blogid : 14295 postid : 1323565

केवल पथ अज्ञान का जाय ज्ञान के देश

Posted On: 8 Apr, 2017 Others में

Achyutam keshvamहम समय शम्भु के चाप चढ़े सायक हैं. हम पीड़ित मानवता के नव नायक हैं हम मृतकों को संजीवन मन्त्र सुनाते हम गीत नहीं युग गीता के गायक हैं

achyutamkeshvam

99 Posts

250 Comments

क्या मेरी सामर्थ्य माँ ,रचूँ गजल या गीत .
मैं तो तेरी बाँसुरी ,गुँजित तव संगीत ..

हिन्दी भाषा हिन्द की ,कल्याणी सुखधाम .
जहाँ उपेक्षित यह रहे,वहाँ विधाता वाम ..

विश्व क्षितज पर देश का ,दिन-दिन बढ़े प्रताप .
पर अवलम्बन अनुकरण ,त्याग सकें यदि आप ..

हिन्दी के उत्कर्ष में ,हम सबका उत्कर्ष .
अगर बढ़े यह तो बढ़े ,जन-गण-मन का हर्ष ..

निज भाषा संस्कृति कला ,पर धरकर विश्वास.
जगत्गुरू हो माँ पुनः ,मिलकर करो प्रयास ..

हस्त आमलक वत उसे ,स्वर्ग और अपवर्ग .
राष्ट्र याग में जो करे ,प्राणों का उत्सर्ग ..

जाति-वर्ग-मत-पन्थ के ,यदि मिट जाए विभेद .
तो पलभर में दूर हो ,माँ के हिय का खेद ..

दल-दल में कुक्कुट खड़े,अलग-अलग है बांग .
फूट फ़्लू रुक जाएगा ,इनकी तोड़ो टांग ..

पग -पग बैठे वहाँ ,मिलते गधे अनेक .
संसद धोबी घाट सी ,गूँज रही है रेंक ..

खूब कही सरकार ने ,उन्नति युक्ति अजीब .
मिटे गरीबी ना मिटे ,पर मिट जाए गरीब ..

जीवेम बजटश्शतम ,करिये जाप अटूट .
जाने कब इस लठ्ठ से जाय खोपड़ी फूट ..

किया हंस का निष्क्रमण ,आज भोगिये पाप .
उल्लू कौए शेष हैं ,किसे चुनेगे आप ..

टुकड़ा-टुकड़ा बांटते ,काट-काट दिल केक .
नुक्कड़ चौराहे गली ,खड़े हुए दिल फेंक..

नर तेरे कर सत्य की दोधारी करवाल .
अभ्यासी की रक्षिका ,अनभ्यस्त की काल ..

रिश्ते नाते मित्रता ,सब मोबायल फोन .
शेष रहे रंगीनियाँ ,फिर हम तेरे कौन..

भेज दिए जिस देश ने अन्तरिक्ष में यान .
उसकी धरती पर मरे ,खाकर जहर किसान ..

उन अँखियन में चाँद है,इन अँखियन में नीर.
एक देश परिवेश है,अलग-अलग तकदीर ..

जिसमे हवा गुरूर की ,उसका कैसा हाल.
ठोकर खाती डोलती ,जगह-जगह फ़ुटबाल ..

अंतरतम की प्रेरणा ,ज्यों प्रकाश की रेख.
अमा निशा को भेदकर ,प्रज्ञा लेती देख..

मिटते तर्क -वितर्क जब ,अह्म गया सुरधाम .
मन के आँगन में तभी ,प्रकटें राजा राम..

परम सत्य की झलकियाँ ,जिसे कहें भ्रम लोग.
और नहीं माया कहीं ,और न कुछ संयोग ..

पिता गुरु परमात्मा ,विकट लगायें मार .
मार नहीं वह प्यार है ,करता बेड़ा पार ..

मेरे प्रभु तुमने दिया ,मुझे नरक में ठौर .
योग-क्षेम तव हाथ में,बस चिंतित मन चोर..

मेरे प्रभु तुमने दिया ,मुझे नरक में ठौर.
जैसी करनी भर रहा ,क्यों मांगूं कुछ और..

तर्क प्रेम का शत्रु है ,कीर्ति शत्रु अभिमान .
अपनी भ्रांति अपूर्णता, कौन सका है जान ..

जो अशिष्ट में शिष्टता ,और घृण्य में प्रेम .
देखा करता है सदा ,सच उसका व्रत नेम ..

तरह-तरह की बोतलें,पर इनका क्या काम .
साकी भर दे जाम तू ,छक जाए यह शाम ..

अलग-अलग हैं बोतलें,अलग-अलग हैं गंध .
तू ढाले जा स्वाद सब ,नशा न होवे मंद..

सबके आगे खेलते ,पाप-पूण्य का खेल .
पर्दे के पीछे करे,पाप पूण्य से मेल..

करते उत्कट अभीप्सा, के सँग अथक प्रयास .
सागर पथ देते उन्हें ,झुकते गिरि सायास ..

अपने जीवन को रचे ,मौत विश्व जंजाल .
तू परिवर्तन कर सके ,जीवन में कर डाल ..

मृत्यु न होती विश्व में ,क्या होता अमरत्व .
बिना क्रूरता प्रेम का ,जग में नहीं महत्व ..

होता केवल ज्ञान ही ना होता अज्ञान .
तो भू पर रहता सदा,हीन-क्षीण विज्ञान ..

देख कुटिल संसार को, मनमत पाल विराग .
स्वयं सदाशिव धारते अंग-अंग पर नाग ..

देश न दुःख करना कभी ,पढ़कर गत इतिहास .
हुआ कभी न महान वो,नहीं रहा जो दास ..

जल्दी-जल्दी चल सखे ,अभी न ले विश्राम .
पथ के अंतिम छोर पर ,करें प्रतीक्षा राम..

टीला जिनका लक्ष्य है ,चढ़ जायेंगे दौड़ .
ओ!आरोही हिमल के ,मत कर उनकी होड़ ..

दृष्टि टिकी हो लक्ष्य पर ,पर मन हो निष्काम .
चलने का संकल्प हो ,सदा सहायक राम..

घटनाएँ संसिद्ध हैं ,अभिव्यक्तित सायास .
जीवन फीचर फिल्म सा ,मन मत लगा कयास ..

विश्वातीत स्वतन्त्रता ,के हित कर दो त्याग .
इससे बढ़कर है नहीं ,कोई जप-तप-याग ..

शाष्त्र वचन अभ्रांत हैं ,आत्म दृष्टि यदि प्राप्त .
हृदय बुद्धि की व्याख्या ,किन्तु नहीं पर्याप्त..

हिमगिरि से ऊँचे उठो ,सागर से गम्भीर.
मन सम्वेदनशीलता ,जाय क्षितिज को चीर..

सन्यासी तो वेश से ,हो सकता है ज्ञात .
मन की मुक्तावस्थता ,सदा रहे अज्ञात ..

गुप्ताकर्षणवत करे ,मन में घृणा निवास .
खुद अपने अस्तित्व पर,करे नहीं विश्वास..

स्वार्थ और संकीर्णता ,घृणा मिलाकर तीन .
हठवादी बनता मनुज ,तर्क-कुतर्क प्रवीन ..

जग आवर्ती दशमलब ,पूर्ण अंक है राम .
आदि अंत आभास हैं ,श्रृष्टि चले अविराम ..

हर चहरे पर रिक्तता ,साधे बैठी मौन .
सन्नाटे की है व्यथा ,मुझे सुनेगा कौन ..

शांत प्रतीक्षारत रहो,शब्द त्याग दो काश .
घृणा करो मत भूत से ,ना भविष्य से आस ..

तिमिर ज्योति बन जाएगा ,जड़ता होगी नृत्य.
मौन कथ्य हो जाएगा ,सपने होंगे सत्य..

ओ!अन्वेषी सत्य के ,तज दो भावावेश .
केवल पथ अज्ञान का,जाय ज्ञान के देश ..

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (16 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading...
  • Facebook
  • SocialTwist Tell-a-Friend

अन्य ब्लॉग