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ravi parkash maurya

Feature Editor, MP Jansandesh, Satna

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मानव मूत्र बनाम गोमूत्र की राजनीति

Posted On: 6 Feb, 2016  
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बीच बहस में राम और रावण

Posted On: 25 Oct, 2015  
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कंधे की चिंता

Posted On: 11 Aug, 2015  
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कविता में

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बहुत बदल गई ‘मां’

Posted On: 12 May, 2015  
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मॉडर्न मां

Posted On: 12 May, 2015  
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कॉमन मैन रिटर्न

Posted On: 23 Feb, 2015  
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क्योंकि गरीब ही बने रहना चाहता है भारत

Posted On: 17 Jul, 2014  
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केजरी कुछ भी करें, उनकी मर्जी

Posted On: 23 May, 2014  
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मोदी-केजरी की जीत बनाम बनारस का भविष्य

Posted On: 12 May, 2014  
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भाजपा को बहुमत न मिलने का डर

Posted On: 5 May, 2014  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: abhishek shukla abhishek shukla

हम लिखते क्यूँ हैं ?इसका सार इन शब्दों में पूर्णतया परिलक्छित होता है "हम जो लिखते हैं दवातों को लहू देते हैं कौन कहता है की लिखने के लिए बस कलम काफी है वैसे मेरी नजर में हम जो कुछ लिखते हैं उसके माध्यम से पढने वालों को एक सन्देश देना चाहते हैं की केवल दूसरों में गलतियाँ निकालने से अपनी गलती पर पर्दा डाला नहीं जा सकता क्यूंकि लेखन भी खुद के विचारों का आईना होता है जो आप लिखते हैं उससे आपके चरित्र आपके विचार और ब्यवहार इन सब बातों का भी पता चलता है और लेखन हमेशा ज्ञान वर्धक और लोगों को ग्राह्य लगे तभी वास्तव में वह लेखन है . अतः दूसरों को गलत कहने के पहले अपने गिरेबान में झाकना ज्यादा जरुरी है . आजकल "पर उपदेश कुशल बहुतेरे वाली कहावत ही सार्थक होती दिखाई दे रही है " इसे तुलसीदास ने रामायण में लिख दिया है ..

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