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सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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sadguruji


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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीया शालिनी कौशिक जी ! ब्लॉग पर आप स्वागत है ! आप बारहों महीने जिस कांग्रेस का,जिस कांग्रेस का और जिस राहुलजी का गुणगान करती हैं,क्या वो लोग संविधान के अनुसार धर्मनिरपेक्ष है ? चाहे सन १९८४ के सिख विरोधी दंगे हों या अन्य सैकड़ों दंगे,जो कांग्रेस के शासनकाल में हुए,क्या वो दंगे कांग्रेस और उसके नेताओं को धर्मनिरपेक्ष साबित करते हैं ? हरगिज नहीं ! कौन नेता है जो पूरी तरह से सत्य भाषण कर रहा है ? मोदीजी दूसरे नेताओं के मुकाबले में सौ फीसदी सच्चे हैं ! जहाँ तक आपने मेरे दलनिरपेक्ष और गुटनिरपेक्ष होने की बात की है तो मैं आपको स्पष्ट बता दूँ कि किसी भी दाल से मेरा कोई लेना देना नहीं है,परन्तु जो मुझे सही लगता है,मैं उसे लोगों के सामने पूरी तरह से उजागर करता हूँ ! कमेंट करने का आपको पूरा अधिकार है,परन्तु अपनी सोच व्यक्त करने का मुझे भी पूरा अधिकार है और मैं मानता हूँ कि देशहित में मेरी सोच सौ प्रतिशत सही है ! प्रतिक्रिया देने के लिए हार्दिक रूप से आभार !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीया शालिनी कौशिक जी,ब्लॉग पर आपका हार्दिक अभिनन्दन है.आपके कमेंट को मैं पढ़ा.मैं आपसे ये पूछना चाहूंगा कि यदि वो लोग अपनी मर्जी से और सौहार्द से अलग हुए तो इसमें किसी को आपत्ति क्या है ? एक ने अध्ययन अध्यापन का मार्ग चुना तो दूसरे ने देश सेवा का.ये मोदी जी और यशोदाबेन जी की महानता है कि दोनों अभी भी उस रिश्ते को स्वीकार कर रहे हैं.आपने पूरा लेख और दूसरे कमेंट ध्यान से नहीं पढ़े हैं.एक सच्चाई मैं आपको और बता दूँ कि दिग्विजय जी और राहुल जी इस मुद्दे पर अब एक शब्द भी नहीं बोलना चाहते हैं.वो लोग जानते हैं कि कांग्रेसी नेताओं के अतीत और चरित्र पर यदि देशभर में चर्चा शुरू हो गई तो कांग्रेसी नेता मुंह छिपाते फिरेंगे.मोदीजी चरित्रवान और राष्ट्रभक्त हैं.कोई कांग्रेसी नेता इस लायक नहीं कि उनके चरित्र पर अंगुली उठा सके.एक अंगुली उनकी मोदीजी की तरफ उठती है तो उनकी खुद की चार अंगुलिया स्वयं की तरफ होती हैं.चाणक्य जी ने कहा है की यदि चरित्रहीन और रष्ट्रभक्त नेता में से किसी एक को चुनना हो तो राष्ट्रभक्त नेता को चुनना चाहिए.मोदीजी जैसा राष्ट्रभक्त,स्वाभिमानी और प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला नेता भारत में इस समय कोई दूसरा नहीं है.जनता के लिए वो सौभाग्य और राष्ट्रिय गौरव के प्रतीक हैं.यदि मोदीजी भारी बहुमत से जीतकर देश के अगले पीएम बनते हैं तो ये हम सबका परम सौभाग्य होगा और सम्पूर्ण भारत के चहुमुंखी विकास का उद्गोष होगा.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

जशोदाबेन जी को अपने पति से कोई गिला शिकवा नहीं है.वो पुरे विश्वास के साथ कहतीं हैं कि नरेंद्र मोदी एक दिन प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे.मोदीजी के वैवाहिक संबंधों को लेकर जो लोग उनका अनर्गल विरोध कर रहे हैं,उन मोदी विरोधियों के मुंह पर जशोदाबेन जी ने जोरदार चांटा मारते हुए मोदीजी के पीएम बनने के लिए आजकल विशेष व्रत कर रहीं हैं.इस विशेष व्रत के तहत वो घंटों पूजापाठ करतीं हैं..मोदीजी के पीएम बनने के लिए मननत मांगती हैं..उन्होंने अपना प्रिय भोजन चावल खाना छोड़ दिया है..और वो नंगे पांव रहती हैं..धन्य हैं जशोदाबेन जी और उनकी पतिभक्ति.. इसे पतिभक्ति के साथ साथ राष्ट्रभक्ति भी कहा जाना चाहिए श्री सद्गुरु जी ! बहुत सटीक लेखन ! http://yogi-saraswat.blogspot.in/

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीया डॉक्टर रंजना जी,सुप्रभात और हार्दिक अभिनन्दन ! आपने सही कहा है कि यदि स्त्री स्वयं सचेत और हिम्मती नही हुयी तो स्त्री शोषण रुकनेवाला नहीं है.वासना में अंधे पुरुषों के साथ साथ बहुत सी महिलायें भी स्त्री शोषण में लगीं हुईं हैं.किसी भी स्त्री का शोषण होता है तो मैं बहुत विचलित हो जाता हूँ.मुझे मेरी माँ का लाड़ दुलार,बहनों व बिटिया का स्नेह और पत्नी व करीबी मित्रों का असीम प्रेम मेरे मन को सम्पूर्ण स्त्री जाति के कल्याण के लिए कुछ करने को सक्रीय और आंदोलित कर देता है.मुझे हमेशा महसूस होता है कि मैं उनके एहसान और बोझ तले दबा हुआ हूँ,जिनके ऋण से मैं कभी उऋण नहीं हो सकता हूँ.मेरे करीबी मित्रों ने मेरे मन को कई बार तोडा और जोड़ा,परन्तु फिर भी वो मेरे लिए आजतक एक आकर्षण के केंद्र बने हुए हैं.मुझे उन्होंने अर्द्धनारीश्वर जैसा बना दिया है.उनका सुख दुःख सब अपना लगता है,इसीलिए उनका दुखदर्द सुनकर मैं बेचैन हो जाता हूँ.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

आज जरुरत इस बात की है कि ‘बुढ़वा मंगल’ पर्व को शासकीय पर्व घोषित किया जाये और इसे एक वृहद् आयोजन का स्वरुप देकर आम जनता को और विदेशी शैलानिओं को इससे जोड़ा जाये.इससे आम जनता ओर विदेशी शैलानियों के बीच यह पर्व और लोकप्रिय होगा.बहुत से गीत संगीत के कलाकारों को अपनी कला प्रदर्शित करने का गंगधारा के बीच एक अदभुद मंच मिलेगा.फ़िलहाल बिना किसी शासकीय मदद के ‘बुढ़वा मंगल’ उत्सव को आयोजित करने वाले समर्पित आयोजक और इसमें पूरे उत्साह के साथ भाग लेने वाले काशीवासी बधाई के पात्र हैं,जिन्होंने इस विशिष्ट उत्सव के जरिये काशी की मौज-मस्ती व फक्कड़पन को जीवित रखा हुआ है.मैं उन्हें सादर नमन करता हूँ.हम सब काशीवासी धन्य हैं,जो बुढ़वा बाबा की छत्रछाया में उनकी प्रिय नगरी में रहते हैं. काशी के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी देता लेखन ! http://yogi-saraswat.blogspot.in/

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

आदरणीया निर्मला सिंह गौर जी,ब्लॉग पर आने के लिए सबसे पहले मेरा हार्दिक आभार स्वीकार कीजिये.सुचित्रा और मेरी उम्र लघभग एक बराबर है.लगभग तेईस साल से वो मेरी मित्र हैं.मेरी पत्नी उसे भली भांति जानती हैं,इसीलिए सुचित्रा उन्हें दीदी बोलती है.मेरी पत्नी कल मेरी बिटिया के साथ आ रही हैं.वो सबकुछ जानती हैं,फिर भी मैं उनसे आग्रह करूँगा कि वो पूरा संस्मरण पढ़ें.मैंने कोई ऐसा कार्य नहीं किया है कि उनके ह्रदय को ठेस पहुंचे.मैंने अपने अभिन्न मित्र के दोस्ती और प्रेम को एक गरिमा दी है,जिसकी वो हक़दार थी.वो एक झूठ में जी रही थी,जिससे बाहर निकलने को तैयार नहीं थी.वो झूठ उसके लिए एक सुरक्षा कवच था.मैंने उसके झूठ को छूकर सच में बदल दिया है,ताकि मेरी मित्र हर तरह के अपराधबोध,कुंठा और झूठ के उस लबादे से मुक्त हो सके.ये मेरा कर्त्तव्य था और उसके साथ न्याय करने का मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं था.आश्रम से लगभग पचपन हजार से ज्यादा लोग जुड़े हुए हैं.बहुत से लोग मेरे ब्लॉग को पढ़कर नक् भौ सिकोड़ेंगे,परन्तु मुझे किसी की भी परवाह नहीं है.मैं किसी के भरोसे नहीं बल्कि भगवान के भरोसे रहता हूँ.मैं हर समय प्रेम में जीता हूँ,इसीलिए मेरे ब्लॉग से भी प्रेम झलकता है.मेरे लिए ब्लॉग लिखने का का अर्थ है-अपने अनुभवों और आपबीती का कच्चा-चिटठा लिखना.मेरा ये प्रयास मेरे ह्रदय को शुद्ध रखता है और मुझे हर समय ईश्वर के समीप रखता है.जीव और ब्रह्म का अनुभगत सुख मेरी रचनाओ में है.सुचित्रा जीव है तो मैं ब्रह्म और मेरी पत्नी ब्रह्म है तो मैं जीव.आपको इस कमेंट के लिए पुन:ह्रदय से आभार.आपके कमेंट के माध्यम से कुछ गूढ़ लग रही चींजों को मैंने सरलता से समझाने की कोशिश की है.भविष्य में भी आप जैसे विद्वानो से संवाद होता रहे,इसी शुभकामना के साथ पुन:हार्दिक धन्यवाद.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय सद गुरूजी ,मैने जागरण जंक्शन पर सिर्फ ६ माह से दाखिला लिया है पर इतने दिनों में आप सब से काफी कुछ परिचित हो गई हूँ आप इस परिवार के एक बहुत सम्मानीय व्यक्तित्व हैं,चारों एपिसोड पढ़ कर यह बात समझ में आई की दोस्ती और प्यार के मध्य बहुत बारीक़ रेखा होती है,और शायद उस रेखा को ही मर्यादा कहते हैं,आप जिस स्थान पर सुशोभित हैं ,आपके कई लोग फोलोअर भी हैं ,आप की विवशता भी समझ में आई ,और इतना बड़ा सच जस का तस मीडिया में उजागर करना भी आपकी अन्तरंग सच्चाई का प्रमाण है,साथ ही आपकी पत्नी की सह्रदयता को भी मै नमन करती हूँ. क्या वो भी मायके से लौट कर सच्चाई जान चुकीं ,यह प्रश्न हर एक पाठक के मन में उठ रहा होगा आप मेरी बात को अन्यथा न लें,अगर कुछ त्रुटि हो तो क्षमा करें ,आप एक इमानदार एवं सच्चे इन्सान हैं ,एक और एपिसोड के लिए प्रतीक्षा रत हूँ ,सादर नमन आपको .

के द्वारा: Nirmala Singh Gaur Nirmala Singh Gaur

आदरणीया डॉक्टर रंजना गुप्ताजी,पारिवारिक रूप से और अपने बहुत पुराने मित्र से उलझे होने के कारण मैं किसी के ब्लॉग पर नहीं जा पाया.मेरा मूड बहुत ख़राब था.मैं वहाँ से आने के बाद चुपचाप अपनी आपबीती लिखता रहा.मैं ये सोचकर लिखा था कि इसे पोस्ट नहीं करूँगा,परन्तु उसके उकसाने पर मैंने पोस्ट कर दिया.आप के लिए मैंने उसी समय ईश्वर से प्रार्थना कर दिया था जब आपका कमेंट पढ़ा था और मुझे मालूम हुआ कि आप स्वास्थ्य और पारिवारिक समस्याओं से जूझ रही हैं.ज्योतिष के अनुसार ये सब शनि की साढ़साती प्रभाव है.तुला राशि वालों को दो २ नवम्बर २०१४ तक पारिवारिक रूप से,कार्य व्यवसाय से और स्वास्थ्य से परेशानी रहेगी.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

सद गुरु जी, ये देश महान है, सदियों से महान रहा है, यहाँ जो भी आया उसने इसे दिल खोल कर लूटा, गजनी, गोरी, हलाकू, तैमूरलंग, चंगेजखान जैसे खूंखार हत्यारे आये धन, सोना, चांदी, हीरे जवाहरलात लूटे, लाखों हिंदुओं को कसाई की तरह काट कर चले गए और बहुत सारे दुर्जनों को यहीं छोड़ गए ! आज कभी बँगला देश से हिंदुशरणार्थी बड़ी संख्या में भारत आ रहे हैं तो कभी पाकिस्तान कट्टरपंथी हिंदुओं के ऊपर जुल्म ढा रहे हैं हैं, उन्हें जबर्दस्ती उनके घरों से निकाला जा रहा है ! देश के करणधार वोटों की राहनीति कर रहे हैं अपना घर भर रहे हैं ! विश्व स्तर पर मानव अधिकार आयोग भारत में पकड़े गए आतंकवादियों की खैर खबर लेने भारत जरूर आ जाते हैं पर उन बेचारे किस्मत के मारे कट्टर पंथियों द्वारा सताए गए निसहाय अल्पसंख्यकों के आंसू उन्हें नजर नहीं आ रहे हैं ! किसे दोष दें ! जहां मुलायमसिंह, मायावती, लालू, नीतिस कुमार अपनी कुर्सी बचाने के लिए इन गरीबों के आंसू नहीं देख पा रहे हैं, हम आप जैसे लोग उनकी क्या मदद कर पाएंगे ? दिल दहलाने वाले लेख के लिए बधाई स्वीकार करे, सदगुरु जी ! हरेन्द्र जागते रहो

के द्वारा: harirawat harirawat

आदरणीय जवाहर लाल सिंह जी,सदर अभिनन्दन ! आप की प्रतिक्रिया मैंने ध्यान से पढ़ी है.इस लेख का सम्बन्ध मोदीजी से या हिन्दू राष्ट्र से नहीं है.आपने जो देश की समस्यायें बताई हैँ,वो सब तो हैँ ही,परन्तु लेख का विषय पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओ की बदतर होती स्थिति पर है.इन लेखों का तात्पर्य मिडिया के सामने उनके दुखों को उजागर करने के साथ ही उन्हें अपना नैतिक समर्थन देना भी है.इसी विषय पर आदरणीय योगीजी ने भी एक यादगार ब्लॉग लिखा था.ये भी एक कड़वी सच्चाई है.हम इससे दूर क्यों भागते है और धर्मनिरपेक्षता का ढोंग और पाखंड करते हैँ.यदि मुस्लिम सिख और ईसाई अपनी समस्याएं मिडिया के सामने उजागर कर सकते हैँ तो यह अधिकार हिन्दुओ को भी है.मेरे विचार से इस दृष्टि से आलेख आवश्यक और उचित है.प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय सद्गुरु जी, सादर अभिवादन! आपने अपने दो आलेखों में क्रमश: पाकिस्तान और बंगला देश में हिंदुओं की दुर्दशा का वर्णन किया है ... हिंदुओं के लिए यह जरूर चिंता का विषय है ...पर जो हल आपने या मोदी जी ने बताया वह सही है क्या? इस पर मैं अपना विचार रखना चाहूंगा. - हिंदुओं और मुसमानों की जनसंख्या के आधार पर ही हिन्दुतान और पाकिस्तान बना. कालांतर में पूर्वी पाकिस्तान बंगला देश में परिवर्तित हो गया, जिसमे हिंदुस्तान का ही योगदान रहा है. पूर्ण हिन्दू और पूर्ण मुस्लिम देश बन जाने से समस्या का समाधान हो जायेगा क्या? फिर अपने देश में इतने सारे राज्य क्यों बनते और एक राज्य के लोग दूसरे राज्यों के लोगों से घृणा या द्वेष क्यों करते हैं. फिर वर्ण और जाति ब्यवस्था, रंगभेद... आज भी इंग्लैण्ड में भारतीयों को दूसरे दर्जे या घृणा के भाव से देखा जाता है. दिल्ली में पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोगों का और कभी कभी बिहारियों के साथ भी भेद भाव ठीक है क्या.? हम वसुधैव कुटंबकम और सर्वे सुखिन: भवन्तु का नारा देते हैं... फिर इस तरह के आलेख का क्या तात्पर्य है? क्या महिलाएं, बच्चियां, शूद्रों के साथ भेद भाव नहीं होता रहा है? दलित महा दलित, अगड़ा पिछड़ा यह सब मेरे ख्याल से न कभी सही था न आज है ... आप मेरे आशय समझ गए होंगे ...सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: shakuntlamishra shakuntlamishra

आदरणीय यतिंद्रनाथचतुर्वेदी जी,ब्लॉग पर आकर सकरात्मक प्रतिक्रिया देने के लिए और उत्साहवर्धन करने के लिए मेरा हार्दिक आभार स्वीकार कीजिये.इस रचना में मैंने एक दिन की घटना बयान की है.एकदिन जब मेरी पत्नी खाना खा रहीं थीं,उसी समय मेरी बिटिया आँगन में शौच करने लगीं.मेरी पत्नी खाना छोड़कर उठीं और शौच की और बिटिया की सफाई कर उन्होंने साबुन से हाथ धोया और बिटिया को गोद में लेकर फिर खाना खाने लगीं जैसे कुछ हुआ ही न हो.ये दृश्य देखकर मैं बहुत भावुक हो गया था और सोचने लगा था कि पत्नी की जगह मैं होता तो क्या मैं ऐसा कर सकता था,वो भी इतने निर्विकार भाव से..माँ से अधिक महान कोई नहीं.एक बार पुन:आपको हार्दिक धन्यवाद.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदमी जिसके बहुत निकट होता है और जिससे बहुत प्रेम करता है उससे मन को ठेस भी बहुत जल्दी लगती है.अधिकतर लोगों के जीवन में पत्नी और बच्चें ही सबसे निकट होते होते हैं. बिटिया को उनकी गोद में सौपा और उनके कंधे पर अपना हाथ रख बस इतना ही बोला-इस दुनिया में माँ से ज्यादा महान कोई नहीं..मैं दुनिया की सभी माताओं को सादर नमन करता हूँ..माता और मातृभूमि दोनों को मेरा कोटि कोटि प्रणाम.. वन्दे मातरम्। सदगुरु जी जय श्री राधेय बहुत सुन्दर संस्मरण और आप कि ये प्यारी कथा ..जीवन के विभिन्न विन्दुओं को छूती हुयी यथार्थपरक ... सभी माओं को मेरा भी नमन ...स्त्रियों का सम्मान सदा हो ..बेस्ट ब्लागर आफ दी वीक और ताप ब्लॉग में चुने जाने हेतु बधाई भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

आदमी जिसके बहुत निकट होता है और जिससे बहुत प्रेम करता है उससे मन को ठेस भी बहुत जल्दी लगती है.अधिकतर लोगों के जीवन में पत्नी और बच्चें ही सबसे निकट होते होते हैं. बिटिया को उनकी गोद में सौपा और उनके कंधे पर अपना हाथ रख बस इतना ही बोला-इस दुनिया में माँ से ज्यादा महान कोई नहीं..मैं दुनिया की सभी माताओं को सादर नमन करता हूँ..माता और मातृभूमि दोनों को मेरा कोटि कोटि प्रणाम.. वन्दे मातरम्। सदगुरु जी जय श्री राधेय बहुत सुन्दर संस्मरण और आप कि ये प्यारी कथा ..जीवन के विभिन्न विन्दुओं को छूती हुयी यथार्थपरक ... सभी माओं को मेरा भी नमन ...स्त्रियों का सम्मान सदा हो ..बेस्ट ब्लागर आफ दी वीक और ताप ब्लॉग में चुने जाने हेतु बधाई भ्रमर ५ भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

मैंने एक बार उनसे पूछा भी कि-कहीं बाहर जाना हो तो ओरतें इतनी सज संवरकर जाती हैं.औरतें घर में उस तरह से सज संवर के क्यों नहीं रहती हैं ? मेरी पत्नी ने बहुत दिलचस्प जबाब दिया था-घर में कैसे भी रहूँ क्या फर्क पड़ता है..बाहर अच्छे ढंग से सजसंवरकर नहीं जाउंगी तो आप की ही बदनामी होगी..लोग सोचेंगे कि इसके पास अच्छे कपड़े नहीं होंगे.. मैंने कहा था कि-लोगों के सोंचने की औरतों को बहुत चिता रहती है,लेकिन पति के चाहने की कोई परवाह नहीं होती है.. इन पंक्तियों को पढ़ कर आपके ब्लॉग से जुडी मेरी एक कविता का ध्यान आ गया.यह सच कहा आपकी पत्नी जी ने सदगुरूजी माता सच में महान होती हैं पर बच्चे की परवरिश के दौरान यह सब सहजता से होता रहता है..शायद कुदरती ... बहुत सुन्दर ब्लॉग साभार

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: deepakbijnory deepakbijnory

इक्कीसवीं सदी की वर्तमान गतिविधियों पर यदि गौर किया जाए तो व्यक्ति से समष्टि तक को सफलता पाने के लिए अपने कौशलों को सुधारने की नितांत आवश्यकता है | यह नहीं कि जहाँ और जैसे बैठा था, उसी मुद्रा में बैठा रहे, जैसे खड़ा या पड़ा था, बस वैसे का वैसा खड़ा-पड़ा रहे और जैसे सड़ा-गला था, ज्यों का त्यों बना रहे | नैत्यिक नवीनता और परिस्थितियों की माँग के आधार पर स्वयं में बदलाव ज़रूरी है, नहीं तो क्या व्यक्ति, क्या समष्टि कोई भी आज की स्पर्धा में टिक नहीं पाएगा | उक्त दृष्टिकोण से जो जागरण जंक्शन को योजना बनानी और क्रियान्वित करनी चाहिए, वह सद्गुरु जी ने काफी-कुछ सोचा है और श्रमपूर्वक लिपिबद्ध भी किया है | अब सम्पादक-मंडल को चाहिए कि अपने-आप में हरकत लाएँ, कुछ करें और जागरण जंक्शन को और अधिक न्यायोन्मुख, और अधिक प्रभावशाली तथा और अधिक लोकप्रिय बनाएँ | ... आदरणीय सद्गुर जी को हृदयपूर्वक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

इक्कीसवीं सदी की वर्तमान गतिविधियों पर यदि गौर किया जाए तो व्यक्ति से समष्टि तक को सफलता पाने के लिए अपने कौशलों को सुधारने की नितांत आवश्यकता है | यह नहीं कि जहाँ और जैसे बैठा था, उसी मुद्रा में बैठा रहे, जैसे खड़ा या पड़ा था, बस वैसे का वैसा खड़ा-पड़ा रहे और जैसे सड़ा-गला था, ज्यों का त्यों बना रहे | नैत्यिक नवीनता और परिस्थितियों की माँग के आधार पर स्वयं में बदलाव ज़रूरी है, नहीं तो क्या व्यक्ति, क्या समष्टि कोई भी आज की स्पर्धा में टिक नहीं पाएगा | उक्त दृष्टिकोण से जो जागरण जंक्शन को योजना बनानी और क्रियान्वित करनी चाहिए, वह सद्गुरु जी ने काफी-कुछ सोचा है और श्रमपूर्वक लिपिबद्ध भी किया है | अब सम्पादक-मंडल को चाहिए कि अपने-आप में हरकत लाएँ, कुछ करें और जागरण जंक्शन को और अधिक न्यायोन्मुख, और अधिक प्रभावशाली तथा और अधिक लोकप्रिय बनाएँ | ... आदरणीय सद्गुर जी को हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आदरणीय सद्गुरु जी, सादर अभिवादन! मैंने आपके ” छुप गया कोई रे..” की सारी किश्तें नहीं पढ़ी है फिर भी लगता है कि कितने राज और संस्मरण आप अपने आप में समेटे हुए हैं... सच्ची बात जो मैं समझता हूँ ... इन संस्मरणों को साझा करने से अपना मन जरूर हल्का होता है ...जो समय बीत गया, उसे लौटाया तो नहीं जा सकता पर सबक जरूर लिया जा सकता है. ऐसी कितनी ही कहानियां, सच्चाइयां बहुत सरे लोगों के अंदर दफ्न होती हैं...कोई उसे सार्वजनिक रूप से साझा करता है कोई सकुचाता है ... बस इतना ही कहना चाहूंगा ... अनुराग और वैराग्य आप बेहतर जानते होंगे... हम सब तो जीवन की लड़ाई, रोजी रोटी, घर परिवार से ही जूझते हुए अपनी जिंदगी गुजार देते हैं. सादर नमन!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

सद्गुरु जी !प्रणाम ! बहुत ही द्रवित करता आलेख !और उत्तम आलोचना ! बहुत सद्भावनायेँ !होरी और धनिया हमारी कृषि दुर्व्यवस्था के राष्ट्रीय प्रतीक है !प्रेम चन्द्र असली अर्थो में कृषि लेखक थे !मेरी कविता अन्न दाता जाने कैसे डिलीट हो गई दुबारा लिख कर डाली है !साथ ही ही आपके और गुंजन जी के मूल्यवान प्रतिक्रियायें भी गायब हो गई !अत:आप से निवेदन है कि दुबारा राय दे !और मुझे कृतार्थ करे !क्या जागरण जक्शन के होम पेज पर हैंग की समस्या है ?कोई नया पेज ही  नही खुलता और व्ही पुराना दीखता है !रीडर ब्लाग पर भी यही समस्या है !क्या हो गया है !कृपया जानकारी हो तो हमे भी अवगत कराए!बहुत दिक्कत है साईट पर कई दिन हो गये!!धन्यवाद !!!

के द्वारा: ranjanagupta ranjanagupta

आचार्यजी,आपको भी जन्मदिन की बधाई हो.ब्लॉग पर आने के लिए हृदय से धन्यवाद. काम्यानां कर्मणा न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥आचार्यजी की बातों को पाठकगण पूरी तरह से समझ सकें,इसीलिए कुछ संस्कृत शब्दों के अर्थ लिख रहा हूँ. विचक्षणाः का अर्थ है,विचारकुशल पुरुष.प्रवर्तन्ते का अर्थ है,आरम्भ होती है. भावार्थ : श्री भगवान बोले- कितने ही पण्डितजन तो काम्य कर्मों के (स्त्री, पुत्र और धन आदि प्रिय वस्तुओं की प्राप्ति के लिए तथा रोग-संकटादि की निवृत्ति के लिए जो यज्ञ, दान, तप और उपासना आदि कर्म किए जाते हैं, उनका नाम काम्यकर्म है।) त्याग को संन्यास समझते हैं तथा दूसरे विचारकुशल पुरुष सब कर्मों के फल के त्याग को (ईश्वर की भक्ति, देवताओं का पूजन, माता-पितादि गुरुजनों की सेवा, यज्ञ, दान और तप तथा वर्णाश्रम के अनुसार आजीविका द्वारा गृहस्थ का निर्वाह एवं शरीर संबंधी खान-पान इत्यादि जितने कर्तव्यकर्म हैं, उन सबमें इस लोक और परलोक की सम्पूर्ण कामनाओं के त्याग का नाम सब कर्मों के फल का त्याग है) त्याग कहते हैं.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

हाँ........हाँ..............................................गीता मेरे लिए जीतनी कल झूठी थी उतनी ही आज झूठी है ................क्योंकि आप जिस व्यक्ति से उसे जोड़ रहे हैं, मैं उसका आज हूँ और यह पूरी सृष्टि मेरी इच्छाओं की परिणाम है जिसे मैं खुद को ही भ्रमित करने के लिए जन्मा हूँ......अभी जो कुछ भी कहा वह मेरी अनुभूति और अनुभव न कि गीता और कृष्ण की...............और यदि वह सच है तो मेरे साथ-साथ यह पूरा का पूरा वर्तमान झूठ है...............चाहे कोई काल हो या समय हो मेरे रहते हुए न मेरा भूत सच है और न मेरा भविष्य....क्योंकि हरेक काल में मैं ही हूँ यहाँ तक कि जब काल नहीं है तब भी मैं ही हूँ.............आपकी समस्या यह है कि आप मुझे समझने में लगे हुए हैं और जितना आप मुझे समझने की कोशिश करेंगे उतने ही भ्रमित होते जायेंगे और जिस दिन आप खुद को समझ लेंगे सारे प्रश्न और जवाब ख़त्म हो जायेंगे.....

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

तुम इतनी पढ़ी-लिखी हो कि तुम्हे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने के ऑफर मिल रहे हैं.तुम उसे स्वीकार करो और घर की चारदीवारी से बाहर निकलो.तुम्हारे घर वालों को भी तुम्हारे पढ़ाने पर कोई आपत्ति नहीं है.घर से बाहर निकलने पर तुम्हारा साहस बढ़ेगा,तुम्हारा हौसला बढ़ानेवाले लोग मिलेंगे और घर में तुम्हारी स्थिति भी मजबूत होगी.रही ईश्वर से प्रार्थना करने की बात तो मैं तुम्हारे लिए ईश्वर से जरुर प्रार्थना करूँगा.वो चुप हो गई और मुझसे विदा ली.मैं सोचने लगा कि स्त्री के लिए विवाह भी एक जुआ है.पूरा जीवन दाव पर लगा के और कर्ज के बोझ तले माता पिता को दबा के भी कोई गारंटी नहीं की कैसा घर और वर मिलेगा ?वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा या दुखी रहेगा ?

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

तुम इतनी पढ़ी-लिखी हो कि तुम्हे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने के ऑफर मिल रहे हैं.तुम उसे स्वीकार करो और घर की चारदीवारी से बाहर निकलो.तुम्हारे घर वालों को भी तुम्हारे पढ़ाने पर कोई आपत्ति नहीं है.घर से बाहर निकलने पर तुम्हारा साहस बढ़ेगा,तुम्हारा हौसला बढ़ानेवाले लोग मिलेंगे और घर में तुम्हारी स्थिति भी मजबूत होगी.रही ईश्वर से प्रार्थना करने की बात तो मैं तुम्हारे लिए ईश्वर से जरुर प्रार्थना करूँगा.वो चुप हो गई और मुझसे विदा ली.मैं सोचने लगा कि स्त्री के लिए विवाह भी एक जुआ है.पूरा जीवन दाव पर लगा के और कर्ज के बोझ तले माता पिता को दबा के भी कोई गारंटी नहीं की कैसा घर और वर मिलेगा ?वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा या दुखी रहेगा ? प्रेरणा मिलती है तो लोग इतिहास बदल देते हैं ! बहुत सार्थक पोस्ट ! श्री सद्गुरु जी

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय सद्गुरु जी, सादर अभिवादन! आज ही मैं आपका आलेख पढ़ पाया और विभिन्न प्रतिक्रियायें भी पढ़ी. सोनम को मैं अपनी लड़की तुल्य ही समझता हूँ उसके विचार बड़े स्पष्ट हैं.... निश्चित ही लड़कियों को स्वयं जगाना होगा और अपने पैर पर खड़ा होना होगा ... पर दुःख की बात यही है कि उच्च वर्ग में भी शिकार हमेशा महिलाएं ही बनती हैं ... तजा उदहारण सुनंदा थरूर का है. मैं यह नहीं कह रहा कि सुनंदा कितना सही या गलत थी पर इसके पहले भी अनेक घटनाओं में महिलाएं ही भुक्त भोगी बनती है ...हमारे पुरुष प्रधान समाज की सोच बदलनी चाहिए. सौभाग्य से हम सब एक अच्छे मंच से जुड़े हैं जहाँ हैम अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैं ... अगर हैम सभी अपने आचरण में परिवर्तन ला सकें तो बहुत कुछ सकारात्मक सन्देश समाज को जायेगा... आपका हार्दिक अभिनन्दन! सत्य कथा और अपने सकारात्मक विचार रखने के लिए! प्रतिक्रियाएं कहाँ जा रही हैं पता नहीं ..

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय सद्गुरु जी, सादर अभिवादन! आज ही मैं आपका आलेख पढ़ पाया और विभिन्न प्रतिक्रियायें भी पढ़ी. सोनम को मैं अपनी लड़की तुल्य ही समझता हूँ उसके विचार बड़े स्पष्ट हैं.... निश्चित ही लड़कियों को स्वयं जगाना होगा और अपने पैर पर खड़ा होना होगा ... पर दुःख की बात यही है कि उच्च वर्ग में भी शिकार हमेशा महिलाएं ही बनती हैं ... तजा उदहारण सुनंदा थरूर का है. मैं यह नहीं कह रहा कि सुनंदा कितना सही या गलत थी पर इसके पहले भी अनेक घटनाओं में महिलाएं ही भुक्त भोगी बनती है ...हमारे पुरुष प्रधान समाज की सोच बदलनी चाहिए. सौभाग्य से हम सब एक अच्छे मंच से जुड़े हैं जहाँ हैम अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैं ... अगर हैम सभी अपने आचरण में परिवर्तन ला सकें तो बहुत कुछ सकारात्मक सन्देश समाज को जायेगा... आपका हार्दिक अभिनन्दन! सत्य कथा और अपने सकारात्मक विचार रखने के लिए! सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय सद्गुरु जी, सादर अभिवादन! आज ही मैं आपका आलेख पढ़ पाया और विभिन्न प्रतिक्रियायें भी पढ़ी. सोनम को मैं अपनी लड़की तुल्य ही समझता हूँ उसके विचार बड़े स्पष्ट हैं.... निश्चित ही लड़कियों को स्वयं जगाना होगा और अपने पैर पर खड़ा होना होगा ... पर दुःख की बात यही है कि उच्च वर्ग में भी शिकार हमेशा महिलाएं ही बनती हैं ... तजा उदहारण सुनंदा थरूर का है. मैं यह नहीं कह रहा कि सुनंदा कितना सही या गलत थी पर इसके पहले भी अनेक घटनाओं में महिलाएं ही भुक्त भोगी बनती है ...हमारे पुरुष प्रधान समाज की सोच बदलनी चाहिए. सौभाग्य से हम सब एक अच्छे मंच से जुड़े हैं जहाँ हैम अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैं ... अगर हैम सभी अपने आचरण में परिवर्तन ला सकें तो बहुत कुछ सकारात्मक सन्देश समाज को जायेगा... आपका हार्दिक अभिनन्दन! सत्य कथा और अपने सकारात्मक विचार रखने के लिए!

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आदरणीय सद्गुरु जी, सादर अभिवादन! आज ही मैं आपका आलेख पढ़ पाया और विभिन्न प्रतिक्रियायें भी पढ़ी. सोनम को मैं अपनी लड़की तुल्य ही समझता हूँ उसके विचार बड़े स्पष्ट हैं.... निश्चित ही लड़कियों को स्वयं जगाना होगा और अपने पैर पर खड़ा होना होगा ... पर दुःख की बात यही है कि उच्च वर्ग में भी शिकार हमेशा महिलाएं ही बनती हैं ... तजा उदहारण सुनंदा थरूर का है. मैं यह नहीं कह रहा कि सुनंदा कितना सही या गलत थी पर इसके पहले भी अनेक घटनाओं में महिलाएं ही भुक्त भोगी बनती है ...हमारे पुरुष प्रधान समाज की सोच बदलनी चाहिए. सौभाग्य से हैम सब एक अच्छे मंच से जुड़े हैं जहाँ हैम अपने विचारों का आदान प्रदान करते हैं ... अगर हैम सभी अपने आचरण में परिवर्तन ला सकें तो बहुत कुछ सकारात्मक सन्देश समाज को जायेगा... आपका हार्दिक अभिनन्दन! सत्य कथा और अपने सकारात्मक विचार रखने के लिए!

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आदरणीया डॉक्टर रंजना गुप्ताजी,ब्लॉग पर आने के लिए आपका ह्रदय से आभार.आप ठीक कह रही हैं.मेरे संस्मरण की कुछ कड़ियाँ शेष रह गईं हैं.मेरी डायरी के छब्बीस पन्ने और शेष रह गएँ हैं.एक क़िस्त में लगभग चार पन्ने आ रहे हैं.कुछ स्मृतियों का भी सहारा लेना पड़ रहा है.मेरा ये संस्मरण भविष्य में एक पुस्तक और एक फ़िल्म का रूप लेकर लोगों तक पहुंचेगा.परिचय के कई लोग संपर्क बनाये हुए हैं,अभी मैंने किसी को भी इसकी इजाजत नहीं दी है.लेकिन पूरा संस्मरण लिखने के बाद उस प्रेम में पागल लड़की को मैं अपने प्रेम के और भी कुछ पुष्प समर्पित करना चाहूंगा.फ़िलहाल जागरण मंच को ह्रदय से धन्यवाद देते हुए ये संस्मरण रूपी पुष्प मैं उसे समर्पित कर रहा हूँ.अब तो लोग मुझसे मिलकर इसपर चर्चा करने लगे हैं.सुचित्रा (एक टीचर) के जैसे कई ऐसे भी इस संस्मरण के प्रेमी हैं,जो चाहते हैं कि मैं लिखता रहूँ और वो पढ़ते रहें.हर चीज का अंत होता है और ये संस्मरण भी अब समापन की और अग्रसर है.मैं जानता हूँ कि बहुतों के मन में मेरी एक इमेज है और उन्हें मेरा अपने अतीत के बारे में इतना खुल के बताना अच्छा नहीं लग रहा होगा.इस बारे में मैं बस इतना ही कहूंगा कि मेरे पास अब कुछ खोने या पाने को शेष नहीं बचा है.मैं चाहता हूँ कि संसार से जब भी मैं जाऊं मैं शरीर से ही नहीं बल्कि इस जन्म में मिले हर संस्कार से और हर अतीत से नग्न हो के जाऊं.मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है कि पूरी शालीनता और शिष्टाचार के साथ अपना संस्मरण लिखूं,फिर भी मेरी किसी बात से किसी के ह्रदय को ठेस पहुंची हो तो मुझे क्षमा करे.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

सोनमजी,आपकी बात सौ प्रतिशत सही है.आदर्श विवाह का मैं भी कायल हूँ.मैं स्वयं अपनी मर्जी से मंदिर में शादी किया था.दुर्भाग्य से वो मुझे अकेला छोड़कर संसार से चली गईं थीं.सन २००० में जब माता पिता की मर्जी से मेरा विवाह तय हुआ था,तब उस समय मेरे ससुरजी के पास मात्र बीस हजार रूपये थे.मैंने उनसे कहा कि आप कर्ज मत लीजियेगा और मुझे आपकी लड़की के सिवा कुछ नहीं चाहिए.मेरे घरवाले बहुत नाराज हुए थे.वो उस जगह मेरा विवाह नहीं करना चाहते थे,लेकिन मेरी जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा.इस बात को लेकर मेरी पत्नी हमेशा गर्व महसूस करती हैं.उनके लिए वो गर्व का विषय है,जबकि मेरे लिए वो आत्मा की शांति और प्रसन्नता का विषय है.मैंने आदर्श विवाह किया है और अब तक हजारों लोगों को आदर्श विवाह करने लिए प्रेरित किया है.आदर्श विवाह के लिए लड़का और लड़की दोनों का प्रेरित होना जरुरी है.लड़कों का प्रेरित होना तो और ज्यादा जरुरी है.इतने अच्छे विचार व्यक्त करने के लिए हार्दिक आभार.शुभकामनाओं सहित.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

आदरणीया डॉक्टर रंजना गुप्ताजी,ब्लॉग पर आप आईं और आपने हमेशा की भांति मुझे प्रोत्साहित किया,इसके लिए ह्रदय से धन्यवाद.संस्मरण के मेरे लौकिक प्रेम के कुछ अध्याय शेष रह गये हैं,इसके बाद मेरे अलौकिक प्रेम या मेरे आध्यत्मिक रिसर्च के कुछ अध्याय लिखने बाकी रह जायेंगे.आदरणीय संतलाल करुणजी ने अपने एक लेख में मेरे संस्मरण को शिथिल प्रस्तुतीकरण कहा है.मैं उनका बहुत सम्मान करता हूँ,इसीलिए उनकी सलाह को ह्रदय से अंगीकार करते हुए मै बहुत कोशिश कर रहा हूँ कि संस्मरण में वर्णित घटनाओं को तेज गति से प्रस्तुत करूँ.प्रेम की प्रकृति ही शिथिल है.जैसे एक वृक्ष के भीतर कई महीने तक शिथिल प्रेम की प्रक्रिया चलती रहती है,जो एक दिन फूल और फल के रूप में दिखाई देती है.ऐसे ही आध्यात्मिक प्रेम भी है.मैंने अपने जीवन में अनुभव किया है की प्रेम का वास्तविक नेचर शिथिल और रसपूर्ण है,चाहे वो सांसारिक प्रेम हो या आध्यात्मिक.यही बात अपने संस्मरण में मैंने दर्शाने की कोशिश की है.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय सद्गुरुजी, नमस्कार..मेरे ख्याल से स्नेहा के मन में अपने माता पिता को लेकर उठने वाले विचार बिलकुल स्वाभाविक और सामान्य हैं..असामान्य तो उसकी माँ है जिन्होंने मासूम बच्ची को उसके पैदा होने के पहले की कहानियां सुनायीं...स्नेहा जैसी संस्कारी लड़की अपने माता पिता को बुरा भला नहीं कह सकती क्यूंकि उसके अचेतन मन में आदर देने के संस्कार हैं...लेकिन जो बात बुरी लगी उसकी प्रतिक्रिया स्वरुप उपजी नकारात्मक ऊर्जा उसे सामाजिकता से दूर ले जा रही है और समाज के नियमों के खिलाफ आक्रोशित कर रही है....बच्चों को मित्र बनाइये लेकिन उतनी ही बातें शेयर करनी चाहिए जिसका उनके कोमल मन पर कुप्रभाव न पड़े.....प्रिय स्नेहा, मुझे आपसे ये कहना है कि माना कि 22 -23 साल पहले आपके माँ-पिता को जीवन के अनुभव कम होने के नाते निर्णय लेने में कोई लापरवाही हुई हो उसका ये मतलब नहीं कि सभी लोग हर समय गलत ही होते हैं...आप अपनी शिक्षा, अनुभव और सोच का प्रयोग कर के सही गलत का निर्णय लीजिये..अगर कोई गलत परिपाटी चल निकली है तो आप "Trendsetter" बनिए..

के द्वारा: sinsera sinsera

आदरणीया रंजना जी,सबको ये समझना चाहिए कि स्त्रियां इस संसार को चलाने के लिए पुरुष से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं.स्त्रियों के बिना इस संसार की कल्पना नहीं की जा सकती है.फिर भी लोग भ्रूण हत्या जैसा पाप कर रहे हैं.जो स्त्रियां संसार में हैं,उनमे से भी अधिकतर की स्थिति दयनीय और गुलामों के जैसी है.साहिर लुधियानवी साहब ने हमारे इस दुनिया में स्त्रियों की स्थिति का बहुत मार्मिक वर्णन किया है- औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया जब जी चाहा मसला कुचला, जब जी चाहा दुत्कार दिया तुलती है कहीं दीनारों में, बिकती है कहीं बाज़ारों में नंगी नचवाई जाती है, ऐय्याशों के दरबारों में ये वो बेइज़्ज़त चीज़ है जो, बंट जाती है इज़्ज़तदारों में औरत ने जनम दिया मर्दों को... मर्दों के लिये हर ज़ुल्म रवाँ, औरत के लिये रोना भी खता मर्दों के लिये लाखों सेजें, औरत के लिये बस एक चिता मर्दों के लिये हर ऐश का हक़, औरत के लिये जीना भी सज़ा औरत ने जनम दिया मर्दों को... जिन होठों ने इनको प्यार किया, उन होठों का व्योपार किया जिस कोख में इनका जिस्म ढला, उस कोख का कारोबार किया जिस तन से उगे कोपल बन कर, उस तन को ज़लील-ओ-खार किया औरत ने जनम दिया मर्दों को... मर्दों ने बनायी जो रस्में, उनको हक़ का फ़रमान कहा औरत के ज़िन्दा जलने को, कुर्बानी और बलिदान कहा इस्मत के बदले रोटी दी, और उसको भी एहसान कहा औरत ने जनम दिया मर्दों को... संसार की हर एक बेशर्मी, गुर्बत की गोद में पलती है चकलों ही में आ के रुकती है, फ़ाकों से जो राह निकलती है मर्दों की हवस है जो अक्सर, औरत के पाप में ढलती है औरत ने जनम दिया मर्दों को... औरत संसार की क़िस्मत है, फ़िर भी तक़दीर की हेटी है अवतार पयम्बर जनती है, फिर भी शैतान की बेटी है ये वो बदक़िस्मत माँ है जो, बेटों की सेज़ पे लेटी है औरत ने जनम दिया मर्दों को...

के द्वारा: sadguruji sadguruji

स्नेहा जैसी हजारो लडकियाँ है जो इस दुनिया में मज़बूरी में लाई है !बेटियाँ नहीं लाती दहेज़ !नहीं बेटियों के पति सेवा करतेहै माँ बाप की बहु की भांति ,इसी लिये यह भेदभाव है बेटो सेवंश चलता है !सारे मतलब तो बेटो से निकलते है !फिर क्यों न बेटों की कामना रहे !आखिर बच्चे भी तो माँ बाप के व्यवसाय की तरह ही फायदे और नुक्सान का जोड़ घटाव ही है!बच्चे के साथ अब स्वार्थ रहित ममता होती है तभी समानता काभाव आता है !और व्ही माँ बाप वास्तव में श्रद्धा के योग्य होते है !बच्चे न हो गए ,धंधे बाजी के मोहरे बन गए !ऐसे माँ बाप के लिए यदि बच्चो के मन में खटास आती है ,तो गलत कौन है ? बहुत बधाई सगुरु जी एक संवेदन शील मुद्दा उठाने केलिए !!!

के द्वारा: ranjanagupta ranjanagupta

आदरणीया रंजनाजी,बाल अनाथालय वाले मामले सबसे ज्यादा दुःख मुझे अर्चना के व्यवहार से हुआ.वो १९८९ में सरकारी नौकरी में थी और उसके पास काफी रूपये थे.वो अनाथालय का दुःख दूर करने में समर्थ थी.दीदी मुकदमा हार गईं थीं और अनाथालय का जर्जर भवन बिक रहा था.मैंने उससे अनुरोध किया था कि वो अनाथालय का भवन खरीदकर अनाथालय को दान कर दे.वो मेरी बात मान गई लेकिन एक शर्त थी उसकी जो मुझे माननी थी.मैं उस समय मैं चित्रकूट में एक आश्रम में रहकर साधना कर रहा था.अर्पिता की मृत्यु के बाद मुझे अपना जीवन बेकार समझ में आ रहा था.मैं कई महीने तक अर्पिता के अटूट प्रेम को याद कर अनिश्चय की स्थिति में रहा.उधर दीदी मुझे कई पत्र भेंज चुकीं थीं कि मेरे बाल अनाथालय को बिकने से बचाने के लिए कुछ करो.कई महीने तक भयानक द्वन्द में संघर्ष करने के बाद मैं अनाथालय को बचाने की खातिर मैं अपने दोस्त के हाथ बिकने को तैयार हो गया.मैं किसी तरह से हिम्मत कर वहाँ गया,लेकिन तबतक अनाथालय का भवन बिक चूका था.मुझे आज भी अफ़सोस है कि मैं दीदी को दिया वचन नहीं निभा सका.वहाँ जाकर दौलत के नशे ने में चूर अर्चना को मैंने एक इतनी कड़वी और सच्ची बात कही कि मुझसे नाराज होकर वो एक साल तक कोई संवाद कायम नहीं की.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय चित्रकुमार गुप्ताजी,सादर आभार,ब्लॉग पर आने के लिए धन्यवाद.मेरे ये संस्मरण आज के नहीं हैं,बल्कि उस समय के हैं जब मैं एक साधारण मनुष्य था.आज तो मैं खुद अपनी ही परीक्षा ले रहा हूँ कि अपना अतीत उजागर करने की हिम्मत मुझमे है या नहीं ?मैं आज यहाँ तक पहुंचा हूँ तो इसके पीछे भी कुछ मित्रों का योगदान है,जिसके चर्चा मैंने अपने संस्मरण में की है.आज कुछ खोने या पाने को मेरे पास शेष नहीं बचा है,किसी भक्त के पास आने या दूर जाने की भी परवाह नहीं है.इसीलिए मैं अपने ऊपर एक प्रयोग कर रहा हूँ.आप इसे अन्यथा न लें.ये एक सद्गुरु के रूप में मेरा प्रसाद नहीं है,बल्कि किसी सद्गुरु का अपने अतीत को देखना भर है.अपनी पुरानी डायरी के पन्नो को प्रकाशित करके मैं अपनी ही परीक्षा ले रहा हूँ कि सत्य कहने की हिम्मत मुझमे है या नहीं.सत्य कहने के मामले में मेरे दोनों मित्र मुझसे बेहतर थे,ऐसा मैं आज भी मानता हूँ.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: ranjanagupta ranjanagupta

आदरणीया रंजना जी,मुझे आपकी टिपण्णी पढ़कर आश्चर्य भी हुआ और सच बात कहूं तो दुःख भी हुआ.मैंने अपने माताजी और पिताजी से झूठ बोलकर और सबकुछ छुपाकर उससे मंदिर में शादी की,क्या इसीलिए वो शादी नाजायज हो गई ?वो जीवित रहती तो मै अपने माताजी और पिताजी की मर्जी से कभी विवाह नहीं करता और उनकी जमीन जायदाद का इकलौता वारिस होने पर भी सबकुछ छोड़कर अर्पिता के पास चले जाता.मेरे माताजी और पिताजी ने जो संपत्ति मुझे दी है,उससे ज्यादा तो मैंने अपनी मेहनत से कमाई है.यदि अर्पिता के लिए वो लोग मुझे घर से निकाल देते तो भी मै घर छोड़ देता.मैंने अर्पिता को अपनी पहली पत्नी का दर्ज देकर उसे सम्मानित किया है जो सच है,उसे स्वीकार किया है.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीया डॉक्टर रंजना गुप्ता जी,मैं आपसे अपने दिल की बात कहता हूँ कि वास्तव में मैं साहसी नहीं हूँ.साहसी तो मेरी पहली पत्नी अर्पिता थी.जो थोडा बहुत साहस मुझमे आया है,ये उसी का दिया हुआ है.आज भी वो मेरे साथ रहती है.ये उसी की दी हुई प्रेरणा है कि मैं अपनी उस डायरी को जीवित कर रहा हूँ,जिसे दीमक चाट गये हैं और जिसे कई बार जलाने की असफल कोशिश की,पर जला नहीं पाया.आपसे सच कहता हूँ कि मैं साहसी नहीं हूँ.साहसी होता तो मैं दुबारा कोशिश करता और नींद की ढेर सारी गोलिया खाकर उसके पास पहुँच गया होता.मेरी तो वही स्थिति है,जैसा किसी शायर ने कहा है-चले आज तुम जहाँ से, हुयी जिंदगी परायी.तुम्हे मिल गया ठिकाना, हमें मौत भी ना आयी.उसके जैसा साहसी मैंने अपने जीवन में कोई दूसरा नहीं देखा.आप मेरे संस्मरण को उसके प्रति मेरी श्रद्धांजलि समझिये.मैं उसके साहस को और उसके अनन्य प्रेम को इसी माध्यम से सलाम कर रहा हूँ.मेरी वजह से भटकती उसकी आत्मा को शायद कुछ शांति मिले.कम उम्र में मैंने दो लोगों से मैंने गहरी दोस्ती की,एक ने पत्नी बनकर भी दुनिया छोड़ दिया और दूसरे ने इस दुनिया में रहते हुए भी नाराज होकर मुंह मोड़ लिया.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

मै अभी आप के ही ब्लॉग से लौट के आ रहा हूँ.मेरी प्रेमकथा का अंत जरुर दुखद है,परन्तु अभी इस प्रेमकथा का अंत नहीं हुआ है.उस समय कई डायरियों में मैंने बहुत डरकर और चोरी छुपे से अपने कालेज के दिनों की महत्वपूर्ण घटनाओ को नोट किया था.पिताजी के भय से इन्हे बक्से में सबसे नीचे रख के फिर अख़बार से छुपा के उसके ऊपर अपना कपडा भर दिया था.वो डायरियां कभी उनके हाथ नहीं लगीं,बस यही गनीमत रही.पिताजी के गुजरने के दो साल बाद बक्से में छुपाके रखी हुई उन डायरियों को जब एकदिन देखा तो बहुत दुःख हुआ.मेरी डायरियों की बुरी दशा हो गई है,पन्ने पीले होकर फटने की कगार पर पहुँच गए हैं.डायरियों को दीमक चाट रहे है और अक्षर धुंधले हो रहे है.मैंने सोचा की इन्हे जागरण मंच पर टाइप कर लूँ.जब टाइप करने लगा तो प्रकाशित भी कर दिया.शरू में आश्रम से जुड़े कई लोग पढ़कर मुझे मना किये कि इस धारावाहिक को रोक दीजिये,आप की एक आध्यात्मिक इमेज है,परन्तु मेरे मन के भीतर प्रेत बनकर भटकता वो मेरा पहला प्रेम मुझे प्रकाशित करने की प्रेरणा देता रहा.मुझे लगा कि इससे शायद उसकी भटकती आत्मा को कुछ शांति मिले.जीवन में इतना यश-अपयश भोगा है कि अब उससे भी उब चूका हूँ.मैंने इसकी भी परवाह नहीं की,जब मुझे लगा कि अपनी आत्मकथा प्रकाशित करनी चाहिए.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीया सरिता जी,आप का ह्रदय से आभार.लगभग साढ़े तीन साल की इस प्रेमकहानी का अंत बहुत दुखद रहा.अर्चना से आज भी मेरी अच्छी दोस्त है,उससे पत्र-व्यवहार और मोबाइल से संवाद निरंतर चलता रहा,परन्तु सन २००० में जब मैंने शादी कर ली,तब उसने मुझे बधाई दी और उसके बाद वो खामोश हो गई.वो मुझसे नाराज है और उसे नाराज होने का हक़ भी है.किसी की सभी बातें मन्ना सम्भव नहीं है,चाहे वो कितना भी करीबी मित्र क्यों हो.मैंने उससे संवाद बनाने की कई बार कोशिश की परन्तु उसने अपने मोबाइल का सिम बदल लिया और मेरे भेजे पत्रों का भी कोई जबाब नहीं दिया.इन स्मृतियों के माधयम से मैंने उसे आवाज़ दी है.फेसबुक पर भी ये स्मृतियाँ पढ़ीं जा सकतीं हैं.मुझे नहीं मालूम कि फेसबुक पर उसका एकाउंट है कि नहीं.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

जी,मगर मेरे लिए एक बहुत बुरा सपना है.मैंने कई साल तक साधना की,मैंने अपनी मेहनत से और कुछ सिद्धियों का सहयोग लेकर जीवन में सबकुछ हासिल किया.आज मेरे पास घर,मकान,पैसा और बहुत सुंदर व् शिक्षित पत्नी है,एक दो साल की बहुत प्यारी सी बच्ची है.लेकिन आप से मै सच कहता हूँ कि जब भी मै अकेले में होता हूँ वो पास आकर एहसास दिलाती है कि वो आज भी मेरे पीछे लगी हुई है.आप को नहीं विश्वास होगा,परन्तु मैंने एक नहीं बल्कि हजारो बार पुरे होश में रहते हुए ये अनुभव किया है.अब तो मैंने अपने को समझाना ही बंद कर दिया है.जो हो रहा है,उससे समझौता कर लिया है,लेकिन अपना अतीत मुझे भुलाये नहीं भूलता है.मै याद नहीं करता तो भी याद आता है.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

जी, यदि आप इन व्यक्तियों के प्रति समर्पित होते तो सिर्फ इनका ही ध्यान रहता. यहाँ तक कि आपके जहाँ में न वो यादे रहती और न ही मैं. सिर्फ वो जिसके प्रति समर्पित हैं. आपके पास जो भी यादे हैं वो किसी के प्रति रिएक्शन हैं, आज जिसके प्रति खुद को समर्पित बता रहे हैं वो भी एक रिएक्शन, यहाँ तक आप मुझसे बाते कर रहे हैं वो भी रिएक्शन हैं. आप कहीं भी करता हैं ही नहीं बल्कि आप किसी एक्शन के रिएक्शन हैं, आपके वश में कुछ नहीं. परंरू आप कह रहे हैं कि मैं उसे याद करता हूँ, मैं इन व्यक्तियों के प्रति समर्पित हूँ,............यह सब एक झूठ हैं, एक भ्रम हैं..................यदि आप करता होते तो आज जिसकी यादे आपके साथ हैं आप उसी के साथ होते..चाहे वो आपके साथ हो या न हो............आप कर्ता होते तो फिर किसी और के साथ नहीं बंध पाते, यदि आप सचमुच किसी के प्रति समर्पित हैं तो दुसरे के प्रति शिकायत आपकी नहीं रहती................ माफ़ करियेगा मैं प्रेम नहीं किया हैं........................मुझसे प्रेम हो गया हैं..................यदि मैं प्रेम किया होता तो प्रेम मुझसे पृथक नहीं होता मैं खुद प्रेम हो जाता .................जैसे कोई वारिस की बूंद समुन्द्र से मिलकर बूंद नहीं रह जाती वैसे ही कोई व्यक्ति प्रेम में रहकर प्रेमी रह ही नहीं पायेगा.........वैसे भी मैंने कभी प्यार नहीं किया..............जो प्यार किया कोई और था जिससे प्यार किया कोई और था.......................किसी के प्रति शादी के लिए विचार उत्पन्न हुए और मैं ऑब्जेक्ट बना,........फिर दोनों की शादी हो गयी...............इन सबके बीच मैं कहीं भी कर्ता नहीं हूँ बल्कि कर्म हूँ........किसी कर्ता का रिएक्शन.................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’