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घर में हुए बेगाने

Posted On: 16 Nov, 2017 Others में

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Abhinay Aakash

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सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई से इनकार दिया, जिसमें देश में आठ राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग की गई थी. कोर्ट ने कहा कि इस मामले में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को ज्ञापन दें. देश की सर्वोच्च अदालत में भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने अर्जी दाखिल कर देश के 8 राज्यों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग की थी.


याचिका में कहा गया कि आठ राज्यों- लक्ष्यद्वीप, मिजोरम, नगालैंड, मेघालय, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब में हिंदुओं की जनसंख्या बेहद कम है, उन्हें यहां अल्पसंख्यक का दर्जा मिले ताकि सरकारी सुविधाएं मिल सकें. अपील में कहा गया कि अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं मिलने से इन राज्यों में हिंदुओं को बुनियादी अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा है. मांग यह भी की गई कि 1993 में केंद्र सरकार की तरफ से जारी अधिसूचना को असंवैधानिक घोषित कर दिया जाए, जिसमें मुस्लिम, सिख, ईसाई समेत कई मजहब के लोगों को अल्पसंख्यक दर्जा दिया गया था.


जिस देश में हिन्दू बहुसंख्यक हैं, वहां हिन्दुओं का अल्पसंख्यक होना सुनने में थोड़ा अजीब जरूर लगता है, लेकिन यह सच भी है. साल 2011 के जनगणना के मुताबिक, लक्ष्यद्वीप में हिन्दू 2.5% हैं, जबकि अल्पसंख्यक घोषित मुस्लिम 96.58%. जम्मू कश्मीर में 28.44% हिन्दू हैं, तो मुस्लिम 68.31%. मिजोरम में 2.75% हिन्दू हैं, लेकिन अल्पसंख्यक का दर्जा पाए ईसाई 87.16% से ज्यादा हैं.


इसी तरह नागालैंड में हिन्दू 8.75% हैं और ईसाई 87.93%. वहीं अगर बात करें मेघालय की तो यहां हिन्दुओं की संख्या 11.53% और ईसाई 74.59% हैं. अरूणाचल प्रदेश और मणिपुर में भी अल्पसंख्यक ईसाईयों की आबादी हिन्दुओं से काफी ज्यादा है. आबादी के हिसाब से पंजाब में भी हिन्दू कम हैं. यहां हिन्दू 38.4% हैं, जबकि सिख 57.69% हैं.


याचिकाकर्ता के अनुसार इन राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं मिलने से उन्हें सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं. अश्विनी ने उदाहरण देते हुए कहा, ‘भारत सरकार हर साल 20 हजार अल्पसंख्यकों को टेक्निकल एजुकेशन में स्कॉलरशिप देती है. यह स्कॉलरशिप इन आठ राज्यों में हिंदुओं को नहीं मिल पाती. जबकि जम्मू-कश्मीर में 68.30 फीसदी मुस्लिम हैं, वहां सरकार ने हाल में 753 में से 717 मुस्लिम स्टूडेंट्स को स्कॉलरशिप दी. इस राज्य में हिंदू स्टूडेंट्स मुस्लिमों से कहीं कम हैं, लेकिन उन्हें स्कॉलरशिप का लाभ नहीं मिला.


दूसरी बात यह है कि लक्ष्यद्वीप में मुस्लिम 96.20%, असम में 34.30%, वेस्ट बंगाल में 27.5% और केरल में 26.6% हैं, लेकिन यहां उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा मिला हुआ है, तो फिर जिन राज्यों में हिंदू कम हैं, वहां उन्हें अल्पसंख्यक क्यों नहीं माना जाता. गौरतलब है कि संविधान के अनुच्छेद 25 से लेकर 30 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता, शैक्षणिक व सांस्कृतिक अधिकार मिले हुए हैं. इन अधिकारों के तहत सरकार अल्पसंख्यक समुदाय के शैक्षणिक, सांस्कृतिक और सामाजिक उत्थान के लिए काम करती है.


केंद्र सरकार ने 23 अक्टूबर 1993 को नेशनल कमिशन फॉर माइनॉरिटी एक्ट 1992 के तहत नोटिफिकेशन जारी किया था और इसके तहत पांच कम्युनिटी- मुस्लिम, क्रिश्चियन, सिख, बौद्ध और पारसी को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया गया है. बाद में 2014 में जैन समुदाय को भी इस लिस्ट में शामिल किया गया है.


क्या सुविधाएं मिलती हैं


संविधान के अनुच्छेद 25 से लेकर 30 के प्रावधानों के मुताबिक अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का संरक्षण, अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को धार्मिक, सामाजिक और शैक्षणिक कार्यों के लिए सरकारी सहायता, अल्पसंख्यक संस्थान खोलने के लिए सब्सिडी, इसमें अल्पसंख्यक छात्रों को आरक्षण, धार्मिक कार्यों के लिए भी अल्पसंख्यकों को सब्सिडी, अल्पसंख्यकों के लिए प्रधानमंत्री के 15 सूत्रीय प्रोग्राम के तहत रोजगार पर कम दर पर लोन, हर साल 20 हजार अल्पसंख्यकों को टेक्निकल एजुकेशन में स्कॉलरशिप.


केंद्र के राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की तर्ज पर राज्यों में भी अल्पसंख्यक आयोग की शुरुआत हुई, लेकिन अभी भी देश के 15 से ज्यादा राज्य ऐसे हैं, जहाँ राज्य अल्पसंख्यक आयोग काम नहीं कर रहा है. इसी वजह से जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर भ्रम की स्थिति कायम है और जिस समुदाय को अल्पसंख्यक माना जाना चाहिए, उसके उलट लोगों को लाभ मिल रहा है.


राजनीतिक दल अल्पसंख्यकों के नाम पर भले ही किसी धर्म विशेष के अधिकारों की वकालत करते हों, लेकिन आंकड़ों की इस जमीनी हकीकत ने सियासत के बाजार को गर्म कर दिया है. बता दें इस मामले में बदलाव संसद से ही सकता है, ऐसे में गेंद सत्तारूढ़ पार्टी के पाले में है और देखना दिलचस्प होगा की केंद्र सरकार इस मामले को कितनी गंभीरता से लेती है या फिर कश्मीरी पंडितों के पुर्नावास के मुद्दे की तरह यह मामला भी सियासत की भीड़ में वक्त के साथ तन्हा और अकेला हो जाएगा.

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