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दो छांदस कविताएँ

Posted On: 29 Jan, 2014 Others में

kavitameri bhavnaon ka sangrah

Acharya Vijay Gunjan

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हवा सुनाती है कानों में परम अलौकिक छंद ( एक )
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हृदय सहज ही हर लेते हैं ये सरसों के फूल !
=
सिर ऊँचे कर – कर खेतों में
गेहूँ कुछ बतियाते ,
सृजन-कथा रचते किसान की
श्रम-महिमा को गाते |
=
अन्न-देवता पावन है तेरे चरणों की धूल !

हृदय सहज ही हर लेते हैं ये सरसों के फूल !!
=
तीसी के बैगनी पुष्प की
सुषमा बड़ी निराली ,
पसर आँख में बरबस जाती
मटरों की हरियाली |
=
चना खेत से हुलक-हुलककर होता सदा प्रफुल्ल !
हृदय सहज ही हर लेते हैं ये सरसों के फूल !!
=
दिशा-दिशा में फैल गई है
आज अरहरी गंध ,
हवा सुनाती है कानों में
परम अलौकिक छंद |
=
ऋतु वसंत को मुखर देखकर शिशिर हुआ निर्मूल !
हृदय सहज ही हर लेते हैं ये सरसों के फूल !!
=
स्वयं कल्पनाओं की लगती साँकल हिलने ( दो )
=
मन में रीतापन भरता है यह उदास दिन !
=
पता नहीं क्या-क्या होता है
अंदर – अंदर ,
अनायास भावों के उठते
सात समुन्दर |
=
हो जाता तब पलभर में ही ख़ास-ख़ास दिन !
मन में रीतापन भरता है यह उदास दिन ! !
=
चिंतन-पट जब धीरे-धीरे
लगता खुलने ,
स्वयं कल्पनाओं की लगती
साँकल हिलने |
=
तब लगता है कितना सुन्दर पास-पास दिन !
मन में रीतापन भरता है यह उदास दिन ! !
=
कई दूधिये रंग फूल के
तरने लगते ,
मन में अनगिन कोमल भाव
सँवरने लगते |
=
पसर आँख में जाता खिलकर काँस-काँस दिन !
मन में रीतापन भरता है यह उदास दिन ! !
आचार्य विजय ‘ गुंजन ‘

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