधारित होना ही इस बात का द्योतक है क़ि आप भी श्रम से जी चुराना चाहते है या अपने गणितीय ज्ञान पर भरोसा नहीं है. जहाँ तक प्रचलन का सवाल है, श्रम से जी चुराने का और कोई सहज तरीका है ही नहीं. प्रचलन के लिए तरीका इस्तेमाल करना ज्योतिषीयो के अपने विवेक पर निर्भर करता है. नालदंड (Placenta) में आवेष्टित भ्रूण ही बाह्य विकिरणों से सुरक्षित होता है. नालदंड से एक बार तरल द्रव स्रावित होगया , उसका सुरक्षा कवच टूट जाता है. और तब नवजात शिशु ग्रहों के प्रत्यक्ष विकिरण प्रभाव में आता है. यह महर्षि पाराशर का ही कथन नहीं बल्कि आज के आधुनिक विज्ञान (Anatomical Science) का भी कथन है. अब आप किस सिद्धांत पर इसे गलत मानते है, यह मुझे नहीं मालूम. 1983 में प्रथम FT की Floppy जब मैंने डेवेलोप कराई थी तभी मुझे इन त्रुटियों से साक्षात्कार हुआ था. और तब से ईश्वर की दया एवं आप लोगो की आत्मीयता से कम्प्युटर का अच्छा ज्ञान होने के बावजूद भी मै Manual Sketched कुंडली पर ही भरोसा करता हूँ. मेरी कितनी भविष्यवाणी सत्य हुई या मिथ्या हुई, इसका आंकलन मै नहीं रखता. कुंडली लिखते समय मुझे सिर्फ इतना ही भरोसा रहता है क़ि मैंने सम्बंधित सिद्धांतो का कड़ाई से पालन किया है. और अंत में मै आप का आभारी हूँ जो आप ने विषय वस्तु से सम्बंधित टिप्पड़ी की.

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सचाई सुनने को कोई तैयार नही नास्तिक विधर्म का जासूस आदि बहुत उपाधी मिलतीहैं मन्त्र मे कोई शक्ति नही होती  यदि मन्त्र मे ताकत होती तो  तिबत चीन का गुलाम नही होता तिबत मे बहुत तन्त्र होता है हिन्दू 1500 साल से गुलाम नही होते हिन्दू औरते अरब के बाजारो मे निलाम नही होती    ताकत मन मे होती है मन्त्र से मन की एकाग्रता मे सहायता मिलती है जिस से मन बलवान होता है जिसका मन बलवान उसे किसी मन्त्र की जरूरत नही यह एक व्यकतिगत अनुभूती है  मन्त्र सिर्फ साधन है जैसे पैसा  पैसे से भूख नही मिटती पर पैसा साधन है वस्तु खरीदने का  भूख  अन्न से मिटती है   जहां तक नाम का मतलब है तो गुलाब का नाम कोन्धरा रख देते तो भी कोई फरक नही पडता   कोन्धरा कहते ही सुन्दर लाल फूल की कल्पना बन जाती

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मेरे अन्य लेखो पर आप के विचार या प्रतिक्रया मुझे अच्छे लगे. किन्तु इस प्रतिक्रया से थोड़ी निराशा हुई है. क्योकि आप की विचार अभिव्यक्ति से मुझे आभास हुआ है क़ि आप को भी कम ज्यादा ज्योतिष में ज्ञान/रूचि है. इसलिए आप से आशा है क़ि आप मेरी प्रस्तुति में मीन-मेष अवश्य निकालें. हो सकता है मुझे कुछ ऐसी चीजें सीखने को मिल जाय जिसका ज्ञान मुझे नहीं हो. रही ज्ञान गंगा बहाने की बात, तो गंगा को बहने का मार्ग तो दिखाएँ. नहीं तो कोई भी नदी जब बिना मार्ग के उच्छ्रिन्खलता पूर्वक स्वतंत्र होकर बहना शुरू करती है तो अनेको गाँव बाढ़ विभीषिका से नष्ट हो जाते है. इसलिए आप एवं आप जैसे अन्य आचार्यो से अपेक्षा है, महाराजा सगर की तरह इस गंगा को मार्ग दिखायेगें. आप का हार्दिक स्वागत.

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लेख पर विचार प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद. वैदिक गणना न तो कभी गलत हुई है और न तो होगी. आप की जान कारी के लिए बता दूं, आप जिस तारीख की बात कर रहे है या जिस घंटा मिनट का विवरण आप ने दिया है, उसकी खोज करने वाला स्वयं ही अपनी इस गणना के प्रति आश्वस्त नहीं था. गैगरिन जिसने कैलेण्डर बनाया उसने स्वयं कहा था क़ि इसका शोधन प्रति चार सौ वर्षो में होना चाहिए. किन्तु श्रम परांगमुख नियुक्त विद्वत समुदाय ने इसे उपेक्षित कर दिया. आज विचलन घंटा मिनट में है, न क़ि वैदिक (सूर्य सिद्धांत या ग्रह लाघवीय) गणना में. परिधि मैंने किलोमीटर में बतायी है. उसे मील या योजन में बदला जा सकता है. सूर्य सिद्धांत चौथी शताब्दी नहीं बल्कि सोमदत्त, कृषभानु, अजमेय, पौह्लीक एवं विजम्भ्रण आदि खगोल शास्त्रियों द्वारा ईशा पूर्व 1120 में ही संकलित कर लिया गया था. इसका उल्लेख जैनधर्म के आदि पुराण में भी आता है. और जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी का अभ्युदय ईशा पूर्व 626 इतिहास कारो ने माना है. कूर्म विभाजन के अनुसार वर्ष गणना धरती के विविध हिस्से के लिए पृथक पृथक है. दोनों धुरियो पर वर्षकाल का मापदंड विषुवत रेखीय प्रान्तों से सदा ही पृथक होगा. ऐसा पृथ्वी की बनावट के कारण है. सौर मंडल के प्रत्येक गोल (ग्रह या पिंड) पर अपना अलग राशि चक्र या भूखंड वैशेष्य होता है. जो एक दूसरे से भिन्न होता है. अंतरिक्ष में कल्पित ज्या खंडो का सामी धरती या किसी एनी ग्रह-पिंड से करना गलत है. सूरज धरती के किस भूखंड-राशि चक्र में है उससे अंतरिक्ष के वृत्तीय खंड का साम्य कैसा? भवृत्तीय या क्रान्तिवृत्त के उन्नयन या अवनयन का क्या औचित्य? और इसी कारण गणना विचलन और तदुपरांत फल स्थापन में भेद उत्पन्न होता है. अध्ययन जारी रखें. इसी तरह इस विषय में कुछ किया जा सकता है.

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मेरे किसी भी लेख पर अब तक का सार्थक विचार प्रस्तुत हुआ. किसी भी ग्रह की दृष्टि तभी प्रभावी होती है जब वह अपने उस तल या सतह से प्रकाश परावर्तक हो. कालिमा या किसी गहरे रंग वाले पृष्ठ से किसी भी तरह के परावर्तन का कोई कारण नहीं बनाता है. भाव, ग्रह एवं राशियों का अपना अलग अलग बल होता है. सबकी गणना चौबीस विन्दुओ पर ही आधारित नहीं है. भाव बल 128, राशि बल 28 एवं ग्रह बल 49 विन्दुओ से निर्धारित किये जाते है. दृष्टि प्रभाव सबसे बली होता है. प्रबल गुरुत्व एवं घनत्व वाली किरणे अपने पभाव क्षेत्र में आने वाले समस्त ग्रहों की किरणों को पराभूत कर देती है. चाहे वह ग्रह उच्च, स्वक्षेत्री या मूल त्रिकोण में ही क्यों न हो. प्रकाश परावर्तन का सिद्धांत आज इसी तथ्य पर आधारित है. और आज एंटी बैलिस्टिक मिसाईल की खोज का आधार भी यही तथ्य है. कोई ग्रह किसी भाव में बैठने मात्र से ही प्रभावी नहीं हो सकता. यह निर्भर है उसके बैठने के आधार के ऊपर. यदि बैठने वाली सतह परावर्तक है तभी पाप या शुभ ग्रह कोई प्रभाव दे सकता है. इसके विपरीत यदि उस ग्रह की बैठने वाली सतह काली, गहरे रंग की या प्रकाश सश्लेशक है, तो उसके बैठने का कोई भी प्रभाव नहीं होगा. ज्योतिषीय विषयो पर रूचि दिखाने के लिए धन्यवाद.

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धरती की परिधि  कि मी से  भी ज्यादा है साथ ही जो गणना आपने की ये स्थूल है सही नही  धरती का अपनी धुरी पर घूमना 24 घन्टे से 4 मिनिट कम है भारतीयो द्वारा चौथी शताब्दी मे जो सूर्य सिध्दान्त बनाया गया था वह भी सही नही निकला और वर्ष 8 पल  अधिक हो गया रेवन्त्य से तीन दिन का  विसखलन हो गया था  जिस से  संक्रान्ती तीन दिन  बाद हो गई कुछ दक्षिण भारतीय पचांगकारो ने ईस गलती को ठीक भी किया था  पर उतर भारत मे वही रखा  और आगे  गलती न हो ये इन्तजाम किया लग्न धरती के घूमने पर निर्भर है  राशी चक्र स्थिर है धरती से  राशि चक्र का जो भाग  सूरज के पार सामने उसी राशी मे सूरज माना जाता है प्रयत्न के लिए बधाई

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श्री शैलेश जी, मैंने उस द्रव को अवश्य देखा नै. किन्तु जैसा क़ि मै पहले ही बता चुका हूँ, यह द्रव बहुत कम समय में ही सीमेंट जैसा जम जाता है. उन जंगली बनमानुषों की लड़ाई के बाद दोने में जो चिपका द्रव पदार्थ होता है, जो बिलकुल सीमेंट जैसा पत्तो पर ही जम चुका होता है, तथा जिसमें मिट्टी एवं रेत मिला होता है, वही देखने भर को मिला है. जिसे पोर्टर के तौर पर उन बीहड़ो एवं जंगलो में सेना की सहायता करने वाले उन जंगली वनमानुषों द्वारा दिखाई गई. द्रव के रूप में या मूल रूप में तो संभवतः सभ्य दुनिया ने आज तक नहीं देखा है. और संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में सेना की देख रेख में उस समुदाय के पुनरुद्धार के साथ डाक्टरों की निगरानी में उस द्रव पदार्थ की भी उपलब्धता सुनिश्चित करने का प्रयास जारी है. असल में यहाँ सेना को एक साथ कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. ये मानव सेना के साथ बहुत भयंकर धोखा भी कर देते है. सेना के हथियार लेकर भाग जाते है. तथा उसी की सहायता से समुद्री लुटेरे का भी काम करते है. लेकिन उनका विश्वास जीतने के लिए सेना को इसे नज़र अंदाज़ करना पड़ता है. ईश्वर जाने सभ्य दुनिया को इन्हें मुख्य धारा में लाने में कब तक सफलता मिलेगी.

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किसी भी नग का टूटना कभी अशुभ नहीं होता है. कोई भी नग तभी टूटता है जब अंतरिक्ष की किन्हीं प्रतिकूल किरणों का सघन जाल उस नग के प्रतिरोधक क्षमता से ज्यादा तीव्र तरंग उत्सर्जित करने वाला होता है. उस अवस्था में नग टूट जाता है. तथा आने वाली विपदा से मुक्ति मिल जाती है. क्योकि आने वाली विपदा कारक का क्षय उस नग में ही हो जाता है. इसका उदाहरण बड़े बड़े भवनों पर लगाए जाने वाला तडित चालक यंत्र है. जो आकाशी बिजली के भवन पर गिराने पर यह उसे अवशोषित कर लेता है. तथा उसे ज़मीन में पहुंचा देता है. तथा भवन सुरक्षित बच जाता है. किन्तु यदि आकाशी बिजली की तरंग तीव्रता सघन हुई तो वह तडित चालाक भी उसे वहन नहीं कर पाता है. तथा भवन को आंशिक रूप से नुकसान पहुँच सकता है. जैसे वर्तिका नग की तरंग वहन क्षमता 27 लेम्डा के करीब आंकी गयी है. यदि अंतरिक्ष से आने वाली प्रतिकूल एवं हानिकारक किरण का समूह इससे ज्यादा तीव्र तरंगित होगी तो उस ऊर्जा को वह नग उतनी तीव्रता से अपने सर्किट या ऊर्जा वाहिनी से प्रवाहित नहीं कर पायेगा. ऐसी स्थिति में वर्तिका नग टूट जाएगा. यह नग अशुद्धता से स्पर्शाघात पाने पर भी टूट जाता है. किन्तु ऐसा तभी होता है जब तक इसे धारण न किया जाय. धारण कर लेने के बाद अशुद्धता भी इसे नहीं तोड़ पाती. क्योकि उस अवस्था में इसका सर्किट शरीर के संवहन तंत्र से जुड़ गया होता है. किन्तु टूटना यह सूचना अवश्य दे देता है क़ि कोई आपदा आने वाली थी. जो नग पर ही गुज़र गयी.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

परम आदरणीय राय साहब, सादर प्रणाम! यह सही है कि मैं न तो आपकी सभी रचनाएँ पढ़ पाता हूँ, न ही सभी पढी हुई रचनाओं पर टिप्पणी ही कर पाता हूँ ..... पर कुछ रचनाएँ जो आपकी होती हैं गृह चाल आदि से हटकर उन्हें मैं ह्रदय से नमन करता हूँ और आपके प्रति मेरा हार्दिक सम्मान, एक सोपान और ऊपर चढ़ जाता है. चूंकि मैं भी गाँव से सम्बन्ध रखता हूँ और आपके द्वारा वर्णित दृश्य और गीत को अक्षरश: सही मानता हूँ! आपके गीत के भाव और शब्द सबकुछ मैं समझ पाता हूँ ..... आपके सम्मान में आपकी ही भाषा में कहना चाहूँगा -- विद्या ददाति विनयं विनया ददाति पात्रताम! पात्रत्व धनामाप्नोती, धनात धर्मं ततः सुखं. सादर प्रणाम! आपके आशीर्वाद का आकांक्षी!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

आदरणीया सुश्री रजनी जी मैं आप का ध्यान निम्नांकित कुछ तथ्यों की तरफ आकर्षित करना चाहता हूँ. 1-आप कैसे विश्वास के साथ कह सकती है क़ि अमुक मन्त्र/तंत्र सिद्ध है? 2-यदि मन्त्र सिद्ध हुआ भी तो आप कैसे विश्वास के साथ कह सकती है क़ि आप उस मन्त्र को सही पढ़ रही है? आप ज़रा देखें- (क)- शंख- इसमें "श" के ऊपर लगी बिंदी को क्या उच्चारित करती है? (ख)-शम्भू-इसमें "श" के ऊपर लगी बिंदी को क्या उच्चारित करती है? (ग)-शान्ति- इसमें "श" के ऊपर लगी बिंदी को क्या उच्चारित करती है? अब आप ही देखें क़ि एक ही अक्षर "श" उसमें अलग अलग शब्दों में लगी बिंदी को कही "म" जैसे शम्भू में तथा "न" जैसे शान्ति में उच्चारित करती है. फिर आप स्वयं ही अनुमान लगा सकती है क़ि आप भले मन्त्र सिद्ध हो, किन्तु उनका उच्चारण कैसे और कितना शुद्ध करती है? शास्त्रीय एवं व्याकरण के मतानुसार - "अकुह विसर्जनीयानाम कंठः" अर्थात अ, कवर्ग अर्थात क से लेकर अँग, ह तथा विसर्ग का उच्चारण कंठ से किया जाता है. "ईचुयशानाम तालुह" अर्थात ई, चवर्ग अर्थात च से लेकर याँ तथा य का उच्चारण तालू- जिह्वा के निचले भाग से किया जाता है. "ल्रीतूलासानाम दन्तः" अर्थात लकार, तवर्ग अर्थात त से लेकर न तथा स का उच्चारण दांत से किया जाता है. "ऊपूपध्मानीयानाम ओष्ठः" अर्थात ऊ, पवर्ग अर्थात प से लेकर म तक का उच्चारण ओठ से किया जाता है. आदि--- अब आप देखिये क़ि मंत्रो का उच्चारण हमारे द्वारा कितना शुद्ध किया जाता है? दूसरा- "गीती शीघ्री शिरः कम्पी तथा लिखित पाठकः. अनर्थाग्यो अल्पभाषी च षडेते अधम पाठकाः" अर्थात गा गाकर , जल्दी जल्दी, सर हिला हिलाकर, लिखकर, बिना अर्थ जाने तथा हकलाकर मन्त्र पढ़ने वाले -----ये 6 पाठक अधम कहे गए है. अब हम अनुमान लगा सकते है क़ि हम कौन सी श्रेणी के पाठक है? संभवतः मैं आप का संशय कुछ हद तक दूर करने में सक्षम हो सका? आप ने इस परम गूढ़ तथा अति पवित्र विषय में रूचि लिया , आप धन्यवाद की भागिनी हैं.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

आदरणीया सुश्री रजनी जी यंत्र-तंत्र बहुत ही सशक्त उपाय है. और मुझे पूर्ण श्रद्धा है. भरपूर विश्वास भी है. किन्तु उन्हीं यंत्रो पर विश्वास है जिनका अनुमोदन एवं विश्लेषण हमारे अथर्ववेद में दिया गया है. तथा जिनका ठोस वैज्ञानिक आधार है. शेष जो पता नहीं कितने यंत्र एवं ताबीज़ आदि बनाकर, जिनका कोई वैदिक आधार नहीं है, कुछ तथा कथित विशेषज्ञों द्वारा दिया जाता है, उसे मैं नहीं मानता हूँ. यद्यपि मैं उसे झूठा नहीं कह सकता. क्योकि यदि मुझे उसका सम्यक ज्ञान नहीं है. तो मैं उसे चुनौती नहीं दे सकता. किन्तु मैं नहीं मानता. आप मेरे इसके पूर्व लिखे ब्लॉग "मन्त्र-यंत्र-निराकरण के सशक्त उपाय" को देख सकती है.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

आदरणीय पंडित जी, सादर प्रणाम! एक बात तो स्पष्ट है की आपके शीर्षक से बहुत सारे लोग आकर्षित हुए हैं! रही बात आत्म सुधर की तो आपने मार्ग सही बताये हैं और हमें स्वयम को की सबसे पहले अपने आप को काटते , छांटते, तराशते अर्थात उपर्युक्त दुष्प्रवृत्तियों से सदा ही पृथक करके जाज्वल्यमान या दीप्तिमान बनाना पडेगा. और तभी हम अपनी उस नियंत्रित ऊष्मा या ऊर्जा से दूसरे को प्रस्फुरित कर उन्हें वास्तविक सुख, खुशी एवं आनंद दे सकते है. कृपया ज्ञान की धारा बहते रहे. कभी न कभी कोई न कोई तो चेतेगा ही और फिर शायद हम जिस सुख और आनंद की खोज में बहार भटक रहे हैं वो शायद अन्दर ही मिल जाय! आपका आशीर्वाद से मूरख मंच भी आबाद रहे यही कमान करता हूँ! पुन: प्रणाम!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

मेरे प्रिय भाई शैलेश जी आप ने इस लेख को प्रतिक्रया देने के उद्देश्य से नहीं पढ़ा. बल्कि आप ने लेख की अवधारणा को देखा. पता नहीं क्यों मुझे कभी कभी लगता है क़ि इस मंच समुदाय में अभी कुछ लोग ऐसे है जो लेख पढ़ते है. लेखक को नहीं. भाई जी, लेख लिखते समय तो आंसू नहीं निकले किन्तु आप ने कुरेद दिया तो निर्लज्जता के आतप से सूखे नयन सागर भी निचुड़ गए और तलहटी में कुछ शेष बचे शर्म हया आंसू का रूप धारण कर टपक ही गए. त्याग, तपस्या, बलिदान, सेवा, वात्सल्य एवं आत्मीयता की साक्षात मूर्ती मा का आविर्भाव निश्चित ही उसके पापो या किसी चूक का परिणाम ही है. अन्यथा अधर्मी एवं कृतघ्नता के ढेर के रूप में उसे संतान प्राप्ति क्यों होती? कुपुत्रो जायेद क्वचिदपि कुमाता न भवति.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

श्रद्धेय पंडित जी ,.सादर प्रणाम पूजा की सरल प्रभावी विधि से परिचित कराने के लिए कोटिशः आभार आपका और सरल भाषा में सार्थक तीखा व्यंग्य करने के लिए हार्दिक अभिनन्दन ,..मूर्ख निर्लज्ज भी हो जाते हैं ,..शायद कभी ज्ञान प्राप्त हो जाय ,..मानसिकता में एकरूपता होते हुए भी समय से आगे पीछे होना निपट मूर्खता है ,..अतिरेकता भी नुकसानदेह है .. देश के सभी नागरिक अमूमन माता पिता भक्त हैं ....अपने स्वार्थ और अन्य विसंगतियो से कुछ लोग ही विमुख होते होंगे ,.ऐसा ही देशप्रेम में है ,...भौतिकता और दुर्गुण सब सद्कर्मों को छिपाते जरूर हैं लेकिन समाप्त नही करते हैं ,...जाति पर आपकी राय देखकर बहुत अच्छा लगा .... गुलामी और सामजिक गिरावट के लंबे दौर में लगभग सभी वर्णशंकर हो गए हैं ,..दिखावटी अलगाव सिर्फ समाज को बांटता है ,....कर्म के आधार पर ही सबका समान सम्मान होना चाहिए ,..अभी ये बातें गौण मुद्दा ही हैं ,.अपने अनमोल आशीर्वाद से मंच सहित मुझे सिंचित रखने के लिए सादर अभिनन्दन सहित पुनः प्रणाम .

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

Its need to understand to whom I am taunting. I am already a great fan of your article. But its really frustrating for me to see everywhere BABA GIRI and lot of followers of different BABA. Even these followers always tries to convince to follow these BABA. In starting BABA and and there follower will tell that BABA does not ask for money. BABAji only helping poor and carry out the order of God but later they somehow convince the follower to come out with money the for different reason. In my openion, in India we still do not belive in mental depression or mental problem in general sense. If some one have mental problem it is regarded as that he/she is mad. But many time due to their mental weakness/depression many persons cannot fight with there problems in daily life. many persons just adjust or compromise with there problems. these problems creat the mental chaos for human being. To calm down there mental problems and get some peace people generally go to these BABA. Pleasurefull talk and Godly gesture of these BABAs create some believe in genral people due to lack of knowledge of general psychology of human being. Then Baba started to make profit and then chain statrs.. just likes a sheeps.... wherever one will go others will follow... Some BABA talks in spirituals and some talks in psysological ways. Some really help the people give right knowledge to people. But nowadays most of the BABA making profits. Even government, leader and media is also under there impression. Now its people have to understand there own way to whom they have to follow or to whom to defy. For this, a storng educations of school and college plays a great role, which is really a pathetic in our country!!! And over this bad quality education, this reservation decaying the quality of educations and so on system. Thats why we can not create good scientist/engineers and writer or literary people. My aim was not to taunt you and your article but its frustration for education system. AND I SHOULD TELL YOU THAT YOU ARE GREAT ... FOR SUCH CREATING AWARE IN SOCIETY. GOOD WISHES FOR YOU..

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

क्यों पीछे पड़े हो बाबा लोगों के ..अगर पब्लिक को ही होश नहीं तो बाबा की क्या गलती है... बहुत सारे बाबा है जो इस तरह से माल बनाने में लगे हैं.... बनाने दो... जागरूक करना है तो जनता को करो... अगर किसी बाबा को इस बाबा गिरी के काम में जनता, सरकार और सबसे बड़ी बात मीडिया से सम्मान प्राप्त हो रहा तो ... इसमें जलने की क्या बात है... अब जनता तो बेवकूफ है तो इसमें बाबा क्या करे?? हर किसी की तमन्ना है अधिक से अधिक पैसा कमाने की और इज्ज़त कमाने की... अगर किसी को मिल रही है तो इसमें जलने की क्या बात है... वैसे भी हिन्दुस्तान की बेवकूफ जनता से ऐसे ही पैसे बनाए जा सकते हैं... बाबा जी लगे रहो.... .... पहले मुस्लिम शासकों ने लूटा.. फिर अंग्रेजो ने लूटा ...फिर नेताओं ने लूटा ...अब तुम क्यों पीछे रहो इन बेवकूफ हिन्दुस्तानियों को लुटने में... लगे रहो... पंडित जी आप भी ना.. अब इस देश की स्कूली शिक्षा इतना खराब है की समझ में नहीं आता है की बच्चा बड़ा हो कर किस भाषा का जानकार है... ना ढंग से हिंदी का ना ढंग से अंग्रेजी का... ना ढंग उसे विज्ञान की जानकारी है... वैसे भी इस देश में अवतार होने की बड़ी कहानियां चलती हैं... अब आप लोग क्यों भूल रहे हैं..सत्य साईं बाबा को... जिनके मरने में हिंदुस्तान की मीडिया ने पलक पावडे बिछा दिए... बड़े बड़े नाम तेंदुलकर,अमिताभ,कई नेता उनसे जुड़े रहे... मैं एक आपकी ये बात मान लेता हूँ कि आपने सड़क छाप बाबा जी की सबकी सामने पोल दी. मगर इन बड़े बाबाओं का क्या जो टीवी पर प्रवचन देते रहते हैं... इनकी पोल आप कैसे खोलेंगे.. और एक बात समझ नहीं आती कि अगर ये बाबा इतनी ढोंगी हैं तो इनका धंधा इतने सालों से क्यों चल रहा है.. क्या एक बन्दा जो इनसे नुस्खा लेके जाता है..फिर वापस इनके पास क्यों आता हैं.. क्या ये सचमुच इनकी समस्या का निराकरण कर देते हैं... वास्तव में कहीं न कही हमारी ईर्ष्या भी है उनके खिलाफ.. हममें से हर कोई अमीर बनना चाहता है... शोहरत चाहता है... मगर ये तकनिकी या कहें जुगाड़, बाबा गिरी का फंडा सबसे नहीं हो पाता....

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

भाई सिंह साहब आप मुझे एक ऐसे व्यक्ति मिले है जिन्होंने "सार्थक" नहीं बल्कि "सक्रिय" क़दम उठाया है. गांधीजी के होहल्ला करने और कफनी लपेटने से भारत को स्वायत्तता एवं स्वतन्त्रता क़ी कल्पना एक दिवा स्वप्न ही होती यदि गोखले, तिलक, आज़ाद, सुभाषचन्द्र बोष, लाला लाजपत राय, खुदीराम बोष, विपिन चन्द्र पाल आदि ने सक्रिय एवं सतही क़दम न उठाया होता. हमारे हो हल्ला करने से इन ढोंगियों एवं पाखंडियो का कुछ नहीं होने वाला यदि आप जैसे सक्रिय क़दम न उठाये गये. किन्तु मै आप के एक कथन से सहमत नहीं हूँ. "धार्मिक लिबास" सम्बंधित ज्ञान को प्रतिबिंबित अवश्य करता है. यह अवश्य है कि केवल धार्मिक लिबास ही सद्धर्म के निरूपण के लिये आवश्यक नहीं है. यदि योगाभ्यास करना है तों पैंट शर्ट पहन कर नहीं किया जा सकता. अतः कुछ विशेष अवस्था में विशेष लिबास का होना आवश्यक है. और हम यही पर भ्रमित हो जाते है. तथा इस भ्रम के कारण सही व्यक्ति को भी उपेक्षित कर देते है. हमें लिबास, भाषा, स्थान एवं भोजन रहन आदि को सम्मान देना ही पडेगा. हम इसका अनादर नहीं कर सकते. अब यह हमारी सामर्थ्य एवं क्रिया शीलता पर निर्भर है कि हम इतना सब होने के बावजूद भी कैसे इसके तह तक जा सकते है. किसी ज़हरीले वृक्ष क़ी शाखाओं को काटने से कोई लाभ नहीं है. इसकी जड़ को ढूँढना है. जैसा कि आप ने क़दम उठाया है. मै आप से प्रभावित हुआ.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

आदरणीय पंडित राय जी सादर प्रणाम, आपने अपने इस छोटे से लेख में जो स्दंदेश दिया है वास्तव में वह अनुकर्णीय है लेकिन हमारे धर्मभीरु समाज में यह सब संभव ही नहीं है कि किसी धार्मिक लिबास पहने व्यक्ति कि ओर इंगित भी कर सके केवल भेड़ के समान हम उसके पीछे जरूर चल सकते है है, मैंने पिछले तीन वर्षों से यही सब कुछ लिखा है परन्तु कुछ साथी जो चरण वंदना के अधिक शौक़ीन है ने हमेशा मेरा विरोध किया है, परन्तु मैं आपकी एक बात से अवश्य प्रभावित हुआ कि ऐसे लोगो का पर्दा फाश करना चाहिए, इस विषय में मैं भी एक बाबा के विषय सरकारी विभाग से कुछ सूचनाये आर टी आई के टी अंतर्गत मांगी थी लेकिन उस विभाग ने मुझे सुचना देने से इनकार कर दिया है कि सम्बंधित पार्टी ने आपत्ति कि है ? लेकिन मैंने भी मुख्या सूचना आयुक्त को अपील कि हुई है देखते है वहां से क्या जवाब आता है ? आपको बधाई और धन्यवाद.

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

भाई शैलेश जी, यह सब कुछ जो मै आप लोगो को बताता हूँ, इसमें मेरा अपना कुछ भी नहीं है. मै वही बताता हूँ जो हमारे प्राचीन ऋषि, मुनि, आचार्य एवं अन्य मनस्वी विद्वान पुस्तकों में लिपि बद्ध कर गये है. इन यंत्रो को विविध ग्रंथो में देखा जा सकता है- यथा- कूर्म पुराण, श्रीमद्देवी भागवत महापुराण, मार्कंडेय महापुराण, तांडव रहस्य, यन्त्र विलास, कापालिक रहस्यम, यन्त्रमाख्यानाम, रहस्योपाख्यान, यन्त्र मार्तण्ड, रुद्रयामल, वाराही संहिता, शक्ति संगम तंत्र, रमल भास्कर, केरिकान्दुलम, नीरवल्लीयम, केतकी दर्पण आदि अनेक और भी ग्रन्थ है. इनमें विविध यंत्रो के निर्माण के प्रकार, उनकी सिद्धि एवं प्रयोग के विधान विस्तार से बताये गये है. इनके अलावा कुछ चीनी ग्रन्थ भी है. थोड़ा बहुत वर्णन वृहत्संहिता में भी मिलता है. किसी एक पुस्तक में यह सब इकट्ठा नहीं मिल सकता.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

बाबा ढोंगी ध्यान का और आपका ज्ञान विज्ञानं का पंडित जी का सत्कार और हाथ जोड़कर नमस्कार विज्ञानं का ज्ञान हर किसी के लिए संभव नहीं और वैसे भी हर किसी का दिमाग एक सामान तीव्र नहीं होता. उपर्युक्त लेख के लिए न्यूज़ चैनल्स अधिक जिम्मेवार है बजे लोगो के. रात आठ बजे एक ढोंगी का पर्दाफाश और रात नौ बजे जानिए अपना राशिफल. दही की कीमत दस रुपए २५० ग्राम दही खाने से नेता के पेट में दर्द ब्रेअकिंग न्यूज़ दही की कीमत सौ रुपए २५० ग्राम. अभिनेता एयरपोर्ट पर दर्शको की भीड़ छूने के लिए उमड़ी किसी का नाख़ून लग गया और उसने कुछ कह दिया तो पहली बार हमारे चैनल्स पर एक अभिनेता ने दर्शक पर हाथ उठाया. गले की हड्डी न निगलते बने और न उगलते बने.

के द्वारा: yogeshdattjoshi yogeshdattjoshi

मुझे ब्रह्म ज्ञान के सम्बन्ध में विशेष कोई उपलब्धि नहीं है. यदि ब्रह्म ज्ञान प्राप्त होता तों राईफल लेकर दुश्मनों का संहार नहीं करता. बल्कि अपने ब्रह्मज्ञान से ही इन सबका निराकरण कर देता. किन्तु जो कुछ सत्संग एवं पुस्तकीय अध्ययन से प्राप्त हुआ है उसका एक छोटा सा रूप प्रस्तुत करना चाहूँगा. एक छोटा सा भी घर बनाने के लिये विविध साजो सामान क़ी आवश्यकता पड़ती है. सीमेंट, ईंट, गिट्टी, बालू एवं मिट्टी आदि. फिर जहाँ घर बनता है वहां पर कीचड भी हो जाता है. तब जाकर कही एक घर तैयार होता है. उसके बाद उस घर को धोते है. रंगाई करते है. कुछ और अन्तः साज सज्जा से उसे रमणीक बनाते है. और तब उसमें निवास सुखकर होता है. इसी प्रकार किसी भी ज्ञान क़ी प्राप्ति के लिये पहले उससे सम्बंधित विविध पहलुओ एवं छोटे बड़े साधनों एवं संसाधनों को संग्रहीत करना पड़ता है. इसमें बहुत सारे अवयव अरुचिकर एवं घृणास्पद भी होते है. जैसे बच्चे को किसी पुस्तक को पढ़ने में समर्थ होने के लिये सबसे पहले "क" से कबूतर और "ख" से खरगोस आदि पढ़ना पड़ता है. जब कि न तों उसका सम्बन्ध खरगोस से है और न ही कबूतर से. इस तरह इन कुछ अनावश्यक चीजो का भी समावेश अध्ययन में सम्मिलित करना ही पड़ता है. इसके अलावा अन्य ढेर सारी आवश्यक जिज्ञासाओं क़ी उपलब्धि इतर स्थान पर भी हो सकती है. जब सब साजो सामान एकत्र हो जाते है तों एक ही जगह पर वह ज्ञान केंद्रीभूत हो जाता है. इसलिये जहाँ तक मेरा अपना विचार है, एकाएक यह कल्पना कि कोई भी ज्ञान किसी एक जगह पर ही उपलब्ध है, संभव नहीं लगता. फिर भी ब्रह्म ज्ञान तों श्रेष्ठ ज्ञान है, उसके विषय में टीका टिप्पणी मुझे शोभा नहीं देगी. "सर्वमेतद्विजानीनाम मंत्राणामभिकीलकम" या फिर "अहम् ब्रह्मस्मि"

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

अरे मेरी प्यारी प्यारी बहनों या बेटियों, एक कथा सुनो. एक अति दरिद्र रिक्से वाला एक पण्डित से अपना भविष्य पूछा. पण्डित ने बताया कि उसके ऊपर शनि भयंकर रूप से नाराज़ है. तथा टेढा चल रहा है. उस गरीब ने पूछा कि उसे सीधा करने का उपाय क्या है. तों पण्डित ने बताया कि एक पूजा करनी पड़ेगी जिसमें ग्यारह सौ रुपये लगेगें. उस गरीब ने बताया कि उसके पास इतने पैसे नहीं है. पण्डित ने बोला कि ठीक है मै तुम्हारे लिये पांच सौ रुपये में पूजा कर दूंगा. गरीब बोला कि उसके पास पांच सौ रुपये भी नहीं है. पण्डित बोला कि यार चलो तुम्हारी गरीबी पर ध्यान कर के मै एक सौ एक रुपये में यह पूजा कर दूंगा. गरीब बोला कि वह सौ रुपये भी देने क़ी स्थोती में नहीं है. पण्डित बोला कि यार यदि इतने गरीब हो तों चलो इक्यावन रुपये ही दो. मै तुम्हारे लिये पूजा करूंगा. गरीब फिर भी तैयार नहीं हुआ. पण्डित ने तब ग्यारह रुपये माँगा. गरीब ने फिर भी यही कहा कि उसके पास ग्यारह रुपये नहीं है. अंत में पण्डित बोला कि चलो पांच रुपये दो. तुम्हारी गरीबी पर दया कर के इतने में ही शनि को सीधा कर दूंगा. गरीब बोला कि बाबा उसके पास पांच रुपये देने क़ी भी शक्ति नहीं है. तब पण्डित बोला कि यदि तुम्हारे पास कुछ है ही नहीं, तों शनि तुम्हारे पास क्या लेने आयेगा. अरे तुम्हारे पास तों साक्षात यम राज भी नहीं आयेगा. लेकिन एक बात बताओ. खुदा क्यों खुदा है? ईश्वर क्यों ईश्वर है? संत क्यों संत है? यशस्वी के ही पास यश क्यों है? बाबा के पास चमत्कार क्यों है? या उसके पास चमत्कार क्यों है जो बाबा बन गया? देखो, इसका निराकरण द्वेष या ईर्ष्या से नहीं बल्कि चमत्कारी बन कर ही करना पडेगा. यदि इसका विश्लेषण मै यहाँ पर देता हूँ तों यह एक स्वतंत्र लेख ही बन जाएगा. मै यहाँ इतना ही कहना चाहूँगा कि किसी भी उपलब्धि के दो ही मार्ग प्रकृति ने निश्चित किये है-एक तों आगमनात्मक एवं दूसरा निगमनात्मक. आगमनात्मक पद्धति का उदाहरण है कि पैर में लगे कीचड को कभी भी कीचड से साफ़ नहीं कर सकते. उसके लिये पानी चाहिए. और निगमनात्मक पद्धति का उदाहरण है कि सोने को साफ़ करने के लिये उसे धधकती हुई आग में ही डालना पडेगा. मेरी समझ से अभी आप को कुछ राहत मिली होगी. क्रोध स्वयं के लिये हानिकारक है.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

पंडित जी आप का लेख बहुत शानदार है. जिस तरह की वैज्ञानिक सूझ बुझ आप रखते हैं उस का दस प्रतिशत भी अगर इस देश के लोगों के पास होता तब भी काम चल जाता. यहाँ तो मामला ही उल्टा है !! यहाँ बहुत ज्यादा पढ़े लिखे ग्रेजुएट , पोस्ट ग्रेजुएट अनपढ़ों की तादाद ज्यादा है जो कुछ चमत्कार की उम्मीद में ख़ुशी ख़ुशी लुटने चले आ जाते हैं. जो साइंस पढ़ कर भी अन्धविश्वास के घनघोर अँधेरे से बाहर नहीं निकल पाते हैं ऐसे लोग इन ढोंगियों के आसन शिकार बन जाते हैं. दोष किसे दिया जाए ? जब आँखों के सामने ही कुछ उल्टा होते नज़र आ जाये तो फिर दो ही विकल्प बचते है : या तो चिल्लाना शुरू कर दो या फिर काठ के उल्लू की तरह तमाशा देखते रहो !!

के द्वारा: Pinky Khanna Pinky Khanna

जब ब्रह्म ज्ञान व्यक्ति को घर बैठे-बैठे ही मिल सकता है, फिर लोग अज्ञानतावश बाहर इधर उधर भटकते फिरते है. बाहर कही से प्राप्त न होगा. होगा तो भीतर से, घर बैठे-बैठे, कुछ भी नहीं करना होगा. ऐश्वर्य चाहिए कर्म करना होगा, कर्मठ बनना होगा. बीमार हो तो इलाज कराना होगा, हॉस्पिटल जाना होगा. मुकदमा है वकील करना होगा. शिक्षा चाहिए तो पुस्तक पदनी होगी. विद्यालय जाना होगा. व्यवहारिक बनना होगा. यह सब कोई आबा-बाबा न करा सकेगा. जो कुछ भी चाहिए उस और कदम बढाने होंगे. ऐश्वर्य चाहिए कर्मठ बनो. ब्रह्मज्ञान तो तुम्हारे पास ही है भीतर ही छिपा है खजाना. मात्र देखने भर की देर है. भीतर से कुछ भी नहीं करना, मात्र रुके रहना है, साक्षी बने रहना है, देखना भर है. बाहर से कर्मठ बनना है, बाहरी कर्मठता - भीतर शांत बहता जल. यही एक ब्रह्मज्ञानी के लक्षण है ..../\....

के द्वारा: Amar Singh Amar Singh

मित्तल जी, संभवतः शब्दविन्यास क़ी गुरुता वृद्धि के प्रयास में कटाक्ष प्रस्तुति के द्वारा अपने स्वयं के उत्तर को मेरे लिये प्रश्न निर्माण कर आप ने भावाभिव्यक्ति क़ी है. या यह मेरा कोरा भ्रम है मुझे पता नहीं. किन्तु यह बात मुझे भलीभांति विदित है कि कोई व्यक्तिगत माध्यम तभी अख्तियार किया जाता है जब कोई सामूहिक माध्यम उपलब्ध न हो. व्यक्तिगत माध्यम व्यक्तिगत सन्दर्भ के लिये ही अपनाना चाहिए. कितु क्षमा कीजिएगा, हो सकता है, यह विचार सबका समर्थन न प्राप्त कर सके. क्योकि यह मेरा नितांत व्यक्तिगत विचार है. अभी मुख्य बात यह है कि आप ने पूछा है कि आश्चर्य क्यों हुआ? जी नहीं, शायद आप ने शीघ्रता में अनुच्छेद का अवलोकन किया है. मै मेल आईडी के प्रयोग पर आश्चर्य व्यक्त नहीं किया हूँ. तथा मै आश्चर्य व्यक्त नहीं किया हूँ. कृपया आप एक बार पुनः पढ़ें. मै आश्चर्य तों बिल्कुल ही प्रकट नहीं किया हूँ. बल्कि अजीब (Unreasonable) लगने क़ी बात कहा हूँ. दूसरी बात यह कि अजीब इसलिये लगा कि ह़र कुछ जानने के बाद भी लेखको / पाठको से प्रत्यक्ष रूप से सम्मति तथा परोक्ष रूप से सहमति माँगने का यह छद्म प्रयत्न किस प्रकरण का द्योतक है? क्या इस मुद्दे को सम्पादकीय या जागरण ब्लॉग के अनुच्छेदों द्वारा प्रकट नहीं किया जा सकता था? इससे तों लगता है कि जागरण मंच के सम्पादक मंडल को यह भय सताने लगा है कि संभवतः लेखको या पाठको क़ी संख्या कम हो रही है. इस बात को प्रत्यक्ष रूप से पाठको / लेखको के सम्मुख रखने पर इस मंच क़ी शाख को ठेस पहुँचने का भी भय उपस्थित हो सकता है. क्या जागरण ब्लॉग इतने अरुचिकर/निरर्थक/अनुपयोगी/आधारहीन हो गये है कि इसके पाठक मिलने मुश्किल हो गये? एक ब्लॉग लिखने से समस्त पाठक पढ़ सकते थे. इससे तों ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पंजीकरण के समय जितने भी सदस्य रहे है, भले ही आज वे इस मंच से दूर जा चुके है, उन्हें भी इसी बहाने बुलाकर पाठको एवं लेखको क़ी संख्या को बनाए रखो. और पाठको तथा लेखको क़ी आड़ में ध्यान केवल आर्थिक पक्ष पर केन्द्रित रखो? यदि ऐसा नहीं है तों पाठको क़ी रूचि या सुझाव माँगने क़ी क्या आवश्यकता? क्या सम्पादक मंडल बिना लेख पढ़े ही उसे फीचर्ड कर देता है? या फिर चेहरा देख कर अनेक विध सम्मान बांटता है? क्या उसे नहीं मालूम कि पाठक / लेखक किस रूचि / स्वभाव / अपेक्षा वाले है? आखिर यह सब क्या पहेली है? व्यक्तिगत मेल आईडी का उपयोग क्यों? क्या लेखक / पाठक इतने निर्बल बुद्धि के हो गये है कि मंच प्रधान के इस षडयंत्रकारी प्रयत्न को न समझ सकें? या क्या यह पाठको तथा लेखको के साथ छ्द्मव्यापार के रूप में अनुबंध स्थापित करना नहीं है? आप के विविध लेखो से एक प्रबुद्ध प्रवाह संचरण क़ी आभा मिलती है. अतः मै आप से अपेक्षा करूंगा कि मेरे संकलन के , विपरीत ही सही, सन्दर्भ में कुछ कहें. लच्छेदार भाषा का प्रयोग न करते हुए मै इतना ही कहना चाहूँगा कि मुझे अपने उद्देश्य में आगे बढ़ने में सरलता होगी. प्रत्युत्तर क़ी आकृति विशाल होने के भय से इसे यही पर इसका उपसंहार कर रहा हूँ.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

आदरणीय श्री चातक भाई जी आदमी को काम कर के आगे बढ़ना चाहिए. पीछे नहीं खिसकना चाहिए. अब आप इसे चाहे मेरे सैनिक प्रवृत्ति का अक्खड़पन समझिये या आदर्श मार्ग. क्योकि यदि आदमी आगे नहीं खिसकेगा तों पीछे घटित घटनाओं के अनुकूल प्रतिकूल प्रभाओं क़ी शिक्षा का उपयोग कहाँ करेगा? दूसरी बात यह कि मै जो कुछ भी लिख देता हूँ उसके बारे में यह नहीं सोचता कि कौन इस के बारे में क्या सोच रखता है. कितने पाठक इसे पढ़ते है. मै उत्तर तभी देता हूँ जब कोई कुछ पूछता है. आप ने देखा होगा कि अभी मेरी एक पोस्ट प्रकाशित हुई नहीं कि दूसरी पोस्ट मंच पर आ जाती है. मै प्रतीक्षा नहीं करता कि लोग इसे पढ़ कर शाबासी या गाली देगें. आप को मेरा लेख पसंद आया. शुक्रिया. आप इस लेख का कहाँ, कैसे, किस लिये और कितना सदुपयोग करना चाहते है, मुझे इसके प्रति कोई चिंता नहीं है. यदि कोई इसका दुरुपयोग भी करता है तों कोई चिंता नहीं है. मै एक सक्रिय सेवारत सैनिक यह पोस्ट लेखन मात्र एक सर्वेक्षण के तौर लिखता हूँ. और मुझे लग भाग पचास प्रतिशत सर्वेक्षण में सफलता भी मिली है. कैसे लोग लेख लिखते है/ कैसे लेख पर कितनी प्रतिक्रिया मिलती है? प्रतिक्रिया देने वाले कितने प्रतिशत लोग है? लोग पोस्ट क्यों लिख रहे है? कैसा लेख ज्यादा पसंद किया जाता है? लिखने , पढ़ने, प्रतिक्रिया देने वाले लोगो क़ी मानसिकता क्या है? इन सब के सर्वेक्षण में मुझे बहुत हद तक सफलता मिल गयी है. धन्यवाद

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

पंडित आर. के. राय जी, सादर अभिवादन, पहली बार आपकी पोस्ट पढ़ी, बहुत ही सरल शब्दों में और बहुत ही स्पष्ट तरीके के आपने शंकाओं का समाधान किया है| अध्ययन एवं गूढ़ चिंतन से भरे इस दस्तावेज को अपने पास सुरक्षित रखने की अनुमति चाहता हूँ| आशा है कि आपको कोई ऐतराज़ नहीं होगा| मैंने इसे सुरक्षित कर लिया है| मेरी भी राय यही है कि व्यक्ति को किसी भी अच्छाई और बुराई, सत्य और असत्य को परखने के लिए पहले उसके हर कोण से देखना चाहिए और फिर उसके त्रिविमीय स्वरुप को ही स्वीकार करना चाहिए ताकि एक पहलू पर दृष्टिपात करने में दुसरे की अनदेखी न होने पाए| पहली बार किसी पोस्ट में मुझे सत्य का त्रिविमीय रूप नज़र आया है| सार्थक लेखन पर बधाई और शंका उन्मूलन के लिए हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak chaatak

आदरणीय श्री आस्तिक जी मै अभी सेवा निवृत्त नहीं हुआ हूँ. आज भी अभी सैन्य वृत्ति से जीविको पार्जन कर रहा हूँ. अभी भूत पूर्व सैनिक क़ी उपाधि प्राप्त करने में विलम्ब है. संभवतः इसीलिए मै "आस्तिक" के स्थान पर "दीक्षित" लिख गया. आप इस गुरुतर त्रुटि को उपेक्षित करेगें. दूसरी बात यह कि आप ने मेरे विविध लेख-प्रलाप पर सरसरी निगाह डाला होगा तों आप ने देखा होगा कि मै थोड़ा थोड़ा ह़र बर्तन में मुँह ड़ाल देता हूँ. बिना सोचे कि बर्तन जूठा है या सस्ती धातु का बना है. तीसरी बात यह कि मै भारत देश क़ी सेवा करता हूँ. जब कि भारत का कोई निश्चित स्थान है ही नहीं. मै यूपी में हूँ. यूपी तों यूपी है, भारत नहीं. पंजाब पंजाब है भारत नहीं. और यदि ये सब भारत है तों फिर यूपी कहाँ है? और पंजाब कहाँ है? भारत मात्र एक नाम है जिसे हम सुनते है. फिर भी भारत के अस्तित्व को क्या नकारा जा सकता है? असत्य को उदाहरण से नहीं कुतर्को से सिद्ध किया जाता है. यदि उदाहरण मात्र असत्य के सिद्धि साधन है तों फिर इतिहास का अध्ययन क्यों? इतिहास के बीते घटना क्रम से शिक्षा लेकर वर्त्तमान में भविष्य के निर्धारण का प्रयत्न क्यों किया जाता है? वर्त्तमान एवं भविष्य को संवारने के लिये ऐतिहासिक घटनाओं का उदाहरण क्यों लिया, दिया एवं पढ़ाया सिखाया जाता है? कोई भी व्यक्ति अपने निर्णय या सिद्धांत से कब विचलित होता है? जब उसे अपने विचार, सिद्धांत या निर्णय में कोई खोट, कमी, त्रुटि या प्रमाण क़ी कमी दिखाई देती है. Rolling stone gathers no mass. यदि मेरे विचार ठोस, सुदृढ़, सार्थक, प्रामाणिक एवं पर्याप्त आधार पर आधारित है तों फिर उसमें हिचक कैसा? कोई माने या न माने. आप मंच पर बहस के लिये नहीं आये है. यह आप का व्यक्तिगत विचार है. इसके विपरीत मै मंच पर सिर्फ बहस के लिये ही आया हूँ. कारण यह है कि धान से चावल निकालने के लिये उसे कूटना पीसना पडेगा ही. जैसा कि आप ने अवश्य ही इसे ध्यान पूर्वक देखा होगा, मै किसी क़ी प्रतिक्रिया क़ी प्रतीक्षा नहीं करता. अभी मेरा एक लेख फीचर्ड हुआ नहीं, उसके पहले ही दूसरा पोस्ट प्रकाशित हो जाता है. सूरज को किसी कृत्रिम रोशनी क़ी आवश्यकता नहीं होती है. किसी क़ी आलोचना से न तों मेरे वेतन में कोई कटौती होने वाली है. और प्रशंसा से न तों मेरी पदोन्नति होने वाली है. आप बिल्कुल सत्य कहते है कि आलोचना से व्यक्ति अपनी कमियों को जान जाता है. किन्तु "निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय" अर्थात आलोचक को सबसे नज़दीक रखना चाहिए. किन्तु आँगन में कुटी छावा कर, न कि उसे बंधक बना कर. और अंत में मै इतना ही कहना चाहूँगा कि किसी भी रीति रिवाज को तब तक व्यर्थ, निन्दित एवं पाखण्ड न कहें जब तक उसके दोनों रूपों- औचित्य, सार्थकता एवं दूसरा उसका विद्रूप, दोनों को गहराई तक न जान जाय. यह मात्र मेरी राय है, जो आप को मानने के लिये कोई एक प्रतिबन्ध नहीं है. जगत रूप क्रीडांगन में अपने रचित विविध रूप रंग, आकार-प्रकार, आचार-विचार एवं भूमिका वाले खिलौनों का स्वयं खिलवाड़ बने परमेश्वर से यही प्रार्थना है कि आप जगत एवं जगत नियंता के आशीर्वाद के भागी बनें.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

आदरणीय भ्राता श्री गोविन्द भरत वंशी जी आप ने तों मुझे परमज्ञानी क़ी महान पदवी से विभूषित कर संसार से ही दूर कर दिया. भाई जी ! बाल बच्चेदार आदमी हूँ. उत्कृष्ट तपोनिष्ठ ऊर्ध्वरेता परम ज्ञानी बना देगें तों मेरे ही परिवार का कोई सदस्य जीविकोपार्जन में अक्षम जान कर गृह निकाला दे देगा. तों मै श्री राम नहीं जो बनवास क़ी कठिनाई को झेल पाउँगा. अस्तु, सार्थक प्रसंग पर पोस्ट लिखना ही ब्लॉग लिखने क़ी आवश्यकता, औचित्य एवं उद्देश्य होना चाहिए. अन्यथा ब्लॉगर कोई भांड या विदूषक नहीं जो उसे देख कर या सुन कर हंसा जाय. पोस्ट यदि लिखना पडा तों यह मेरे लिये अपने (थोथा ज्ञान ही सही ) ज्ञान का प्रदर्शन करना तों होगा. तुलसी दास ने राम चरित मानस में एक प्राणी के जन्म से लेकर मृत्यु तक क़ी सारी क्रिया, प्रतिक्रिया, ज़रुरत, इच्छा, कष्ट, निराकरण, उद्देश्य एवं परिणाम सबका आंकलन किया है. उन्होंने स्पष्ट किया है कि एक ही सिद्धांत से सबको सीमित या प्रतिकृत नहीं किया जा सकता. किन्तु तत्काल वह यह भी बताते है कि सिद्धांत या कानून सबके लिये बराबर होता है. देखें- "प्रभुता पाइ केहि मद नाही". अर्थात बड़प्पन मिलने के बाद किसे घमंड नहीं हो जाता? अर्थात सबको हो जाता है. किन्तु तत्काल कहते है कि- "भरतहि होहि न राज मद विधि हरि ह़र पद पाइ". अर्थात भरत को यदि ब्रह्मा. विष्णु एवं महेश क़ी ही पदवी क्यों न दे दी जाय, उन्हें कोई घमंड नहीं हो सकता. लेकिन हम बस इतना ही पढ़ कर राम चरित मानस क़ी इतिश्री कर देते है. और परिणाम "अश्वत्थामा मरो नरो वा कुंजरो" वाली कहावत चरितार्थ हो जाती है. सब को घमंड हो सकता है. किन्तु भरत को नहीं. कारण भी उन्होंने बताया है- "विश्व भरण पोषण कर जोई. ताकर नाम भरत अस होई." अर्थात भरत मात्र उसी का नाम हो मसकता है जो सम्पूर्ण विश्व का भरण पोषण करने में समर्थ होगा. इस प्रकार तुलसी दास के इस राम चरित मानस में द्विविधा आप को अनेक स्थानों पर प्राप्त होगी. किन्तु उसका विश्लेषण भी उन्होंने दिया है. अब हम मुख्य विषय पर आते है. नियति को बदला जा सकता है, यदि सामर्थ्य हो. किन्तु वह सामर्थ्य भी नियति ही देगा. इसके दो उत्तर हो सकते है. प्रथम तों नियति क़ी भी यही नियति है कि उसे सामर्थ्य देना ही है. क्योकि नियति तों सबके लिये है. सब नियति से बाँधे हुए है. तों नियति भी अवश्य ही नियति से बंधा है. अब यह उस नियति क़ी नियति है कि वह नियति बदलने के लिये सामर्थ्य देगा. नियति के अनुसार यह उसका कर्त्तव्य (नियति) है. यद्यपि तार्किक तौर पर मेरा यह उत्तर अवश्य साधार, ठोस एवं प्रामाणिक है. किन्तु मै स्वयं इस उत्तर का विरोधी हूँ. क्योकि मुझे स्वयं इस उत्तर से संतोष नहीं है. इसका उत्तर यह है कि पार ब्रह्म परमेश्वर जगत नियंता ने शक्ति का विकेंद्री करण कर रखा है. उन्होंने सृजन के लिये ब्रह्मा, पालन के लिये विष्णु एवं दंड के लिये शिव को निर्धारित कर रखा है. और ये तीनो रूप उन्ही के है. किन्तु उस पार ब्रह्म परमात्मा ने यह स्पष्ट कर रखा है कि जब भी शक्ति का केंद्री करण होगा , विकृति अवश्यम्भावी है. इसीलिए उन्होंने अपनी स्वयं क़ी शक्ति को कई टुकड़ो में बाँट कर रखा है. और किसी को भी स्वतंत्र या निरंकुश नहीं रखा है. देखें- 'शिव द्रोही मम दास कहावा. सो नर सपनेहु मोहि नहीं भावा." अर्थात श्री राम कहते है कि जो कोई शिव से विमुख हो कर मेरी अराधना करता है. वह मुझे बिल्कुल ही प्रिय नहीं है. या अन्यत्र देखिये, समुद्र पार करने के लिये भगवान राम को शिव का सहारा लेना पडा. और उन्हें रामेश्वरम क़ी स्थापना करनी पडी. दूसरी तरफ, राम नाम कर अमित प्रभावा. संत पुराण उपनिषद् गावा. संतत जपत शम्भू अविनाशी. शिव भगवान ज्ञान गुण राशी." अर्थात राम (साक्षात राम तों दूर) का नाम ही इतना प्रभाव शाली है कि संत, पुराण, एवं उपनिषद् इसका गान करते रहते है. यहाँ तक कि ज्ञान एवं गुणों के भण्डार स्वयं भगवान शिव निरंतर राम का गुण गान करते रहते है. इस प्रकार नियति, नियंता, नियामक, नियम एवं नियम्य सब एक दूसरे के वश में है. नियति निरंकुश नहीं है. यदि हम नियति के अधीन है. तों नियति हमारे अधीन है. हम कोई क्रिया प्रतिक्रिया ही नहीं देगे तों तों नियति के विधान निर्धारण का आधार क्या होगा? यदि पृथ्वी सूर्य को अपना रस (जल) नहीं सोखने देगी तों सूर्य फिर दुबारा धरती को वर्षा के रूप में पानी कहाँ से देगा. इसलिये नियति एवं नियंता के गोल घेरे में सिर्फ हम ही नहीं बल्कि स्वयं नियंता भी गोल गोल चक्कर लगा रहा है. आप क़ी दूसरी बात, ध्यान दें, "बोले बिहंसी महेश तब, ज्ञानी मूढ़ न कोय". तुलसी दास ने मात्र तुक बंदी के लिये "बिहंसी" शब्द का प्रयोग नहीं किया है. रूद्र-विष्णु के सम्मिलित अवतार हनुमान जी के देख रेख में भगवान राम ने स्वयं अपने परम पवित्र हस्ताक्षर से जिस ग्रन्थ के प्रत्येक वर्ण एवं शब्द का अनुमोदन किया हो उसमें कोई अक्षर-विन्यास या शब्द सामंजस्य निरर्थक या मात्र तुक बंदी के लिये प्रयुक्त हुआ हो , यह सोचना भी पाप है. आप स्वयं देखें कि यदि मात्र तुक-छंद ही पुरा करना होता तों इसे निम्न प्रकार भी लिख सकते थे- "हंस कर कहेउ महेश तब ज्ञानी मूढ़ न कोय' किन्तु ऐसा नहीं है. समस्त राम चरित मानस में जब कही भी 'बि" उपसर्ग का प्रयोग हुआ है, कोई विशेष चीज इंगित हुई है. जैसे, बिलखी कहेउ मुनि नाथ, बिहँसे करुना अयन चितई जानकी लखन तन, बोला बिहंसी महा अभिमानी, आदि. यद्यपि आधुनिक टीकाकारो क़ी भांति तर्क कुतर्क कर के आप के इस कथन क़ी ऐसी छीछालेदर क़ी जा सकती है कि तुलसी दास क़ी सारी तुक बंदी भूल जायेगी. आप देखें- भोले नाथ कह रहे है कि कोई भी ज्ञानी मूर्ख नहीं है. बिल्कुल सही. ज्ञानी मूर्ख कैसे होगा? मूर्ख ज्ञानी कैसे होगा? ज्ञानी ज्ञानी है. मूर्ख मूर्ख है. श्री आस्तिक जी ने मेरे पिछले लेख पर टिप्पड़ी करते हुए बहुत ही सटीक बात लिखी थी कि आज राम चरित मानस रूपी दुकान के ज्ञान रूपी सामान क़ी बिक्री धड़ल्ले से चल रही है. जो जितना, जैसा और जहाँ पैसा दे रहा है, उसे उतना, वैसा और वहां पर ज्ञान (सामान) बेचा जा रहा है. भगवान भोले नाथ ने हंस कर नहीं बल्कि विशेष रूप से हंस कर अर्थात बिहंस कर माता सती को यही बताया कि मै भी विधि के विधान से नियंत्रित हूँ. मै निरंकुश या परम स्वतंत्र नहीं. जैसा कि हम सब यही धारणा बना रखे है कि भगवान शिव के प्रसन्न होने के बाद कुछ भी अलभ्य नहीं है. किन्तु स्वयं भगवान शिव ने इसका इस चौपाई से खंडन किया है कि ज्ञानी मूढ़ न कोय. अर्थात सब कुछ करने, देने एवं जानने में समर्थ होने के बावजूद भी मै शिव विधि के विधान से नियंत्रित, मर्यादित एवं संचालित हूँ. तों भाई भरत वंशी जी, आप के इन तीनो प्रश्नों में "बि' उपसर्ग आया है. सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखी कहेउ मुनि नाथ हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ. ============ बोले बिहंसी महेश तब ज्ञानी मूढ़ न कोय. और तों और स्वयं विधाता भी पर तंत्र होने के कारण "बि" के उपसर्ग से बंध कर धाता नहीं विधाता हो गया है. इसीलिए जब कोई कार्य सामान्य मार्ग से स्खलित हो जाता है तों तब वह कार्य या कार नहीं बल्कि "विकार" हो जाता है. और ऐसे असामान्य विकार जब हो जाता है तों नाश नहीं बल्कि विनाश प्रारम्भ शुरू हो जाता है. जब कोई कार्य विशेष रूप से लंबित हो जाता है तों उसे "विलम्ब" होना कहा जाता है. और श्री भरत वंशी भाई जी मेरी बुद्धि जहाँ तक साथ देगी मै जोर शोर से प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दूंगा. अन्यथा महर्षि पातंजलि का अनुकरण करते हुए "अग्रे अजा भक्षिता" कह कर हाथ खडा कर दूंगा.

के द्वारा: पण्डित आर. के. राय पण्डित आर. के. राय

आदरणीय पंडित जी सादर प्रणाम,        भूतपूर्व सैनिक होने के कारण आप मेरे लिये परम सम्माननीय हैं, मैं मानता हूँ कि देशभक्ति से बढ़ा कोई धर्म नहीं है।       आपसे निवेदन है कि मेरे संबंध में कोई भी धारणा बनाने से पहिले मेरी पिछली पोस्टे आवश्यक पढ़े। खासतौर से "बहस"। मेरा नाम आस्तिक है, दीक्षित नहीं। यदि आप मुझे मेरे उपनाम से सम्बोधित करें तो अत्यधिक प्रसन्नता होगी। निवेदन है कि आप मुझे ईश्वर के अस्तित्व को नकारने वाला न समझे, हाँ में उस ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करता, जिसे ईश्वर के रूप में परोसा जाता है। ईश्वर के संबंध में किसी के क्या विचार हैं, यह मेरे लिये महत्वपूर्ण नहीं है। ईश्वर के संबंध में मैं क्या सोचता हूँ। यही मेरे लिये उपयोगी है। मैं प्रकृति को ईश्वर मानता हूँ। जो काल्पनिक सांसारिक ईश्वर के पहले भी था और उसके बाद में भी रहेगा। काई उसे ईश्वर न माने, मुझे इससे कोई आपत्ति नहीं। मैं न तो कोई तर्क शास्त्री हूँ और न ही कुतर्क शास्त्री। अपने आपको समालोचक समझने की नादानी करता हूँ। शायद यह नादानी बचपन से करता आया हूँ। मेरा अल्प ज्ञान कहता है कि ईश्वर बहस एवं आस्था का विषय नहीं है, अपितु सत्य का विषय है। मेरा निवेदन है कि मैं न तो अपनी विद्दता स्थापित करने के लिये इस मंच पर आकर पोस्ट लिखता हूँ और न ही इस उद्देश्य से प्रतिक्रिया देता हूँ। आधिकांशतः लोग सोचते हैं कि मैं जो कह रहा हूँ वही सत्य है, जबकि मेरा मानना है कि हमें वह कहना या सुनना चाहिये जो सत्य है। महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा था कि तुम किसी बात को इसलिये स्वीकार नहीं करना कि वह गौतम बुद्ध ने कही है, बल्कि उसपर मनन चिन्तन करके यदि आपकी बुद्धि उसे स्वीकार करे तो मानना अन्यथा नहीं मानना। किन्तु हम करते बुद्ध के विचारों के विपरीत।    मान्यवर यदि आप आपनी इस पोस्ट को अपनी पिछली पोस्ट के प्रति उत्तर में प्रषित करते तो मुझे प्रति उत्तर देने में सुविधा होती।     मैं आपका आभारी हूँ कि आपकी इस पोस्ट से मुझे कोई नई रचनाओं का सृचन करने का अवसर प्राप्त होगा।    मैं अपनी अल्प बुद्धि से अपनी अगली पोस्टों में सटीक उत्तर देने का प्रयास करूँगा। आपकी तरह जीवनयापन के लिये मैं भी समय के बंधनों से मुक्त नहीं हूँ।     आपसे एक निवेदन और करना था (कृपया आप इसे आप अन्यथा न लें) यदि हम किसी बात या विषय पर यह सोचकर विचार करें कि यह हो सकता है और नहीं भी हो सकता है, तभी सत्य के सन्निकट जा सकते हैं। अन्यथा जो हम कहते या जानते है वही सत्य है, सोच कर विरक्त रहेंगे।    हाँ मेरा मानना है कि सत्य को स्थापित करने के लिये उदाहरणों  की एवं तर्कों की आवश्कता नहीं होती। असत्य उदाहरणों द्वारा सिद्ध किये जाते हैं।       शायद आपको ईश्वर के संबंध में मेरी परिभाषा तार्किक न लगे कि ईश्वर मनुष्य के डर एवं अज्ञान के स्वार्थ रुपी संसर्ग की संतान है।     मेरी एक रचना धर्म एवं शराब पर भी अपना आशीर्वाद दें।        मान्यवर मैं मंच पर बहस के लिये नहीं अपितु देश के लोगों के विचार जानने एवं लोगों को अवगत कराने आया हूँ। ईश्वर या अईश्वर का प्रतिनिधि बनकर नहीं।       मेरा मानना है कि तारीफ से अधिक लाभदायक एवं उपकारी आलोचना होती है। जो आपकी भूलों में  सुधार करके आपको एक विवेक एवं विचारशील प्राणी बनाती है। आपसे भी निवेदन है कि आप भी मेरी प्रतिक्रियाओं को इसी रूप में लेंगे।       अंत मैं क्षमा माँगता हूँ कि अनेकानेक कारणों से मैं आपकी बातों से सहमत नहीं हो सका। यदि सहमत होता तो आपसे अधिक खुशी मुझे होती।      मनुष्य के लिये ईश्वर है या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है कि हमारे देश से सामाजिक  भेदभाव(जातिप्रथा,दहेज प्रथा आदि), धार्मिक अंधविश्वास(मृत्युभोज आदि) आर्थिक असमानता, राजनैतिक अव्यवस्था(भ्रष्टाचार आदि) आदि का दूर होना। आशा है इस संबंध मैं आप मेरा मार्गदर्शन करेंगे। गद्य में अधिक लिखने की सामर्थ नहीं। संभवतः आशीर्वाद से ऐसा हुआ हो।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

परम आदरणीय पंडित जी सादर चरण वंदन आपके वेद -विज्ञान के अनमोल ज्ञान को नमन ,..आप जिज्ञासा का उत्तर निश्चित ही देते हैं...मैं बिलकुल नही चाहूँगा कि आप मेरी बात पर कोई पोस्ट लिखकर अपनी अनमोल ऊर्जा जाया करें ...बस कुछ बातें आयी हैं जो इस पोस्ट से इतर भी हैं ... श्री रामचरित मानस में  प्रभु श्रीराम के वनवास के बाद भरत को समझाते हुए वशिष्ठ जी ने कहा .. हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ | और भगवान भोले नाथ ने माता पार्वती से कहा है .. बोले बिहसि महेश तब ज्ञानी मूढ़ न कोय | एक विचार आता है कि .. नियति को बदला जा सकता है यदि नीयत बदलने का सामर्थ्य हो ,..और यह सामर्थ्य नियति का नियंता ही दे सकता है ..नियति और नीयत के गोल घेरे में सिर्फ हम हैं !....वन्देमातरम !

के द्वारा: Govind Bharatvanshi Govind Bharatvanshi

आदरणीय पंडित जी सादर प्रणाम, आपके आलेख ने ईश्वर के अस्तित्व पर कुछ लिखने की इच्छा जागृत कर दी। आपसे क्षमा एवं आशीर्वाद माँगते हुये कुछ निवेदन करने जा रहा हूँ। स्वाभाविक है अज्ञानता वश निश्चित ही भूलें होगी। इसी आशंका से आप मुझे क्षमा करेंगे ऐसा वरदान चाहता हूँ। 1.हमने सिर्फ ईश्वर को माना है। कभी प्राप्त नहीं किया और न ही कभी प्राप्त कर सकते हैँ।शायद ईश्वर सिर्फ मानने के लिये होता है, प्राप्त करने के लिये नहीं। 2.प्रथम यह जानना आवश्यक है कि ईश्वर है या नहीं। फिर कहीं यह प्रश्न उठता है कि ईश्वर क्या है।  तार्किक कारणों से यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि न तो ईश्वर है और न ही अच्छा एवं सच्चा जीवन जीने के लिये उसकी आवशयकता है 3.यदि ईश्वर है तो वह न तो कोई आकार प्राप्त कर सकता, न जन्म ले सकता और न ही मृत्यु को प्राप्त कर सकता है। वह सर्वथा जैविक गुणों से प्रथक होगा। ईश्वर चमत्कार भी नहीं दिखा सकता। जो चमत्कार दिखाते हैं, वे या तो ढ़ोगी होते हैं या जादूगर। फिर हमें ईश्वर की आवश्कता क्यों। 4.शायद ईश्वर सदगुणों का समूह हो। यदि ऐसा है तो हम राम, कृष्ण आदि में ईश्वर नहीं कर सकते। क्योंकि गर्भवती पत्नि को किसी अशिक्षित व्यक्ति के मिथ्या आरोपों के कारण त्याग कर वन में भेजना, न तो राजकीय धर्म है, न धार्मिक, न सामाजिक, न मानवीय, न दैवीय और न ही ईश्वरीय। 5.यदि ईश्वर है तो वह इच्छा रहित होगा। किन्तु अधिकांश धर्म यह साबित करने का प्रयास करते हैं कि  ईश्वर ने सृष्टि का निर्माण केवल अवनी इच्छा की पूर्ति के लिये किया है। इच्छा तो मानवीय गुण है। ईश्वरीय नहीं। 6.तुलसी दास एक महान साहित्कार थे। किन्तु हमने अज्ञानता एवं स्वार्थ वश उनके साहित्य को धार्मिक जामा पहनाकर अपनी रोजी रोटी का साधन बनी लिया। 7.नरसिंह अवतार एक काल्पनिक, मिथक, सुन्दर, मनोरंजक एवं सुन्दर संदेश देने वाली मात्र एक कथा है। 8.जीव ईश्वर का अंश है। इसमें बिल्कुल भी सत्य नहीं है। यदि जीव ईशवरीय अंश होता तो उसमें सारे गुण ईश्वरीय ही होते। किन्तु अनुवांशिकता का सिद्धांत चरितार्थ न होने के कारण, जीव ईश्वर का अंश नहीं हो सकता। 9.प्रत्येक प्राणी की सोच समझ एवं विचार प्रथक होते हैं। अतः यह कहना तार्किक नहीं है कि प्रत्येक प्राणी में ईश्वर विराजमान है। 10.प्रथक प्रथक वेश धारण कर ईश्वर बहुरूपिया नहीं हो सकता। यदि ईश्वर है तो वह सीधा, सरल, सहज, सत्य शिव एवं सुन्दर है। 11.ईश्वर की दवा से तुलना करना न तो तर्क संगत है और न ही न्याय संगत। 12.क्या ईश्वर इतना छोटा और विवश है कि उसे रहने के लिये मंदिर, मस्जिद आदि की आवश्यकता पड़े। क्या हमने अपने स्वार्थ के लिये उसे मंदिर, मस्जिद आदि में कैद नहीं कर दिया। 13.करोड़ो वर्षोपरांत उसे हम न तो खोज पाये और न ही प्रत्यक्ष देख पाये। फिर मंदिर, मुर्तियाँ आदि बनाकर क्या साबित करना चाहते हैं। 14.मैं अज्ञानता, डर एवं स्वार्थ के वशीभूत होकर उसे मंदिर, मस्जिद आदि में ढ़ूढ़ता रहा। जिसका मुझे अफसोस है। किन्तु जो बीत चुका वह मेरे वश में नहीं है। अतः अधिक अफसोस से क्या लाभ। 15.आज तक यह सिद्ध नहीं हो सका कि भगवान भगवान है। हाँ यह सिद्ध है कि आदमी आदमी है। 16.जिसे हम न तो देख सकते हैं, न ही पा सकते हैं। फिर इस बहुमूल्य जीवन के बहुमूल्य पलों को उसको खोजने में व्यर्थ नष्ट कर दें। जबकि जीवन के व्यतीत पल दोबारा प्राप्त नहीं होते।यह भी निश्चित है कि  जीवन केवल एक ही बार प्रप्त होता है। अतः हमें इसका सदुपयोग करना चाहिये। 17.ईश्वर की अनेक परिभाषायें हैं। जिसे प्रत्येक व्यक्ति, सम्प्रदाय एवं धर्म अपनी सुविधानुसार प्रस्तुत करता है। 18.शाब्दिक अर्थ तो बौद्धिक कौशल एवं साहित्यिक ज्ञान से अनेक निकल सकते हैं। 19.जो साकार है वह निराकार एवं जो निराकार है वह साकार नहीं हो सकता है। 20नास्तिक वह हैं जो सत्य को न स्वीकार करके केवल अंधविश्वास की बात करते हैं। जिनकी सत्य में आस्था होती है, वे नास्तिक नहीं होते। 21.हिटलर ने लोगों का केवल इसलिये संहार किया। क्योंकि वे लोग यहूदी थे। 22.यदि उसके दर्शन प्राप्त करके व्यक्ति जीवित नहीं रहता , तो फिर जगत में उसकी आवश्यकता क्यों। 23.अंत में बस यही कहूँगा- कि डर एवं अज्ञान के संसर्ग से ईश्वर का जन्म होता है।

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आदरणीय त्रिपाठी जी एक लेखक क़ी शक्ति उसकी लेखनी, उसका परिवार उसके विविध भाव, उसके मित्र उसके विचार एवं उसकी पूँजी उसका ज्ञान होता है. उसकी प्रसन्नता उसकी कृति या रचना का उसके अन्तः करण का मूक अनुमोदन होता है. एक लेखक क़ी पूँजी कभी भी किसी के द्वारा दी गयी शाबासी नहीं होती है. दूसरे क़ी शाबासी क़ी अपेक्षा या प्रतीक्षा सिर्फ वही करते है जिन्हें अपने आप पर भरोसा या विश्वास नहीं होता है. यदि आप अपनी कृति या रचना से संतुष्ट है तों किसी क़ी प्रतिक्रिया या अनुमोदन क़ी आवश्यकता नहीं है. मत फीचर्ड हो ब्लॉग. मत मिले यह क्षणिक सुख का द्योतक पुरस्कार. सूरज को बादल ढक लेगा तों सिर्फ उसकी रोशनी ही ज़मीन पर नहीं आयेगी. किन्तु रात कदापि नहीं होगी. दूसरी बात यह कि यदि आप क़ी रचना आप क़ी डायरी में ही भली है. तों इससे अच्छा और क्या हो सकता है? क्योकि चाहे जैसे भी हो हमें तों यही प्रयत्न करना है कि हमारी रचना भली हो. यदि जागरण मंच से ज्यादा महफूज़ जगह हमारी डायरी है तों मै तों उसे अपनी डायरी में ही रखना पसंद करूंगा. जो भी हो यह मेरा अपना व्यक्तिगत विचार है. क्या पता इससे कितने लोग सहमत हो? सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग भवेत्.

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धन्यवाद रमेश जी, जागर्न जंक्शन परिवार को बचाने और इस मंच पर फैले लेखक बंधुओं को सही रास्ता दिखाने के लिए आपका यह बलॉग अव्श्य ही अन्य गुस्साए ब्लॉगरों की तरह कमेंट नहीं प्राप्त कर सकेगा लेकिन मेरा विश्वास है कि आपके एक कदम से कई अन्य लोग प्रेरित होंगे और इस मंच पर फैले हुए असंतोष की लहर शायद शांत हो. आपका यह ब्लॉग पढ़कर मुझे बेहद खुशी हुई. यहां कुछ लोग मात्र कुछ दिनों में आकर ही इसे खराब बता रहे हैं लेकिन मैं इस मंच से पिछले दो साल से जुड़ा हुई. 50 से ज्यादा ब्लॉग लिखें है लेकिन इनमें से मेरे बहुत कम ब्लॉग ही फीचर हुए हैं पर मैं जानता हूं कि जिस जगह मात्र 10 ब्लॉगों के फीचर होने की जगह हो वहां मेरे जैसे नौसिखिए लेखक की जगह बहुत कम बनती है. खैर आपके ब्लॉग के लिए एक बार फिर धन्यवाद Read My Blogs at http://jack.jagranjunction.com/

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पंडित जी, सादर प्रणाम. आपकी सब बात सही है, की किसी लेख पर पचास ही क्लीक आये, इसका सीचा मतलब यही है की JJ पर पाठक ही नहीं है. दूसरी बात अगर खुद के लिये ही लिखना है तो मेरा अपना ब्लॉग है ना, जिसे मैं ट्विटर या फेसबुक पर शेअर करता रहता हू. अगर आपने एक सिस्टम लाया है की फीचर्ड ब्लाग या ग्लागेर आफ वीक, तो फिर आपको न्यायोचित होना ही पड़ेगा, नहीं तो भैया हम अपने ब्लाग सपाट पर ही खुश थे वहां क्या कमी थी! सिर्फ पाठको एवं सम्मान की ही ना. तो अगर इसकी अपेक्षा छोड़ दे तो मेरा ब्लागस्पाट जिंदाबाद. वैसे भी मेरे किस लेख से भारत की क्या व्यवस्था बदल जाएगी! जब इतने बड़े बड़े आन्दोलन कुछ बदलाव नहीं ला प् रहे हैं. यह बात साफ़ है कीजो ब्लॉग फीचर्ड, ब्लागेर आफ वीक, बनते हैं उस पर ज्यादा कमेन्ट आते हैं, और वैसे भी ब्लागेर की पूंजी क्या है, कॉमेंट्स और वियुस, अब जब कलेजा हाथ में ले के लिखने पर वो भी नहीं मिल रहा है, तो वो शेर और ग़ज़लें मेरी डायरी में ही अच्छे. कुछ ज्यादा कहा हो,तो क्षमा प्रार्थी हू. आपका दिन मंगलमय हो.

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प्रिय संतोष कुमार जी जब हम दूसरे पर दोषारोपण करते है तों उसी से हमारी इच्छा एवं उद्देश्य दोनों प्रकट हो जाते है. यदि कही कोई गंदी हवा बह रही है तों उससे दूर रहना चाहिए. तथा उसके शोधन का उपाय ढूँढना चाहिए. यदि उसी गन्दगी में घुल मिल गये तों फिर उसके उद्धार क़ी अपेक्षा नहीं क़ी जा सकती. नेताजी सुभाष चन्द्र बोष क़ी आज़ाद हिंद फौज का उदाहरण हमारे सामने है. जिसका ढांचा उन्होंने हिन्दुस्तान में नहीं बल्कि विदेशो में खडा किया. तों हमें सुभाष, तिलक, गोखले, विपिन चन्द्र पाल, सरदार बल्लभ भाई पटेल, खुदी राम बोष तथा चन्द्र शेखर आज़ाद बनना है. गांधी बनने से अभी हिन्दुस्तान के और बटवारे एवं नेहरु बनने से हिन्दुस्तान के कई काश्मीर और खड़े हो जायेगें.

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आदरणीय सिंह साहब जैसा कि आप ने देखा होगा, मैं लेख लिखने के बाद फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखता कि कितनी प्रतिक्रियाएं मिली है. दूसरी बात यह कि मै लेखो के इस "ब्लॉग" पर प्रकाशित करने क़ी अन्य टेढ़ी मढी तकनीकी विधाओं से सर्वथा अपरिचित हूँ. इसलिये गलती से कुछ ऐसा "कमांड" देना छूट गया होगा जिससे 'प्रतिक्रिया" देना प्रतिबंधित हो गया था. तीसरे यह कि अमावश्या से वसंत पंचमी के बीच इतने "जजमान" संगम तट पर अपना "सब कुछ" लुटाने आ जाते है. कि भारी भरकम "नगद नारायण" दक्षिणा दे जाते है. और लुटपिट कर खाली हाथ "जोंक" द्वारा चूसे गये प्राणी क़ी तरह हाथ मलते पछताते वापस चले जाते है. इसीलिये खाली पीली "बिना पैसेवाली" मिलने वाली "प्रतिक्रिया" से ध्यान हट जाता है. दूसरी बात सिंह साहब, ज्ञान बांटने क़ी ही चीज होती है. वैसे "पंडितो" क़ी "जजमानी" का भी निःशुल्क प्रचार प्रसार भी हो जाता है. अगर एकाध "जजमान" मिल जाया करें तों गाडी सरकती रहती है. और अंत में, जैसा कि मै आप को आप क़ी पिछली प्रतिक्रिया में संकेत दे चुका हूँ, इस प्रकार इस सर्वेक्षण से मेरा एक "संदेह" पूरी तरह 'विश्वास' में बदल गया. वैसे आप मेरे लेख को उचित एवं पर्याप्त सम्मान देते है, मै आप का आभारी हूँ. धन्यवाद

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प्रिय संतोष कुमार जी यह एक बहुत बड़े सौभाग्य क़ी बात होगी जो आप तीरथ राज प्रयाग का दर्शन करते है. बहुत बड़े बड़े व्यक्ति भी योजना बनाते ही रह जाते है. किन्तु नहीं पहुँच पाते है. मै तों बल्कि दबाव देकर कहना चाहूंगा कि आप अवश्य ही तीरथ राज प्रयाग का दर्शन करें. बल्कि मै तों आप को लिखे इस पत्र के माध्यम से मेरे समस्त पाठको से निवेदन करना चाहूंगा कि सभी एक बार अवश्य तीरथ राज प्रयाग में आकर संगम के परम पवित्र अमृत से भी ज्यादा महत्व रखने वाले जल में एक डुबकी अवश्य लगावें. और मेरा भी यह परम सौभाग्य होगा कि मै पुण्य के आकांक्षी ऐसे श्रद्धालुओ का स्वागत यहाँ करूँ. पण्डित आर. के. राय प्रयाग

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प्रिय संतोष कुमार जी बात ऐसी नहीं है. हम सबको पता है कि होली चैत्र महीने के पहले दिन को मनाई जाती है. किन्तु सबसे बड़ी बात यह है कि होली तों अपने घर का त्यौहार है. इसकी बेईज्ज़ती भी होगी तों कोई बात नहीं है. किन्तु पहली जनवरी तों हमारी मेहमान है. इसकी खातिर एवं आव भगत तों होनी ही चाहिए. अपने घर क़ी रजाई ओढ़ते ओढ़ते यदि फाड़ भी देगें तों कोई बात नहीं है. किन्तु दूसरे क़ी रजाई सुरक्षित रहनी चाहिए. किन्तु शायद यह पता नहीं कि ठण्ड के प्रकोप से अपनी ही रजाई रक्षा कर पायेगी. दूसरे क़ी रजाई के भरोसे ठण्ड से मर जाना पडेगा. देखें प्रभु जी कब तक सदबुद्धि देते है. यदि सदबुद्धि नहीं दिये तों निर्वस्त्र तों पहले ही हो चुके है. अब जो "नेताओं क़ी तरह लंगोटी" बची है वह भी खुलकर कही गुम हो जायेगी. धन्यवाद पण्डित आर. के. राय प्रयाग

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