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" दांव पर लग गई आजतक की उमर "

Posted On: 27 Jan, 2014 Others में

kavitameri bhavnaon ka sangrah

Acharya Vijay Gunjan

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जागता ही रहा चाँदनी के लिए रात भर चाँद घन में छुपा ही रहा !
=
भावनारण्य में मन भरमता रहा
भाव जाने न कितने तिरोहित हुए ,
बादलों ने बदल आचरण निज दिए
और छद्मोन्मेषी पुरोहित हुए |
=
दे गया भ्रम पुनः कर गया विभ्रमित चित्त फिर भी न विचलित हुआ सब सहा !
जागता ही रहा चांदनी के लिए रात भर चाँद घन में छुपा ही रहा ! !
=
आज अवकाश आकाश में ना रहा
ग्रह-उपग्रह सभी लड़खड़ाने लगे ,
घोर गर्जन गरज घन किये इस तरह
सृष्टि के चर-अचर थरथराने लगे |
=
वात वातायनों से बहक वेग से कल्पना-गंध को अब दिया ही बहा !
जागता ही रहा चांदनी के लिए रात भर चाँद घन में छुपा ही रहा ! !
=
भाव आराधना-साधना के सभी
भंग होके पृथक दूर मुझसे हुए ,
दांव पर लग गई आजतक की उमर
हर कदम दर कदम रोज हारे जुए |
=
ज़िन्दगी कट गई इस तरुण उम्र में वेदना की नदी में नहा ही नहा !
जागता ही रहा चांदनी के लिए रात भर चाँद घन में छुपा ही रहा ! !
आचार्य विजय ‘ गुंजन ‘

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