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ऐसा क्यों होता है?

Posted On: 23 Dec, 2011 Others में

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abodhbaalak

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कुछ समय पहले मेरी अपने एक मित्र से बात हो रही थी और बात ही बात में किसी के बारे में कुछ ऐसी बात पता चली कि मन अशांत हो गया.
 
हुआ ये की एक युवक और युवती में प्रेम हुआ, जो काफी समय समय तक चलता रहा, प्रेम के गीत गए गए, साथ जीवन बिताने के ढेर सारे वादे, भविष्य के सुनहरे ख्वाब………………, समस्या ये थी को दोनों ही अलग अलग धर्म को मानने वाले थे. पर प्रेम में पड़ने के बाद लोग कहा इन  बातों  को सोचते हैं? उनकी तो दुनिया ही अलग होती है. यहाँ ये भी बताता चलूँ की ये बात एक छोटे शहर की है, किसी मेट्रो सिटी की नहीं, जहाँ लोग अपने अपने घर के बाहर कम ही झाकते हैं,
 
कुछ समय के बाद लड़की के घर में इस बात की भनक लग गयी, और उसके घर से बाहर आने जाने पर रोक टोक लगने लगी, और तब इस प्रेमी युगल ने घर से बाहर भागने का प्लान बनाया,  और एक दिन दोनों  भाग भी निकले,  लड़की के घर वालो ने पुलिस में शिकायत  की, और पुलिस ने उन दोनों को पकड भी लिया, लड़की के घर वालो ने क्योंकि लड़के पर लड़की को भगाने का आरोप लगाया था इस लिए उसे पुलिस ने उसे गिरफ्तार का उसपर केस बनाया, इसी बीच एक खास पार्टी के लोग इस मामले में  जुड़ गए, मोर्चे निकलने लगे, जो बात प्रेम कि थी, वो धर्म कि  रक्षा में, धर्म संकट में है में  बदल गयी और लड़के पर सख्त से सख्त कदम उठाने के मांग ……, इधर  लड़की पर तरह तरह से घर वालो के प्रेशर पड़ रहे थे, और अंततः लड़की ने बयान दिया के ये लड़का मुझे ज़बरदस्ती ………………
 
लड़के के पास लड़की के कुछ पत्र थे जो की उसने दिखाए और फिर उसके मोबाइल पर लड़की की मोबाइल से आई हुई काल्स से ये तो साबित हो गया की लड़के और लड़की अजनबी नहीं थे और उनमे प्रेम था और इसलिए केस में थोडा …………
 
इस लेख को लिखने का मेरा  अभिप्राय ये  है की इस तरह के रिश्ते अक्सर ही ऐसे अंजाम को पाते हैं, मै लड़की को  दोष  नहीं दे  रहा, जब माँ बाप अपने खून का /दूध का वास्ता दें, बाकी बहनों के रिश्ते की बात करें, समाज में कटने वाली नाक का हवाला, और ना जाने इस तरह के कितने इमोशनल ……………., तो लड़की का उस समय अपने बात पर खड़ा रहना आसान  नहीं होता है, और ये लड़के के बारे में भी कहा जा सकता है ( ऐसा ही उनके साथ भी होता है) पर इस तरह की घटना से प्रेम जैसी बात से विश्वास उठने लगता है. या तो प्रेम  ही जात, धर्म, सम्प्रदाय देख कर करना चाहिए, पर वो प्रेम कहाँ हुआ, वो तो एक तरह का ……………., 
 
हालांकि आजकल प्रेम, टीवी और फिल्मो में जिस तरह से परोसा जा रहा है वो प्रेम के बजाये कुछ और ही बन गया है, अपरिपक्व नौ जवानो की जिस तरह का वातावरण मिल रहा है वहां प्रेम केवल शारीरिक आकर्षण बन कर रहा गया है, पर फिर भी प्रेम, प्रेम है, वो प्रेम जो हीर रांझा का था, सोहनी महिवाल का, लैला मजनू का, जहाँ दिल को बात होती थी.
 
 ऊपर वर्णित घटना मन में प्रश्न खड़े कर देती है की क्या दो धर्म/ जात को मानने वाले एक दुसरे के साथ प्रेम नहीं कर सकते, क्या वो एक साथ जीवन नहीं बिता सकते, क्या उन्हें इसका हक नहीं है?
 
या  ये, के इस पूरे प्रकरण से क्या निष्कर्ष निकालूँ, क्या उन दोनों का प्यार प्यार ना हो होकर केवल एक बचपना था, या ये कि अगर दोनों एक धर्म के होते तो शायद ऐसा ना होता, या ये कि लड़की अगर हिम्मत दिखाती तो इसका अंत सुखद भी हो सकता था, या ये के प्रेम करने के पहले ही हमें उससे जुड़े हर पक्ष पर गौर भी करना चाहिए ( पर ये प्रेम कहाँ रहा , प्रेम तो एक सव्भाविक प्रतिक्रिया हैं जो सोच विचार करके नहीं किया जाता ), या ये कि ……………., बहुत सारे प्रश्न है जिनका उत्तर मै ढूंढ नहीं पर रहा.
 
क्या आपके पास है इनके उत्तर ?

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