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विजय कुमार सिंघल


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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आपका कहना बिल्कुल सही है, जवाहर लाल जी. पहला इंटरव्यू था, नर्वस होना स्वाभाविक है. लेकिन वे नर्वस नहीं थे, बल्कि मूर्खतापूर्ण और टालू जबाब दे रहे थे, जिनका सवालों से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं था. इसीलिए लोगों को हंसने का अवसर मिल गया. कांग्रेस को इससे फायदा होना तो दूर रहा, भारी नुक्सान ही हुआ है. अगर राहुल गाँधी ऐसे एक-दो इंटरव्यू और दे दें तो मोदी जी की जीत पक्की हो जाएगी. हा...हा....हा.... दूसरी बात यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गाँधी ने आज तक किसी को इंटरव्यू तो क्या एक सवाल का भी जबाब नहीं दिया है. अगर उनका इंटरव्यू कर लिया जाये, तो भाजपा को प्रचार करने की आवश्यकता नहीं रहेगी, क्योंकि यह सिद्ध हो जायेगा कि सोनिया की बुद्धि का स्तर किसी बार डांसर से अधिक नहीं है.

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के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

इसका सीधा सा अर्थ यह भी है कि हमारे विद्यालयों में अध्यापक विद्यार्थियों को योग्य बनाने में कोई रुचि नहीं लेते और पढाने की खानापूरी करके चले जाते हैं। इसी कारण जिन विद्यार्थियों के माता-पिता आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे विद्यालयों की पढाई पर विश्वास नहीं करते और अपने बच्चों को ट्यूशन तथा कोचिंग भेजना ज्यादा पसन्द करते हैं। यह हाल सरकारी विद्यालयों का ही नहीं, बल्कि ऊँची फीस वसूलने वाले प्राइवेट शिक्षा संस्थानों का भी है। वैसे कोचिंग सेंटरों का स्तर भी कोई बहुत अच्छा नहीं है। इस परीक्षा में जो 93 प्रतिशत से अधिक उम्मीदवार असफल हुए हैं उनमें से बहुत से कोचिंग संस्थानों में भी जाते होंगे। फिर भी वे इंटरमीडियेट स्तर तक की परीक्षा भी उत्तीर्ण नहीं कर पाये, यह बेहद शर्मनाक है। इससे सिद्ध होता है कि वे वास्तव में अयोग्य हैं। अगर ऐसे अयोग्य लोग शिक्षक बनेंगे, तो आने वाली पीढी के विद्यार्थी योग्य कैसे होंगे? अभी भी सत्ता में जो लोग हैं उनकी अयोग्यता का कुपरिणाम हम भुगत रहे हैं। पता नहीं और कब तक भुगतना पडेगा। सबको पैसा चाहिए सिंघल साब

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क्या राहुल गाँधी इतने बड़े मूर्ख हैं जो यह भी नहीं समझ सकते कि एक मामूली अख़बार बेचने वाले लड़के के पास हज़ार के नोट के छुट्टे नहीं हो सकते? क्या इतना बड़ा मूर्ख प्रधान मंत्री के पद के लायक है? ५. कांग्रेस ने उस लड़के को हर महीने हज़ार रुपये देने का वायदा किया है. मैं नहीं मानता कि कभी ऐसा होगा, क्योंकि कांग्रेस के सारे वायदे झूठे ही होते हैं. लेकिन अगर यह वायदा सही मान लिया जाये, तो इसे कांग्रेस कि दरियादिली कहेंगे या मूर्खता, जो एक मेहनती लड़के को मुफ्तखोरी की आदत डालना चाहती है? क्या इससे अच्छा यह न होता कि वे उसकी स्कूल फीस देने कि व्यवस्था कर देते और उसके पिता को कहीं ऐसा काम दिला देते कि उस लड़के को अख़बार न बेचने पड़ें? पहली बात ये की वो वास्तव में ही मुर्ख हैं और दूसरी बात ये की आपको कलावती याद होगी जिससे ये राहुल महाशय महाराष्ट्र में मिले थे और उसका संसद में जिक्र किया था लेकिन क्या हुआ उसका ?

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आद. अनिल कुमार जी, टिप्पणी के लिए आभार. भाजपा ने येदियुरप्पा का बचाव इसलिए किया था कि वे वास्तव में निर्दोष थे, इसलिए नहीं की वह भ्रष्टाचार को चलने देना चाहती थी. अभी तक येदियुरप्पा के खिलाफ कोई भी मामला सही नहीं पाया गया है. जो शिकायतें आई थीं वे भी गलत सिद्ध हुई हैं. येदियुरप्पा को इसलिए हटाना पड़ा कि वहां के लोकायुक्त ने उनको गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया था. लेकिन येदियुरप्पा जी ने नै पार्टी बनाकर गलत कदम उठाया. उनको प्रतीक्षा करनी चाहिए थी. अगर वे भाजपा से अलग न होते, तो आज भी वहाँ भाजपा की ही सरकार होती और कांग्रेस को बहुमत न मिलता. जहाँ तक छवि की बात है, कांग्रेस की छवि भी कोई अच्छी नहीं है. फिर भी वह कई राज्यों में जीत गयी. यह सब राजनैतिक चालबाजी है और चुनाव प्रणाली की कमी है.

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प्रिय विजय जी , मै यहां आप से कतई सहमत नहीं हूं । वास्तविकता यह है कि अब कांग्रेस और  भजपा की संस्कृतियों मे कोई अन्तर नहीं रह गया है । एक समय था जब एक रेल हादसे पर लाल बहादुर शास्त्री ने तुरन्त त्यागपत्र दे दिया था । एक समय था जब लाल कृष्ण अडवाणी ने  हवाला कांड में नाम आने पर तत्काल अपने समस्त पद छोड दिये थे । परन्तु आज भाजपा ने  भी एक वर्ग विशेष के वोटों के लालच मे यदुरप्पा का शुरु में उसी प्रकार बचाव किया , जैसे कांग्रेस  आज अपने भ्रष्ट मंत्रीयों का बचाव कर रही है । मजबूरी में और देर से यदुरप्पा को हटाया गया ।  उसी का परिणाम भाजपा ने कर्नाटक मे भुगता है । चुनावों में हार जीत तो होती रहती है , परन्तु अपनी एक पृथक और स्वच्छ छवि बनाए रखना अधिक महत्वपूर्ण है ।

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के द्वारा: Vijay Singhal Vijay Singhal

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अब प्रश्न उठता है कि राजग के प्रमुख सहयोगी दलों के मोदी-विरोध का कारण क्या है? यह कारण बिल्कुल स्पष्ट है। वे जानते हैं कि यदि मोदी जी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके चुनाव लड़ा जाता है, तो भाजपा उम्मीदवारों को आम जनता का इतना समर्थन मिलेगा कि उसकी अपनी सीटों की संख्या 200 को भी पार कर सकती है। ऐसा होने पर सहयोगी दलों का महत्व घट जाएगा। इसलिए वे किसी भी कीमत पर भाजपा की सीटों की संख्या अधिक नहीं बढ़ने देना चाहते। लेकिन यह रवैया अपनी नाक कटाकर दूसरों का अपशकुन करने की नीति की तरह ही मूर्खतापूर्ण कहा जाएगा। सहयोगी दल चाहें या न चाहें, आम भारतीय मोदी जी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है और वह देखेगा। बहुत सटीक बात कही , लेकिन ये बात आखिर में आई , पहले आती तो शायद और प्रभावी होती ?

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तीसरे नम्बर पर हैं मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाले दल और नेता। इनके लिए देश के ऊपर सबसे पहला हक मुसलमानों का है, बाकी देशवासी बाद में आते हैं। इसलिए कहीं पर भी सत्ता में आते ही ऐसे कानून और योजनायें बनाते हैं, जिनसे कुछ मुट्ठीभर मुसलमानों को सीधे फायदे हों तथा वे फायदे अन्य समुदायों को न हों। मुस्लिमों के लिए आरक्षण की घोषणा करना, केवल मुस्लिम बच्चों को वजीफा देना, उर्दू को अनावश्यक महत्व देना आदि इनके कुछ कार्य हैं। वे कभी भी ऐसी योजनायें नहीं निकालते, जिनसे सभी देशवासियों का फायदा हो। वे यह कभी नहीं सोचते कि अगर संसाधन केवल एक वर्ग के लिए खर्च किये जायेंगे, तो दूसरे वर्गों में उस वर्ग के प्रति अच्छे विचार तो नहीं ही बनेंगे। जैसे केवल मुस्लिम लड़कियों को परीक्षा पास करने पर हजारों रुपये का इनाम देना और बाकी लड़कियों को कुछ न देना आदि। वे पूरी बेशर्मी से मुस्लिम तुष्टीकरण करते हैं और इस बात को छिपाते भी नहीं हैं। आपने जितनों के भी नाम लिए मुझे उनमें से ये सबसे ज्यादा खतरनाक लगते हैं ! बहुत व्यावहारिक लेखन दिया है सिंघल साब !

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