Meri udaan mera aasman

हार नही है जीत नही है जीवन तो बस एक संघर्ष है ........

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Sonam Saini


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देवनिता मेरी पहली किताब …..

Posted On: 2 Dec, 2015  
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नाउम्मीदी के बादल ……

Posted On: 14 Sep, 2015  
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Others कविता में

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क्या यही भारत निर्माण है ???

Posted On: 20 Jul, 2015  
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Others Others social issues कविता में

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चक्रव्यूह ………

Posted On: 19 May, 2015  
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Hindi Sahitya Others social issues में

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मुझे राजनीतिज्ञ बनना है …..

Posted On: 8 May, 2015  
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Hindi Sahitya social issues कविता में

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जानना चाहती हूँ ….

Posted On: 18 Dec, 2014  
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माँ कौन सी मिटटी की बनी होती है …????

Posted On: 9 Dec, 2014  
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अनेक को एक बनाना होगा …..

Posted On: 15 Sep, 2014  
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माँ की रोटी से खुशबु आती है …

Posted On: 22 Aug, 2014  
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पैसा जरूरी है या जमीर ???

Posted On: 16 Apr, 2014  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

प्रिय सोनम, बहुत बहुत आशीर्वाद और ढेर सारा प्यार! मैंने पहले भी कहा है और लिखा है,कि जब तुम लिखने बैठती हो, साक्षात माँ शारदे तुम्हारी लेखनी पर विराजमान हो जाती हैं. आदरणीया सरिता बहन, परवीन मैडम और जिन लोगों का नाम तुमने लिखा है, सबने तुम्हारी मिहनत को तराशा है, पर मूर्ति जो तुम्हारे मन के अंदर विराजमान थी, वह तुम्हारे प्रयास से ही प्रकट हो गयी. अब समय है उस मूर्ति पर पुष्प अर्पित करने का... हम सब तुम्हारे उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं और माँ शारदे से प्रार्थना करते हैं कि वे आगे भी तुम्हे सम्बल प्रदान करती रहें. अपनी भावुकता, निर्मलता, सरलता और अनुभव को शब्द देती रहो. वही शब्द मूर्त रूप धारण कर तुम्हारे सामने/हम सबके सामने प्रकट हो जायेंगे... आगे भी अनेक देव और देवियाँ, देवांश और वनिताएं प्रकट होती रहेंगी. अनंत शुभकामनाओं के साथ - तुम्हारा चाचा,

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती; आगे आती थी हाले दिल पे हंसी, अब किसी बात पर नहीं आती । मौत का राज़ जानना चाहती हो सोनम ? कौन बला तूफानी है, मौत को ख़ुद हैरानी है, आए सदा वीरानों से, जो पैदा हुआ वो फ़ानी है । तुम्हारा दर्द मैं समझ सकता हूँ लेकिन ऐसे दर्दों को सहना तो प्रत्येक संवेदनशील मनुष्य की नियति है । तड़पते वही हैं जो सारे जहाँ का दर्द अपने जिगर में लिए फिरते हैं । पत्थरदिल लोगों को ऐसी तकलीफ़ें नहीं होतीं । मैं भी तुम्हारी ही तरह संवेदनशील हूँ सोनम । इसीलिए कभी-कभी लगता है कि अगर ये दुनिया ऐसी ही है और इसका निज़ाम ऐसे ही चलता है तो मेरे जैसे शख़्स का पैदा होना ही ग़लत है । लेकिन जब पैदा हुए हैं तो जीना भी पड़ता ही है । अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे, मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे ? तुम्हारे सवालों के जवाब ख़ुदा भी देने वाला नहीं सोनम । बुद्ध की तरह उन्हें स्वयं ही ढूंढो और जान लो कि यह संसार दुखमय ही है । सुख तो केवल दो दुखों के बीच का अंतराल है । अगर तुम स्वयं को सुखी अनुभव कर रहे हो तो समझ लो कि एक दुख आकर गया है और दूसरा आने वाला है । जिसका दुख तुम दूर कर सको, करो और इसी में अपना संतोष पाओ । लेकिन फिर भी ये न भूलो कि दूसरों के आँसू पोंछने से अपने ज़ख्म नहीं भरते हैं ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

मैं आपके विचारों से सहमत हूँ सोनम । हमें लोगों द्वारा कही जाने वाली बातों को स्वविवेक की कसौटी पर कसकर ही देखना होता है कि वे किस सीमा तक हमारे लिए स्वीकार्य और व्यावहारिक हैं । इसके अतिरिक्त दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण को देखना-समझना और उसकी विचार-शक्ति का सम्मान करना व्यक्ति की परिपक्वता का ही परिचायक होता है जो अक्सर फ़ेसबुक सरीखी सोशल साइटों पर नज़र नहीं आता । जहाँ तक सकारात्मक सोच संबंधी बातों का सवाल है, यहाँ भी मैं आपके विचारों से सहमत हूँ । जो दुखी है, शोकाकुल है, व्यग्र और चिंतामग्न है; उसके लिए तो सकारात्मक सोच का उपदेश चिढ़ ही पैदा करेगा । बात यह है सोनम कि दूसरे का ग़म बांटना भी एक कला है जो बहुत कम लोगों को आती है । किसी का ग़म बांटने के लिए उसकी बात को सुनना और उसके आँसुओं को पोंछना ज़रूरी होता है न कि उसके सामने सकारात्मक सोच का राग अलापना और अपनी ही हाँके जाना । समझाने वालों की क्या कमी है दुनिया में । हर गली, कूचे, नुक्कड़ पर मिल जाते हैं । लेकिन आपको समझने वाला, आपके दर्द को महसूस करने वाला केवल भाग्य से मिलता है । दुखी इंसान को कंधा चाहिए होता है जिस पर सर रखकर वह रो सके, कोई उसे समझने वाला चाहिए होता है जो उसके मन की हालत को समझ सके । सकारात्मक सोच का उपदेश बेवक़्त झाड़ने वाले तो उसके दुख तो बढ़ाते ही हैं, कम नहीं करते ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

प्रिय सोनम, तुम्हारी दर्द भरी कविता पढ़कर ऐसा लग रहा है जैसे कि किसी ने मुझे आईना दिखा दिया हो या मेरे होठों की बात छीन ली हो । मैं भी पिछले कुछ समय से ऐसे ही हालात और मानसिक दशा से गुज़र रहा हूँ । लेकिन मेरी अपनी हालत हूबहू ऐसी ही होने के बावजूद मैं आशावादी होने की ही सलाह दूंगा । मैं जानता हूँ कि दर्द दूर हो जाता है मगर ख़त्म नहीं होता । लेकिन सोनम, उसे सहना पड़ता है, जीना पड़ता है । मैं यह भी जानता हूँ कि उम्मीदें अक्सर टूट जाया करती हैं । बहुत टूटी हैं मेरी उम्मीदें भी । लेकिन फिर भी उन्हें फिर से जोड़ना पड़ता है क्योंकि उम्मीद के बिना जिया नहीं जा सकता । बुझ रहे हैं एक-एक करके अक़ीदों के दिये, इस अंधेरे का भी लेकिन सामना करना तो है । हौसला रखो सोनम । मैं भी रखता हूँ । वो ज़िन्दगी का सफ़र हो कि जंग का मैदान, मुहाज़ कोई भी हो, हौसला ज़रूरी है । और याद रखो - जिसके पास आशा है, वो लाख बार हारकर भी नहीं हारता । हमें हारना नहीं है । हार मान लेना आसान होता है । हम मुश्किल काम करेंगे । ज़िंदगी से जूझने का मुश्किल काम । कोई साथ न हो तो अकेले चलेंगे । अगर चारों तरफ़ अंधेरा है तो अंधेरे को ही हमसफ़र समझकर चलेंगे । लेकिन ठहरेंगे नहीं, थकेंगे नहीं, हारेंगे नहीं ।

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

देखो जी किरण सी लहर आई आई आई रे हंसी आई!... मई नहीं चाहता चिर सुख मैं नहीं चाहता चिर दुःख, सुख दुःख की आँख मिचौली खोले जीवन अपना मुख. नर हो न निराश करो मन को कुछ काम करो कुछ नाम करो. मैं अपने स्कूल में बहुत ज्यादा हँसता था. कोई कुछ हंसाने वाली बात कह देता मै हंसाने लगता. एक दिन मेरे प्रिय शिक्षक हिंदी पढ़ा रहे थे. एक लड़का उनकी बात का नक़ल कर रहा था और मैं हंस पड़ा. मुझे हँसते देख टीचर जी ने मुझे बुलया और पुछा -क्यों हंस रहे हो? मै जवाब न दे सका बल्कि हँसता ही रहा. उन्होंने मुझे पूरे पूरे क्लास के सामने मुर्गा बना दिया और कहने लगे - जो हमेशा हँसता रहता है, उसे दुःख या कष्ट का भान नहीं होता - जो दुःख को नहीं समझ सका, वह व्यक्ति अच्छा कलाकार नहीं हो सकता, अच्छा साहित्यकार नहीं हो सकता ...इसलिए रोना भी जरूरी है. मैं रोने लगा, सबके सामने, शर्म से, क्योंकि मुझे सबके सामने मुर्गा बनना पड़ा . टीचर को दया आ गयी. उन्होंने कहा- "उठो, मर्द रोते नहीं " और मैं चुप हो गया. अब मैं जल्दी नहीं रोता पर रो पड़ता हूँ, किसी भी लड़की की बिदाई पर, सच में या फिल्मों में भी. मुझसे किसी बेटी/लड़की का दुःख देखा नहीं जाता. इसलिए मेरी बेटे तुल्य सोनम, मत हो उदास! देखो तुमसे भी दुखी लोग इस संसार में हैं. माँ की देखभाल करो, अपना भी ख्याल रक्खो. कमजोर न बनो. अंदर से मन को मजबूत रक्खो और कागज पर या कम्प्यूटर पर अपनी भवन को व्यक्त कर दो जैसा की तुम करती हो. अंदर का दुःख बहार आ जायेगा. अपने आप को ब्यस्त रक्खो. ज्यादा देर अकेली न रहो.पुस्तकें सहारा का काम करती है. ...कोई पास न रहने पर भी जान-मन मौन नहीं रहता, आप आपसे कहता है वह आप आपसे है सुनता ...इतना काफी है. शोभ जी और निर्मल जी ने भी उचित सलाह दी है ..ये सभी कभी तुम्हारी जैसी ही रही होंगी.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आदरणीय सोनम जी , चक्रव्यूह तो जीवन में सतत चलने वाले महाभारत का एक अंग है । यहां तो  नित्य कोई न कोई व्यूह रचना होती है । इसी संघर्ष में अरूणा शानबाग को गहरे जख्म देने वाले लोग  भी है और बियालिस वर्षों तक बिना किसी सम्बन्ध के उसकी सतत सेवा करने वाला नर्सों का समुह  भी है । आप तो स्वयं मानती है कि - हार नहीं जीत नहीं , जीवन तो बन एक संघर्ष है - यह जीवन है  तो संघर्ष तो रहे गा ही । परन्तु यदि आप सत्य के लिये , न्याय के लिये , दूसरों के लिये संघर्ष करें गी  तो उस संघर्ष में ही बिना किसी जय या पराजय के भाव के आनन्द की अनुभूति होगी । जैसी कि उन  नर्सों के समुह को हुई होगी । और सम्भवतः गीता में भगवान श्री कृष्ण भी यह ही कहना चाहते हैं । 

के द्वारा: anilkumar anilkumar

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

आदरणीय शाही सर जी नमस्कार ......बहुत दिनों बाद आपको देखा ....फेसबुक से तो लगता है जैसे आप अदृश्य ही हो गए हैं .....आपकी प्रतिक्रिया काफी हद तक मेरी जिज्ञासा को, मेरे सवालो को शांत करती है, ...हम जब इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवेलप करते हैं, सड़कें बनाते हैं, बिल्डिंग्स के लिए ज़मीन में नींव खोदते हैं, तो नहीं चाहते हुए भी जाने अनजाने में असंख्य छोटे छोटे जीव जन्तुओं की हत्या और उनके आशियाने उजाड़ने का काम कर डालते हैं । ऊपर वाला जब अपने विकास कार्यों को अंजाम देने के लिए, सृष्टि को चलाने के लिए वही काम करता है, तो हमें इतना बुरा क्यों लगता है ?....आपका कहना सही है लेकिन मैं इसी क्यों का जवाब ढूँढना चाहती हूँ ....

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

सोनम जी बहुत बहुत स्नेह, आज आप का ब्लॉग पढ़ने का अवसर मिला सुविचारित एवं सुन्दर रचना है नाम देख कर सोचा कि आप जागरण के मंच पर नए रचनाकार हो परन्तु ब्लॉगों कि संख्या पर ध्यान गया तो बहुत कुछ पाया अच्छा लिखा है निरंतर लिखते रहो आपके द्वारा उठाये गए सभी प्रश्नो के उत्तर श्रीमद भगवद गीता में हैं परन्तु समझने के लिए बहुत ही सब्र और संतोष कि आवश्यकता होगी बार बार अध्यन करने पर ही तत्व समझ में आ पाएंगे अगर प्रश्नो के उत्तर चाहियें तो कृपया पढ़ना जरूर कभी कभार मैं भी ब्लॉग पर लिखता हूँ मेरे ब्लॉग का नाम 'मेरा देश मेरी बात 'हैं गीता को समझने में मैं कोई मदद कर सकूँ तो स्वयं को धन्य समझूंगा आप चाहें तो b.dass1@gmail.com पर भी संपर्क कर सकते हैं लेख के लिए एक बार फिर साधुवाद भगवान दास मेहंदीरत्ता

के द्वारा: bhagwandassmendiratta bhagwandassmendiratta

आदरणीया सोनम सैनी जी ! विचारणीय लेख के लिए अभिनन्दन और बधाई ! आपका लेख मुझे अच्छा लगा ! मेरे विचार से तो हमारे विकास और जीवन से कुदरत कोई सरोकार नहीं रखती है ! उसकी दृष्टि में हमारे जीवन और विकास का कोई महत्व नहीं है ! यही वजह है कि वो हमारे जीवन को और विकास को कभी भी तहस नहस कर देती है ! रही बात भगवान की तो उसकी अनुभूति के लिए भक्ति जरुरी है ! ध्यान रहे कि भगवान भी सिर्फ भक्त के लिए हैं ! बाकी सबके लिए तो यही कर्म प्रधान कुदरत या प्रकृति है ! मुझे एक चीज और अनुभव में आती है कि हम जो कुछ चाहते हैं, सबकुछ वैसा नहीं होता है ! बल्कि कुदरत जैसा चाहती है, वैसा होता है ! विरक्ति और भक्ति से अच्छा कुछ भी नहीं ! इस भावना को जारी रखो ! यही वास्तविक रूप से कल्याणमय है ! आशीर्वाद और शुभकामबनाओं सहित !

के द्वारा: sadguruji sadguruji

ऐसा बहुत कुछ है जो हम नहीं जानते, और न कभी जान पाएँगे । हमें इतना कुछ जानने की शायद ज़रूरत भी नहीं है । हमारी हर गतिविधि उस पाक परवरदिगार के वृहत्तर मकसदों के सापेक्ष प्रेरित होती है, जिन्हें हम चाहकर भी समझ नहीं सकते । दुर्भाग्यवश मनुष्य को बुद्धि क्या मिल गई, वह खुद को ही खुदा समझने लगा है । सच्चाई ये है कि आज बेबुद्धि और बेज़ुबान ही संभवत: हमारी अपेक्षा उस आलमाइटी के ज़्यादा क़रीब हैं । हम जब इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवेलप करते हैं, सड़कें बनाते हैं, बिल्डिंग्स के लिए ज़मीन में नींव खोदते हैं, तो नहीं चाहते हुए भी जाने अनजाने में असंख्य छोटे छोटे जीव जन्तुओं की हत्या और उनके आशियाने उजाड़ने का काम कर डालते हैं । ऊपर वाला जब अपने विकास कार्यों को अंजाम देने के लिए, सृष्टि को चलाने के लिए वही काम करता है, तो हमें इतना बुरा क्यों लगता है ?

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

प्रिय सोनम, सच कहो तो मेरे पास तुम्हारे प्रश्नों का जवाब नहीं है. पर अपनी समझ और अनुभव के अनुसार उत्तर देने की कोशिश कर रहा हूँ. मेरी समझ से धर्म ग्रंथों,ऋषि-मुनियों, महात्माओं आदि के सन्देश का तात्पर्य यही है कि हम सद्कर्म की राह पर चलें. अठारहों पुराण में ब्यास जी के दो ही वचन प्रधान हैं- परोपकार करने से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है और दूसरों को पीड़ा पहुँचाने से बड़ा कोई पाप भी नहीं है. पर हमने उन संदेशों को धरोहर के रूप में संजो दिया. नयी नयी व्याख्याएं पैदा की गयी, धर्म के नाम पर अनेकों अनाचार हुए और धर्म का विकृत रूप आज हम सबके सामने है. यह मनुष्य कहते हैं परमात्मा की सबसे श्रेष्ठ सृष्टि है ...पर यही मनुष्य आज जानवर, शैतान, हैवान से भी बदतर हो गया है....और आगे क्या होनेवाला है, शायद किसी को नहीं पता...

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

प्रिय सोनम ,आपका लेख आपकी परिपक्वता और मजबूत संकल्प शक्ति का परिचायक है,दहेज़ हमारे देश में अभिशाप है,और उसके लिए अगर कोई कुछ कर सकता है तो युवा पीढ़ी ही कर सकती है,जिनके पास काला धन है वो बे तहाशा खर्च करते हैं,पर पैसे से खुशियाँ नहीं खरीदीं जा सकतीं,सबसे ज्यादा विवाह विच्छेद भी उनके ही होते हैं ,दूसरी बात सब लडकियाँ आपके जैसी विवेकशील भी नहीं होतीं,वो खुद ही अपने माता पिता से शादी में गहने और अन्य चीजों की फरमाइश करतीं हैं,आपका आलेख नई अलख जगाये,एसी उम्मीद है ,अनेक शुभकामनाये, हार्दिक बधाई और ये भी आशार करता हूँ कि आपका लेखन , आपकी सोच , आपके विचार जन जन तक पहुंचें और लोग इस बात पर गौर करें कि क्या वो इस लेख में लिखे शब्दों का दस प्रतिशत भी अपने जीवन में उतार सकते हैं ?

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय निर्मला सिंह मैम नमस्कार ..........., जी काला धन ही अक्सर निर्धन परिवारो के जीवन में अँधेरा ले आता है, आपकी बात से सहमत हूँ कि जिनके पास काला धन है वो बे तहाशा खर्च करते हैं, और उनके इस बेतहाशा खर्च को देखकर ही एक माध्यम परिवार को भी उतना नही लेकिन अपनी हैसियत से ज्यादा शादी पर खर्च करना पड़ता है, ! मेरे लिए तो शादी पर किया गया खर्च फिजूल ही है, शादी पर किये जाने वाले खर्च से अगर किसी गरीब की मदद कि जाये तो वो ज्यादा अच्छा होगा ......., लड़कियो को फरमाइश करते देखकर ही मैंने यह साफ तौर पर लिखा है मैम कि लड़कियो को भी आगे आना चाहिए, उनके बेवकुफो की तरह हाथ पर हाथ रखकर नही बैठना चाहिए बल्कि अपनी एजुकेशन को हथियार बनाकर इस बुराई से लड़ना चाहिए ...... इतनी सारी शुभकामनाओ के लिए तहे दिल से शुक्रिया मैम ...... :) :)

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

आदर्बिया सोनमजी,आपका लेख सराहनीय है.आपने सही कहा है-बड़ो के साथ-साथ बच्चे भी थोड़ी समझदारी दिखाए तो दहेज़ से होने वाली हर समस्या का समाधान किया जा सकता है ! लड़को को दहेज़ न लेने के लिए खुद पहल करनी होगी, अगर माता-पिता दहेज़ लेना चाहते हैं तो उन्हें इसके लिए मना करना होगा, उन्हें समझाना होगा ! इसी तरह लड़कियो को भी हाथ पर हाथ रखकर नही बैठना है, अगर उनकी शादी से उनके माता-पिता के जीवन में दुःख आते हैं तो उन्हें ऐसी शादी से खुद ही पीछे हट जाना होगा ! अधिकतर ऐसा देखा गया है कि बेटी की शादी में लोग कर्ज ले लेते हैं और फिर जीवन भर उस कर्ज के भार तले तबे रहते हैं ! कर्ज का यही भार कई पिताओ की जिंदगी भी छीन चुका है ! ये फैसला आपको खुद करना होगा कि आपको सिर्फ शादी से मतलब है या फिर अपने माँ-पापा के सुख-दुःख का भी ख्याल है !इस अच्छे लेख के लिए आपको बहुत बहुत बधाई.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

प्रिय सोनम, बहुत ही सार्थक विषय और सही तरीके से उठाया है... सवाल यही है कि लोग क्या कहेंगे? शुरुआत तो घर से ही होती है पर पहल कौन करे? हैम बेटी की शादी में दहेज़ देने से बचाना चाहते हैं पर बेटे की शादी में लेने के लिए सुरसा के सामान मुख फ़ैलाने में परहेज नहीं करते ...ऊपर से अधिकांश लोग यही कहते मिल जायेंगे हैम तो दहेज़ के खिलाफ हैं ...पर समाज में अपनी भी मर्यादा है ...फलां जगह के फलां महोदय आए थे खुद से ही इतने का ऑफर दे गए थे ...हमने तो उन्हें न कह दिया ...मतलब आप उससे आगे बढ़िए तब हम हाँ करेंगे......यह एक सामाजिक बुराई के साथ धन की बर्बादी भी है जिसे बिरथ के ताम झाम में खर्च किया जाता है. हाँ इसके लिए नवयुवकों, नवयुवतियों को ही आगे आना होगा ...समझदारी के साथ. बाकी तो समाज तभी बदलेगा जब हम बदलेंगे... एक तरह का यह भी भ्रष्टाचार ही है.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

आदरणीय जे एल सिंह सर जी नमस्कार ....जी "सकारात्मक सोचो और सकारात्मक करो" में गलत कुछ भी नही है, लेकिन सकारात्मक करने को कहता कौन है ? सभी सिर्फ ये कहते हैं कि सकारात्मक सोचो .... आप ही बताइये अगर इंसान सिर्फ सोचता रहेगा और करेगा नही तो क्या कुछ सकारात्मक हो फायदा होगा ?................"दुःख में हर ब्यक्ति दुखी होता है और सुख में खुश.होता है. यह तो एक सामान्य प्रक्रिया है. दुःख में धैर्य धारण करना चाहिए, तभी आदमी का दुःख कम होगा, नहीं तो वह दुखों के बोझ से दब जायेगा टूट जायेगा और कोई गलत कदम उठा लेगा."............. ऊपर आपने ही यह लिखा है, मैं भी बिलकुल यही कहना चाह रही थी लेकिन ठीक से समझा नही पायी, इंसान अगर दुःख में धैर्य रख कर कुछ सकारात्मक कार्य करे तब ही वह अपने दुःख से बहार निकल सकता है .....आप ही बताइये क्या गहरे दुःख में सकारात्मक सोचा जा सकता है ??? ... प्रतिक्रिया की कुछ आखरी लाइनस मुझे ठीक से समझ नही आयी ...... ..... :"और ऐ मालिक तेरे बन्दे हम ऐसे हों हमारे करम, नेकी पर चलें और बदी से डरें, ताकि हंसते हुए निकले दम…में सच्चाई नहीं दीखती? …प्रयत्नहीन प्रार्थना, प्रार्थना हो ही नहीं सकती … एक बात और कहूंगा …कार्यालय में या कार्यशाला में अपना कर्त्तव्य का पालन पहला धर्म है …मन न लगे तो छुट्टी ले लेनी चाहिए …बेमन से कोई काम करने में गलती होने की सम्भावना रहती है. …..."...... ...."अपने विचार रखने का हक़ सभी को होता है आपको भी है सर जी...इसमें मुझे कैसे बुरा लग सकता है..... ? शुभकामनाओ हेतु धन्यवाद ... :)

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

“बनी बनायी बात पर हाँ में हाँ न मिलाएं बल्कि सच्चाई को समझे, जो सही है उसे ही सही कहे, और अगर आप किसी को अपनी बात कहने का हक़ देते हैं तो उसे अपनी बात भी कहने दे’, ये नही कि आप जो सोचते हैं वही सही है, सबका अपना-अपना नजरिया है तो सोच भी अलग ही होगी ! अगर कोई आपसे सहमत नही होता तो इसका ये मतलब नही कि वो बुरा इंसान है, या उसे समझ नही है ! जिस तरह आपको अपनी बात कहने का अधिकार है वैसे ही दुसरो को भी है ! प्रिय सोनम, आशीष .. मन का भाव व्यक्त कर देने से मन हलका हो जाता है.सोसल साइट्स एक ऐसा ही जगह है. बड़े लोगों द्वारा कही गयी सभी अच्छी बातें सही कैसे हो सकती है. बड़े लोग अपने अनुभव के आधार पर अपनी बात कहते हैं, समय के अनुसार मान्यताएं और अर्थ बदल जाते हैं.अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल हमेशा करनी चाहिए. सकारात्मक सोचो और सकारात्मक करो - इसमे क्या गलत है? दुःख में हर ब्यक्ति दुखी होता है और सुख में खुश.होता है. यह तो एक सामान्य प्रक्रिया है. दुःख में धैर्य धारण करना चाहिए, तभी आदमी का दुःख कम होगा, नहीं तो वह दुखों के बोझ से दब जायेगा टूट जायेगा और कोई गलत कदम उठा लेगा. आज बढ़ती आत्महत्याओं के कई कारणों में एक कारण यह भी है कि आज लोगों में धैर्य की कमी हो गयी है. आज इंसान सब कुछ जल्दी में प्राप्त कर लेना चाहता है, नहीं मिलने पर दुखी होता है. जब प्यार किया तो डरना क्या सत्य लगता है ---और ऐ मालिक तेरे बन्दे हम ऐसे हों हमारे करम, नेकी पर चलें और बदी से डरें, ताकि हंसते हुए निकले दम...में सच्चाई नहीं दीखती? ...प्रयत्नहीन प्रार्थना, प्रार्थना हो ही नहीं सकती ... एक बात और कहूंगा ...कार्यालय में या कार्यशाला में अपना कर्त्तव्य का पालन पहला धर्म है ...मन न लगे तो छुट्टी ले लेनी चाहिए ...बेमन से कोई काम करने में गलती होने की सम्भावना रहती है. ...मैं भी प्रवचन दिए जा रहा हूँ ...हो सकता है तुम्हे अच्छा लगे या न लगे... पर जब तुमने मंच पर यह बात साझा की है तो अपना विचार रखने का तो हक़ बनता है. सदा खुश रहो, निश्छल रहो....

के द्वारा: jlsingh jlsingh

आपके लेख और कविता का सार है-वो लोग जो अपने रंग-रूप या कद के कारण हीन भावना से ग्रस्त हो जाते है अगर वो सभी भी और बाकि सभी भी उन दोनों की ही तरह अपने हुनर को, अपनी प्रतिभा को अपना हथियार बना ले तो फिर इस दुनिया में कोई उन पर गलत शब्दो के, तानो के बाणो से हमला नही कर सकता ! अपने आप पर तब उन्हें भी गर्व होगा और वो कह सकेंगे कि ” मेरा कद बौना है मगर मैं आसमाँ हूँ … खुद को इस लायक बनाना होगा कि जब खुले जुबान लोगो की मारने को ताने और पूछने को रंग-रूप, लम्बाई तो बोले हुनर …. दे हर जवाब प्रतिभा … और कर दे चुप सभी को कह कर ये कि…. “मेरा कद बौना है मगर मैं आसमाँ हूँ.बहुत अच्छा लेख और उतनी ही अच्छी कविता.सार्थक,शिक्षाप्रद और उपयोगी रचना.आपको इस उत्कृष्ट कृति के लिए बधाई.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

के द्वारा: सौरभ मिश्र सौरभ मिश्र

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के द्वारा: jalaluddinkhan jalaluddinkhan

के द्वारा: Piyush Aseeja Piyush Aseeja

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

के द्वारा: Bhagwan Babu Shajar Bhagwan Babu Shajar

के द्वारा: vaidya surenderpal vaidya surenderpal

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Bhagwan Babu Shajar Bhagwan Babu Shajar

बिहार में एक सोन नदी है, सोन में सरिता (सोनम सरिता) अजीब सा है न! पर सरिता दीदी तो अपने को बदल भी कहती हैं और उड़कर लोगों की प्यास बुझाती हैं ...फिर यह भी कहती हैं, हम तो बदल हैं, बादलों का क्या ...बरसे या न बरसे ..भले ही प्यासा पानी को तरसे. पर ऐसा नहीं है ..बादलों को बरसाना पड़ता है, सरिता को बहन से बहना होता है, अपनी स्वच्छ जलधारा से प्यास बुझाती हैं ... अजीब सा रिश्ता होता है, अनजाना सा बंधन होता है, बादल में और सरिता में ठीक वैसे ही जैसे सोनम और सरिता में...और मैं क्या कहूँ या लिखूं, सोनम जैसी कविता तो लिख नहीं सकता, सोनम में सरस्वती का निवास है बिना सरिता के होती उदास है... फोन की घंटी बजाती रहती है और सरिता दीदी अपनी परेशानी छुपाती रहती हैं.... आप दोनों का अटूट बंधन ऐसे ही बना रहे, यही अभिलाषा रखता हूँ.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

:) :) :) :) :) :) :) :) .........हम्म्म्म इसका मतलब मैं सही सोचती हूँ, जब मुझे लगता है कि आप परेशान हो तब आप रियल में परेशां होते हो ..... आप मुझसे छुपाते हो .... :( :( :( और ये डरने वाली बात का असर आजकल कुछ कम हो रहा है आप पर हैं न ...??? :) तभी तो .... :) वैसे डर कर ही रहा करिये अच्छे लगते हो......मेरे घर में भी सब लोग मुझसे ऐसे ही डरते हैं , मैं सभी को डरा कर रखती हूँ .. हहहहहहहआ............मजाक कर रही हूँ, .... जासूसी तो एक बहाना है मकसद बस इतना सा है कि आप स्वस्थ रहे, सबके साथ साथ खुद का ख्याल भी रखे ...... कितनी बार बताया है न कि जब माँ बीमार पड जाती है तो कुछ भी अच्छा नही लगता इसीलिए बस .......... लास्ट की दो लाइन मुझे पसंद नही आयी ........ :( मैं इमोशनल होकर आपकी बात नही मानने वाली ...मुझे आपका टाइम भी चाहिए और आप भी हमेशा मेरे साथ....... जब तक भी मैं रहूँ इस दुनिया में आपको यूँ ही परेशान करती रहूँ, यही दुआ है मेरी भगवान जी से ......... :) :) :)

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

प्रिय सोनम..धन्यवाद कहने का यहाँ कोई मतलब नहीं है...मेरे लिए इतनी मेहनत की और कहती हो गिफ्ट नहीं है...अब और गिफ्ट क्या करुँगी मैं....मैं भी सोचती हूँ कि सितारों की कौन सी चाल थी जो मेरी तुम्हारी मुलाक़ात हुई..शायद मेरी किस्मत में ये निस्वार्थ प्रेम पाने का योग था इसीलिए ....वर्ना जो कुछ तुमने ऊपर लिखा है उसमे कोई खास बात नहीं है..सभी औरतें रोटियां बनती हैं और अपने अपनों से प्रेम रखती हैं, घर में एडजस्ट करती हैं..आदि इत्यादि..इसमें अनोखा क्या है..अनोखा है तुम्हारा व्यवहार जो बिना किसी रिश्ते के मुझसे इतना लगाव रखती हो....सच तो ये है कि तुम्हारी जासूसी कि वजह से मैं अब रातों को जागने से, बीमार पड़ने से डरने लगी हूँ...कोई परेशानी हो और तुम्हारा फोन आये तो डर लग जाता है कि अब कैसे छुपाऊँ...खैर ..ये सारी दुआएं, फूल, चॉकलेट...सब कम हैं तुम्हारे प्रेम और मान-सम्मान के आगे..जे जे पर आने से पहले मैं सोचती थी कि मैं एकदम सुखी संतुष्ट हूँ...मेरे पास अब कोई कमी नहीं है, लेकिन अब समझ में आता है कि अगर मैं यहाँ न आती तो किस दौलत से महरूम रह जाती.....ईश्वर तुम्हे भी संसार कि सारी खुशियां बख्शे....मैं समय दूँ या न दूँ..रहूँ या न रहूँ..मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ रहेगा.....

के द्वारा: sinsera sinsera

"आज खुश तो बहुत होगी तुम, अय्य्यन ...!!!" लड़की या कमज़ोर होने के बहुत फायदे हैं इस देश में...!! मुझे याद आता है बचपन में मेरा छोटा भाई मुझ से लड़ाई करता था, वो जब मुझे मरता था तो मैं बर्दाश्त कर लेता था, लेकिन अगर मैं उसे हौले से भी मार देता था तो वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगता था... उसका रोना सुन माँ आ जाती थी, और फिर मुझे डांट पड़ती थी... माँ को लगता था सिर्फ मैंने उसे मारा है...गलती हम दोनों की होती थी लेकिन डांट सिर्फ मैं ही सुनता था...!! रोने-धोने और कमज़ोर होने के बहुत फायदे हैं....तुमने हौले से अनील को 'चूँटी' काटी थी जिसकी वजह से बेचारा इतना चिल्ल-पों मचाया और लोगों की नज़र में आ गया...लेकिन तुमने जो 'चूँटी' काटी थी वो किसी को नहीं दिखा.....!! लड़कियों वाली बुद्धि लगा दी...गुड है...!! 'सदार खुश हुआ..' ... 'तुम लड़की ही हो सो ये भी नहीं कह सकता कि 'ये तुमने लड़कियों वाला काम किया है'

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आप तो मुझे रुला के भगाने वाली थी. अब आप को क्या हो गया? जो एक व्यक्ति के कारण इतने लोगों से रूठ गयी...............सोनम याद है तुम्हें कभी छोटी बहन की तरह ट्रीट किया था और आज भी मेरे लिए तुम वैसी ही हो जैसे एक छोटी बच्ची. यह अलग बात है कि तुम खुद को बहुत बड़ी समझती हो यहीं कारण है तुम्हारे मन को ठेस पहुँचने का. मैं कई बार इशारे-इशारे में बताने कि कोशिश किया था कि नकारात्मकता इतनी ठीक नहीं होती.मगर यह तुम थी जिस पर यह भुत सवाल था खुद के बड़े होने की, यह तुम थी जिसे गलतफहमी थी कि मैं कुछ नहीं जानता और आप ही नहीं सारे लोग इस गलतफहमी में जीते है और जिस दिन मुझसे मुलाकात होती है. फिर भागने लगते हैं. दरअसल वो मुझसे नहीं भागते खुद से भागते है और जब खुद सबके सामने आ जाता है तो फिर वो सबसे भागने की कोशिश करते हैं. परन्तु कोई कहीं भी चला जाय पर मुझसे नहीं भाग सकता मतलब कि खुद से नहीं भाग सकता. तुम समझती हो कि तुम इस दुनिया में अकेली हो जो बाह्य रूप धारण कर राखी हो. हरेक इंसान की वही हालत है जो तुम्हारी हालत है. यहाँ तक कि खुद अनिल कुमार "अलीन" भी अछूता नहीं है इससे. परन्तु कुछ लोग ऐसे भी है जैसे संदीप झा अर्थात सूफी ध्यान मुहम्मद जैसे लोग जो खुद को स्वीकार करते हैं. अतः उन्हें भागना नहीं पड़ता क्योंकि जानते है कि खुद से भागना या छुपना एक मुर्खता के सिवा कुछ नहीं. या फिर तुम यह समझती हो अनिल कुमार "अलीन" के यहाँ रहने से तुम्हें ठेस पहुंचता है तो वह आज से और अभी से ब्लागिंग करना बंद कर रहा है . पर इस गलतफहमी में मत रहना कि मेरा काम ख़त्म हो गया क्योंकि वह अनिल कुमार 'अलीन' बल्कि मैं हूँ जिसे तुम स्वीकार नहीं करना चाहती मतलब वह स्वयम तुम हो. और एक बात बातों तुम तुमसे कबतक भागती रहोगी................ .................अनिल कुमार "अलीन" जैसे हजारों लोग तुम्हें मिलेंगे और फिर तुम्हारा अहम् और वहम दोनों तुम्हारे सामने खड़ा हो जायेगा...............हाँ.................हाँ.....................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

कोई रूचि नहीं......................समय नहीं........................तो फिर यह क्या है.........................? आपने जो कुछ भी कहाँ उससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि यह आपके अन्दर की तिलमिलाहट है. कभी-कभी होता जब बिमारी बढ़ जाती है या गलतफहमी हो जाती है कि सामने वाला कुछ नहीं जानता मेरे बारे में............................................................अब इतनी जल्दी दवा फ़ायदा थोड़े नहीं करेगी................. आप पूछ रही है न कि मैं क्या जानता हूँ आपके बारे में. तो सुनिए वह सब कुछ जो आप दुसरे से छुपाई सिवाय दो-चार को छोड़कर उसमे से सरिता दी भी है. परन्तु मैं वह भी जनता हूँ जो आप उनसे छुपाई है. संभवतः हर बार खुद के सिवा दूसरो को बतायी नहीं जाती............मैं किसी के दो-चार बातों और पोस्टो को पढ़कर पता लगा लेता हूँ कि आखिर यह बिमारी क्या है? आपको क्या लगता है कि आप किसी और दर्द और पीड़ा को माँ , राम या सीता माँ इत्यादि के कैरेक्टर से जोड़कर सबको धोखा दे रही है तो मुझे भी दे देंगी. अब सरिता दी, से मत लादियेगा कि यह सब मुझसे आपके बारे में वह बताई है क्योंकि मैं किसी से बात करता हूँ तो सिर्फ अपने और उसके बारे में किसी तीसरे के बारे में नहीं. जिससे बात करनी होती और जो बात करनी होती और जब बात करनी होती है......उपयुक्त समय का इंतज़ार नहीं करता .............जैसे कि मुहे अनजानी से प्यार हुआ और मैं उससे शादी करना चाह रहा था तो बाते घुमाने की बजाय सीधे पहले दिन ही बोल दिया था ........कि अनजानी मैं आपसे शादी करना चाह रहा हूँ................ देखिये कहाँ से कहाँ चला गया तो बात हो रही है आपकी. जब आपकी बिमारी को आपके लेख के माध्यम से पकड़ा था तभी विलम्ब किये बिना आपके इलाज में लग गया . कुछ समय के लिए आपसे दूर रहना भी मेरे इलाज़ का हिस्सा था. सब पूछियेगा परन्तु फिर कभी मत पूछियेगा कि क्या जानता हूँ आपके बारे में. वरना बता दिया तो तमाशा बन जाएगा आपका.................वैसे भी घटिया इंसान तो मैं हूँ पर इतना नहीं कि किसी के प्यार का तमाशा बनाऊ ............आख़िरकार मैं भी किसी का प्रेमी हूँ......... आपका कहना, "…. कृपया अब कोई कमेंट न करे …………" इसका मतलब कि दवा अब आपको असर करनी शुरू कर दी है. इलाज़ के शुरुवाती दिन में ऐसा होता है जब मरीज डाक्टर से भागता है क्योंकि यह बिमारी कुछ ऐसी है. परन्तु यह संकेत है कि आप जल्द ही ठीक हो जाएँगी. फिर चला जाउंगा एक नए बीमार की तलाश में. परन्तु आपसे एक विनती है कि जब आप ठीक हो जाए तो फिर यह बिमारी मत पलियेगा क्योंकि और भी लोग है इलाज़ करने को. एक आप ही नहीं जिसे लेकर बैठा रहा हूँ..........बस यूँ समझ लीजियेगा यह फीस है मेरी.........................................................................जब दिल ही टूट गया हम जी कर क्या करेंगे.....जब दिल ही टूट गया...........जी क्या करेगेगेगेगेगेगेगेगे...........................गेगे..................हाँ.................हाँ..................हाँ.......................जाने क्यों मोहब्बत किया करते हैं दिल के बदले दर्दे-दिल लिया करते है............जाने क्यों...........क्यों.........क्यों.............? हाँ...................हाँ...................हाँ..........................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

अनिल कुमार अलीन जी ............. मेरी आपसे लड़ने में कोई रूचि नही है ! आपने कहा कि " लगता है दुनिया में सबसे ज्यादा समझदार आप ही हैं " .............मैंने तो ये कभी नही कहा कि मैं ही सबसे ज्यादा समझदार हूँ दुनिया में ......आप ही हर किसी के ब्लॉग पर जाकर अपने ज्ञान का ढिंढोरा पीट रहे हैं ..! मैंने तो कभी किसी कि पोस्ट पर जाकर या कही किसी से ये नही कहा कि आप लोग सभी गलत हैं बस एक मैं ही सही हूँ, मैं ही ज्ञानी हूँ , ये काम तो आपका ही है जिसे आप बखूबी कर रहे हैं ! दूसरे आपने कहा कि मैं झूठ में जी रही हूँ ...आपसे सिर्फ इतना पूछना चाहूंगी कि आखिर आप मुझे जानते कितना हैं ?? और क्या जानते हैं मेरे बारे में जो आपने ये कह दिया कि तुम झूठ में जी रही हो??? आलोचना करने का इतना ही शौंक है आपको तो पहले जाइये एक अच्छे आलोचक बनिए ! तब जाकर आलोचना करिये गा.... ये आप जिसे आलोचना कह रहे हैं ये मात्र आपकी एक बनी बनाई सोच के अलावा और कुछ नही है ! "कुछ भी बोलने से पहले ये समझ लिया करिये कि आप बोल क्या रही हैं " मुझे अच्छे से पता है कि मैं क्या बोलती हूँ लेकिन शायद आप ही हर समय नशे में रहते हैं और हाँ दुसरो को शिक्षा देने से पहले अपने अंदर झांक कर देखिये .......आप चाहे जिसे जो बोल दे वो कुछ नही और बोलने के बाद नाम दे देते हैं कि हम तो मज़ाक कर रहे थे ...अरे पहले खुद को सलाह दीजिये ....और खुद को सुधारिये …!"अभी जा रहा हूँ परन्तु याद रखियेगा जब भी आपकी बिमारी बढ़ेगी आपका इलाज़ करने आऊंगा……………आप पहले जाकर अपना इलाज करवा आइये कहीं ऐसा न हो कि दुसरो का मज़ाक उड़ाते उड़ाते , दुसरो का इलाज करते करते किसी दिन आपको कोई उठाकर पागल खाने में न छोड़ आये ...... और अब आखरी बार आपसे ये कह रही हूँ कि आप चाहे जहाँ जाकर अपने ज्ञान का प्रदर्शन करे लेकिन मेरी पोस्ट से दूर ही रहे ! मुझे न तो आपसे कोई बात करनी है और न ही आपकी कोई बात सुननी है ! और न ही मेरे पास इतना समय है कि आपकी बकवास में आपका साथ दूँ ! इसलिए अच्छा यही रहेगा कि आप समझ जाये वरना अगर मैंने फिर कुछ कह दिया तो आप फिर यहाँ से रोते हुए भागेंगे .... कृपया अब कोई कमेंट न करे ............आपकी अति कृपा होगी .....

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

रामायण से मुझे दो बाते समझ में आती हैं पहली ये कि हम सभी इस दुनिया में एक चरित्र प्ले करने आये हैं। सभी का अपना-अपना काम है जिसे सबको करना है। जिस दिन वो काम खत्म उस दिन मृत्यु हो जाती है फिर चाहे वो किसी भी कारण से हुई हो। सब कुछ पहले से निर्धारित है। कब किसके साथ क्या होना है सब पहले से ही तय हो चुका है हमे तो बस उस तय किये हुए को अपने कर्मो से लक्ष्य तक पहुँचाना है। और दूसरी बात जो मुझे समझ में आती है वो ये कि पीड़ा का रिश्ता किसी स्त्री पुरुष से नही है यह तो हर उस जीव से जुडी है जिसने इस धरती पर जन्म लिया है फिर वो चाहे किसी भी रूप में हो.... मैं आप की सभी बातो से सहमत हू मगर आपके ऊपर दिए तर्क को मान ले तो सारे अपराधियों को छोड़ दिया जाना चाहिए आसाराम ,तरुण तेजपाल ,ये सब तो इस का मतलब अपना किरदार ही निभा रहे थे तो फिर तो ये सब निर्दोष है इस बारे में अपने विचार बताये

के द्वारा: vijay vijay

लातारणीय अनिल, आदरणीय प्रवीण जी, और प्रातः स्मरणीय सोनम जी...!! यूँ स्कूली बच्चों की तरह आपस में न लड़ें... ऊर्जा यूँ ही व्यर्थ न करें... कुछ सकारात्म कीजिए, अपनी शक्ति को देश हित में खर्च कीजिए.... आप गणमान्य जानो को यूँ चिल्ल-पों मचाते देख मन व्यथित हो जाता है...अब आप लोग बड़े हो गएँ हैं, इस तरह अशोभनीय ढंग से मत लड़िये....अब आप लोगों को बड़ों की तरह लड़ना चाहिए....एक दूसरे को विशुद्ध-विशुद्ध गाली देनी चाहिए...कोट-कचहरी तक घसीट कर ले जाने की बात करनी चाहिए... जंग-जंग की तरह होनी चाहिए...खून-खराबा से भरपूर.... आप लोगों का ये 'टुचु' लड़ाई देख कर मज़ा नहीं आया... लड़ाई मार-धाड़ और एक्शन से भरपूर होनी चाहिए... राम से कुछ सीखिए...क्या खूब लड़ते थे राम...औरतों का अपमान करना तो उनका रोज़ का धंधा था...पुरे मानव जाति के इतिहास में राम ऐसे पहले उल्लेखित व्यक्ति हैं जो औरतों पर हाथ उठाते थे...उसको गाली देते थे...उनके राज्य में लोग अपनी बेटी को बेचता था...

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

लगता है दुनिया में सबसे अधिक समझदार आप ही हैं. यही बात उनसे क्यों नहीं कहती जो आपकी इस रचना की तारीफ़ कर रहे हैं. जाइये उनसे कहिये कि तुम लोगों को कौन कहाँ है मेरी तारीफ़ करने के लिए. तबतो वह बहुत अच्छा लगता है. मोहतरमा अपनी तारीफ़ इतनी पसंद है तो आलोचना भी सहना सिख लीजिये. आखिरकार झूठ में जीने की आपकी आदत हो गयी है. वरना अपने आलेख और रचनाओ को किताबों में बंद करके रखिये और किसी बंद कमरे में जोर-जोर से पढ़कर अपने कान को संतावाना देते रहिये......कोई विरोध करने वाला नहीं मिलेगा? क्यों पढ़ता हूँ. यह मेरा कर्तव्य है जिसे निभा रहा हूँ. यदि किसी को फोड़ा है और कोई सच में एक डाक्टर का फ़र्ज़ निभाता है तो वह बिना पैसे का अपने मरीज़ को बैठाकर जबरदस्ती ओपरेशन करता है. भले उसकी सहमति हो या न हो.......मैं भी वही काम कर रहा हूँ..........................और हद में रहने की बात कर रहीं हैं................जो इंसान हद से बाहर चला गया हो उससे बोलने की हिम्मत नहीं कर पाएंगी...................बस बन्दर की तरह आसमान को देखती रह जायेंगी..................कुछ भी बोलने से पहले समझ लिया करिए कि क्या आप बोल रही हैं? मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं बुरा इंसान हूँ और अबतक मुझ जैसा बुरा कोई इस धरती पर नहीं हुआ होगा. पर आप तो एक अच्छी लड़की है तो फिर आप क्यों बुरा बन रहीं हैं. फिर तो आप मुझसे भी बुरी हो गयीं...............अभी जा रहा हूँ परन्तु याद रखियेगा जब भी आपकी बिमारी बढ़ेगी आपका इलाज़ करने आऊंगा..................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीया सोनम सैनी जी,आप का लेख मैंने दो बार पढ़ा,आप ने १०० प्रतिशत सही बात कही है.कोई भी समझदार और भगवान का भक्त आप की बातों को नकारेगा नहीं.आप ज्ञानियों की बातों से भ्रमित मत होइएगा और इस तरह के लेख आप लिखना जारी रखिये.मै बहुत से ब्लॉगरों के लेख पढता हूँ,परन्तु आप का लेख पहली बार पढ़ रहा हूँ.लेख की ये पंक्तियाँ मुझे बहुत अच्छी लगीं-"अपने मन की पीड़ा को अनदेखा करके पूरी प्रजा के बारे में सोचना और अपने सबसे प्रिय इंसान को दुसरो की ख़ुशी के लिए खुद से दूर कर देना बहुत बहुत कठिन कार्य है जिसे सिर्फ श्री राम जैसा महान व्यक्ति ही कर सकता है।" और आप के लेख की ये पंक्तियाँ भी १०० प्रतिशत अकाट्य सत्य हैं-"रामायण से मुझे दो बाते समझ में आती हैं पहली ये कि हम सभी इस दुनिया में एक चरित्र प्ले करने आये हैं। सभी का अपना-अपना काम है जिसे सबको करना है। जिस दिन वो काम खत्म उस दिन मृत्यु हो जाती है फिर चाहे वो किसी भी कारण से हुई हो। सब कुछ पहले से निर्धारित है। कब किसके साथ क्या होना है सब पहले से ही तय हो चुका है हमे तो बस उस तय किये हुए को अपने कर्मो से लक्ष्य तक पहुँचाना है। और दूसरी बात जो मुझे समझ में आती है वो ये कि पीड़ा का रिश्ता किसी स्त्री पुरुष से नही है यह तो हर उस जीव से जुडी है जिसने इस धरती पर जन्म लिया है फिर वो चाहे किसी भी रूप में हो।" जो लोग आप की आलोचना कर रहे हैं-वो लोग न जीव,न माया और न ही भगवान के बारे में सही जानकारी रखते हैं.जो लोग आप की आलोचना कर रहे हैं,वो ज्ञानी नहीं बल्कि जरुरत से ज्यादा चालाक लोग हैं.न तो इनका अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण है और न ही जबान पर,पता नहीं किस बात के ये लोग ज्ञानी हैं.इससे ज्यादा निकृष्ट सोच और क्या हो सकती है कि अपने को ज्ञानी साबित करने के लिए और दूसरों को नीचा दिखाने के लिए हम किसी की आलोचना करें.गुरुनानक देव जी ने ज्ञानी की सही परिभाषा दी है-"एक ने कही,दूजे ने मानी ! नानक कहें दोनों ही ज्ञानी !! इस लेख में आप ने अपनी सर्वोत्तम लेखन क्षमता और अपने ह्रदय की भक्ति भावना को बहुत ही सुंदर विवेकपूर्ण ढंग से प्रदर्शित किया है.विशुद्ध ज्ञान और भाव भक्ति दोनों ही दृष्टि से आपने १०० प्रतिशत सही बात कही है.इतने अच्छे लेख के लिए मै आप को बधाई देता हूँ और भविष्य में भी आप के ऐसे लेखों की मुझे प्रतीक्षा रहेगी.अपनी शुभकामनाओं सहित.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

बहुत साफ साफ समझ में नहीं आया कि अपने कहना क्या चाहा है सोनम..बस एक बात समझ में आयी कि अपना अपना रोल प्ले करना है, लोग उसका आकलन चाहे जैसे करें...हमारे उत्तर भारत में राम पूजनीय हैं और दक्षिण भारत में रावण की पूजा होती है....कहानी एक ही है लेकिन लोग उसमे अलग अलग पहलू देखते हैं...मुझे तो रावण से ज़यादा चरित्रवान कोई नहीं दीखता .....राम तो मर्यादा पुरुषोत्तम थे लेकिन रावण ने राक्षस जाति का होते हुए भी सीता माता पर कोई अनाधिकार बल प्रयोग नही किया ,वो चाहता तो उन्हें ज़बरदस्ती अपनी पटरानी बना सकता था लेकिन वो उन्हें घर तक नही लाया , अशोक वाटिका में ही रखा...उसको भी उनकी इज़ज़त की चिंता थी....खैर..आध्यात्मिकता की ओर आपके बढ़ते कदम मुबारक हों....

के द्वारा: sinsera sinsera

रामायण से मुझे दो बाते समझ में आती हैं पहली ये कि हम सभी इस दुनिया में एक चरित्र प्ले करने आये हैं। सभी का अपना-अपना काम है जिसे सबको करना है। जिस दिन वो काम खत्म उस दिन मृत्यु हो जाती है फिर चाहे वो किसी भी कारण से हुई हो। सब कुछ पहले से निर्धारित है। कब किसके साथ क्या होना है सब पहले से ही तय हो चुका है हमे तो बस उस तय किये हुए को अपने कर्मो से लक्ष्य तक पहुँचाना है। और दूसरी बात जो मुझे समझ में आती है वो ये कि पीड़ा का रिश्ता किसी स्त्री पुरुष से नही है यह तो हर उस जीव से जुडी है जिसने इस धरती पर जन्म लिया है फिर वो चाहे किसी भी रूप में हो। ये कलियुग है सोनम जी , ये सब जानते हैं कि हम यहाँ मात्र कुछ वर्षों के लिए ( अध्यात्म के अनुसार कुछ सेकण्ड्स ) के लिए ही आये हैं लेकिन इसी पल में कोई कोई क्या कर देता है ! कोई अपनी जगह बना लेता है कोई सीधे आता है चला जाता है ! भगवान् राम कि जो कहानी आपने कही है , मुझे नहीं लगता भगवान् राम के ऊपर गम्भीर सवाल उठाये जाते हैं ! एक सार्थक बहस को जन्म दिया है आपने !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: Sonam Saini Sonam Saini

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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के द्वारा: sonam saini sonam saini

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के द्वारा: sonam saini sonam saini

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

आज ABP न्यूज़ पर बहस के दौरान एक नेता अंग्रेजी में बोल रहे थे तो एंकर ने उन्हें हिंदी में बोलने के लिए आग्रह किया उर फिर वे हिंदी में शुरू हुए! वही अधिकतर हिंदी फिल्मों और धारावाहिकों में काम करने वाले/वालियां अंग्रेजी में बोलने को प्राथमिकता देते हैं, पता नहीं क्यों? यहाँ तो उन्हें रोजगार हिंदी भासः ही दे रही है फिर वे हिंदी में साक्षात्कार देने से घबराते क्यों हैं? चाहे जो हो हम सबको हिंदी में बोलने, लिखने, संवाद करने को बढ़ावा देना चाहिए! भाषा सीखने या जानने में कोई बुराई नहीं है. हमारे हिंदी के अध्यापक 'विचार' शब्द के 'अठारह अंग्रेजी' शब्द बता गए थे - उसके बाद उन्होंने कहा था - मैं इतना ही जनता हूँ! विचारपूर्ण आलेख प्रस्तुति के लिए सोनम को बधाई!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

वास्तव में अगर देखा जाये तो सिर्फ कुछ लेख लिख देने से या सिर्फ हिंदी में ब्लोगिंग करने से हिंदी को सम्मान नही मिल सकता क्योंकि सम्मान तो दिल से होता है। हिंदी का प्रयोग ब्लॉग लिखने के लिए भी हम सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए करते हैं। अपने स्वार्थ के लिए इसीलिए क्योंकि हम अपनी रचना को सर्वश्रेष्ठ बनाना चाहते है, हमारी रचना को ज्यादा से ज्यादा लोग पढ़े यह चाहते हैं और यह तभी संभव होता है जब हम अपनी रचना को हिंदी भाषा में लिखते हैं क्योंकि हिंदी भाषा सभी को आसानी से समझ में आ जाती है। सोनम जी , आपने हिंदी भाषा को माँ से जोड़कर बहुत सटीक और प्रभावशाली लेखन दिया है ! हालाँकि हमने आपको सदैव काव्य लिखते हुए पढ़ा है लेकिन आज लेख लिखकर आपने अपनी प्रतिभा का एक और पन्ना खोल दिया है ! बहुत सुन्दर आलेख ! बधाई

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: deepakbijnory deepakbijnory

के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

के द्वारा: sonam saini sonam saini

सोनम सैनी किसी लडकी की आत्म व्यथा को ईतने मार्मिकता से व्यक्त किया है कि नहीं लगता यह एक कविता है या लेख है  यह आम लडकियों की व्यथा है समाज को सुव्यविस्थीत तौर पर चलाने एक भय के साक्षात्कार से बचने या बचाने को या स्त्री होने का  दंश सहन करना होता है शायद यह नियती है कितनी ईसका भेदन कर पाती हैं कितनी सामना करती हुई ठोकर खाती बडती हैं,,,,,,,, सामाजिक  प्रतिद्वंदिता महत्वांकांक्षा शायद सारे बन्धन तोडकर निकलने का साहस देती है किंन्तु नारी होने का दंश तो झेलना ही होगा ,,,,,   मां,,,,,,, य़ही एक शब्द या रिस्ता है जो नारी को  सर्वोच्च पद प्रदान करती है ,,,,,,,   ए मां,,,, तेरी सुरत से अलग भगवान की सुरत क्रया होगी  ,,,जिसको नहीं देखा हमने कभी,,,,,यह हर  संतान के अंतर्मन के भाव होते हैं भगवान भी शक्ति के विना अपने को असहाय मानते हैं  नारी सब कुछ सहते हुए, बंधनो मैं  रहते हुए,अपने घर वाहर के कर्तव्यों को करते हुए  अपने मात्र धर्म का प्रमुखता से पालन करते हुए जीवन विताती है वह प्रथीवी की तरह महान है असहाय नहीं ,,,,,,,,,,,,सोनम तुझे लाख लाख बधाई  ,,,हिम्मत ना हारना,,,,,

के द्वारा: hcsharma hcsharma

बहन सोनम जी! सबसे पहले आपको एक उच्च सम्मान के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ. बहुत ही सुन्दर मार्मिक और आज के परिवेश की जरूरत पूरी करती कविता है. इस मंच के सबसे बड़े सम्मान से आपकी रचना और आपकी काव्य प्रातिभा को नवाजा गया इसके लिए जागरण का भी आभार...परन्तु ये कविता के हिसाब से सम्मान बहुत छोटा है...लेकिन इससे बड़ा और कोई सम्मान नहीं है तो किया भी क्या जा सकता है जुगनूँ के पास जितनी रौशनी होगी उतनी ही दे सकता है...एक बार पुनः बहुत बधाई. और आने वाले भाई-बहन के प्यार भरे त्यौहार रक्षाबंधन की भी बहुत बधाई...सिर्फ ये दो पंक्तियाँ लिखना चाहता हूँ अन्यथा न लें यह पंक्तियाँ केवल "सोनम" के चेहरे को "सुमन" बनाने के लिए लिख रहा हूँ---हंसी आ जाए तो जरूर बताना- "राखी पर जितना बड़ा उपहार...भाई के प्रति बहन का उतना ज्यादा प्यार...."

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

के द्वारा: sonam saini sonam saini

के द्वारा: sonam saini sonam saini

के द्वारा: sonam saini sonam saini

के द्वारा: sonam saini sonam saini

के द्वारा: sonam saini sonam saini

के द्वारा: sinsera sinsera

मासूम सी हंसी , मासूम सा चेहरा लिए फिरती हो दुनिया की तुम परवाह कितनी करती हो ऐसी समझदार बेटियाँ हों अगर किसी की तो माँ न कभी बीमार पड़े किसी की सोनम बेटे मैंने एक तुम्हारे ऊपर कविता लिखने की कोशिश की है । लेकिन यह सच है कि तुम हो ही इतनी प्यारी और इस सच्चाई को तुमने अपनी कविता द्वारा साबित कर दिया और मम्मी लोगों की हठ भी । एक बात मैं भी तुमको बताऊ मुझे भी दवाई के नाम से सख्त नफरत है और मैं भी होम रेमेडीज में विश्वास रखती हूँ और दवाई के नाम से कतराती हूँ । हा हा हा मेरे ब्लॉग पर भी तुम आना अभी नई कविता '' जंग '' लिखी है उसे तुम जरुर पढना । इसमें तुम्हें सैनिक और सैनिक के परिवारों का दर्द देखने को मिलेगा ।

के द्वारा: Manisha Singh Raghav Manisha Singh Raghav

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

सुन्दर कविता , शुभकामनाये , आज मै एक ऐसी रचना लेकर आप सब के सामने उपस्थित हुआ हूँ, जिसे पढ़कर आप सब की आँखे नाम हो जायेगी. और यही हमारे देश की कड़वी सच्चाई भी है, इस कविता के माध्यम से मै ऋषभ शुक्ला, इस समाज का निर्दयी ही सही लेकिन है तो सच. आज हमारे समाज के लोग महिलाओ के प्रती वही पुरानी सोच रखते है जो वह हमेशा रखते आये है, और आगे भी ऐसी ही सोच रखने का इरादा है. गरीब माँ-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते है और वह संतान के रूप में एक बेटा चाहते है, और इसके लिए वह गर्भ में ही जाच के द्वारा उन्हें यदी पता चल गया की गर्भ में बच्ची है तो उसे इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते है, उस नन्ही सी जान को जो इस निर्मम दुनिया में आने को बेताब रहती है, उसकी सभी इच्छाओ को भी मार देते है . मै इस कविता के माध्यम से उस छोटी गुडिया के दर्द को आप सब से मुखातिब करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कृपया मेरी गुजारिश है की आप सब इस लिंक को देखे और उसके बारे में कम से कम दो शब्द कहे. यदी कमेंट देने में कोई असुविधा हो तो उसे लाइक करे या वोट करे. http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=25 शुक्रिया

के द्वारा: ऋषभ शुक्ला ऋषभ शुक्ला

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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