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श्री रामाष्टकम -राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा ||

Posted On: 7 May, 2015 Others में

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acharyashivprakash

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राज्य किये मनु कोशल में बहु काल गए मन माहिं विचारा | भूप कहै शतरूप प्रिये बिनु धर्म वृधा मम जीवन सारा || नैमिष तीर्थ प्रसिद्ध महा तप त्याग धरा तंह भूप पधारा | राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा || ब्रह्म अगोचर निर्गुण जो सुखराशि सदा अज विष्णु पियारा | शम्भु सदा जेहि ध्यान करैं ऋषि देवन के तप का उजियारा || जासु स्वरूप भुसिंडि हिये मनु को वह रूप लगा अति प्यारा | राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा || धेनुमती तट बैठि गए शतरूप व् भूप तपी तनु धारा | ध्यान करैं अखिलेश्वर का तन क्षीर्ण किया तप योग सँभारा || विष्णु महेश विरंचि सबै तंह आइ कहे वर लेहु हमारा | राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा || भूप न रंच डिगा तप से शतरूप तपी तन योग पसारा | वेदन ने जेहि नेति कहा प्रकटा सोइ ब्रह्म अगोचर तारा || भूपति मांगु जो तोहि सोहाय प्रसन्न हुआ तप देखि अपारा || राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा || चाह न स्वर्ग न मोक्ष मिलै मोहि पुत्र मिलै तुम सा अति प्यारा | ब्रह्म कह्यो मनु से नृप मैं बनिहौं तव पुत्र प्रतिज्ञ सितारा || देवि सती वर मांगि कही बन पुत्र प्रभो करना भव पारा | राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा || भूप बहोरि बनें मनु थे दशरत्थ प्रसिद्ध सुदेह सो धारा | रानि सयानि कौशिल्या बनी शतरूप पुनः तपरूप विचारा || राम प्रभो प्रकटे परब्रह्म धरा पर भा प्रभु का अवतारा | राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा || रानि निहारि कौशिल्या रही परब्रह्म चतुर्भुज रूप संवारा | आदि अनादि अखंड अभेद अगोचर गोचर सा अति न्यारा || निर्गुण ब्रह्म स्वरूप धरै परब्रह्म सदा भक्तन रखवारा | राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा || लंक में भीषण युद्ध हुआ रणकर्कश राम ने रावण मारा | राम नमामि नमामि प्रभो तुमने ऋषि गौतम नारि को तारा || दीन हुआ शिव दास प्रभो बस केवल आपका एक सहारा | राम सदा सुखधाम प्रभो शुचि सुन्दर शील स्वरूप तुम्हारा || आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी ९४१२२२४५४८

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