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सद्गुरुजी

आदमी चाहे तो तक़दीर बदल सकता है, पूरी दुनिया की वो तस्वीर बदल सकता है, आदमी सोच तो ले उसका इरादा क्या है?

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sadguruji


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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय डॉ.शैलेश जी ! ब्लॉग पर आपका सादर अभिनन्दन है ! लेख पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए धन्यवाद ! आपने अपनी प्रतिक्रिया में लिखा है कि २२वीं सदी की स्त्री विनाश का सामान है ! मुझे अफ़सोस है कि आप ऐसा सोचते हैं ! स्त्री को कुदरत ने सृजन के लिए बनाया है और वो जबतक सृष्टि चलती रहेगी,सृजन ही करेगी,विनाश नहीं ! आपने अदिति को भड़काने और स्त्री जाति को सन्तुष्ट करने की बात लिखी है,वो सही नहीं है ! अदिति को अपने विवेक से जो सही लगा,उसने किया ! उसने मुझसे कोई राय नहीं ली थी ! उसकी आपबीती सुनकर मुझे लगा कि ये एक असाधारण स्त्री है ! इसकी आपबीती को प्रकाशित करना चाहिए ! अधिकतर महिलाओं की आज भी हमारे घरों में समाज में और पूरे देश दुनिया में जो दयनीय और चिंताजनक स्थिति है,वो किसी की भी नजरों से छिपी नहीं है !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय सिंह साहब ! सादर अभिनन्दन ! ये ब्लॉग लिखने का मेरा उद्देश्य भी यही था कि इस विषय पर खुलकर चर्चा हो ! इस मंच पर एक बहुत निराशाजनक कटु सत्य है कि सामाजिक सुधार वाले लेखों को जागरण जंक्शन परिवार द्वारा उतना महत्व नहीं दिया जाता है,जितना देना चाहिए ! मंच अपने उद्देश्यों की प्राप्ति में इसीलिए अब तक पूर्णत: सफल नहीं हो पाया है ! जागरण जंक्शन परिवार की सबसे बड़ी भूल ये है कि वो इस मंच पर लिखने वाले ब्लागरों को पाठक मात्र समझती है,इसीलिए कोई विशेष महत्व नहीं देती है ! जबकि सच्चाई ये है कि इस मंच के बहुत से ब्लागरों की रचनाएँ अख़बारों में छपने वाली रचनाओं से कहीं बेहतर होती हैं ! जागरण जंक्शन परिवार से मेरा आग्रह है कि इस विषय पर अपना नजरिया बदले और मंच के संचालन में एक क्रन्तिकारी परिवर्तन करे और बदलते समय के साथ चले ! इस विषय पर ब्लागरों से सुझाव भी आमंत्रित किये जा सकते हैं !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

मेरे मन में एक भाव उठा और मैं अपने आसन से उठ खड़ा हुआ.सदियों से पराधीन और पीड़ित भारतीय नारी के इस आधुनिक और स्वतंत्र होते स्वरूप को देखकर मैं प्रसन्न था.आने वाले बाइसवीं सदी की नारी निश्चय ही पूरी तरह से स्वतंत्र होगी और उसकी महत्वकांक्षाओं के पंख भी असीमित होंगे.आज उसके पंख कतरने वाले आने वाले कल को उसे खुले आसमान में उड़ता हुआ देखेंगे.!! जयहिन्द !! !! वन्देमातरम !! आदरणीय सद्गुरु जी आपने बहुत ही उपयुक्त समय में इस आलेख को प्रकाशित किया है आज जबकि स्त्रियां अपनी कमजोरी के जलते जुल्म और दरिंदगी शिकार हो रही है, जरूरत है अदिति जैसी बहादुर लड़कियों की जो सहस और बहादुरी के साथ परिश्थिति के साथ लड़े और जीते.... सादर

के द्वारा: jlsingh jlsingh

देश के कुछ प्रसिद्द मंदिरों में अब भी पशु-बलि प्रथा जारी है,जो अब पूर्णत:बंद होनी चाहिए.ये मंदिर मंदिर न होकर एक दुकान बन गए हैं और दर्शनार्थी दर्शनार्थी न होकर ग्राहक बन गए हैं.पूरे देशभर में अनगिनत ऐसे मंदिर हैं,जिनके पास अथाह सम्पत्ति है,उनमे से कुछ स्कूल,हॉस्पिटल,अनाथ आश्रम और वृद्धाश्रम आदि स्थापित कर सामाजिक सेवा कार्य कर रहे हैं,परन्तु अधिकतर मंदिर किसी भी सामाजिक सरोकार से नहीं जुड़े हैं और विशुद्ध रूप से मंदिर के जरिये एक धार्मीक व्यवसाय कर रहे हैं.सरकार को ऐसे मंदिरों का अधिग्रहण कर मंदिर की आमदनी को सामाजिक विकास के कार्यों में लगाना चाहिए.सरकार को मंदिर में पूजापाठ करने के लिए योग्य और जनता से भेदभाव रहित मित्रवत व्यवहार वाले पुजारियों को नियुक्त करनी चाहिए,तभी मंदिर और पुजारियों की सही उपयोगिता सिद्ध होगी. बहुत सही विचार रक्खे हैं आदरणीय सद्गुरु जी!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीया डॉक्टर रंजना जी ! सादर अभिनन्दन ! आपने जो प्रश्न पूछा है,वो लोंगो ने पूछा है ! हमलोग अक्सर ये सोचते हैं कि अच्छे गुरु कैसे मिलेंगे ! अच्छे संत ये चाहते हैं कि उन्हें अच्छे शिष्य मिलें ! अच्छे गुरुओं के साथ साथ अच्छे शिष्यों की भी कमी सी हो गई है ! ‘‘गुरु लोभी शिष लालची दोनों खेलें दांव। दोनों बूड़े बापुरै, चढ़ि पाथर की नांव।। संत कबीर दास जी कहते हैं कि-“गुरु और शिष्य लालच में आकर दांव खेलते हैं और पत्थर की नाव पर चढ़कर पानी में डूब जाते हैं.”इस समय ज्यादातर यही हो रहा है ! सच्चा गुरु पाने के लिए शिष्य का भी अच्छा और सच्चा होना जरुरी है ! शास्त्रों के अनुसार पूर्ण गुरु को ब्रह्मज्ञानी और ब्रह्मनिष्ठ होना चाहिए ! गुरु के सानिध्य में कुछ दिन रहने से इसका आभास हो जाता है ! शंका समाधान न हो और कोई अनुभव न हो तो दूसरा गुरु तलाशना चाहिए ! कबीर साहब कहते हैं कि-"‘‘जा गुरु से भ्रम न मिटै, भ्रान्ति न जिव की जाय, सौ गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय.’’

के द्वारा: sadguruji sadguruji

इस संसार में गुरु की आवश्यकता हर मनुष्य को है.यदि हम गहराई से विचार करें कि हमें गुरु की आवश्यकता क्यों है,तो इस प्रश्न का एक ही उत्तर मिलेगा कि हमारी आत्मा जन्म जन्म से ईश्वर रूपी सत्य का साक्षात्कार करने के लिए बेचैन है और ये साक्षात्कार वर्तमान शरीरधारी पूर्ण गुरु के मिले बिना संभव नहीं है,इसीलिए हर जन्म में वो गुरु की तलाश करती है.परन्तु इस संसार में आकर जीवात्मा लोभी गुरुओं की या फिर मूर्ति और समाधी की पूजा करने में भटककर सारी उम्र गवां देती है.धर्मग्रंथों में कहा गया है कि मनुष्य का जन्म बड़े भाग्य से और बहुत मुश्किल से प्राप्त होता है.बहुत सुन्दर आलेख श्री सद्गुरु जी ! एकदम सही लिखा आपने गुरु की महिमा अपरम्पार है

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: एल.एस. बिष्ट् एल.एस. बिष्ट्

आदरणीया डॉक्टर रंजना गुप्ता जी ! आपका ह्रदय से आभार ! मैं तो सोच रहा था कि मैं अकेले ही ये लड़ाई लड़ रहा हूँ ! विवाद से बचने के लिए लोग सत्य से मुंह फेर लेते हैं ! ऐसे उपभोक्ता हित वाले विषय पर लोग साथ देने से घबराते हैं और कमेंट करने तक से बचते हैं ! उपभोक्ताओं में एकता नहीं होने का ही नेटवर्क कम्पनिया फायदा उठा रही हैं ! आपने अपनी आपबीती सुनाई और मेरे लेख का समर्थन किया,इसके लिए धन्यवाद और आभार शब्द भी छोटा पड़ जाता है ! क्या कहूँ,उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं है ! मेरे विचार से हमेशा प्रीपेड नेट कनेक्शन लेना चाहिए ! उपभोक्ताओं को किसी भी कम्पनी का पोस्टपेड नेट कनेक्शन नहीं लेना चाहिए ! नेटवर्क प्रदान करने वाली कंपनियां न सिर्फ बिलों में हेर फेर करती हैं,बल्कि प्राइवेट एजेंसियों को ठेका देकर जबरदस्ती बिलों की वसूली कराती हैं ! वो सब वकील और एडवोकेट बनकर कोर्ट की झूठी धमकी देते हैं ! मैंने ये लेख प्रधानमंत्री जी तक पहुंचा दिया है ! यदि वो इन कम्पनियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करते हैं तो मुझे बहुत दुःख होगा और चुनाव के समय उनको समर्थन देने पर अफ़सोस भी होगा ! हमेशा साथ देने के लिए पुन: मेरा हार्दिक आभार स्वीकार कीजिये !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: ranjanagupta ranjanagupta

भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने देश के सभी अधिकारियों और सरकार के सभी मन्त्रियों से अपने सार्वजनिक भाषणों और सार्वजनिक वक्तव्यों में तथा सरकारी पत्रों में हिन्दी का इस्तेमाल करने का आदेश जारी किया है.हिंदी में काम करने वाले कर्मचारियों को प्रोत्साहन राशि प्रदान करने का फैसला किया गया है.ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी जी राष्ट्रभाषा को सम्मान देने के लिए विदेशी प्रतिनिधिमण्डलों से हिन्दी में ही बात करेंगे.यह वाकई बहुत सुखद और स्वप्न देखने के जैसा एहसास है.प्रधानमंत्री जब विदेशियों से हिंदी में बात करते हैं तो करोडो देशवासियों का सिर गर्व से ऊँचा उठ जाता है.अबतक तो अधिकतर प्रधानमंत्रियों ने विदेशी तो क्या देशी लोंगो से बातचीत करने में भी राष्ट्रभाषा हिंदी की उपेक्षा ही की है.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

''प्रधानमंत्री जी और गृहमंत्री जी से मेरा आग्रह है कि दक्षिण भारत के कुछ नेताओं द्वारा जारी हिंदी विरोध की परवाह न करते हुए हिंदी को भारत की आधिकारिक भाषा बनाने की मुहीम और तेज की जाये.यह देश के करोडो भारतवासियों की मातृभाषा है और सभी देशवासियों को आपस में जोड़ने वाली संपर्क भाषा भी है.हिंदी में अंतर्राष्ट्रीय भाषा बनने की सारी खुबिया मौजूद हैं और हमें हिंदी को उस मुकाम तक पहुँचाना है.आज दुनिया के कई देश चाहते हैं कि हिंदी अंतर्राष्ट्रीय भाषा बने हम सब भारतवासियों को भी एकजुट होकर यही दृढ़संकल्प लेना चाहिए.!! '' सदगुरुजी, आपका कहा गया उपरोक्त कथन एक सार्वभौम सत्य है, आज देश को 'हिंदी' को राष्टीय और अन्तर्राष्टीय दोनों ही स्तरों पर विकसित करने की आवश्यकता है.. ~

के द्वारा: Sushma Gupta Sushma Gupta

आदरणीय सिंह साहब ! सुप्रभात ! हार्दिक अभिनन्दन ! मैंने अपने जीवन में अपने सद्गुरुओं के बताये अनुसार भजन किया है और मुझसे जो भी संभव हो सका है,अपनी सामर्थ्यनुसार लोककल्याण किया है ! अब काशी या फिर मगहर कहीं भी मेरा शरीर छूटे,मुझे सद्गति मिलेगी ! मैं कबीर साहब का अन्नय भक्त हूँ ! उनकी कही वाणी-"दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी कि ज्यों की त्यों धर दीन्ही चदरिया.." मेरे मन में गूंजती रहती है ! आपने साधुओं की बात की है ! आज भी एक से महान संत हैं,जो अपने अतीत के बारे में सबकुछ बताते हैं.वो कुछ भी छिपाते नहीं हैं.जो छिपाते हैं,उनमे से अधिकतर कोई अपराध करके,घरवालों को कर्ज में लादकर या फिर स्त्री बच्चों को मझदार में छोड़कर घर से भागे हुए हैं ! मैंने जीवन को भरपूर जिया है और उसके लिए कठिन संघर्ध भी किया है ! अपने संस्कारों के सारे आवरण मैं हटाना चाहता हूँ,इसीलिए आपलोगों से व्यक्तिगत बातें शेयर करता हूँ ! हो सकता है कि मेरा कोई अनुभव किसी के काम आ जाये ! पोस्ट की प्रशंसा आपने की है,इसके लिए बहुत बहुत हार्दिक आभार !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

सद गुरू जी आज के बच्चे अपनी संस्कृति से दूर हो गये हैं उनको जोड़ना कितना जरूरी होगा है |मेरे पिता बहूत टेलेंटेड थे उन पर मारकेश था हम लोग जरा ज्यादा मार्डन थे कभी इस विषय में कभी सोचा नहीं परन्तु जिन्होंने मेरे पिता की उम्र कम बताई थी उन्होंने कहा बस रोज अपनी माँ के पैर छु देना मेरे फादर जब तक माँ जियीउनके सामने पड़ते ही पैर छु देते जब तक मेरी दादी जिन्दा रही वह सदैव बीमार रहीं उनकी आयु भी ज्यादा नहीं थी कुछ अजीब उनके साथ होता जब उनकी मृत्यू हूई दो साल बाद मेरे पिता की कम उम्र में हार्ट अटैक से मृत्यू हो गई शायद हमारी दादी मेरे पिता के सारे कष्ट ले लेती थी आज मैं ऐसा सोच रही हूँ काश मेरी दादी जिन्दा रहती मेरे पिता और जी लेते शोभा

के द्वारा: Shobha Shobha