मेरा नज़रिया

दिशा से दशा तक

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सनिल मिश्रा


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बचपन कहीं खो गया है?

Posted On: 5 Jan, 2014  
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ईश्वर के प्रति आज की मानसिकता !

Posted On: 18 Dec, 2013  
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Celebrity Writer Hindi Sahitya Junction Forum Others में

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राजनीति और रामनीति में भिन्नता

Posted On: 9 Dec, 2013  
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डॉलर की तुलना मे क्यों गिरता जा रहा है रुपया ?

Posted On: 6 Dec, 2013  
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कान्वेंट स्कूलों का भारत से क्या संबंध?

Posted On: 3 Dec, 2013  
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दुनियाँ मे अँग्रेजी का अस्तित्व

Posted On: 2 Dec, 2013  
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शिक्षा में विध्या का आभाव

Posted On: 1 Dec, 2013  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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के समय में जो भी व्यक्ति अध्यात्म को ठीक से समझ लेगा वो कभी भी विध्या की दुकान नहीं लगाएगा क्योंकि विध्या की दुकान वो ही व्यक्ति लगाता है जिसे विध्या के गुड नहीं पता होते हैं आज हम देखते हैं कि सभी मंदिर और विध्यालय लालच की दुकानें बनते जा रहे हैं मंदिरों में भगवान की पूजा कम और महंतों की पूजा अधिक होने लगी है लोग अपने आप को सन्यासी कहते हैं या तो वो सन्यास शब्द से ठीक से परिचित नहीं है या फिर वो हमें परिचित कराना नहीं चाहते हैं आज न जाने कितने संतों ने अध्यात्म को व्यापार बना लिया है और ईश्वर को बाज़ार- बाज़ार बेचा जा रहा है क्योंकि हम तो ऐसे लोग हैं कि अगर दुआ कुबूल न हो तो अपना भगवान बदल देते हैं हंसी आती है मुझे कि अभी तक तो ये बात सिर्फ धर्मों तक ही सीमित थी परंतु आजकल तो अधिकतर संत अपनी पूजा कराते हैं और जिनकी आय करोड़ों में है कुछ लोगों ने तो इसे तमासा भी बनाया हुआ है और जो टेलीविज़न पर अपना खूब मज़ाक उड्बाते हैं आजकल हम देखते है कि अधिकतर लोग समझते हैं कि भगवा वस्त्र धारण कर लेना ही सन्यास है, पहली बार आपके ब्लॉग पर हूँ , अच्छा लिखते हैं आप !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के समय में जो भी व्यक्ति अध्यात्म को ठीक से समझ लेगा वो कभी भी विध्या की दुकान नहीं लगाएगा क्योंकि विध्या की दुकान वो ही व्यक्ति लगाता है जिसे विध्या के गुड नहीं पता होते हैं आज हम देखते हैं कि सभी मंदिर और विध्यालय लालच की दुकानें बनते जा रहे हैं मंदिरों में भगवान की पूजा कम और महंतों की पूजा अधिक होने लगी है लोग अपने आप को सन्यासी कहते हैं या तो वो सन्यास शब्द से ठीक से परिचित नहीं है या फिर वो हमें परिचित कराना नहीं चाहते हैं आज न जाने कितने संतों ने अध्यात्म को व्यापार बना लिया है और ईश्वर को बाज़ार- बाज़ार बेचा जा रहा है क्योंकि हम तो ऐसे लोग हैं कि अगर दुआ कुबूल न हो तो अपना भगवान बदल देते हैं हंसी आती है मुझे कि अभी तक तो ये बात सिर्फ धर्मों तक ही सीमित थी परंतु आजकल तो अधिकतर संत अपनी पूजा कराते हैं और जिनकी आय करोड़ों में है कुछ लोगों ने तो इसे तमासा भी बनाया हुआ है और जो टेलीविज़न पर अपना खूब मज़ाक उड्बाते हैं आजकल हम देखते है कि अधिकतर लोग समझते हैं कि भगवा वस्त्र धारण कर लेना ही सन्यास है, सही और स्पष्ट कहती पोस्ट ! पहली बार आपके ब्लॉग पर हूँ , अच्छा लिखते हैं आप !

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