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मगर अतृप्त मन फिर भी.......

Posted On: 9 Feb, 2014 Others में

kavitameri bhavnaon ka sangrah

Acharya Vijay Gunjan

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C6302J बहुत अच्छे मुझे लगते
तुम्हारे प्रेम के दोहे !
=
हृदय में चासनी सी घोलती
हरपल मधुर पाती,
मृदुलतम भावनाओं से पगी
सौगात है लाती |
=
नयन-युग बाट अपलक राह में
हरकार की जोहे !
बहुत अच्छे मुझे लगते
तुम्हारे प्रेम के दोहे !!
=
निमंत्रण के सभी अक्षर
अपरिचित नेह में डूबे,
पले पुलकित ह्रदय की घाटियों में
रोज मंसूबे |
=
अलंकृत भंगिमाएँ भाव की मन-हिरण को मोहे !
बहुत अच्छे मुझे लगते तुम्हारे प्रेम के दोहे !!
=
अलौकिक कल्पना के दर्पणों में
रूप को झाँकूँ
कपोली – लालिमा पर ‘ अनुष्टुप ‘ के
गणों को टाँकूँ |
मगर अतृप्त मन फिर भी ‘यमक-अनुप्रास’ को टोहे !
बहुत अच्छे मुझे लगते तुम्हारे प्रेम के दोहे !!
-आचार्य विजय ‘ गुंजन ‘

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